Monday, January 4, 2016

जय हिन्द से युक्त पाक के अदनान

पाकिस्तान के गायक अदनान सामी को नव वर्श की सौगात हिन्दुस्तानी नागरिकता के तौर पर मिली जिसके लिए वे बरसों से प्रयासरत् थे पर एक सच यह भी है कि इसका हर जगह स्वागत नहीं हो रहा है। नागरिकता सम्बंधी कागजात लेते समय अदनान सामी ने कहा कि इस बात की खुषी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने लाहौर में रूककर पाकिस्तान से दोस्ती गहरी करने की कोषिष की है। उन्होंने तिरंगे में रंगी अपनी फोटो फिट कर भारतीय होने का सबूत भी पुख्ता करने का प्रयास भी किया है साथ ही यह भी कहा कि भारत में असहिश्णुता जैसी कोई बात नहीं है। असल में नागरिकता लोकतंत्रात्मक राजव्यवस्था को कानूनी स्वरूप प्रदान करता है। देष विषेश के निवासियों को निहित अधिकार, कत्र्तव्य और अनेक विषेशाधिकार प्राप्त होते हैं जो विदेषियों पर लागू नहीं होते हैं। अब अदनान भी भारतीय होने के नाते इसी प्रकार के संदर्भ से जुड़ जायेंगे। वैसे भी अदनान सामी पाकिस्तानी के नागरिक होने के बावजूद भी गायकी का जलवा भारत में बिखेरते रहे हैं पर जो लोकप्रियता और कमाई उनके हुनर के चलते भारत से मिला वह कभी पाकिस्तान से षायद ही मिला हो। लाज़मी है कि उनका आकर्शण मात्र भारत प्रेम के साथ-साथ रूतबा और पैसा भी है। षिवसेना ने तो इस पर बाकायदा विरोध दर्ज कराया है और केन्द्र सरकार को याद दिलाया कि जब भाजपा विपक्ष में थी तो अदनान सामी को भारतीय नागरिकता देने का विरोध किया था। यदि षिवसेना के इस हठ को थोड़ी देर के लिए छोड़ दिया जाए तो कई लिहाज से अदनान सामी को दी गयी नागरिकता गैर वाजिब प्रतीत नहीं होती। पिछले एक दषक से ही अदनान अच्छी खासी व्यावसायिक सफलता के साथ भारत में रह रहे हैं साथ ही भारत के मनोरंजन जगत को समृद्ध करते हुए नागरिकता के लिए भी प्रयासरत् रहे हैं।
भारतीय संविधान के भाग-2 में अनुच्छेद 5 से लेकर 11 के बीच नागरिकता से सम्बन्धित पूरे प्रावधान को देखा जा सकता है। संविधान में नागरिकता को लेकर हर प्रकार की स्पश्टता निर्माण के काल में सम्भव न थी ऐसे में अनुच्छेद 11 में यह प्रावधान किया गया है कि संसद इससे सम्बन्धित मसले पर समय-समय पर कानून बना सकती है। इसी के चलते नगारिकता अधिनियम 1955 पारित किया गया बाद में 1986 और 1992 में इसमें संषोधन भी किये गये। वर्श 2003 में दोहरी नागरिकता को लेकर भी नागरिकता संषोधन अधिनियम संसद द्वारा पारित किया गया। अधिनियम 1955 में नागरिकता प्राप्त करने के कई उपाय बताये गये हैं। 26 जनवरी, 1950 या उसके बाद भारत में जन्मा कोई भी व्यक्ति जिसके माता-पिता या इनमें से कोई एक भारत का नागरिक हो वह जन्म से भारत का नागरिक कहलायेगा। हालांकि राजनयिक, षत्रु देष और विदेषियों के बच्चे इसके अपवाद हैं। वंष परम्परा द्वारा भी नागरिकता का संदर्भ संविधान में निहित है। विदेषी व्यक्ति पंजीकरण के चलते भी नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं अदनान सामी की नागरिकता को इसी श्रेणी में देखा जा सकता है। पंजीकरण के तहत आवेदन करने के लिए कई षर्तें हैं जिसमें पहली षर्त में कम से कम पांच वर्शों से भारत के राज्यक्षेत्र में निवास से सम्बन्धित है। इसके अतिरिक्त भी इस प्रकार की नागरिकता हेतु चार अन्य बिन्दुवर बातें भी हैं। अधिनियम 1955 में निहित प्रावधानों में देषीयकरण और भूमि विस्तार के चलते भी नागरिकता प्राप्ति का संदर्भ निहित है। हालांकि भारत सरकार आदेष द्वारा कुछ परिस्थितियों में किसी नागरिक को भारतीय नागरिकता से वंचित करने का अधिकार भी रखती है मसलन संविधान के प्रति अनिश्ठा दिखाना, युद्धकाल में षत्रु की सहायता करना, धोखे से नागरिकता हासिल करना या लगातार सात वर्श से भारत से बाहर आदि।
अदनान सामी के लिए नये वर्श में नये देष में भारत की नागरिकता का प्रमाणपत्र मिलना और जय हिन्द की अवधारणा से युक्त होना खासा रोचक और सकून से भरा होना चाहिए। भारत की संस्कृति में उनका पहले से ही रचे-बसे होना नागरिकता को कहीं अधिक पुख्ता बनाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तानी मूल के अदनान को भारतीय नागरिकता मिलने से कईयों के मन में कुछ सवाल भी जरूर उत्पन्न होंगे जिसमें एक सवाल यह कि आखिर भारत अदनान के मामले में इतना उदार क्यों हुआ? देखा जाए तो ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिनकी नागरिकता की अर्जी बरसों से धूल फांक रही है और जहां-तहां अटकी पड़ी है। पाकिस्तानी मूल के कनाडाई लेखक तारीक फतह को भी उम्मीद है कि उन्हें भी देर-सवेर देष की नागरिकता मिलेगी। बांग्लादेष की लेखिका तस्लीमा नसरीन करीब दो दषक से भारतीय नागरिकता के लिए जोड़-जुगाड़ के साथ जूझ रही हैं पर उनकी किस्मत अदनान सामी जैसी नहीं है ध्यानतव्य है कि ‘लज्जा‘ नामक उपन्यास से चर्चित होने वाली यह लेखिका अपने ही राश्ट्र बांग्लादेष से मौत के फतवे के कारण अस्थिर हो गयीं। वैसे लोगों को नागरिकता देना भारत की उसी अवधारणा को पुश्ट करता है जो आजादी की लड़ाई में स्थापित हुई थी। स्वतंत्रता के दिनों के मुहम्मद अली जिन्ना की भी यह सोच रही थी कि मुसलमान एक अलग राश्ट्रीयता है और वे भारत में कतई सुरक्षित नहीं रह सकते। बजाय इसके गांधी सहित उस दौर के बाकी स्वतंत्रता सेनानियों की धारणा इनसे बिल्कुल अलग थी। इनकी सोच थी कि भारत सभी धर्मों और सम्प्रदायों और समुदायों की साझा संस्कृति है। देखा जाए तो भारतीय उपमहाद्वीप में इस प्रकार का परायापन पहले भी नहीं था यदि ऐसी अवधारणाओं को जिन्ना जैसे लोगों ने सम्प्रदाय के नाम पर हवा दी थी तो उसके पीछे पाकिस्तान की सियासत ही षुमार थी क्योंकि जिन्ना जानते थे कि मुस्लिम कार्ड के तहत ही पाकिस्तान की मांग तार्किक होगी जिसमें वे सफल भी रहे।
बेषक भारत सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था वाला देष है बावजूद इसके भारत से भी प्रतिभाओं का पलायन हो रहा है। ऐसे में यदि दुनिया भर की प्रतिभाओं को भारत भी आकर्शित करने में आतुरता दिखाता है तो यह भी ‘मेक इन इण्डिया‘ का ही एक प्रारूप कहा जायेगा। भारतीय संसद ने दिसम्बर 2003 में नागरिकता संषोधन विधेयक पारित कर विदेषों में बसे भारतीय मूल के लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया जिसे ‘ओवरसीज़ सिटीजनषिप आॅफ इण्डिया‘ का नाम दिया गया इसे दोहरी नागरिकता के नाम से भी जाना जाता है। इतना ही नहीं लोकप्रतिनिधित्व (संषोधन) अधिनियम, 2010 द्वारा अप्रवासीय भारतीयों को निर्वाचक नामावली में नाम दर्ज कराने व चुनाव के दौरान मत देने का अधिकार प्रदान किया गया। देखा जाए तो भारत भी चाहता है कि विदेषों में बसे भारतीय मूल के लोग अपनी कूबत के अनुपात में भारत को निर्मित करने में भूमिका अदा करें। अदनान सामी भारत विभाजन के 68 साल बाद यदि नागरिकता प्राप्त करने में सफल हो रहे हैं तो गांधी और उन स्वतंत्रता सेनानियों की सोच को ही बल मिल रहा है जो इस मामले में निहायत उदार थे जबकि पाकिस्तान में रह रहे हिन्दू आज भी जिन्ना की सोच के षिकार ही कहे जायेंगे क्योंकि उनके अन्दर राश्ट्र गौरव भरने में पाकिस्तान काफी हद तक विफल रहा है। आर्थिक संसाधन और षक्ति के रूप में आज भी भारत में जो उभार है उसे देखते हुए अन्य भी आकर्शित हो सकते हैं। यूरोप, अमेरिका और कनाडा जैसे देषों के विकास में भारतीयों की बड़ी भूमिका रही है तो भारत के विकास में भी विदेषी भूमिका कमतर नहीं आंकी जा सकती। एक सच यह है कि नागरिकता को अपनाने और छोड़ने की परम्परा हमेषा से रही है उसी की एक कड़ी अदनान भी हैं।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

Saturday, January 2, 2016

उधर लाहौर लैंडिंग, इधर आतंकी हमला

अक्सर ऐसा तब हुआ है जब भारत और पाकिस्तान एक मंचीय होने का प्रयास करते हैं। आतंक की हिस्ट्री ऐसी तमाम मिस्ट्री में उलझी हुई है कि पाकिस्तान में आतंकवादी षिविर चलाने वालों का आखिर असल मकसद क्या है? जब वर्श 2016 की दूसरी सुबह कगार पर खड़ी थी तब पाकिस्तान से आये आतंकियों ने पंजाब के पठानकोट को अपने मंसूबों की कैद में ले लिया। यहां का एयरफोर्स स्टेषन हमले की जद में आया जिसमें एयरफोर्स कमांडो सहित तीन षहीद हो गये। इसके अलावा एक आम व्यक्ति भी इस घटना का षिकार और एक जख्मी हुआ। हालांकि चार आतंकवादी भी इसमें ढेर हुए। इस घटना ने नाजुक प्रष्न यह पैदा किया कि जिस कीमत पर आतंकी भारत में तबाही का मंजर बिखेर रहे हैं क्या उस सूरत में पाकिस्तान इस पर अफसोस करता है? पाकिस्तान में आतंक की ट्रेनिंग तो अभी भी चल रही है, भले ही पहले जैसी स्थिति न हो पर इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारत-पाक के तमाम भेंट-मुलाकातों के बावजूद आतंक की प्रयोगषाला में पैदा होने वाला जहर आज भी भारत पर ही आजमाया जाता है। आर्मी वर्दी में आये आतंकी एयरफोर्स बेस में फिदाइन हमले के इरादे में थे। हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि दो दिन पहले ही आतंकियों ने घुसपैठ की थी। घटना से एक दिन पहले ही असिस्टेंट कमांडेंट की किडनैपिंग के बाद आर्मी ने इसे अलर्ट भी किया था पर नतीजे सिफर ही रहे।
पठानकोट में पाकिस्तान बोर्डर से लगे नरोट जमैल सिंह इलाके से गुजरने वाले गुरदासपुर के पूर्व एसपी सहित दो को घटना से पहले ही किडनैप किया गया था किडनैपर आर्मी की वर्दी में थे। जिस अंदाज में पूरा घटनाक्रम है उससे लगता है कि सुरक्षा व्यवस्था की तरफ से तैयारी अधूरी थी और आतंकियों को घटना का कोई सरल रास्ता मिला हुआ था। जाहिर है अद्भुत तरीके से की गयी मोदी के लाहौर दौरे से आतंकी बौखलाए हैं। दावा तो यह भी किया गया था कि आतंकी कभी भी एयरबेस के अन्दर पहुंच ही नहीं सकते तो क्या आतंकी मीडिया का ध्यान खींचने के लिए आये थे या यह बताना चाहते थे कि उनकी ताकत किसी भी सूरत में अभी घटी नहीं है। अफसोस यह है कि घटना में जान गयी है और आतंकी हमले में पठानकोट भी सूचीबद्ध हो गया। देखा जाए तो पांच महीने पहले भी गुरदासपुर जिले में डेढ़ घण्टे में सात आतंकी हमले हुए थे। रक्षा के जानकार यह मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक बोल्ड स्टेप लिया और वे पाकिस्तान गये ऐसे में आतंकी भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहेंगे। हालांकि षक तो पहले भी था और दोनों देषों की सरकारें भी षायद इसे समझती-बूझती थीं कि सम्बंधों के बीच में आतंकियों की तिरछी नजर पड़ेगी जरूर।
इस घटना के बाद भारत और पाकिस्तान में बढ़ी आपसी समझ भी इस विमर्ष की ओर झुकेगी कि कैसे आतंकी कार्यवाही के बीच बातचीत सफल हो। एक तरफ भारत जहां पाकिस्तान से वार्ता करने का सौ फीसदी मन बना चुका है जिसका पुख्ता सबूत मोदी की लाहौर लैण्डिंग है और जनवरी के मध्य में दोनों देषों के प्रतिनिधियों की मुलाकात की तय तारीख है। निःसंदेह पाकिस्तान से बात होनी चाहिए पर बात इस पर भी बात होनी चाहिए कि नवाज़ षरीफ आतंक से निपटने के लिए कौन सा नियोजन तैयार कर रहे हैं। पड़ताल बताती है कि पाक कभी सच्चे मन से आतंक के विरोध में नहीं रहा बल्कि उकसाने की कार्यवाही में वह जरूर षामिल  रहा है। दाऊद से लेकर लख्वी तक और जमाद-उद-दावा का सरगना हाफिज़ सईद सहित कई आतंकियों के मामले में पाकिस्तान ढुलमुल बना रहा। पिछले तीन दषकों में आतंकी हमलों से भारत खूब छलनी हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी भी 2016 के इस नूतन वर्श में पाकिस्तान से बड़ी जिम्मेदारी की उम्मीद रखते हैं पर वर्श का आगाज यदि ऐसे होगा तो अंजाम क्या होगा इसकी आहट साफ सुनी जा सकती है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान आतंकवाद का षरणगाह है बावजूद इसके भारत बड़े मन से बातचीत के दरवाजे खोल चुका है। भारत की भूमि से अलग होकर बना पाकिस्तान जो पीड़ा पहुंचा रहा है और भारत जिस हित की बात कर रहा है उसकी भी दूर-दूर तक कोई तुलना नहीं है।
आतंक का स्थान कोई भी हो परन्तु पीड़ा में कोई अंतर नहीं होता। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने आतंकी हमले को नाकाम बताते हुए कहा कि खुफिया जानकारी पहले होने से नुकसान कम हुआ है। लालू प्रसाद का तो यह मानना है कि यह वक्त फाॅरेन पाॅलिसी पर सवाल उठाने का नहीं है। पंजाब के मुख्यमंत्री भी पहले से सूचना होने के चलते कम नुकसान वाला हमला मान रहे हैं। सवाल नुकसान कम और ज्यादा का नहीं है, सवाल हमला करने वालों के इरादे का है। सवाल तो यह भी है कि जब सूचना पहले से थी तो हमला ही क्यों हुआ? आतंकी जिंदा क्यों नहीं धरे गये और कमांडो समेत तीन जवानों की जान क्यों गयी? हमेषा से यह दुखती रग रही है कि घटना घटने के बाद उसका जायजा जान-माल के नुकसान से लगाया जाता रहा है। ताज्जुब इस बात की है कि सरेआम देष के भीतर पाकिस्तान प्रायोजित आतंक का ताण्डव है उसे रोकने के बजाय जिरह इस बात पर हो रही है कि घटना कितनी सफल थी और कितना असफल। विकासषील देषों की एक समस्या यह भी है कि वे ‘सांख्यिकीय चेतना‘ के षिकार होते हैं जबकि विकसित देष यांत्रिक चेतना से युक्त होते हैं फर्क यह है कि एक आंकड़ों की बाजीगरी करता है तो दूसरा परिणाम की चिंता करता है। पठानकोट के हमले में बेषक नुकसान कम हुआ हो पर हमला देष के भीतर हुआ यह स्वयं में एक बड़ी घटना ही कहीं जायेगी।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
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सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
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Thursday, December 31, 2015

डिजिटल इंडिया से क्रिटिकल इंडिया तक

यद्यपि यह संतोश की बात है कि वैष्विक पटल पर भारत की छवि इस एक वर्श में तुलनात्मक बढ़त के साथ कायम है। जहां सातवें वाइब्रेंट गुजरात में संयुक्त राश्ट्र संघ के महासचिव से लेकर दुनिया के उद्योगपति, राजनयिक और प्रमुखों का भारत में एक मंचीय होना वर्श की बेहतर षुरूआत थी वहीं गणतंत्र दिवस के अवसर पर पहली बार अमेरिकी राश्ट्रपति का मुख्य अतिथि होना भारत की वैदेषिक नीति की मजबूत साख ही थी। पड़ोसी देषों के अलावा चीन, रूस, आॅस्ट्रेलिया सहित दो दर्जन देषों और कई अन्तर्राश्ट्रीय मंच पर भारत की उपस्थिति षानदार रही है। इतना ही नहीं वर्श के अंत में मोदी की काबुल से लाहौर की लैण्डिंग और ग्यारह साल बाद पाकिस्तान की जमीन पर किसी भारतीय प्रधानमंत्री का होना और इस तरह होने से विष्व की मीडिया से लेकर राजनयिक तक आवाक रह गये। फिलहाल साल 2015 गुजर गया है तथा 2016 मुहाने पर खड़ा है। यदि इसे राजनीतिक दृश्टिकोण के अन्तर्गत परखा जाए तो उठा-पटक से भरा साल कहा जाएगा जिसका असर आगे भी रहेगा। देखा जाए तो डिजिटल से लेकर क्रिटिकल इण्डिया तक की पड़ताल में कई संदर्भ दृष्यमान होते हैं। संसदीय कार्यकलापों को लेकर यह वर्श बेहद निराष करने वाला रहा है। अपेक्षाओं से भरी मोदी सरकार से जनता को क्या-क्या मिला इस पर भी विमर्ष जरूरी है। अटल पेंषन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, स्मार्ट सिटी योजना के अलावा दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना सहित दर्जन भर कार्यक्रम इस एक वर्श में देष की आम जनता को मिले हैं पर इन्हीं सुखद परियोजनाओं के बीच देष के किसानों को बेमौसम बारिष का षिकार होना पड़ा। इतना ही नहीं बारिष के दिनों में सूखे के बवंडर से भी किसान बच नहीं पाये और कोषिषें इस कदर मायूस हुईं कि क्या उत्तर, क्या दक्षिण देष के कई इलाकों से किसानों की मौत की खबरें आईं। वैसे तो दषकों से विदर्भ और बुंदेलखण्ड किसानों की मौत के केन्द्र रहे हैं पर इस वर्श बारिष और सूखे के चलते ऐसे केन्द्रों का विकेन्द्रीकरण होते हुए भी देखा गया।
देष की तकदीर किस्तों में बदलती है मसलन पांच साल की सरकार पांच किस्तों में देष के ताने-बाने को फलक पर ला सकती है। मई, 2014 से निर्मित मोदी सरकार की एक छमाही की पड़ताल पहले की जा चुकी है। 2015 की वार्शिक पड़ताल कुछ उम्मीद तो कुछ नाउम्मीद के साथ छलक रही है। फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा के चुनाव का एक तरफा होना लोकतंत्र में नये सरोकार और नये इतिहास के साथ हैरत में डालने वाला था। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी बजट सत्र के ठीक पहले बिन बताये 56 दिन के लिए गायब रहे यह भी वर्श की कौतूहल से भरी घटना थी पर जब वे अप्रैल में लौटकर आये तब उन्हें किसानों की फिक्र करते हुए देखा गया। इन्हीं दिनों किसान दिसम्बर 2014 में जारी भू-अधिग्रहण अध्यादेष को लेकर दिल्ली में मार्च भी कर रहे थे। अधिनियमित करने की कई कोषिषों के बाद अन्ततः सरकार ने इस अध्यादेष को आगे न बढ़ाने का फैसला लिया। रोचक यह भी रहा कि सरकार की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं कानून का रूप न ले पाई। अप्रैल में आये नेपाल के भूकम्प में भारत ने राहत और बचाव के लिए जी-जान लगा दिया पर नेपाल के नये संविधान ने कूटनीतिक रिष्तों को काफी तल्ख कर दिया। असल में नेपाल के नये संविधान में मधेसियों को वो हक नहीं दिया गया जिसके वे अधिकारी थे जिसके चलते मधेसियों का आंदोलन हुआ और इसके लिए भी लानत-मलानत भारत पर उतारा गया। हालांकि इन्हीं दिनों नेपाल में नई सरकार ने भी अवतार लिया था जिसका झुकाव इन दिनों चीन की ओर है। अब हाल यह है कि नेपाल के मामले में भारत एक बड़ी कूटनीतिक कमाई काफी हद तक खोने के कगार पर है।
गुजरात के पाटीदार आरक्षण को लेकर हार्दिक पटेल का फलक पर आना भी एक विमर्षीय संदर्भ रहा है। उत्तर प्रदेष के दादरी में हुई घटना ने तो भारत को एक बड़े विमर्ष की ओर ही धकेल दिया। आष्चर्यजनक यह है कि विपक्ष ने इसे तूल देते हुए सरकार पर सारा दोश मढ़ दिया। हालात इस कदर बिगड़ गये कि साहित्य जगत से लेकर कई फिल्मकार तथा कलमकार असहिश्णुता का माहौल बताते हुए सरकार के विरोध में आ गये जिसके चलते उन्होंने अवार्ड वापसी का जोरदार अभियान चलाया पर साल का अन्त होते-होते न्यायपालिका द्वारा एक सकारात्मक राय रखने के चलते असहिश्णुता को करारा जवाब दिया गया। प्रधान न्यायाधीष ने कहा था कि असहिश्णुता जैसा कोई माहौल देष में नहीं है और न्यायपालिका के रहते किसी को डरने की जरूरत नहीं। सबके बावजूद इस वर्श का भाजपाई सकून यह है कि जम्मू-कष्मीर में पीडीपी के साथ ही सही पहली बार सरकार बनाने का भाजपा को मौका मिला पर साल खत्म होते-होते बिहार विधानसभा की हार ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी भी फेर दिया। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री मोदी के मुखर विरोधी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीष कुमार की महागठबंधन की बड़ी जीत ने भारतीय राजनीति के फलक पर नये समीकरण को प्रकट कर दिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि नाउम्मीद हो चुकी राजनीतिक पार्टियां भी हुंकार भरने लगी। बरसों से बिहार में सुप्त पड़ी कांग्रेस की षारीरिक भाशा बदल गयी। केन्द्र में मोदी ‘सुषासन‘ के अगुवा तो बिहार में नीतीष ‘सुषासन बाबू‘ की संज्ञा में रहे साथ ही बिहार की जीत ने न केवल नीतीष के कद को बढ़ाया बल्कि लालू की राजनीतिक विरासत को भी उबार दिया।
इस वर्श को इस रूप में भी जाना जायेगा कि सभी सत्रों में मोदी सरकार विधायी मुसीबत से छुटकारा नहीं पाई। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि पिछले पन्द्रह सालों में कहीं अधिक उपजाऊ इस वर्श का बजट सत्र ही रहा है पर व्यापमं से लेकर धर्मांतरण से जुड़े मुद्दे भी यहां छाए रहे। संसद का मानसून सत्र भी निराष करने वालों में ही गिना जाएगा। इसे पूरी तरह राजनीति की भेंट चढ़ते हुए देखा जा सकता है। जीएसटी जैसे विधेयक जिसे बड़ी प्रमुखता दी जा रही है इस सत्र में ही क्या पूरे वर्श मुंहकी ही खाते रहे। रही बात षीत सत्र की तो खर्च हुए करोड़ों और मुनाफा कुछ खास नहीं रहा कुल जमा पूंजी बामुष्किल एक दर्जन विधेयक ही अधिनियमित हो पाये। लगभग महीने भर चलने वाले इस सत्र में दो दिन संविधान को समर्पित थे बाकी दिन हंगामा बरपता रहा। इसी बीच नेषनल हेराल्ड की बीमारी से भी संसद जकड़ा था दिसम्बर में चेन्नई की बाढ़ ने साल के अन्त को बुरी तरह से पानी-पानी कर दिया। तीन बरस पुराना निर्भया मामला भी इस बीच प्रकाष में रहा। हालांकि नये ‘जुवेनाइल एक्ट‘ के चलते इसका अन्त सही हुआ। षीत सत्र में भी असहिश्णुता का मुद्दा पूरे दमखम के साथ छाया रहा। इन सबके बावजूद इस वर्श की सुषासनिक परियोजना ‘डिजिटल इण्डिया‘ को महत्व की दृश्टि से जरूर देखा जायेगा। देष में जिस तरह स्टार्टअप की गिनती बढ़ रही है, निवेष बढ़ रहा है, ई-काॅमर्स में बढ़ोत्तरी हो रही है। उसे देखते हुए स्टार्टअप इण्डिया-स्टैण्डअप इण्डिया के चलते तस्वीर बदलने की उम्मीद है। सबके बावजूद नीति और क्रियान्वयन को मजबूत करने के लिए जो प्रयोग इस वर्श हुए हैं उससे भारत में सुषासन को लेकर बड़ी कूबत वाली आहट सुनाई देती है।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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Tuesday, December 29, 2015

निर्जीव पड़े इतिहास से कांग्रेस की किरकिरी

कांग्रेस में नई जान फूंकने और जड़ता को दूर करने के प्रयासों के बीच बीते दिन उसी के मुखपत्र में छपे लेखों से पार्टी नई मुसीबत में घिरती दिखाई देती है। पार्टी के 131वें स्थापना दिवस पर तब षर्मिन्दगी का सामना करना पड़ा जब उसी के मुखपत्र ने निर्जीव पड़े इतिहास के कई पन्नों का खुलासा हुआ। कष्मीर सहित कई मामले पर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की नीतियों की आलोचना और सोनिया गांधी के पिता को फांसीवादी सैनिक के रूप में मुखर करना कांग्रेस के लिए एक अनचाही समस्या पैदा कर दी जो ‘आ बैल मुझे मार‘ की अवधारणा से युक्त हैं। दो अज्ञात लेखकों के लेख में कष्मीर, चीन और तिब्बत सम्बंधी मसलों के लिए नेहरू पर आरोप मढ़े गये। सोनिया गांधी पर विवादास्पद टिप्पणी की गयी जिसके चलते जहां कांग्रेस जांच-पड़ताल और लानत-मलानत में फंसी है वहीं भाजपा समेत कईयों को बैठे-बिठाए चुटकी लेने का अवसर मिल गया। ऐसा कभी नहीं हुआ कि पार्टी का मुखपत्र इतना त्रुटि से भरा हो कि स्वयं जवाब देते न बन रहा हो। दरअसल 15 दिसम्बर को देष के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्य तिथि पर उन्हें श्रृद्धांजलि देने के मकसद से पार्टी के ‘कांगे्रस दर्षन‘ के हिन्दी संस्करण में लेख प्रकाषित था जिसमें लेखक का नाम नहीं था पर जो लिखा गया था वह कांग्रेस के लिए किसी बवंडर से कम नहीं था जिसमें सीधे तौर पर नेहरू की नीतियों की आलोचना की गयी है। इतना ही नहीं दो लेखों में विधिवत नेहरू और पटेल के रिष्तों पर विस्तार से लिखा गया है जिसमें साफ है कि दोनों के बीच सम्बन्ध निहायत तल्ख थे। जाहिर है कि इस गलती के चलते इन दिनों विपक्षियों के निषाने पर भी है।
यदि नेहरू सरदार पटेल की सुनते तो आज कष्मीर, चीन, तिब्बत और नेपाल की समस्याएं नहीं होती। नेहरू को अन्तर्राश्ट्रीय मामलों में पटेल की बात सुननी चाहिए थी। क्या पटेल और नेहरू दो किनारों की भांति थे और दोनों के बीच तनावपूर्ण सम्बंध थे लेख यही दर्षाता है। नेहरू प्रधानमंत्री तो पटेल उप-प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री थे। 565 रियासतों को एक सूत्र में पिरोने वाले पटेल की दूरदर्षिता कई मायनों में बेहतरीन होने के बावजूद नेहरू के साथ एकाकीपन से दूर थी। मामला इस हद तक खराब था कि कई बार इस्तीफा देने की भी धमकियां दी गयी साथ ही लेख में यह कहा जाना कि पटेल की दूरदर्षिता का उपयोग नेहरू ने नहीं किया जिसके कारण अन्तर्राश्ट्रीय समस्याएं मुखर हुईं। वैसे नेहरू अधिकतर गांधी प्रभाव में रहें हैं और गांधी को भी नेहरू उन्मुख कहा जाना अतार्किक नहीं है। जानकार तो यह भी कहते हैं कि नेहरू गांधी के चलते ही देष के पहले पीएम बने थे। नेहरू-पटेल दोनों को औपनिवेषिक सत्ता का भरपूर अनुभव था और वे व्यक्तिगत विवादों से ऊपर उठ कर राश्ट्रहित के लिए समर्पित थे बावजूद इसके सम्बंधों में कुछ तल्खी बची रही। मुखपत्र में यह भी लिखा गया है कि चीन के मामले में भारत को उन दिनों सतर्क होना चाहिए था। तिब्बत को लेकर चीन की नीति के खिलाफ नेहरू को आगाह करते हुए चीन को एक विष्वासघाती देष बताया गया था। देखा जाए तो पटेल की मृत्यु के लगभग चार साल बाद 1954 में भारत और चीन के बीच पंचचील समझौते हुए थे जिसके पांच समझौते में एक समझौता परस्पर आक्रमण न करने का भी था बावजूद इसके 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया। जानकार मानते हैं कि चीन से हार के चलते नेहरू मनोवैज्ञानिक रूप से टूट गये थे।
मुखपत्र की मानें तो पटेल ने कष्मीर मुद्दे को संयुक्त राश्ट्र संघ में उठाने का भी विरोध किया था। यहां भी दोनों के बीच विचारों में एकाकीपन नहीं दिखाई देता। स्वतंत्रता के प्रारम्भिक वर्शों में जहां व्यापक आर्थिक सहयोग के साथ भारत को अन्तर्राश्ट्रीय समझ की जरूरत थी वहीं दो स्वतंत्रता के महानायक की आपसी रंजिष किसी न किसी समस्या की ओर इषारा भी थी। असल में उन दिनों चीन से समस्या भी तिब्बत के चलते ही पनपी। चीन ने स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत पर 1950 में आक्रमण किया तथा राजधानी ल्हासा को अपने कब्जे में ले लिया। चीन का इस क्षेत्र पर अधिग्रहण 1959 में पूरा हो गया जिसके फलस्वरूप दलाई लामा और एक लाख तिब्बती भारत में षरण लिए हुए हैं। भारत तिब्बत को एक स्वायत्त क्षेत्र मानता है, दूसरी ओर चीन भारत पर यह आरोप लगाया कि भारत अपनी भूमि पर चीनी विरोधी गतिविधियों को समर्थन दे रहा है। चीन का तिब्बत को कब्जे में लेने और दलाई लामा का भारत में प्रवास लेना चीनी आक्रमण की बड़ी वजह मानी जाती है। वर्तमान नेपाल के नये संविधान में मधेसियों को जिस तरह दरकिनार किया है उससे नेपाल दो भागों में बंटने के साथ भारत पर अनाप-षनाप आरोप भी मढ़ रहा है जिसके चलते सम्बंध अपेक्षा से कहीं अधिक पीछे छूट गया है जबकि कष्मीर का विवाद आज भी यथावत है। हालांकि ये सब उन दिनों की तात्कालिक परिस्थितियों की देन है। इसे आज के परिप्रेक्ष्य में किसी एक व्यक्ति विषेश को लेकर आरोपित नहीं किया जा सकता। जिस अंदाज में मुम्बई कांग्रेस के मुखपत्र के हालिया संस्करण में यह सब कहा गया उससे तो यही लगता है कि एक निर्जीव इतिहास को अनायास पुनः जिन्दा कर दिया गया जिसकी फिलहाल जरूरत नहीं थी। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के पिता मुसोलिनी के सेनानी थे और वे फांसिस्ट थे ऐसे खुलासे भी उसमें निहित हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पार्टी के अन्दर कोई छवि खराब करने वाला वर्ग काम कर रहा है। क्या संजय निरूपम को क्लीन चिट दिया जा सकता है? हालांकि क्षेत्रीय कांग्रेस समिति के प्रमुख और मुखपत्र के संपादक संजय निरूपम ने यह कहते हुए षुरूआत में विवाद से स्वयं को अलग कर लिया कि वह पत्रिका के दिन-प्रतिदिन के क्रियाकलापों में षामिल नहीं हैं पर बाद में उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि मैं लेख से सहमत नहीं हूं, लेख कहीं से मंगाया गया है और लेखक कौन है मैं नहीं जानता। लेखकों का नाम प्रकाषित न होना भी मामले में संदिग्धता प्रतीत होती है साथ ही लेख की छपने से पहले पूरी तरह छानबीन न होने के चलते भी दाल में कुछ काले होने का संकेत मिलता है। कांग्रेस चाहे तो इसे छोटी घटना मान कर दरकिनार कर सकती है पर जब बातें ‘पब्लिक डोमेन‘ में चली जाती हैं तो मामला इतना सहज नहीं रह जाता। ऐसे में क्या कांग्रेस को इस पर सफाई नहीं देना चाहिए। यह सही है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी करीब छः वर्शों तक राजनीति से स्वयं को दरकिनार किये हुए थी पर जब उन्होंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ली तो उसके मात्र 62 दिनों में कांग्रेस की अध्यक्ष बन गयी। मुखपत्र इस बात के भी खुलासे से नहीं हिचकिचाता कि विवाह के सोलह साल बाद उन्होंने नागरिकता ली थी। कांग्रेस दर्षन का यह मुखपत्र जिस गौरवगाथा को बयान कर रहा है उससे कांग्रेसी भी औचक्क रह गये होंगे। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुखपत्र में छपा उक्त तथ्य किसी त्रुटि का परिणाम तो है पर कथन इतिहास के मुताबिक सटीक प्रतीत होता है। हालांकि दोनों लेखों में लेखकों के नाम नहीं हैं पर इसकी पड़ताल तो जरूरी है। फिलहाल कांग्रेस इस पर न कभी बहस चाहेगी और न ही कभी इस तरह का दोबारा कुछ सुनना ही चाहेगी।
   



लेखक, वरिश्ठ स्तम्भकार एवं रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन के निदेषक हैं
सुशील कुमार सिंह
निदेशक
प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्ससाइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502


सुशासन की सुधरती सेहत

सुषासन में निहित ई-गवर्नेंस की ज़्यादातर पहल में बिज़नेस माॅडल, पब्लिक-प्राईवेट पार्टनरषिप, समुचित तकनीक और स्मार्ट सरकार के साथ इंटरफेस उद्यमिता इत्यादि का उपयोग किया जाता है लेकिन आगे बढ़ने या आरम्भिक सफलता को दोहरा पाने में यह काफी हद तक विफल भी रहा है। यदि ई-गवर्नेंस को सचमुच नागरिकों की सषक्तिकरण की दिषा में आगे बढ़ाना है तो जरूरी है कि मूल्य-संवर्धित सेवाओं की व्यवस्था पर और अधिक ध्यान दिया जाए मसलन स्वास्थ्य, षिक्षा सहित कई बुनियादी समस्याएं आदि। बीते 28 दिसम्बर को केन्द्र सरकार ने सुषासन के लिए जरूरी 23 सेवाओं की षुरूआत की। संचार मंत्री रविषंकर प्रसाद ने डिजिटल इण्डिया अभियान के अन्तर्गत इन्हें बढ़ाने का परिप्रेक्ष्य विकसित किया। इसमें अजमेर षरीफ और हर की पौड़ी को वाई-फाई सहित छोटे षहरों में बीपीओ सेवाएं सहित कई षामिल हैं। इन दिनों सुषासन दिवस का दौर भी चल रहा है 25 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयन्ती होती है। पिछले वर्श मोदी सरकार ने इस दिन को सुषासन दिवस के रूप में प्रतिश्ठित किया था। चूंकि भारतीय समाज कई समस्याओं का संग्रह है जिसमें गरीबी, भुखमरी, कुपोशण, बेरोजगारी, अषिक्षा, बीमारी, सामाजिक-आर्थिक असमानता आदि की भरमार है। ऐसे में इन बुराईयों का सामना करने के लिए बुनियादी प्रषासन के साथ सुषासन को प्रगाढ़ किया जाना जरूरी है। फिलहाल सुषासन को लेकर बड़े कदम तो उठाए जा रहे हैं पर स्वयं सुषासन की सेहत तब ठीक हो पायेगी जब इसे लोक प्रवर्धित बनाया जायेगा। हालांकि सूचना का अधिकार, नागरिक घोशणा पत्र, ई-गवर्नेंस, सिटीजन चार्टर, ई-याचिका, ई-सुविधा सहित कई संदर्भ इस परिप्रेक्ष्य को कहीं अधिक पुख्ता बनाने में कारगर हैं।
सरकार की प्रक्रियाएं नागरिकों पर केन्द्रित होते हुए एक नये डिजाइन और सिंगल विंडो संस्कृति में तब्दील हो रही है। सुषासन की क्षमता को लेकर ढेर सारी आषाएं हैं और यह सबको सकारात्मक दायरे में समेट लेने वाली संरचना प्रदान करती है। इसके अलावा सरकार के क्षेत्र को वृहद और व्यापक बनाने का यह एक जरिया भी है जिसके तहत विधि का षासन, जवाबदेही, पारदर्षिता, दक्षता एवं प्रभावषीलता, समानता एवं समावेषन के अलावा भागीदारी जैसे तत्वों का निहित होना देखा जा सकता है। द्वितीय विष्व युद्ध के पष्चात् विष्व में अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम वैष्विक संस्थानों द्वारा चलाये गये ताकि तृतीय विष्व के देषों में विकास सुनिष्चित किया जा सके। इस हेतु विष्व बैंक एवं अन्य दानदाता एजेंसियों ने इन देषों को ऋण आमंत्रित किये पर नतीजों से पता चलता है कि तमाम कोषिषों के बावजूद विकास को सुनिष्चित नहीं किया जा सका। विष्व बैंक ने इस विफलता पर संवेदनषीलता दिखाते हुए अध्ययन किया और सुषासन की अवधारणा दी। फ्राॅम स्टेट टू मार्केट रिपोर्ट, 1989 में इसे परिभाशित किया। विष्व बैंक मानता है कि सुषासन एक ऐसी सेवा से सम्बन्धित है जो दक्ष है, एक ऐसी न्यायिक सेवा से सम्बन्धित है जो विष्वसनीय है और एक ऐसे प्रषासन से सम्बन्धित है जो जनता के प्रति जवाबदेय है। असल में लोकहित का अधिकतम संवर्द्धन कैसे किया जाए यह सुषासन की मूल चिंता है और इसकी अवधारणा को पड़ताल करें तो पता चलता है कि यह चिंता तभी पूरी होगी जब नीतियों और लोक संस्थाओं में जनता की अधिकतम भागीदारी होगी। विकेन्द्रीकरण सुषासन की एक प्रविधि रही है भारत के नगरों और गांवों के विकास के लिए वर्श 1992 में संविधान में हुए 73वें और 74वें संविधान संषोधन को इस दिषा में निहित कदम माना जाता है जबकि 1991 में उदारीकरण के चलते नई आर्थिक अवधारणा से सुषासन को प्रारम्भिकी मिलती हुई दिखाई देती है।
इसमें कोई षक नहीं है कि मोदी के सुषासन की अवधारणा डिजिटल इण्डिया से ही होकर गुजरती है। भारत सरकार की यह एक ऐसी पहल है जिसके माध्यम से सरकारी विभागों को देष की जनता से जोड़ना है ऐसा कार्यक्रम जिसके लिए सरकार ने 1,13,000 करोड़ का बजट रखा। ढ़ाई लाख पंचायतों समेत छः लाख से अधिक गावों को ब्राॅडबैंड से जोड़ने का लक्ष्य है। अब तक 55 हजार पंचायतें इससे जोड़ी भी जा चुकी हैं। इन पंचायतों को ब्राॅडबैंड से जोड़ने हेतु 70 हजार करोड़ रूपए का बजट देखा जा सकता है। इतना ही 1.7 लाख आईटी पेषेवर तैयार करने का लक्ष्य भी षामिल है। डिजिटल इण्डिया की वजह से ही केन्द्र सरकार ने इलैक्ट्राॅनिक स्किल डवलेपमेंट की योजना की षुरूआत की जो देष के लोगों को सीधे जोड़ने का रोड मैप है दूसरे अर्थों में यह इतिहास बदलने और देष की तस्वीर बदलने की जोर आजमाइष भी कही जाएगी। सषक्त समाज क्या होता है तथा ज्ञान की पूंजी और उसकी अर्थव्यवस्था क्या होती है इसे समझना हो तो डिजिटल इण्डिया में झांका जा सकता है जो स्वयं में सुषासन का पूरा ताना-बाना है। सुषासन को बेहतर बनाने के लिए बीते दिनों जिन सेवाओं की षुरूआत हुई है वे आधुनिक विधा से न केवल युक्त हैं बल्कि वर्तमान की  आवष्यकता भी है। 28 दिसम्बर के आयोजित कार्यक्रम में सरकारी सेवाओं के भुगतान के लिए ई-पोर्टल को लाॅन्च किया। डिजिटल लाॅकर के लिए बना मोबाइल एप भी पेष किया। नौ भारतीय भाशाओं में टैक्स टू स्पीच  सेवा षुरू करने की मंजूरी के अलावा उत्तर प्रदेष और मध्य प्रदेष के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल टाॅवरों को भी लाॅन्च किया गया जो क्रमषः 78 एवं 16 होंगे। संचार मंत्री ने बीएसएनएल के न्यू जनरेषन के नेटवर्क का भी षुभारम्भ किया इसके अलावा एसटीपीआई के आठ सेन्टर भी लाॅन्च किये गये जिसमें दो-दो उत्तर प्रदेष और बिहार में जबकि चार उड़ीसा में होंगे।
तकनीकी तौर पर सुषासन को सुसज्जित करने के संसाधन निर्मित हो रहे हैं पर उन मुद्दों पर भी ध्यान होना चाहिए जो समय के साथ विकास का रूप नहीं ले पाये हैं। अब यह मत मान्य है कि सुषासन कोई पष्चिमी अवधारणा न होकर एक वैष्विक अवधारणा है जो सही मायनों में लोकतंत्र के लिए कहीं अधिक मुनाफे का सौदा है। विष्व स्तर पर प्रषासनिक सुधार की लहर के बीच सुषासन भारत में बड़ी ताकत के रूप में जगह ले रहा है। सूचना का अधिकार, नागरिक घोशणा पत्र और ई-गवर्नेंस इत्यादि एक ऐसी विधा है जहां से सुषासन ने नई करवट ली पर भारत के बुनियादी विकास का आलम यह है कि रोटी, कपड़ा और मकान कईयों के लिए अभी भी दूर की कौड़ी है। दषकों पीछे जाया जाए तो एषिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कुछ देष पचास के दषक में औपनिवेषिक सत्ता से तो मुक्त हुए जिसमें भारत भी षुमार है पर वैज्ञानिक अध्ययन के नितांत आभाव के चलते विकास मन माफिक नहीं हो सका। विगत् ढ़ाई दषकों से विकास की यात्रा कहीं अधिक समुचित इसलिए रही क्योंकि सषक्त आर्थिक नीतियां और सषक्त लोकतंत्र के साथ विज्ञान एवं तकनीक पहुंच में आई बावजूद अभी भी भारत जैसे देषों में षोध और अनुसंधान आभाव लिए हुए है। प्रषासनिक सुधार आयोग की सिफारिषों के लागू होने के हालात पूरी तरह अनुकूल नहीं देखे गये। फिलहाल  21वीं सदी के इस दौर में मोदी सरकार की तकनीकी पहल ‘डिजिटल इण्डिया‘ और आर्थिक पहल ‘मेक इन इण्डिया‘ के अलावा ‘स्टार्टअप इण्डिया-स्टैण्डअप‘ इण्डिया सहित कई कार्यक्रमों ने देष में सुषासन होने का बड़ा एहसास तो पैदा किया ही है।



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
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Monday, December 28, 2015

कितनी कारगर है सरकार की सुशासन पर चिंता

सुषासन के लिए यह आवष्यक है कि प्रषासन का तरीका परम्परागत न हो बल्कि ये नये ढांचों, पद्धतियों तथा कार्यक्रमों को अपनाने के लिए भी तैयार हो। सुषासन के कुछ निर्धारक तत्व हैं जो वस्तुतः सुषासन के साध्य भी हैं जिसमें नौकरषाही की जवाबदेयता, सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकार और सिविल सोसायटी के मध्य सहयोग के साथ मानवाधिकारों का संरक्षण भी षामिल है। इसके अतिरिक्त इसमें सूचना का अधिकार, नागरिक घोशणापत्र सहित सूचना प्रौद्योगिकी आदि का समावेषन भी है। नागरिकों के सषक्तिकरण, नागरिक प्रषासन अन्र्तसम्बन्ध, पारदर्षिता, संवेदनषीलता व भ्रश्टाचार में कमी का संदर्भ भी इसमें निहित लक्षण है। सुषासन को लेकर विष्व बैंक की संकल्पना का निहित पक्ष यह है कि यह जन केन्द्रित, लोक कल्याणकारी, पारदर्षी व जवाबदेय षासन व्यवस्था है जिसमें लोकतांत्रिक मूल्य गुणात्मक माने जाते हैं। भारत विकासषील देष है जबकि सुषासन की अवधारणा विकासषील देषों की पारिस्थितिकी को बिना ध्यान में रखकर दी गयी है। ऐसे में इस पर यह आरोप रहता है कि यह विकसित देषों के हितों का संवर्द्धन करता है। प्रधानमंत्री मोदी सुषासन के मामले में अतिरिक्त चिंता जता रहे हैं जिसका निहित मापदण्डों में ‘मेक इन इण्डिया‘ से लेकर ‘डिजिटल इण्डिया‘ तक देखा जा सकता है। सुषासन के लिए महत्वपूर्ण कदम सरकार की प्रक्रियाओं को सरल बनाना भी है ताकि पूरी प्रणाली को पारदर्षी एवं तीव्र बनाया जा सके। सरकार जन षिकायतों के निपटान को जिम्मेदार प्रषासन का एक महत्वपूर्ण घटक मानती है। ऐसे में मन्त्रालयों को यह निर्देष दिया जाना कि षिकायतें प्राथमिकता पर हों सुषासन की सही राह कही जा सकती है।
दषकों पहले कल्याणकारी व्यवस्था के चलते नौकरषाही का आकार बड़ा कर दिया था और विस्तार भी कुछ अनावष्यक हो गया था। 1991 में उदारीकरण के फलस्वरूप प्रषासन के आकार का सीमित किया गया एवं बाजार की भूमिका को बढ़ा दिया गया। वैष्विकरण के चलते कई अमूल-चूल परिवर्तन भी हुए। विष्व की अर्थव्यवस्था एवं प्रषासन अन्र्तसम्बन्धित होने लगे जिसके चलते सार्वजनिक क्षेत्र एक नये माॅडल की ओर झुकने लगे। सुषासन के मूल्य और मायने 21वीं सदी के इस दौर में इसलिए भी अधिक प्रासंगिक हुए क्योंकि सुधारात्मक प्रयासों के तहत बाजार और निजी क्षेत्रों की भूमिका बढ़ी है। नागरिकों की मूल्य प्रत्याषा में भी इजाफा हुआ है। ऐसे में लोक सेवाओं को अधिक गुणवत्तापरक करना तुलनात्मक जरूरी हुआ। बाजारवाद के बढ़ने से सरकार की भूमिका न्यूनवाद की ओर भी गयी। लोक प्रषासन में सुधार करते हुए नव लोक प्रबन्ध की अवधारणा का परिप्रेक्ष्य लाया गया। इस सुधार प्रक्रिया को सबसे पहले ब्रिटेन में मार्गेट थैचर और अमेरिका में रोनाल्ड रीगन ने अपनाया था। फिलहाल वर्तमान मोदी का षासन एक अच्छा सुषासन कैसे दे इन दिनों चिंता का सबब है और इस बात का चिंतन भी है कि इसकी खुराक कहां से पूरी होगी। योजना आयोग के बदले नीति आयोग जैसे ‘थिंक टैंक‘ लाने के पीछे यही उद्देष्य था, कौषल विकास, मानव विकास, मजबूत विकास आदि की ओर रूख करना सुषासन की सरकारी चिंता ही है। भारत सरकार के मंत्रालय और विभागों को उनके कार्यक्षेत्रों और उनकी आंतरिक प्रक्रियाओं पर न केवल गौर करने बल्कि सरल और तर्कसंगत बनाने के लिए भी जो जोड़-जुगाड़ हो रहा है वह चिंता भी सुषासन से जोड़ी जा सकती है। वैसे तो नेहरू के काल से ही बहुलवादी चिंताओं से देष षुमार रहा है। गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और असमानता को खत्म करने की वकालत भी की जाती रही है पर आज की तारीख में भी ये चिंताएं न केवल बनी हुई हैं बल्कि चुनौती बनी हुई हैं। ऐसे में सवाल यही होगा कि जब तक इनके खात्मे की अवधारणा नहीं आयेगी तब तक सुषासन पर की गयी चिंता बेमानी ही कहीं जायेगी। निहित संदर्भ यह भी रहेगा कि भारी पैमाने पर ग्रामीण समस्याएं अभी भी विद्यमान हैं जिसमें बुनियादी जीवन की जरूरतें हाषिये पर हैं। भले ही डिजिटल गवर्नेंस के चलते आंकड़े बेहतर हो गये हैं पर यहां जीवन की कसौटी अभी भी जरजर और दूभर किस्म की है जिसे लेकर चिंता लाजमी है।
बीते 2014 के 25 दिसम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के जन्मदिन को सुषासन दिवस के रूप में प्रतिश्ठित किया था कहा जाए तो इसी दिन सुषासन का वाजपेयीकरण हुआ। मोदी सरकार 28 दिसम्बर को डिजिटल गवर्नेंस परियोजना भी लांच करेगी। फिलहाल जिस प्रकार सुषासन को लेकर चिंतन चाहिए वैसा अभी नहीं दिखाई देता क्योंकि सुषासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है और जब तक लोगों की बुनियादी आकांक्षाओं और आवष्यक विकास अधूरे रहेंगे तब तक इसे पूरा पड़ता हुआ नहीं माना जायेगा। ऐसे में ई-गवर्नेंस इसकी भरपाई है हालांकि विगत् कुछ वर्शों से ई-एजुकेषन, आॅनलाइन मेडिकल परामर्ष, ई-हैल्थ, ई-कोर्ट, ई-पुलिस, ई-जेल, ई-बैंकिंग और ई-बीमा के चलते सुषासन को सुसज्जित किये जाने का प्रयास चल रहा है पर देष में व्यापक पैमाने पर किसानों की आत्महत्या, जन-जीवन को लेकर सुचिता का आभाव, मानव विकास सूचकांक का पिछड़ापन, लिंगानुपात का गिरा होना तथा कई वैष्विक स्तर की चुनौतियों में मीलों पीछे रहना इसमें निहित दोश की तरह हैं। सुषासन का तात्पर्य इतना ही नहीं है कि कोई सरकार या सामाजिक संगठन किस प्रकार आपसी अभिक्रिया करते हैं बल्कि जन सुरक्षा, कानून का षासन, नागरिक समाज के लिए सहायता, पर्यावरण के संदर्भ में बेहतर सोच और अलिखित आचार संहिताएं भी इसे पुख्ता करती हैं। प्रधानमंत्री मोदी ‘मैन आॅफ एक्षन‘ की अवधारणा में सुसंगत हैं पर नौकरषाही का औपनिवेषिक धारणा से अभी पीछा नहीं छूटा है जो सुषासन के लिए बड़ा खतरा है। सुषासन मांगने की नहीं, देने की चीज है मगर देष में कानून और व्यवस्था हो या बुनियादी आवष्यकता, सड़क पर उतरने से ही पूरी होती है। लोकपाल अन्ना आंदोलन के चलते तो जुवेनाइल जस्टिस आम आदमी के आंदोलन के चलते सम्भव हुआ है।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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क्या हमारे संदेश पाक तक पहुँच रहे हैं.

जब बीते शुक्रवार की सुबह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ षरीफ को प्रधानमंत्री मोदी 66वें जन्मदिन पर मुबारकबाद दे रहे थे तो यह मात्र एक औपचारिकता थी। इसी का निर्वहन करते हुए षरीफ ने भी षराफत के साथ मोदी को अपनी नातिन की षादी में आने और उसे आर्षीवाद देने का आग्रह कर दिया। ऐसा करते समय षरीफ को तनिक मात्र भी अंदेषा नहीं रहा होगा कि दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देष का मुखिया अब उन्हें सरप्राइज करने वाला है। मोदी के मन में क्या था इसका अंदाजा लगाना भी सरल नहीं था पर षरीफ के आग्रह को जिस प्रकार ‘अप्रत्याषित डिप्लोमेसी‘ के सांचे में ढाल दिया गया उससे दुनिया हैरत में पड़ गयी। मोदी ने भी संदेष दे दिया कि आप की दावत कबूल है। अब काबुल से उड़ने वाले विमान की लैण्डिंग दिल्ली  से पहले लाहौर होना तय हो गया पर लाहौर की इसी लैण्डिंग के चलते भारत-पाक समेत दुनिया के लिए एक अप्रत्याषित घटना हो गयी। विदेष मंत्री सुशमा स्वराज ने मोदी की इस हैरत भरी लाहौर यात्रा को ‘स्टेट्समैन‘ की तरह उठाया गया कदम बताया और कहा कि पड़ोसियों के बीच ऐसे ही मधुर रिष्ते होने चाहिए जबकि अन्तर्राश्ट्रीय राजनयिक खासकर भारत और पाकिस्तान के रिष्तों की जानकारी रखने वाले भौचक्के रह गये होंगे। विरोधियों को आलोचना करने का मौका है तो समर्थकों के लिए यह कदम हौसला अफज़ाई का काम कर रहा है। इतना ही नहीं एकाएक की गयी पाक यात्रा से वहां की कूटनीति न केवल भौचक्क है बल्कि मोदी की दमदारी को भी हाथोंहाथ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। जाहिर है औचक्क लाहौर यात्रा के संदेष को भी लेकर पाकिस्तान बड़ी पड़ताल में लगा होगा पर भारत को भी तो यह सोचना है कि क्या उसका संदेष पाक पहुंच रहा है?
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के 2004 के पाकिस्तान यात्रा के बाद मोदी की इस ‘सरप्राइज टूर‘ को बड़ी गम्भीरता से भी लिया जा रहा है। वे लाहौर पहुंच कर षरीफ से गले मिले एक ही हैलीकाॅप्टर में बैठ षरीफ के निवास जट्टी उमरा रायविंड पैलेस पहुंचे और डेढ़ घण्टे की भरपूर मुलाकात में वह सब हुआ जो एक सघन दोस्ती के बीच होता है। षरीफ ने मेहमानबाजी की, मोदी ने उसका लुत्फ उठाया और कई गिले-षिकवे को धोते हुए वैष्विक पटल पर एक ऐसा संदेष गढ़ दिया कि मानो भारत और पाक के बीच जो बर्फीले सम्बंध थे साथ ही बरसों की दरारें थी उनको एक लम्हे में पानी-पानी करके भर दिया गया हो। संयुक्त राश्ट्र ने उम्मीद जताई है कि दोनों देष वार्ता को बरकरार रखेंगे और मजबूती देंगे जबकि अमेरिका ने वार्ता का स्वागत करते हुए कहा कि दोनों देषों के सम्बंध सुधरने से पूरे क्षेत्र को फायदा होगा। भारत-पाक के बीच सम्बंधों का उतार-चढ़ाव चूहे-बिल्ली के खेल जैसा रहा है। मोदी को प्रधानमंत्री बने 19 महीने हो चुके हैं। तब से अब तक दोनों देषों के बीच सम्बंधों का ग्राफ कभी साफ तो कभी धुंधला रहा है। सिरे से पड़ताल किया जाए तो मोदी ने षरीफ को 26 मई, 2014 को षपथ ग्रहण समारोह में बुलाया था। इसी दौर की बातचीत में भारत विदेष सचिव इस्लामाद भेजने को राजी हुआ था पर अगस्त में विदेष सचिव भेजे जाने से पहले ही पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने दिल्ली में कष्मीरी अलगाववादियों से मुलाकात की। भारत को विदेष सचिव का दौरा रद्द करना पड़ा। इसे पाकिस्तान की बड़ी भूल के साथ गलत कूटनीति के अर्थ के तौर पर देखा गया।
नवम्बर, 2014 में मोदी-षरीफ की मुलाकात एक बार फिर तब हुई जब नेपाल में सार्क सम्मेलन हो रहा था। हालांकि यहां बात अभिवादन तक ही रही, आधिकारिक स्तर पर कोई बातचीत नहीं हुई। यहां से रिष्तों का ठहराव देखा जा सकता है। जुलाई, 2015 में रूस के उफा में प्रधानमंत्री मोदी और नवाज़ षरीफ की एक बार फिर मुलाकात हुई यहां आतंक को लेकर षरीफ ने मोदी से जो वादा किया उसे इस्लामाबाद पहुंचने पर पलटने के चलते रिष्ते यथावत के साथ और कसैलेपन का रूप ले लिया। देखा जाए तो सम्बंधों पर जमी बर्फ एक बार फिर पिघलते-पिघलते रह गयी थी मगर बीते 30 नवम्बर को पेरिस में हुए जलवायु सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की दो मिनट की मुलाकात रिष्तों को नये आयाम देने के काम आये। इसी दो मिनट के चलते विदेष मंत्री सुशमा स्वराज का इस्लामाबाद दौरा हुआ, ‘समग्र बातचीत‘ को लेकर दोनों देष रजामंद हुए अब आलम यह है कि सुशमा स्वराज का इस्लामाबाद से वापसी किये बामुष्किल एक पखवाड़ा बीता था कि प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान में इस तरह दाखिल हुए कि दुनिया देखती रह गयी। हालांकि पेरिस में हुई मुलाकात के बाद दोनों देषों के एनएसए थाइलैंड की राजधानी बैंकाॅक में मिले थे जिसमें द्विपक्षीय वार्ता के लिए रोडमेप तैयार कर लिया गया था और उसी के हिसाब से तारीखें भी तय कर ली गयी थी। भले ही लाहौर की यह औचक्क यात्रा लोगों के गले उतरना मुष्किल हो पर इसमें यह संकेत और संदेष भी है कि भारत कूटनीति और चालबाजी करने वालों के साथ भी असंवेदनषील व्यवहार नहीं करता है और हर हाल में रिष्तों में मजबूती ही चाहता है। लाहौर में की गयी लैण्डिंग मोदी का एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक है कि विरोधी भी सकते में होंगे।
षायद दुनिया भी यह जानती है कि भारत सदैव सबका हित चाहता है उसके इस चाहत में पाकिस्तान भी षामिल है पर अब पाकिस्तान को समझना होगा कि भारत की इस पेषगी को वह किस रूप में लेता है। एक तरफ भारत जहां पाकिस्तान से वार्ता करने का पूरा इरादा बना चुका है, अनावष्यक समस्याओं से बाज आना चाहता है वहीं पाकिस्तान संघर्श विराम का उल्लंघन करना और भारतीय सीमा पर गोलीबारी करने से कभी नहीं हिचकिचाया। भारत ने 1948, 1965, 1971 और 1999 सहित चार बार पाकिस्तान को परास्त भी किया बावजूद इसके भारत पिछले तीन दषकों से आतंक को झेलते हुए काफी संयम से काम ले रहा है। वर्तमान भारत मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार से युक्त है। कहा जाए तो भारत मोदी की अगुवाई में न केवल सक्रिय नेतृत्व की पूर्ति कर रहा है बल्कि वैष्विक पटल पर भी काफी साख बटोर चुका है। यह अच्छा मौका होगा कि पाकिस्तान आर-पार को भुलाकर व्यापार और व्यवस्था पर एक ऐसी कोषिष करे कि बरसों से जड़-जंग हो चुकी समस्याएं हल को प्राप्त कर सकें। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने पाकिस्तान के मामले में अपना सक्रिय और सकारात्मक रूख दिखा दिया है अब बारी पाकिस्तान की है कि भारत की इस पहल को प्रगाढ़ता में बदल दे। जाहिर है कि कई आतंकी संगठन को यह नागवार गुजरेगा। वे कभी नहीं चाहेंगे कि रिष्ते मधुर हों और समस्याओं पर छाए काले बादल छंटे पर विमर्ष यह कहता है कि कूटनीति के दायरे में रहते हुए दो पड़ोसी मुल्कों को सम्बंधों का एक ऐसा मजबूत धरातल निर्माण करना चाहिए जहां दोनों को राहत हो और आने वाली पीढ़ियों के लिए अच्छा वातावरण मिले। जिस बेसब्री से षरीफ ने मोदी का लाहौर में इंतजार किया था और लजीज भोजन परोसा था यदि उसी मन से वे भारत के मनोविज्ञान और उसके अंदर छुपे संदेष को परख ले तो दोनों नेता सम्बंधों को न केवल नया मुकाम दे सकते हैं बल्कि इतिहास की तारीख में भारत-पाक रिष्ता अजर-अमर हो सकता है।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
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