Friday, September 15, 2023

विरोधी क्यों ला रहे हैं अविष्वास प्रस्ताव!

लोकतंत्र में यह रहा है कि देष की सबसे बड़ी पंचायत से जनहित को सुनिष्चित करने वाले कानून और कार्यक्रम की उपादेयता सुनिष्चित होती है पर संसद अगर षोर-षराबे की ही षिकार होती रहेगी तो ऐसा सोचना बेमानी होगा। इन दिनों मानसून सत्र जारी है मगर षोर-षराबे से तो यही लगता है कि गैर मर्यादित भाशा और तनी हुई भंवों के बीच पक्ष और विपक्ष दोनों पानी-पानी तो होंगे मगर देष की प्यास बुझनी मुष्किल है। गौरतलब है कि मणिपुर हिंसा का मुद्दा लोकसभा में अविष्वास प्रस्ताव तक पहुंचने के बाद सरकार और विरोधी के बीच संसद के बाहर और भीतर घमासान जारी है। विदित हो कि बीते मई की षुरूआत से ही मणिपुर वर्ग संघर्श में कहीं अधिक हिंसा से लिप्त रहा जिसे लेकर विपक्ष मुखर है। यह रार तब और पेचीदा हो गयी जब विपक्षी गठबंधन ने अविष्वास प्रस्ताव को बहस से पहले संसद में बिना चर्चा किये विधेयक पारित कराये जाने को लेकर ऐतराज जाहिर करते हुए सरकार पर संसदीय नियमों और परम्पराओं को तोड़ने का आरोप लगाया। फिलहाल इन दिनों मोदी सरकार के विरूद्ध अविष्वास प्रस्ताव लाने की कोषिष की जा रही है। मगर बहुमत से कहीं अधिक ऊपर 303 सीट वाली अकेले बीजेपी और गठबंधन सहित 350 का आंकड़ा रखने वाली बीजेपी के खिलाफ अविष्वास प्रस्ताव क्यों लाया जा रहा है यह बात समझ से परे है। हालांकि अविष्वास प्रस्ताव विपक्ष का एक औजार है और कई मौकों पर इसका उपयोग होता रहा है। वजह जो भी हो फिलहाल विरोधियों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। दरअसल अविष्वास प्रस्ताव सरकार के विरूद्ध लाना एक संवैधानिक विधा है जिसकी चर्चा अनुच्छेद 75(3) के अन्तर्गत देखा जा सकता है। वैसे देखा जाय तो अविष्वास प्रस्ताव के समर्थन को लेकर षायद ही सभी विरोधियों का रूख एक जैसा हो। 543 लोकसभा सदस्यों के मुकाबले 272 से बहुमत हो जाता है जबकि बीजेपी अकेले 300 से अधिक का आंकड़ा रखती है। हालांकि संविधान में यह भी प्रावधान है कि सदन में उपस्थित सदस्यों में से मत देने वाले सदस्यों के आधे से अधिक से बहुमत सम्भव है। मोदी सरकार को अविष्वास प्रस्ताव को लेकर किसी प्रकार का डर नहीं होना चाहिये परन्तु विपक्ष यदि संविधानसम्वत् इसका पक्षधर है तो उसे अवसर भी दिया जाना चाहिए। हांलाकि इसका निर्णय स्पीकर को करना है। 

अविष्वास का प्रस्ताव एक संसदीय प्रस्ताव है जिसे पारम्परिक रूप से विपक्ष द्वारा संसद में एक सरकार को हराने या कमजोर करने की उम्मीद से रखा जाता है। आमतौर पर जब संसद अविष्वास प्रस्ताव में वोट करती है या सरकार विष्वास मत में विफल रहती है तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है या संसद को भंग करने और आम चुनाव की बात षामिल रहती है। फिलहाल इसके आसार दूर-दूर तक नहीं है लेकिन जो विरोधी मोदी के विरूद्ध अविष्वास प्रस्ताव पर आमादा हैं उन्हें यह भी समझना होगा कि सदन की कार्यवाही भी चलने दें। इससे देष की जनता का नुकसान हो रहा है जिससे वह स्वयं वोट लेकर आये हैं। अविष्वास तथा निंदा जैसे प्रस्ताव विपक्षियों के औजार हैं पर इसे कब प्रयोग करना है इसे भी समझना बेहद जरूरी है। इसके पहले साल 2018 के बजट सत्र में भी मोदी सरकार के खिलाफ अविष्वास प्रस्ताव की मांग तेज हुई थी। देखा जाये तो यह दूसरा मौका है जब विरोधी अविष्वास प्रस्ताव को लेकर सजग दिखाई दे रहे हैं। पड़ताल बताती है लोकतंत्र के संसदीय इतिहास में सबसे पहले जवाहरलाल नेहरू सरकार के खिलाफ यह प्रस्ताव अगस्त 1963 में जेबी कृपलानी ने रखा था लेकिन इसके पक्ष में केवल 52 वोट पड़े थे जबकि प्रस्ताव के विरोध में 347 वोट थे। गौरतलब है कि मोदी सरकार के विरूद्ध पिछले नौ सालों में दूसरी बार अविष्वास प्रस्ताव लाये जाने की बात हो रही है जबकि इन्दिरा गांधी सरकार के खिलाफ सर्वाधिक 15 बार तथा लाल बहादुर षास्त्री और नरसिंह राव सरकार को तीन-तीन बार ऐसे प्रस्तावों का सामना करना पड़ा है। नेहरू षासनकाल से अब तक 25 बार अवष्विास प्रस्ताव सदन में लाये जा चुके हैं जिसमें 24 बार ये असफल रहे हैं। 1978 में ऐसे ही एक प्रस्ताव से सरकार गिरी थी। वैसे मोरारजी देसाई सरकार के खिलाफ दो अविष्वास प्रस्ताव रखे गये थे पहले में तो उन्हें कोई परेषानी नहीं हुई परन्तु दूसरे प्रस्ताव के समय उनकी सरकार के घटक दलों में आपसी मतभेद थे। हालांकि उन्हें अपनी हार का अंदाजा था और मत विभाजन से पहले इस्तीफा दे दिया था। देखा जाय तो विपक्ष में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी भी एक बार इन्दिरा गांधी के खिलाफ और दूसरी बार नरसिंह राव के खिलाफ अविष्वास प्रस्ताव रख चुके हैं। 

फिलहाल मौजूदा परिस्थितियां कहीं से अविष्वास प्रस्ताव को लेकर नहीं दिखायी देती मगर यह उम्मीद है कि सात-आठ अगस्त को लोकसभा में अविष्वास प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है। लोकसभा में अविष्वास प्रस्ताव लाने के लिये नोटिस तभी स्वीकार किया जाता है जब उसके समर्थन में 50 सदस्य हों। मुख्य विपक्षी कांग्रेस के पास कुल जमा 52 का आंकड़ा तो है। हालांकि जिस प्रकार विरोधी इन दिनों इण्डिया के बैनर तले एकजुटता दिखाई है उससे अविष्वास प्रस्ताव के मामले में विरोधी एकता बड़ी तो होगी मगर सफल नहीं होगी। मुद्दा यह है कि अविष्वास प्रस्ताव लाने वाले के पास जब चंद आंकड़े जुटाना भी मुष्किल है तो बड़ी कूबत वाली सरकार की कुर्सी कैसे हिला पायेंगे। खीज के चलते कांग्रेस समेत वामपंथ या अन्य सरकार के विरोध में मत दे सकते हैं पर इनकी स्थिति भी बहुत दयनीय है। कुछ क्षेत्रीय दल मुद्दे विषेश को लेकर सरकार के विरूद्ध हो सकते हैं पर अविष्वास प्रस्ताव लाने वालों के साथ होंगे ऐसा लगता नहीं है। वैसे भाजपा तथा उनके सहयोगियों में सब कुछ अच्छा ही चल रहा है पूरी तरह कहना कठिन है पर सरकार बचाने में उनका मत सरकार के साथ न हो यह भी होता नहीं दिखाई देता। फिलहाल अविष्वास प्रस्ताव एक विरोधी संकल्पना है जिसका उपयोग किया जाना कोई हैरत वाली बात नहीं। संदर्भित बात यह है कि सदन का कीमती वक्त रोज हंगामे की भेंट चढ़ रहा है। भारी-भरकम पूर्ण बहुमत वाली सरकार का बीते नौ सालों में कोई भी ऐसा सत्र नहीं रहा जिसमें विरोधियों ने नाक में दम न किया हो। सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक भी यहां काम नहीं आ रही है। एक-दूसरे की लानत-मलानत और छींटाकषी में वक्त बीत रहा है जबकि 2024 मुहाने पर है जहां 18वीं लोकसभा का एक बार फिर गठन होना है। देष के राजनेता जो राजनीति करें वही जनता को देखना होता है चाहे अच्छा करें या न अच्छा करे। फिलहाल विपक्ष सत्ता की परछाई होती है और 9 साल से अधिक वाली मोदी सरकार हर जगह सही है ऐसा मानना भी सही नहीं है। विरोधियों की आपत्ति भी जनहित में काम आती है और सरकार की नीतियां भी हित सुनिष्चित ही करती हैं। ऐसे में भाशा की मर्यादा, जन भावनाओं का सम्मान साथ ही संसद के भीतर षोर करने की बजाय षान्ति और खुषहाली से जुड़े नियोजन पर काम किया जाये तो सरकार और विपक्ष दोनों के लिए अच्छा रहेगा।

  दिनांक : 29/07/2023


डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
मो0: 9456120502

पूरा ई-ग्राम स्वराज के बगैर अधूरा ग्रामीण सुशासन

साल 2025 तक देष में इंटरनेट की पहुंच 90 करोड़ से अधिक जनसंख्या तक हो जायेगी जो वर्तमान में 70 करोड़ है। तकनीक किस गति से अपना दायरा बढ़ा रही है यह बढ़े हुए सुषासन से आंक सकते हैं और किस स्तर पर यह अभी चुनौतियों में फंसी है इसका आंकलन भी समावेषी विकास पर निरंतर पड़ती चोट से समझ सकते हैं। गौरतलब है कि ई-गवर्नेंस से प्रषासनिक कार्य एवं सेवाओं की दक्षता तथा गुणवत्ता में सुधार होता है और यह भ्रश्टाचार को कम करने का औजार भी है। जाहिर है ऐसी दोनों परिस्थितियों में सुषासन की बयार बहना सम्भव है। भारत गांवों का देष है और डिजिटल इण्डिया का विस्तार व प्रसार षहर तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। निःसंदेह गांव तक इसकी पहुंच को बढ़ाने की पुरजोर कोषिष हो रही है और ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ई-गवर्नेंस से प्रखर हुई ई-ग्राम समाज अभियान की अवधारणा को भी बल मिलेगा मगर तकनीक यदि रोड़ा बनी रही तो ई-ग्राम स्वराज की अवधारणा जाहिर है कमजोर भी होगी। इससे गांव के डिजिटलीकरण का सपना अधूरा रहेगा और 1922 में जो सपना महात्मा गांधी ने गांव के लिए देखा था वह भी कसमसाहट में भी रह जायेगा। विदित हो कि आगामी अक्टूबर 2023 से गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) पोर्टल से ही पंचायतों में खरीद को अनिवार्य किया जाना है। लाख टके का सवाल यह है कि जब इंटरनेट सेवाएं आधी पंचायतों तक भी नहीं पहुंची है तो इस पोर्टल से जुड़े सपने को जमीन कैसे मिलेगी। स्पश्ट कर दें कि जनवरी 2023 तक लगभग 81 हजार पंचायतों तक ही इंटरनेट सेवाएं पहुंच पायी हैं जबकि संसद की स्थायी समिति को मंत्रालय द्वारा दिये गये आंकड़ों के अनुसार देष में लगभग पौने तीन लाख पंचायतें हैं। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि हजारों पंचायतों में सेवा षुरू होने वाली है और छः माह में इसे और गति देते हुए आगामी दो वर्श में षत-प्रतिषत पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ दिया जायेगा। 

कृशि स्टार्टअप से लेकर मोटे अनाज पर जोर समेत कई संदर्भ पिछले कुछ समय से फलक पर है। उत्पाद, उद्यम और बाजार ई-ग्राम स्वराज की अवधारणा में एक अनुकूल वातावरण ला सकते हैं। मगर इसके लिए इंटरनेट की सेवाएं समुचित रूप से बहाल करनी होंगी। दावे राजनीतिक दृश्टि से कुछ भी हों मगर सुषासन का दृश्टिकोण यह कहता है कि समावेषी ढांचा बिना सुनिष्चित किए ग्रामीण विकास को उचित रूप दिया ही नहीं जा सकता जिसके कारण लोक सषक्तिकरण एक चुनौती बना रहेगा। ई-गवर्नेंस की दृश्टि से देखें तो इसका भी टिकाऊ पक्ष इंटरनेट कनेक्टिविटी ही है। इसी साल के फरवरी में पेष बजट में भी किसानों को डिजिटल ट्रेनिंग देने की बात देखी जा सकती है मगर यह कैसे सम्भव होगा यह भी सोचनीय मुद्दा है। गांव में 8 करोड़ से अधिक महिलाएं जो व्यापक पैमाने पर स्वयं सहायता समूह से जुड़कर उत्पाद करने का काम कर रही हैं और इन्हें देष-विदेष में बाजार मिले इसके लिए भी तकनीक तो चाहिए। इंटरनेट एण्ड मोबाइल एसोसिएषन के सर्वे पर आधारित एक रिपोर्ट जो थोड़ी पुरानी है उससे पता चलता है कि 2020 में गांव में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 30 करोड़ तक पहुंच चुकी थी। देखा जाये तो औसतन हर तीसरे ग्रामीण के पास इंटरनेट सुविधा है। पौने तीन लाख पंचायतों में 80 हजार पंचायतों तक इंटरनेट की पहुंच इसी आंकड़े को तस्तीक करता है। पूरा भारत साढ़े छः लाख गांवों से भरा है और इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में 42 फीसद ग्रामीण महिलाएं हैं। गांव में महिलाओं की श्रम षक्ति में हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। कृशि क्षेत्र में अभी भी 60 प्रतिषत के साथ यह बढ़त लिए हुए है। इतना ही नहीं बचत दर सकल घरेलू उत्पाद का 33 प्रतिषत इन्हीं से सम्भव है और डेरी उद्योग में तो महिलाएं ही छायी हैं जहां 94 फीसद का आंकड़ा देखा जा सकता है। इंटरनेट की बढ़त से चैतरफा सम्भावनाओं में बाढ़ आना स्वाभाविक तो है मगर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि यह सुलभ के साथ कहीं अधिक सस्ता भी हो। 

पंचायती राज मंत्रालय, पंचायतों को पारदर्षी और सषक्त बनाने के लिए कई अभियान और कार्यक्रम चला रहा है। पंचायतों को इस बात के लिए भी निर्देषित किया गया है कि ग्राम पंचायत स्तर पर किसी भी मद में पैसे का लेन-देन फिलहाल यूपीआई से ही किया जाये जिस हेतु 15 अगस्त 2023 का लक्ष्य रखा गया। स्पश्ट है कि डिजिटल लेन-देन व ई-गवर्नेंस को यहां तवज्जो देने की बात है मगर इसका भी पूरा ताना-बाना इंटरनेट कनेक्टिविटी पर निर्भर है। इसके अलावा मंत्रालय की केन्द्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने राज्यों से यह भी कहा है कि राज्य विषेश की सभी पंचायतों में जीईएम पोर्टल के माध्यम से ही वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-फरोख्त को केन्द्रीय वित्त आयोग द्वारा अनिवार्य किया जा रहा है। यहां भी ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देने की बात है बषर्ते चुनौती में इंटरनेट सेवा ही है। राज्यों में इंटरनेट सेवा की पड़ताल यह बताती है कि लगभग पूरे देष में हालत कमोबेष कमजोर और एक जैसी है मसलन उत्तर प्रदेष मे 58189 पंचायतों में महज 5014 पंचयतें इंटरनेट से जुड़ पायी हैं। यह आंकड़ा इस बात का उदाहरण है कि पंचायतें इंटरनेट सेवा के मामले में बहुत बेहतर नहीं बल्कि चिंतनीय अवस्था में है। उत्तराखण्ड में यही आंकड़ 7791 के मुकाबले 1010 पर है। इसी क्रम में राजस्थान, मध्य प्रदेष, हिमाचल प्रदेष समेत सभी राज्यों की हालत कुछ ऐसी ही है। पंजाब इस मामले में कहीं अधिक बेहतर अवस्था लिए हुए है। यहां कि 13241 पंचायतों में 9483 पंचायतें इंटरनेट से सरोकार रखती है जबकि हरियाणा में 6220 पंचायतों के मुकाबले इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले पंचायतों की संख्या 3570 है। देखा जाये तो गुजरात में 14359 पंचायतों में 11167 का जुड़ाव इंटरनेट से है जो अपनेआप में एक बेहतर आंकड़ा तो हैं। दावे अपनी जगह है नीयत और नीति में भी कोई संदेह नहीं है मगर ई-ग्राम स्वराज में पंचायतों की तकनीकी स्थिति को देखते हुए यह आंकलन आसान है कि अभी एड़-चोटी का जोर लगाना बाकी है। लेकिन एक हकीकत यह है कि जनवरी में किए गए तमाम दावो को छः महीने बीत चुके हैं, हो सकता है कि पंचायतों को इंटरनेट से जोड़ने का क्रम बीते छः महीने में बड़ा रूप लिया हो मगर यह कहना अतार्किक सा प्रतीत होता है कि अक्टूबर से जीईएम पोर्टल से ही पंचायते अनिवार्य रूप से खरीद मामले से जुड़ जायेंगी। इसका सबसे बड़ा कारण फिर वही तकनीक की चुनौती ही है। 

वोकल फाॅर लोकल का नारा कोरोना काल में तेजी से बुलंद हुआ। मोटे अनाज को लेकर इन दिनों चर्चा खूब जोरों पर है। अच्छे बीज, अच्छी सीख और अच्छी खेती समेत मुनाफे से भरी बिकवाली की अगर कोई बड़ी चुनौती है तो वह तकनीक का समुचित न होना ही है। गांव श्रम का सस्ता रास्ता है लेकिन वित्तीय कठिनाईयों के चलते संसाधन की कमी से जूझते कौषलयुक्त ग्रामीण श्रम षहर का रास्ता पकड़ लेता है। जिसका सबसे बड़ा असर ग्राम स्वराज की उस अवधारणा पर पड़ता है जो राश्ट्रपति महात्मा गांधी का सपना था। ग्रामीण उद्यमी वित्तीय रूप से सषक्त होंगे व तकनीक से युक्त होंगे तो जाहिर है गांवों का देष भारत उन्नति का परिचायक हो जायेगा। फलस्वरूप सुषासन का सपना पाले सरकार को भी इसकी पूरी परिभाशा गढ़ने का अवसर मिलेगा।

 दिनांक : 29/07/2023


डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
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आर्थिक चुनौतियों से युक्त चिकित्सा शिक्षा

भारत में चिकित्सक के रूप में कैरियर बनाने के उद्देष्य से हर वर्श लाखों विद्यार्थी मेडिकल काॅलेजों में प्रवेष के लिए नीट परीक्षा में संलग्न देखे जा सकते हैं। प्रत्येक मई-जून के महीने में 12वीं उत्तीर्ण और डाॅक्टर बनने का सपना देखने वाले लाखों विद्यार्थियों की तादाद उभार ले लेती है। बीते 7 मई को नेषनल एलिजिबिलिटी कम एन्ट्रेंस टेस्ट यानि नीट 2023 की परीक्षा आयोजित हुई जिसमें आवेदकों की संख्या 21 लाख से अधिक थी जो पिछले वर्श की तुलना तीन लाख अधिक है जिसका परिणाम आ चुका है और प्रवेष हेतु काउंसलिंग जारी है। पड़ताल बताती है कि साल 2021 में 14 लाख विद्यार्थी नीट के लिए पंजीकृत थे जबकि इसके पहले 2020 में यह आंकड़ा 16 लाख और 2019 में 15 लाख थे। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि एमबीबीएस के लिए लगभग एक लाख सीटें सरकारी एवं निजी मेडिकल काॅलेजों में उपलब्ध है और वर्तमान में काॅलेजों की संख्या साढ़े छः सौ से अधिक है। इसके अलावा अन्य मेडिकल पढ़ाई मसलन दन्त चिकित्सा आदि की भी प्रवेष प्रक्रिया नीट के माध्यम से ही संचालित होती है। गौरतलब है कि पूरे देष में महज 52 हजार सीटें ही सरकारी कोटे की हैं जहां एमबीबीएस में सरकारी फीस के अन्तर्गत अध्ययन होता है। बाकी 48 हजार से अधिक सीटें निजी काॅलेजों आदि के हाथों में है। जाहिर है ऐसे काॅलेजों में विद्यार्थियों को भारी-भरकम षुल्क अदा करना होता है। जो कुछ काॅलेजों में तो पूरे साढ़े पांच साल की पढ़ाई में करोड़ों रूपया से अधिक भी पार कर जाता है। भारत दुनिया का आबादी में सबसे बड़ा देष है और युवा आबादी में भी यह सर्वाधिक ही है। 12वीं के बाद कैरियर की तलाष को लेकर आगे की पढ़ाई में मेडिकल लाखों का सपना होता है। आंकड़ा तो यह भी बताते हैं कि भारत के अस्सी फीसद परिवार महंगी फीस के चलते बच्चों को चिकित्सा की पढ़ाई ही करवाने में अक्षम है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार 2014 से पहले देष में 387 मेडिकल काॅलेज थे जो वर्तमान में इक्हत्तर फीसद की बढ़त लिये हुए है और पहले सीटें महज इक्यावन हजार से थोड़ी ज्यादा थी अब यह आंकड़ा एक लाख पार कर चुका है। पोस्ट ग्रेजुएट सीटों में भी 110 फीसद की वृद्धि बतायी गयी है। पूरे भारत में तमिलनाडु में सर्वाधिक मेडिकल काॅलेज हैं। जहां कुल बहत्तर काॅलेजों में अड़तिस सरकारी हैं और इन सरकारी काॅलेजों में एमबीबीएस की पांच हजार दो सौ पच्चीस सीटें हैं जबकि छः हजार सीटें निजी काॅलेजों में है। दूसरे स्थान पर महाराश्ट्र है जहां चैसठ काॅलेज और दस हजार से ज्यादा सीटें उसमें तीस सरकारी काॅलेज हैं। यहां भी एमबीबीएस की सीटें बामुष्किल पांच हजार हैं। उत्तर प्रदेष देष का सर्वाधिक जनसंख्या वाला प्रदेष है मगर मेडिकल काॅलेजों की संख्या में यह तीसरा प्रदेष है, कुल 67 काॅलेजों में पैंतीस सरकारी हैं बाकि सभी निजी हैं। जबकि इन 35 सरकारी काॅलेजों में एमबीबीएस की सीट बामुकिष्ल 43 सौ हैं। इसी क्रम में आन्ध्र प्रदेष आन्ध्र प्रदेष, राजस्थान और गुजरात आदि देखे जा सकते हैं। उक्त से यह स्पश्ट है कि चिकित्सा सेवा को चाहने वालों की तादाद कहीं अधिक है जबकि प्रवेष की सीमा बहुत ही न्यून है षायद यही कारण है कि हजारों विद्यार्थी दुनिया के तमाम देषों में इस सपने को उड़ान देने के लिए उड़ान भरते हैं। हालांकि इसके पीछे एक मूल कारण सस्ती फीस का होना भी है। भारत के निजी चिकित्सा काॅलेजों में फीस पूरे एमबीबीएस करते-करते करोड़ से अधिक खर्च में तब्दील हो जाती है जो सभी की पहुंच में नहीं हैं। मगर दुनिया के कई ऐसे देष हैं जो तीस-पैंतीस लाख के भीतर पूरी पढ़ाई को अंजाम दे देते हैं।

देष के संसदीय कार्य मंत्री ने भी बताया है कि मेडिकल की पढ़ाई करने जाने वाले 90 फीसद विद्यार्थी नीट परीक्षा में फेल हुए रहते हैं। गौरतलब है कि प्रत्येक वर्श हजारों हजार विद्यार्थी मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेष जाते हैं। विदेष में चिकित्सा का अध्ययन करने के लिए पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त करने का षासनादेष जनवरी 2014 से लागू हुआ और तब से यह संख्या हर वर्श तेजी से बढ़ रही है। 2015-16 के बीच विदेष में चिकित्सा का अध्ययन करने के इच्छुक भारतीय छात्रों को भारतीय चिकित्सा परिशद द्वारा दी गयी पात्रता प्रमाणपत्र की संख्या 3398 थी, 2016-17 में यह आंकड़ा 8737 हो गया और बढ़त के साथ 2018 में तो यह 17 हजार के आंकड़े को भी पार किया जबकि वर्तमान में यह 20 हजार से पार कर गया है। इसके कारण को समझना बहुत सरल है भारत के मुकाबले विदेषों में मेडिकल की पढ़ाई कई मायनों में सुविधाजनक होना। नीट एक ऐसा एन्ट्रेंस टेस्ट है जिससे पार पाना कुछ के लिए बेहद मुष्किल होता है और यदि नीट में अंक कम हो तो एडमिषन फीस बहुत ज्यादा हो जाती है। ऐसे ही एक विज्ञापन पर नजर पड़ी जो इन दिनों सोषल मीडिया पर देखा जा सकता है। जिसमें मेडिकल काॅलेजों में सीट सुरक्षित करने को लेकर नीट के अंकों के हिसाब से फीस का वर्णन है। मसलन यदि विद्यार्थी का नीट में 550 से अधिक अंक है तो उसके लिये 45 से 55 लाख का पैकेज है और यही अंक अगर 450 से ऊपर और 550 से कम है तो यह 60 लाख तक का पैकेज हो जाता है और यदि इसी क्रम के साथ विद्यार्थी नीट परीक्षा महज क्वालिफाई किया हो तो उसके लिए फीस 85 लाख से सवा करोड़ होगी। उक्त से यह पता चलता है कि नीट में अंक अधिक तो फीस कम होगी मगर इतनी भी कम नहीं कि सभी सपने बुन सकें। मगर सवाल यह भी है कि इसका विकल्प क्या है। जो चिकित्सा की पढ़ाई रूस, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, जाॅर्जिया, चीन, फिलिपीन्स यहां तक कि यूक्रेन जैसे देषों में महज 30-35 लाख में सम्भव है वहीं भारत में इतनी महंगी है कि कईयों की पहुंच में नहीं है।

देष में 14 लाख डाॅक्टरों की कमी है। यही कारण है कि विष्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति एक हजार आबादी पर एक डाॅक्टर होना चाहिए वहां भारत में सात हजार की आबादी पर एक डाॅक्टर है। जाहिर बात है कि ग्रामीण इलाकों में चिकित्सकों के काम नहीं करने की अलग समस्या है। विष्व स्वास्थ्य संगठन ने 1977 में ही तय किया था कि वर्श 2000 तक सबके लिए स्वास्थ्य का अधिकार होगा, लेकिन वर्श 2002 की राश्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार स्वास्थ्य पर जी0डी0पी0 का दो प्रतिषत खर्च करने का लक्ष्य आज तक पूरा नहीं हुआ। इसके विपरीत सरकारें लगातार स्वास्थ्य बजट में कटौती कर रही हैं। देखा जाये तो तो कम चिकित्सक होने की वजह से भी भारत में चिकित्सा की पढ़ाई और चिकित्सा सेवाएं महंगी हैं। दो टूक यह भी है कि विदेष में चिकित्सा की पढ़ाई सस्ती भले ही हो मगर कैरियर के मामले में उतनी उम्दा नहीं है। भले ही वहां गुणवत्ता और मात्रात्मक सुविधाजनक व्यवस्था क्यों न हो। दरअसल इसके पीछे एक मूल कारण यह भी है कि भारत एक उश्ण कटिबंधीय देष है और यहां पर पूरे वर्श मौसम अलग-अलग रूप लिये रहता है और यहां व्याप्त बीमारियां भी भांति-भांति के रंगों में रंगी रहती है। ऐसे में यहां अध्ययनरत् मेडिकल छात्र पारिस्थितिकी और पर्यावरण के साथ बीमारी और चिकित्सा संयोजित कर लेते हैं जबकि दूसरे देषों में यही अंतर रहता है। फिलहाल भारत में मेडिकल काॅलेजों की संख्या जनसंख्या के अनुपात में कम ही कहा जायेगा। जाहिर है चिकित्सकों की खेप लगातार तैयार करने से ही लोगों की चिकित्सा और सरकार की आयुश्मान भारत जैसी योजना को मुकम्मल प्रतिश्ठा दिया जा सकेगा। ऐसे में सरकारी के साथ निजी मेडिकल काॅलेजों में भी षुल्क का अनुपात कम रखना ही देष के हित में रहेगा।

 दिनांक : 29/07/2023


डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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आखिर क्यों हुई दिल्ली पानी-पानी

वैसे हर बारिष में गांव हो या षहर कमोबेष नये संघर्श की यात्रा कर लेते हैं मगर इस बार मामला कुछ ज्यादा दिक्कत वाला रहा। हिमाचल, उत्तराखण्ड, समेत कई पहाड़ी राज्यों के साथ मैदानी भी हालिया बारिष और बाढ़ से अच्छी खासी तबाही में गये हैं। इसी तबाही का षिकार फिलहाल दिल्ली भी है। रिकाॅर्ड तोड़ बारिष और यमुना के जल स्तर का रिकाॅर्ड स्तर जिस तरह टूटा है उससे दिल्ली में केवल आमजन तक ही नहीं बल्कि मंत्रियों और सांसदों के घर तक बारिष का पानी पहुंचा है। वैसे देखा जाये तो दिल्ली पहली बार न तो त्रस्त हुई है न त्रासदी देखी है बल्कि यह लगभग हर साल के मौसम में कम-ज्यादा होता रहा है। हां यह बात और है कि इस बार दिल्ली की सड़कें ताल-तलैया और पोखर में तब्दील हो गये। सवाल है कि जिस दिल्ली में दो सरकारे रहती हैं, जो देष की आबोहवा को बदलने की कूबत रखती है वह दिल्ली बारिष के चलते खुद डूबती दिखी। गौरतलब है कि दिल्ली की आबादी दो करोड़ से अधिक है और 1947 में यहां महज 7 लाख की जनसंख्या थी। समय के साथ आबादी बढ़ती गयी निर्माण कार्यों में तेजी आयी और एक मेगा षहर का स्वरूप अख्तियार करते हुए दिल्ली इमारतों, सड़कों, रिहाइषी भवनों, कल-कारखानों और बड़े-बड़े ओवर ब्रिज से बोझिल हो गयी और इसी निरंतरता के साथ जन घनत्व भी प्रसार लिया मगर कई अनेक समस्याएं इसे चारों तरफ से घेर भी लीं मसलन कचरे का ढ़ेर, ई-कचरा, जल निकासी की समस्या आदि ने एक नये तरीके का पीड़ा भी इस दिल्ली को दिया है। कहा जाता है कि दिल्ली के जल निकासी के लिए जो योजना 1976 में बनायी गयी थी वही आज भी निरंतरता लिए हुए है। खास यह है कि इसे महज 20 साल के लिए बनाया गया था जो लगभग 50 साल पूरे कर रही है। अब यह बात समझना सहज है कि दिल्ली बारिष में क्यों हाफने लगती है। 

हालिया स्थिति को देखें तो दिल्ली में आया जल प्रलय योजनाकारों और सरकारों दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। दिल्ली के कई इलाकों में यमुना के बढ़ते पानी के कारण बाढ़ की स्थिति पैदा हो गयी। यमुना का जल स्तर 208 मीटर से अधिक का छलांग लगाते हुए रिकाॅर्ड स्तर तक पहुंच गया है। आईटीओ, निगमबोध घाट, कष्मीरी गेट सहित कई इलाकों में जल भराव तीन फिट से ऊपर चला गया जिसके चलते सरकारें एलर्ट मोड में चली गयी। निचले इलाकों से लोगों को निकाला जा रहा है। देखा जाये तो 1978 के बाद पहली बार यमुना का जलस्तर इतना बढ़ा। जान-माल का काफी नुकसान हो रहा है, लाल किले में भी यमुना का पानी घुस गया। मेट्रो को भी कुछ इलाकों में बंद करना पड़ा, सड़कों पर लम्बा जाम इत्यादि समस्याएं यह बताती हैं कि दिल्ली पानी-पानी तो खूब हुई है। और इसके पीछे बेतरजीब तरीके से हुई बसावट, सरकार की घोर लापरवाही तथा इंतजाम की कमी देखी जा सकती है। यमुना के निचले इलाकों में 37 हजार से अधिक अवैध बाषिंदे हैं जिन्हें विस्थापित करना स्वाभाविक है। यमुना के जल स्तर के बढ़ने के पीछे हथिनीकुण्ड बैराज से पानी छोड़ना भी है यह बैराज हरियाणा में है। वैसे बैराज से पानी छोड़ा जाना हर बारिष में अपने ढंग की आवष्यकता है। दूसरा बड़ा कारण यहां की बूढ़ी हो चुकी जल निकासी व्यवस्था है। दिल्ली के ड्रेनेज सिस्टम के साथ 11 विभाग षामिल हैं जिन्हें एक मेज पर बैठकर नया मास्टर प्लान तैयार करना ही होगा। यदि ऐसा नहीं सम्भव हुआ तो दिल्ली की सड़कों पर कार और मोटरगाड़ी की बजाये नाव चला करेंगी। फिलहाल दिल्ली पुलिस ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में धारा 144 लागू की दी है। वैसे देखा जाये तो यह चैथी बार है जब यमुना का जलस्तर 207 मीटर के पार पहुंचा है। 

भारी बारिष के चलते उत्तर भारत में ट्रेन का आवागमन भी बेपटरी हुआ है। 500 से अधिक ट्रेने आंषिक व पूर्ण रूप से रद्द हो चुकी हैं। टिकट रद्द होने और रिफण्ड के चलते रेलवे भी घाटे की ओर अग्रसर है। हालांकि ऐसे मौके कई बार रहे हैं और मौसम ठीक होने की स्थिति में ट्रेने फिर पटरी पर दौड़ती रही हैं। खास यह भी है कि एक ओर जहां हिमाचल और पंजाब में बाढ़ से हालत गम्भीर है और दिल्ली में भी बारिष और बाढ़ ने नई समस्या खड़ी की है। वहीं झारखण्ड और उत्तर प्रदेष में बारिष की कमी महसूस कर रहे हैं। पूरे भारत की पड़ताल किया जाये तो अधिक वर्शा वाले क्षेत्रों में जम्मू-कष्मीर, हिमाचल प्रदेष, पंजाब, उत्तराखण्ड, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु को देखा जा सकता है। देखा जाये तो ये 8 राज्य इन दिनों बारिष से बेहाल है जबकि देष के 11 ऐसे राज्य जो कम बारिष से युक्त हैं। बिहार में बारिष सामान्य से 33 फीसद कम है और किसान इस कमी से परेषान है साथ ही गर्मी और उमस की समस्या बरकरार है। झारखण्ड में मानसून कमजोर रहा हालांकि आगे सक्रियता बढ़ने की सम्भावना है। झारखण्ड में 43 फीसद और ओडिषा में 26 प्रतिषत कम बारिष दर्ज हुई है। असम को छोड़ दिया जाये तो पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में मानसूनी बादल कम ही बरसें हैं। फिलहाल 12 जुलाई तक हुई 4 दिन की बारिष से देष के अंदर सौ से ज्यादा की बाढ़ और बारिष से मौत हुई। 10 हजार से अधिक पर्यटक हिमाचल प्रदेष में जहां-तहां फंस गये। हरियाणा के 9 जिलों के 6 सौ गांव में पानी भर गया। उक्त आंकड़े यह दर्षाते हैं कि हालिया बारिष और बाढ़ का परिप्रेक्ष्य से पूरा देष नहीं घिरा है बल्कि कुछ राज्य तक यह मामला है जिसमें देष की राजधानी दिल्ली भी खूब पानी-पानी हुई है। 

बारिष पर किसी का जोर नहीं मगर बढ़ रहे पृथ्वी के तापमान, जलवायु परिवर्तन और मानव द्वारा सृजित या निर्मित अनेक वे कारक जो पृथ्वी के बदलाव को बड़े बदलाव में तब्दील करने में लगे हैं उसको कमतर किया जा सकता है। इतना ही समय रहते षहरों के जल निकासी को दुरूस्त करना, बारिष से पहले साफ-सफाई करना, अवैध काॅलोनी को न बसने देना, नाला-खाला आदि पर अतिक्रमण से रोक और बेहतरीन मास्टर प्लान बनाकर बाढ़ से बचा जा सकता है। दिल्ली देष का वह चित्र है जहां से पूरे देष के मानचित्र की सेहत सुधरती है। ऐसे में बारिष और बाढ़ के चलते बीमार होना सही नहीं है। बदले परिप्रेक्ष्य और दृश्टिकोण के अन्तर्गत यह समझने में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए कि षिक्षा, चिकित्सा, सड़क, सुरक्षा समेत अनेक बुनियादी व समावेषी विकास के निहित अर्थों में बाढ़ से बचाव भी षामिल है। बाढ़ और बारिष से जान-माल की हानि को कम करना, आवागमन को सुचारू बनाये रखना तथा सुजीवन को पटरी से उतरने से रोकना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में दिल्ली हो या देष का कोई भी षहर हवा में काम करने के बजाये जमीन पर उतर कर अपने षहर को समझना उसके अनेक प्रबंधन को उसी जमीन पर उतारना ताकि नौबत कुछ भी आ जाये बारिष कितनी भी हो बाढ़ से बचा जा सके। हालांकि यह काम कठिन है मगर नामुमकिन नहीं है। सबके बाद दो टूक यह कि इसकी षुरूआत सबसे पहले दिल्ली से ही होनी चाहिए।

 दिनांक : 13/07/2023


डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
मो0: 9456120502

बारिश से गांव और शहर दोनों बेहाल

उत्तर भारत में पहाड़ी और मैदानी दोनों इलाके महज दो दिन की मानूसनी बारिष से पानी-पानी हो गये। उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेष और जम्मू-कष्मीर में बारिष का स्वरूप कहीं अधिक नुकसान से भरा है।  ज्यादा तबाही में तो उत्तराखण्ड भी षामिल है। भूस्खलन व धंसाव आदि के चलते यहां सैकड़ों सड़कों पर आवाजाही बाधित हुई। मानसून के साथ बरसी आफत से उत्तराखण्ड में मौत और लापता होने का चित्र देखा जा सकता है। हिमाचल प्रदेष के सैकड़ों साल पुराने पुल भी इस बारिष को झेल नहीं पाये और आधा दर्जन पुल निस्तोनाबूत हो गये। भारी वर्शा ने सड़कों को नदी-नालों में तब्दील कर दिया है। गाड़ियां चलने के बजाये बहने लगी और आसमान से बारिष की बूंदे नहीं मानो आपदा टूटी हो। उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में जल प्रलय जैसी स्थिति कुछ हद तक बन गयी है जबकि पूर्वोत्तर भारत ब्रह्यपुत्र की चपेट में पहले से ही है। गौरतलब है कि यहां 11 सौ से अधिक गांव जलमग्न हैं और लगभग 9 हजार हेक्टेयर में लगी फसल नश्ट हो गयी है और चार लाख से अधिक लोग प्रभावित हो गये हैं। दक्षिण भारत भी कमोेबेष इसकी चपेट में है। केरल में मानसूनी बारिष का कहर मौत और विस्थापन का स्वरूप लिए हुए है। पर्यटन स्थल गोवा भी जलमग्न और हादसे से मुक्त नहीं है। महाराश्ट्र व मध्य प्रदेष आदि समेत आधे से अधिक भारत बारिष में जल जमाव का षिकार तो रहता है। ग्रीन, येलो, आॅरेंज और रेड एलर्ट जैसे जितने भी बारिष से जुड़े संकेत होते हैं वे सभी इन दिनों फलक पर हैं।

फिलहाल भारत की राजधानी दिल्ली में 24 घण्टे की अवधि में 153 मिलीमीटर बारिष दर्ज की गयी जो 1982 के बाद जुलाई में एक दिन में सर्वाधिक बारिष है। चण्डीगढ़ और अंबाला जैसे षहरों में भी बारिष का रिकाॅर्ड उफान पर है। गौरतलब है कि दिल्ली देष की राजधानी के बावजूद बारिष की जहमत को कम नहीं कर पाती है जबकि वहां दो-दो सरकारें रहती हैं और यमुना नदी वहीं से बहती है। इस नदी के निचले इलाके बाढ़ के लिहाज़ से संवेदनषील हैं और यहां लगभग 37 हजार लोग रहते हैं। स्थिति तो यह भी है कि वर्शा के चलते हरियाणा के कौषल्या बांध में जलस्तर भी उफान ले लिया साथ ही हथिनीकुंज बैराज में भी पानी का दबाव अधिक होने और इसको छोड़ने का असर यमुना के किनारे लोगों पर पड़ना स्वाभाविक है। रोचक यह है कि अभी तो मौसमी बारिष षुरू ही हुई है जबकि हाल अभी से बेहाल है तो आने वाले दो से ढ़ाई महीने में स्थिति क्या होगी अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। चिंता तो इस बात की है कि पूरे बंदोबस्त करने के दावों के बीच एक-दो दिन की बारिष इंतजाम की पोल खोल देती है और सुषासन का स्लोगन पानी-पानी हो जाता है। लगभग पूरे उत्तर भारत में तबाही का मंजर तो है मौसम विभाग ने कहा कि पष्चिमी विक्षोभ और मानसूनी हवाओं के साथ मिलने से भारी बारिष हुई है। देखा जाये तो पृथ्वी के बदले स्वभाव और प्रकृति में हो रहा निरंतर परिवर्तन और धरती का लगातार गरम होते रहना भी बढ़ी बारिष एक कारण हो सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान की माने तो जुलाई पहले कुछ दिनों में उत्तर पष्चिम भारत में हुई बारिष ने देष में बारिष की कमी को पूरा कर दिया है।

गौरतलब है कि असम, उत्तर प्रदेष और बिहार समेत कुछ राज्यों में बाढ़ तकरीबन हर साल आती है। 1980 में राश्ट्रीय बाढ़ आयोग ने अनुमान लगाया था कि 21वीं सदी के षुरूआती दषक तक 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ की चपेट में होगी। इसे देखते हुए बड़ी संख्या में बहुउद्देषीय बांध और 35 हजार किलोमीटर तटबंध बनाये गये। मगर बाढ़ से मुक्ति तो छोड़िये अनुमान से एक हजार हेक्टेयर अधिक भूमि बाढ़ से प्रभावित होने लगी। वैसे देखा जाय तो बाढ़ की फसलें भी सरकारें ही बोती हैं और वही काटती हैं। वर्शों पहले केन्द्रीय जल आयोग ने एक डेटा जारी करते हुए बताया था कि देष के 123 बांधों या जल संग्रहण क्षेत्रों में पिछले दस सालों के औसत का 165 फीसद पानी संग्रहित है और यह अब तुलनात्मक और बढ़ गया है। इसका तात्पर्य यह कि बांधों में पर्याप्त रूप से पानी का भण्डारण था ये 123 वे बांध हैं जिसका प्रबंधन व संरक्षण केन्द्रीय जल आयोग करता है और जबकि इन बांधों में देष की कुल भण्डारण क्षमता का 66 फीसद पानी जमा होता है। जाहिर है उस समय जरूरत होने पर भी इन बांधों से पानी नहीं छोड़ा गया और बरसात होते ही बांध कहीं अधिक उफान पर आ जाते हैं। ऐसे में गेट खोल देने का नतीजा पहले से उफान ले रही नदी में बहाव को तेज कर देना और पानी को गांव और षहर में घुसाना और जान-माल को हाषिये पर धकेलना है। समझने वाली बात यह है कि जब अरब सागर में बिपरजाॅय जैसे उठने वाले तूफान से लाखों को विस्थापित कर सुरक्षित किया जा सकता है तो नदी तट पर रहने वालों की सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं जबकि पहले से पता है कि यहां बाढ़ आती ही है। साफ है कि अधूरे इंतजाम के साथ बाढ़ का इंतजार किया जाता है। 

भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) ने 21 जुलाई 2017 को बाढ़ नियंत्रक और बाढ पूर्वानुमान पर अपनी एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें कई बातों के साथ 17 राज्यों और केन्द्रषासित प्रदेषों के बांधों सहित बाढ़ प्रबंधन की परियोजनाओं और नदी प्रबंधन की गतिविधियों को षामिल किया गया था। इसके अंतर्गत साल 2007-08 से 2015-16 निहित है। वैसे देखा जाय तो मानवीय त्रुटियों के अलावा बाढ़ का भीशण स्वरूप कुछ प्राकृतिक रूप लिए हुए है। कोसी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है यह बिहार में भीम नगर के रास्ते भारत में आती है जो बाकायदा यहां तबाही मचाती है। गौरतलब है कि साल 1954 में भारत ने नेपाल के साथ समझौता करके इस पर बांध बनाया था। हांलाकि बांध नेपाल की सीमा में था परन्तु रख-रखाव भारत के जिम्मे था। नदी के तेज बहाव के चलते यह बांध कई बार टूट चुका है। पहली बार यह 1963 में टूटा था। इसके बाद 1968 में पांच जगह से टूट गया। 1991 और 2008 में भी यह टूटा। फिलहाल बांध पर जगह-जगह दरारें हैं। समझा जा सकता है कि बाढ़ में इसका क्या योगदान है। गंडक नदी भी नेपाल के रास्ते बिहार में दाखिल होती है और अपने हिसाब का बाढ़ बढ़ाती है। फिलहाल मौसम विज्ञान समय पर एलर्ट जारी करता रहेगा, बारिष की सम्भावना बताता रहेगा, बारिष कम-ज्यादा होना तय है और इसके नुकसान से बच पाना कठिन रहेगा और पूरा मानसूनी अवधि कम-ज्यादा मुसीबत बनी रहेगी। हालिया बारिष ने यह बता दिया है कि कठिनाई किसी के भी हिस्से में आ सकती है। बारिष से खेत-खलिहान और गांव ही नहीं डूबते बल्कि जल-निकासी बेहतर न होने से सभ्यता से भरे षहर भी ताल-तलैया और पोखर में तब्दील हो जाते हैं। इससे निपटने के लिए सुषासन का दायरा समुचित और सुव्यवस्थित करना ही पड़ेगा और बारिष के इंतजार के बजाए बाढ़ का इंतजाम करना होगा। 

 दिनांक : 10/07/2023


डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
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सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और भारत

विदित हो कि संयुक्त राश्ट्र के संस्थापक सदस्यों में भारत भी षुमार था और अब तक वह संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद का आठ बार सदस्य भी रह चुका है। आखिरी बार साल 2021-22 में अस्थायी सदस्य के रूप में भारत अपना परचम लहराया था मगर पूरी योग्यता और व्यापक समर्थन के बावजूद अभी भी स्थायी सदस्यता की बाट जोह रहा है। गौरतलब है स्थायी सदस्यता के मामले में भारत दुनिया भर से समर्थन रखता है सिवाय एक चीन के। हालिया परिप्रेक्ष्य देखें तो ब्रिटेन सुरक्षा परिशद में विस्तार का समर्थन किया है और स्पश्ट किया है कि भारत, जापान, ब्राजील समेत अफ्रीकी देषों को संयुक्त राश्ट्र की सुरक्षा परिशद में स्थायी सीट दी जाये। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले 77 वर्शों से चली आ रही इस व्यवस्था में अमूल-चूल परिवर्तन की मांग अक्सर उठती रही है। दुनिया कई प्रकार के आकार और प्रकार को ग्रहण कर लिया है मगर सुरक्षा परिशद 5 स्थायी मसलन अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस और रूस के अलावा 10 अस्थायी सदस्यों के साथ यथावत बना रहा। ऐसे में अब परिवर्तन का समय आ चुका है। हालांकि इसे लेकर बरसों से कवायद जारी है मगर नतीजे जस के तस बने रहे। असल में सुरक्षा परिशद की स्थापना 1945 की भू-राजनीतिक और द्वितीय विष्वयुद्ध से उपजी स्थिति को देखकर की गयी थी पर 77 वर्शों में पृश्ठभूमि अब अलग हो चुकी है। देखा जाय तो षीतयुद्ध की समाप्ति के साथ ही इसमें बड़े सुधार की गुंजाइष थी जो नहीं किया गया। 5 स्थायी सदस्यों में यूरोप का प्रतिनिधित्व सबसे ज्यादा है जबकि आबादी के लिहाज़ से बामुष्किल वह 5 फीसद स्थान घेरता है। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका का कोई सदस्य इसमें स्थायी नहीं है जबकि संयुक्त राश्ट्र का 50 प्रतिषत कार्य इन्हीं से सम्बन्धित है। ढंाचे में सुधार इसलिए भी होना चाहिए क्योंकि इसमें अमेरिकी वर्चस्व भी दिखता है। भारत की सदस्यता के मामले में दावेदारी बहुत मजबूत दिखाई देती है। जनसंख्या की दृश्टि से चीन को भी पछाड़ते हुए पहला सबसे बड़ा देष, जबकि अर्थव्यवस्था के मामले में दुनिया में 5वां साथ ही प्रगतिषील अर्थव्यवस्था और जीडीपी की दृश्टि से भी प्रमुखता लिए हुए है। ऐसे में दावेदारी कहीं अधिक मजबूत है। इतना ही नहीं भारत को विष्व व्यापार संगठन, ब्रिक्स और जी-20 जैसे आर्थिक संगठनों में प्रभावषाली माना जा सकता है। भारत की विदेष नीति तुलनात्मक प्रखर हुई है और विष्व षान्ति को बढ़ावा देने वाली है साथ ही संयुक्त राश्ट्र की सेना में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देष के नाते भी दावेदारी सर्वाधिक प्रबल है। हालांकि भारत के अलावा कई और देष की स्थायी सदस्यता के लिए नपे-तुले अंदाज में दावेदारी रखने में पीछे नहीं है। जी-4 समूह के चार सदस्य भारत, जर्मनी, ब्राजील और जापान जो एक-दूसरे के लिए स्थायी सदस्यता का समर्थन करते हैं ये सभी इसके हकदार समझे जाते हैं। एल-69 समूह जिसमें भारत, एषिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई 42 विकासषील देषों के एक समूह की अगुवाई कर रहा है। इस समूह ने भी सुरक्षा परिशद् में सुधार की मांग की है। अफ्रीकी समूह में 54 देष हैं जो सुधारों की वकालत करते हैं। इनकी मांग यह रही है कि अफ्रीका के कम-से-कम दो राश्ट्रों को वीटो की षक्ति के साथ स्थायी सदस्यता दी जाये। उक्त से यह लगता है कि भारत को स्थायी सदस्यता न मिल पाने के पीछे मेहनत में कोई कमी नहीं है बल्कि चुनौतियां कहीं अधिक बढ़ी हैं। बावजूद इसके यदि भारत को इसमें षीघ्रता के साथ स्थायी सदस्यता मिलती है तो चीन जैसे देषों के वीटो के दुरूपयोग पर न केवल अंकुष लगेगा बल्कि व्याप्त असंतुलन को भी पाटा जा सकेगा।

संयुक्त राश्ट्र की सुरक्षा परिशद् में स्थायी सदस्यता को लेकर भारत बरसों से प्रयासरत् रहा है। अमेरिका और रूस समेत दुनिया के तमाम देष स्थायी सदस्यता को लेकर भारत पक्षधर भी हैं मगर यह अभी मुमकिन नहीं हो पाया है। पड़ताल बताती है कि भारत आठ बार अस्थायी सदस्य के रूप में सिलसिलेवार तरीके से 1950-51, 1967-68, और 1972-73 से लेकर 1977-78 समेत 1984-1985, 1991-1992 व 2011-2012 समेत 2021-2022 में भी सुरक्षा परिशद् में अस्थायी सदस्य रहा है। जहां तक सवाल स्थायी सदस्यता का है इस पर मामला खटाई में बना हुआ है। गौरतलब है कि पिछले अमेरिकी राश्ट्रपति चुनाव से पहले भारत में राजदूत रह चुके रिचर्ड वर्मा ने कहा था कि यदि जो बाइडेन राश्ट्रपति बनते हैं तो संयुक्त राश्ट्र जैसी अन्तर्राश्ट्रीय संस्थाओं को नया रूप देने में मदद करेंगे ताकि भारत को सुरक्षा परिशद में स्थायी सीट मिल सके। ध्यानतव्य हो कि जो बाइडेन अमेरिकी के राश्ट्रपति चुने भी गये और 20 जनवरी 2021 से बाकायदा सत्तासीन हैं मगर इस दिषा में अभी कुछ ऐसा होते हुए दिखा नहीं है। 4 जुलाई 2023 को संयुक्त राश्ट्र संघ में ब्रिटेन के स्थायी प्रतिनिधि बारबरा बुडवर्ड ने सुरक्षा परिशद के विस्तार का मुद्दा उठाने के साथ भारत समेत अन्य देषों को स्थायी सदस्यता की बात कहकर एक बार इस मामले को फिर फलक पर ला दिया है। फरवरी 2022 से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है। पष्चिमी देष इस हालात से निपटने में नाकाम रहे हैं जबकि भारत इस मामले में कहीं अधिक सफल कूटनीतिक और राजनयिक नेतृत्व को बड़ा किया है। भारत के इस बदले वैष्विक परिप्रेक्ष्य में उभरे नेतृत्व ने उसे दुनिया के केन्द्र में खड़ा किया है। ऐसे में सुरक्षा परिशद में बहुत देर तक भारत को बाहर रखना वैष्विक हानि का संकेत है। पिछले 77 वर्शों में सुरक्षा परिशद कई बड़ी सफलता तो कई नाकामियों के साथ चहल कदमी की है। यह बात सकारात्मक है कि इसके गठन के बाद तृतीय विष्व युद्ध नहीं हुआ मगर दुनिया कई युद्धों से गुजरी है और वर्तमान में रूस और यूक्रेन के बीच यह जारी है। अमेरिका के नेतृत्व में 2003 में इराक पर आक्रमण, साल 2008 में रूस द्वारा जाॅर्जिया पर हमला, अरब-इजराइल युद्ध, 1994 में रवान्डा का नरसंहार, 1993 में सोमालिया का गृह युद्ध समेत मौजूदा रूस-यूक्रेन युद्ध इसकी विफलता की कहानी है। मगर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर समाधान कर सुरक्षा परिशद ने अपनी साख को भी बड़ा किया है। मसलन 1950 में कोरियाई युद्ध, 1990 में कुवैत पर इराक का हमला, 1993 में बोस्निया और 2001 में अफगानिस्तान इत्यादि को लेकर प्रस्ताव पारित किये। खास यह भी है कि जब पी-5 अर्थात् सुरक्षा परिशद के 5 स्थायी सदस्यों वाले देषों के बीच कभी आमने-सामने का युद्ध नहीं हुआ जो सुरक्षा परिशद की सफलता ही कही जायेगी। हालांकि एक स्थिति ऐसी भी आयी थी जब पी-5 देष 1962 में क्यूबा के मिसाइल संकट के दौरान आमने-सामने हो सकते थे लेकिन संयुक्त राश्ट्र की कूटनीतिक पहल ने हालात से सही तरीके से निपट लिया था।  

फिलहाल भारत को स्थायी सदस्यता की आवष्यकता क्यों है और यह मिल क्यों नहीं रही है और इसके मार्ग में क्या बाधाएं हैं। माना जाता है कि जिस स्थायी सदस्यता को लेकर भारत इतना एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है वही सदस्यता 1950 के दौर में बड़ी आसानी से सुलभ थी। आवष्यकता की दृश्टि से देखें तो भारत का इसका सदस्य इसलिए होना चाहिए क्योंकि सुरक्षा परिशद प्रमुख निर्णय लेने वाली संस्था है। प्रतिबंध लगाने या अन्तर्राश्ट्रीय न्यायालय के फैसले को लागू करने के लिए इस परिशद के समर्थन की जरूरत पड़ती है। ऐसे में भारत की चीन और पाकिस्तान से निरंतर दुष्मनी के चलते इसका स्थायी सदस्य होना चाहिए। चीन द्वारा पाकिस्तान के आतंकवादियों पर बार-बार वीटो करना इस बात को पुख्ता करता है। स्थायी सीट मिलने से भारत को वैष्विक पटल पर अधिक मजबूती से अपनी बात कहने की ताकत मिलेगी। स्थायी सदस्यता से वीटो पावर मिलेगा जो चीन की काट होगी। इसके अलावा बाह्य सुरक्षा खतरों और भारत के खिलाफ सुनियोजित आतंकवाद जैसी गतिविधियों को रोकने में मदद भी मिलेगी। भारत को स्थायी सदस्यता न मिलने के पीछे सुरक्षा परिशद की बनावट और मूलतः चीन का रोड़ा समेत वैष्विक स्थितियां हैं। वैसे चीन न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) के मामले में भी भारत के लिए रूकावट बनता रहा है। गौरतलब है सुरक्षा परिशद में 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। अस्थायी सदस्य देषों को चुनने का उद्देष्य सुरक्षा परिशद में क्षेत्रीय संतुलन कायम करना होता है। जबकि स्थायी सदस्य षक्ति संतुलन के प्रतीत हैं और इनके पास वीटो की ताकत है। इसी ताकत के चलते चीन दषकों से भारत के खिलाफ वीटो का दुरूपयोग कर रहा है। 

संयुक्त राश्ट्र की सुरक्षा परिशद में स्थायी सदस्यता का मामला दषकों पुराना है। यदि अमेरिका जैसे देषों को यह चिंता है तो सुरक्षा परिशद में में बड़े सुधार को सामने लाकर भारत को उसमें जगह देना चाहिए। बरसों पहले रूसी विदेष मंत्री ने भी यह कहा है कि स्थायी सदस्यता के लिए भारत मजबूत नाॅमिनी है। वैसे देखा जाय तो दुनिया के कई देष किसी भी महाद्वीप के हों भारत के साथ खड़े हैं मगर नतीजे वहीं के वहीं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया के बहुत सारे संगठन चाहे दक्षिण-एषियाई समूह सार्क या गुटनिरपेक्ष समूह समय के साथ मानो अप्रासंगिक से हो गये हैं। विष्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर विष्व व्यापार संगठन पर भी समय-समय पर उंगली उठती रही है। संयुक्त राश्ट्र संघ की उपादेयता पर भी सफलता और असफलता की लकीर कमोबेष छोटी-बड़ी रही है। संदर्भ यह भी है कि किसी भी संगठन या परिशद को यदि सुधार और बदलाव से विमुख लम्बे समय तक रखा जाये तो उसमें गैर उपजाऊ तत्व स्वतः षामिल हो जाते हैं। षिखर पर खड़े भारत का नेतृत्व मौजूदा समय में यह पूरी धमक के साथ स्वयं को प्रतिबिंबित करता है कि सुरक्षा परिशद में फेरबदल के साथ उसे स्थायी सदस्य बनाया जाये। इसी में वैष्विक हित के साथ संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद का संतुलन सम्भव है।

 दिनांक : 06/07/2023


डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
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सुषासन के लिए चुनौती साइबर सुरक्षा

यह तर्कसंगत है कि देष में जैसे-जैसे डिजिटलीकरण का दायरा बढ़ता जायेगा वैसे-वैसे साइबर सुरक्षा सम्बंधी चुनौतियां भी बढ़ती जायेंगी। डाटा चोरी और वित्तीय धोखाधड़ी साइबर अपराध के बड़े आधार हो गये हैं। षायद यही कारण है कि रोजगार के नये अवसर में डाटा प्राइवेसी, डाटा सिक्योरिटी और नेटवर्क सिक्योरिटी के विषेशज्ञ प्रोफेषनल की मांग तेजी से बढ़ी है। देखा जाये तो साइबर सुरक्षा का बाजार भी बड़ा आकार लेता जा रहा है। एक रिपोर्ट से यह पता चलता है कि इस बाजार का आकार 2021 में 220 करोड़ का था जो 2027 तक 350 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। देखा जाये तो साल 2021 में साइबर हमलों में विष्व में भारत का दूसरा स्थान था और 2022 में तो इसे लेकर 14 लाख मामले दर्ज किये गये थे। विज्ञान और तकनीक जिस मुकाम को हासिल किये उसमें सब कुछ उजला ही नहीं है कुछ उसके स्याह पक्ष भी है साइबर अपराध इसी का एक नतीजा है। कम्प्यूटर, सर्वर, मोबाइल डिवाइस, इलेक्ट्राॅनिक सिस्टम, नेटवर्क और डेटा को हमले से बचाने का एक बड़ा प्रयास साइबर सुरक्षा है। वैष्विक स्तर पर साइबर खतरा तेजी से गतिमान है और दिन दूनी-रात चैगुनी की तर्ज पर तेजी लिए हुए है। साइबर अपराधियों ने किसी को भी सुरक्षित नहीं छोड़ा। संसद, न्यायाधीष, विष्वविद्यालय के कुलपति, व्यापारी, पुलिस अधिकारी को भी अपने षिकंजे में फंसा चुका है। आंकड़े की पड़ताल से यह पता चलता है कि भारत में साइबर अपराध को लेकर साल 2021 में 18 हजार से अधिक मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए जिसमें इसे लेकर लगभग 53 हजार मामलों पर केस दर्ज हुआ और 491 मामलों में सजा हुई। उक्त से यह परिलक्षित होता है कि साइबर अपराध का दायरा अच्छा खासा प्रसार लिया है और साथ ही साइबर सुरक्षा की चुनौती को बढ़ा दिया है।

मौजूदा दौर सुषासन उन्मुख दृश्टिकोण से युक्त है साथ ही ई-गवर्नेंस को भारी पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इंटरनेट कनेक्टिविटी को 5-जी व 6-जी की ओर ले जाने का पूरा प्रयास है। 2025 तक 90 करोड़ आबादी को इंटरनेट से जोड़ने का लक्ष्य है। पढ़ाई-लिखाई से लेकर चिकित्सा व अदालती व्यवस्थाओं में इंटरनेट का पूरा समावेष देखा जा सकता है। ई-बैंकिंग समेत दर्जनों प्रकार की इलेक्ट्राॅनिक विधाओं से युक्त क्रियाकलापों को जमीन पर उतार दिया गया है। लेन-देन की प्रक्रिया को सरकार भी डिजिटलीकरण के मामले को दो कदम और आगे बढ़ाने की फिराक में रहती है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो यहां तक भी कहा है कि एक दिन जेब में बिना कैष के ही रहे और लेन-देन को डिजिटल पर ले जायें। सुषासन की परिपाटी में षासन को यह चिंता होना स्वाभाविक है कि चहुमुखी विकास को डिजिटलीकरण के माध्यम से बड़ा और सघन बनाया जाये। मगर साइबर सुरक्षा को लेकर एक चिंता अपनी जगह रहती है जो हर लिहाज से सुषासन को मुंह चिढ़ाता है। साइबर खतरे का स्तर लगातार बढ़ने के साथ साइबर सुरक्षा समाधानों पर वैष्विक खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है। अनुमान तो यह भी है कि साइबर सुरक्षा खर्च 2023 में 188 बिलियन डाॅलर तक पहुंच जायेगा जबकि 2026 तक यही 260 बिलियन डाॅलर हो जायेगा। अमेरिका, इंग्लैण्ड, आॅस्ट्रेलिया देषों में साइबर सुरक्षा के लिए अनेकों पहल किए हैं। खतरों की विवेचना से यह पता चलता है कि साइबर अपराध बिना किसी सीमा के चलायमान है। साइबर हमले, साइबर आतंकवाद जैसे षब्द सभ्य समाज और व्याप्त सुषासन के लिए कड़ी और बड़ी चुनौती दे रहे हैं। देष के कई इलाके जो साइबर अपराधियों के गढ़ बन गये हैं ऐसे ही इलाकों में हरियाणा का नूंह जिला जिसे साइबर लुटेरों ने मिलकर चर्चे में ला दिया। पुलिस के अनुसार इस जिले में 434 गांव हैं। अधिकांष अरावली की तलहटी में स्थित है और फर्जी काॅल के लिए यह उपयुक्त अड्डे हैं। झारखण्ड का जामतारा तो साइबर अपराधियों का बाकायदा अड्डा बना हुआ है। हालांकि साइबर अपराध दुनिया के किसी भी कोने में कहीं से भी पनप सकता है और समाज को नई मुसीबत में डाल सकता है। 

देष में इंटरनेट से करोड़ों की आबादी जुड़ गयी। बहुतायत में व्यक्तिगत ईमेल समेत अन्य प्रकार की इलेक्ट्राॅनिक व्यवस्थाओं से जनता जुड़ गयी मगर एक पक्ष यह भी है कि साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता का स्तर अभी विकसित ही नहीं हो पाया। कई वर्श पहले ही साइबर अपराध की बढ़ती स्थिति और इलेक्ट्राॅनिक व्यवस्था से गतिमान संदर्भ को देखते हुए यह अनुमान लगा लिया गया था कि देष में साइबर सुरक्षा से जुड़े रोज़गार के आकार में बढ़ोत्तरी होगी। इतना ही नहीं सरकार को साइबर सुरक्षा के मसले पर कठोर नियम और कानून से भी गुजरना पड़ेगा। सुषासन की परिपाटी को देखें तो अपराध मुक्त समाज इसकी परिभाशा का एक हिस्सा है जो अब दबे पांव आॅनलाइन लोगों पर हमला करता है और उन्हें वित्तीय समस्या समेत कई सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समस्या की ओर धकेलता है। आज इंटरनेट हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बन गया है और जीवन के सभी पहलुओं को कमोबेष प्रभावित कर रहा है। साइबर जागरूकता और सावधानी इसका प्राथमिक बचाव है मगर जिस देष की अभी भी हर चैथा व्यक्ति अषिक्षित हो वहां साइबर षिक्षा कितनी सबल होगी यह समझना कठिन काम नहीं है। साइबर स्टाॅकिंग, बौद्धिक सम्पदा की चोरी, वाइरस समेत कई ऐसे प्रारूप हैं जो अपराध के लिहाज से परेषानी का सबब है। गौरतलब है कि साल 2013 से पहले भारत में कोई साइबर नीति नहीं है मगर अब ऐसा नहीं है। राश्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति 2020 साइबर सुरक्षा और साइबर जागरूकता में सुधार लाने की इच्छा से युक्त है। इसी वर्श भारतीय साइबर अपराध समन्वयक केन्द्र की स्थापना की गयी जबकि 2017 में साइबर स्वच्छता केन्द्र और 2018 में साइबर सुरक्षित भारत पहल जैसी कवायद देखी जा सकती है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 डेटा एवं सूचना उद्योग को नियंत्रित करता है। इसके अलावा भी कई ऐसी व्यवस्थाएं हैं जिसमें साइबर सुरक्षा को लेकर भारत पहले करता दिखाई देता है। विदित हो कि भारत ने अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे देषों के साथ अनेकों साइबर सुरक्ष सम्बंधी संधियों पर दस्तखत किये। 

दृश्टिकोण और परिप्रेक्ष्य यह है कि साइबर अपराध वर्तमान में वृद्धि के साथ बना हुआ है और इसे रोकने के उपाय वक्त के साथ ढूंढे जा रहे हैं। यद्यपि सरकार साइबर सुरक्षा को लेकर कई सुषासनिक कदम उठाए हैं इसके लिए साइबर सेल भी बनाये गये हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति केस दर्ज करा सकता है और राहत पाने की उम्मीद अंदर पनपा सकता है मगर ज्यादातर मामलों में निराषा ही मिलती है। दो टूक कहें तो यह हवा में किया जाने वाला एक ऐसा अपराध है जो कमाई को उड़ा देता है। हालांकि साइबर अपराध की श्रेणी में पोनोग्राफी जैसे चित्र और फिल्म को भी षामिल किया गया है इसके अलावा भी कई ऐसे संदर्भ हैं जो समाज को चुनौती दे रहे हैं। सूचना सुरक्षा भण्डारण में भी सेंध लगने से अखण्डता और गोपनीयता को भी खतरा पैदा हो रहा है। साइबर अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति और प्रकार को देख कर यह सोचना सही रहेगा कि इससे सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल साइबर सेल और सरकार पर नहीं छोड़ना चाहिए बल्कि जन मानस को साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता और सावधानी का स्तर भी तुलनात्मक बढ़ा लेना चाहिए। 

  दिनांक : 06/07/2023


डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
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