Wednesday, December 13, 2017

इराक ही नहीं पूरी दुनिया आतंक मुक्त हो

दुनिया दो समस्याओं से जूझ रही है एक आतंक तो दूसरा जलवायु परिवर्तन। जिसे लेकर इसी दुनिया के माथे पर चिंता की लकीरें स्वाभाविक रूप से देखी जा सकती है। गौरतलब है कि विगत् तीन दषकों से भारत, पाकिस्तान प्रायोजित आतंक से लहूलुहान होता रहा और यह सिलसिला बादस्तूर अभी जारी है। विष्व के अन्य देष व अनेक देष तब तक इसे लेकर संजीदगी नहीं दिखाई जब तक इसके खौफ के साये से वे बचे रहे। वर्श 2001 में जब अलकायदा ने अमेरिका पर हमला किया तब अमेरिका जैसे सभ्य देषों को यह पता चला कि आतंक की पीड़ा कितनी बड़ी और आहत करने वाली होती है। लंदन के मेट्रो में जब आतंकियों ने बम ब्लास्ट किया तब उन दिनों यूरोप भी इससे सिहर गया था। क्या पूरब, क्या पष्चिम और क्या उत्तर, क्या दक्षिण पृथ्वी के मानचित्र पर अब षायद ही कोई देष बचा हो जो आतंकवाद से परिचित न हो। पड़ताल बताती है कि आतंकवादियों के सैकड़ों संगठन दुनिया में संकट पैदा कर रहे हैं और ताबड़तोड़ हमलों से अपनी ताकत का प्रदर्षन कर सभ्य समाज को चिढ़ा भी रहे हैं। गौरतलब है कि अमेरिका द्वारा जारी सौ आतंकी संगठनों में 83 को इस्लामिक संगठन बताया गया था। इसी प्रकार की पुश्टि संयुक्त अरब अमीरात ने भी की थी जिससे निपटने के लिए अनेक राश्ट्राध्यक्ष सम्मेलनों एवं अन्तर्राश्ट्रीय बैठकों में रणनीति भी बनाते रहे हैं। खास यह भी है कि आतंक का जिस गति से विस्तार हुआ उससे पार पाने के लिए वैष्विक रणनीति कारगर नहीं रही है। प्रधानमंत्री मोदी अपने कार्यकाल से ही वैष्विक मंचों पर आतंक की पीड़ा से जूझ रहे भारत की स्थिति दुनिया के सामने रखते रहे। जिसका नतीजा यह है कि पाक आज षेश दुनिया से अलग-थलग हो गया है। 
देखा जाय तो विगत् कुछ वर्शों से आतंकवाद पर चर्चा खुल कर हो रही है और आतंकी संगठन तुलनात्मक सषक्त होने की रणनीति में भी मषगूल रहे हैं और षायद अभी भी इसी काम में लगे हैं। जिस तर्ज पर आतंकवादियों ने पिछले कई वर्शों से अपनी ताकत को परवान चढ़ाया है उसकी तुलना में बड़े से बड़ा देष भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसके सुरक्षा कवच को वे भेद नहीं सकते। गौरतलब है कि अमेरिका और ब्रिटेन से लेकर तमाम ऐसे कद्दावर देष इस जद्द में पहले आ चुके हैं और कई देष भले ही हमले से बचे हों पर दहषत से मुक्त नहीं हैं। इतना ही नहीं ब्रिटेन सहित षेश यूरोप भी इसकी पीड़ा भोग चुका है। ध्यानतव्य हो कि साल 2015 में पेरिस के षार्ली आब्दो के दफ्तर पर हुए आतंकी हमले और पुनः उसी पेरिस में दोबारा आतंकी हमला पूरे यूरोप को भय से भर दिया था और इस हमले में फ्रांस में व्यापाक पैमाने पर जान-माल का नुकसान भी हुआ। हांलाकि फ्रांस ने इस मामले को प्रमुखता देते हुए आतंकी ठिकानों पर हमले भी तत्काल षुरू कर दिये थे। खास यह भी है कि जिस पेरिस में 2015 के नवम्बर के पहले पखवाड़े में यह हमला हुआ था उसी पेरिस में इसी माह के आखिरी दिनों में पेरिस जलवायु सम्मेलन को लेकर दुनिया के राश्ट्राध्यक्ष को इकट्ठा होना था। कचोटने वाला प्रष्न यह है कि दुनिया की दो समस्याओं में एक जलवायु परिवर्तन पर जहां चिंतन किया जाना था वहीं आतंकवाद को लेकर नई चिंता का विकास हो गया था। 
निहित परिप्रेक्ष्य यह भी है कि दुनिया में तबाही का मंसूबा रखने वाला आइएस तेजी से सिकुड़ रहा है यदि उसे इस समय कोई अतिरिक्त ऊर्जा नहीं मिली तो उसका भरभराना सम्भव है। ताजा दृश्टिकोण यह है कि इराक जहां आइएस के सरगना बगदादी का जन्म हुआ अब वही इराक उसके चंगुल से मुक्त हो गया है। इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया यानि आइएसआइएस को किसी भस्मासुर से कम नहीं माना गया। फिलहाल बदले हालात में यह संगठन छिन्न-भिन्न हो रहा है फलस्वरूप उसका मानचित्र तेजी से छोटा हो रहा है। कई प्रकार की परेषानियों समेत आर्थिक संकटों के चलते अब इस संगठन से जुड़ने वालों की संख्या निरन्तर कम होती जा रही है और जो पहले से हैं वे भी आम जीवन में लौटना चाहते हैं। मुख्य यह भी है कि इसमें षामिल महिलायें अब तेजी से इससे पीछा छुड़ा रही हैं। दुनिया का सबसे अमीर आतंकी संगठन आइएस निहायत महत्वाकांक्षी किस्म का है। आर्थिक तौर पर देखें तो इसका बजट दो अरब डाॅलर का है जो अपहरण से प्राप्त फिरौती तथा बैंक लूटने जैसे तमाम हथकण्डों से युक्त है। आइएस मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों को सीधे अपने राजनीतिक नियंत्रण में रखने का लक्ष्य घोशित किया था जिसमें जाॅर्डन, इज़राइल, फिलीस्तीन, लेबनान, कुवैत तथा साइप्रस समेत दक्षिणी तुर्की का कुछ भाग इसमें आता है पर महात्वाकांक्षा के उफान इतने तक ही सीमित नहीं था। इसकी स्थिति को देखते हुए लगता है कि इसकी इच्छा मानो दुनिया भर पर कब्जा जमाना था।
फिलहाल ताजा प्रकरण यह है कि बगदाद समेत पूरे इराक पर जहां बगदादी की तूती बोलती थी वहां से अब यह पूरी तरह समाप्त हो चुका है दूसरे षब्दों में इराक आइएस मुक्त होते हुए इसके क्षेत्र को निहायत संकुचित कर दिया है। गौरतलब है कि इराकी प्रधानमंत्री हैदर अल अबादी बीते 10 दिसम्बर को राश्ट्रीय अवकाष घोशित करते हुए आइएस से इराक के मुक्त होने का जष्न मनाया। उनका दावा है कि सुरक्षा बलों ने सीरिया से लगे अन्तिम इलाके को भी फिलहाल आईएस से मुक्त करा लिया है। यदि यह सूचना पूरी तरह सही है तो इराक आइएसआइएस के खिलाफ चल रही लड़ाई को न केवल जीता है बल्कि बगदादी के खौफ से मुक्ति भी पा ली है। इसे देखते हुए ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीजा ने इराक के आतंक से मुक्ति पर प्रसन्नता तो जाहिर की पर यह भी आगाह किया है कि आईएस का खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। ऐसा कहने के पीछे सीरिया से लगी सीमा पर इराक की मौजूदगी मानी जा रही है। वैसे एक सूचना यह भी रही है कि आइएस प्रमुख बगदादी की मौत हो चुकी है पर इसकी पुश्टि न होने से यह खबर संदेह में रहती है। तुर्की और ईरान की मीडिया ने भी उसकी मौत को सही बताया है पर संदेह से पर्दा अभी भी पूरी तरह हटा नहीं है। पूरी दुनिया में आतंक और दहषत का पर्याय बन चुके चरमपंथी समूह आइएसआइएस की क्रूरता और जुर्म तथा उसी की ओर से जारी वीडियो के माध्यम से दुनिया ने यह देखा है कि रेगिस्तान में लाल वस्त्र पहनाकर घुटने के बल बैठाकर किस तरह विदेषी नागरिकों और गैर मुस्लिमों का गला रेता गया है। विष्व भर में फैले आतंक और हिमाकत साथ ही तबाही के बीच क्या इस बात का चिंतन-मनन नहीं होना चाहिए कि दुनिया को संवारते-संवारते आखिर दहषत फैलाने वाले आतंकी संगठन और आतंकवादी कहां से पैदा हो जाते हैं। कहा तो यह भी जाता है कि जाने अनजाने आइएस के जन्म के पीछे अमेरिका का ही हाथ रहा है ठीक वैसे जैसे ओसामा बिन लादेन और अलकायदा के मामले में और ठीक वैसे जैसे 1980 में ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए केमिकल हथियार देकर अमेरिका ने सद्दाम को सद्दाम हुसैन बना दिया साथ ही ठीक वैसे जैसे सीरिया के फ्रीडम फाइटर को अमरिका ने हथियार और ट्रेनिंग दी जो अब आइएसआइएस के बैनर तले लड़ रहे हैं। साफ है कि कूटनीतिक और राजनीतिक लाभ के लिए जब-जब ताकतवर देष अपने निजी एजेण्डे पर काम करेंगे तब-तब अलकायदा और आइएस जैसे संगठन उगते रहेंगे और फिर इनके खात्मे के लिए अतिरिक्त ताकत जुटाई जायेगी। वजह जो भी हो दहषत और आतंक किसी के लिए भी अच्छा नहीं है और अच्छी बात यह है कि इराक ही नहीं पूरी दुनिया आतंक मुक्त हो और साथ ही दुनिया की जलवायु सभी के रहने योग्य हो।




सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502
ई-मेल: sushilksingh589@gmail.com

महंगाई से निपटने में नाकाम सरकार

सब्जी, फल, अण्डा, चीनी और दूध जैसी रोज़मर्रा की उपयोग की वस्तुएं महंगी होने के चलते बीते नवम्बर में खुदरा महंगाई दर पिछले 15 महीने की तुलना में उच्चतम स्तर पर पहुंच गयी। यह किसी भी सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं है। बीते 12 दिसम्बर को केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने इस बात का खुलासा किया कि मुद्रास्फीति 4.88 फीसदी पर पहुंच गयी है जो सवा साल में सर्वाधिक है। हालांकि इस बीच एक अच्छी खबर यह है कि पिछले साल के नवम्बर की तुलना में इस बार दलहन के दाम में गिरावट है। रोचक यह भी है कि यूपीए सरकार के समय महंगाई पर छाती पीटने वाले यही भाजपाई आज इसलिए बढ़ी हुई महंगाई के बावजूद सुकून में हैं क्योंकि विपक्ष भी कान में तेल डालकर बैठा है। इस बात से बहुधा लोग अनभिज्ञ नहीं होंगे कि इस देष में मात्र प्याज महंगा होने से सरकारें पानी-पानी हुई हैं और नौबत तो सत्ता से हाथ धोने तक की भी आई है। यह बदले दौर की राजनीति ही है कि जिस देष में महंगाई को लेकर हाहाकार होता था आज वहां सन्नाटा है। यह बात और है कि मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए जीवन इन दिनों फिलहाल कठिन बना हुआ है। जब कभी यह सवाल मन में आये कि संवेदनषीलता और संवेदनहीनता में क्या अंतर है तो दो प्रकार की सरकारों की तरफ दृश्टि गड़ाई जा सकती है एक वो जो महंगाई काबू रखने के साथ-साथ जनता की जेब और जीवन का ख्याल रखती है, दूसरी वो जो इससे उलट कृत्य में लिप्त होकर मात्र सियासी दांवपेंच में लगी रहती है। गौरतलब है महंगाई न केवल जनजीवन को अस्त-व्यस्त तथा त्रस्त करती है बल्कि सरकार की साख पर भी बट्टा लगाती है। साढ़े तीन साल से केन्द्र में मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार चल रही है। मतदाताओं ने सरकार को इसलिए बड़े पैमाने पर सीटें जिताई थी ताकि वे उनके लिए अच्छे दिन लाये जैसा कि उनका चुनावी वादा भी था पर इन दिनों मामला इससे उलट दिखाई दे रहा है। खान-पान की वस्तुओं में प्याज कहीं अधिक केन्द्र में रहती है जिसकी कीमत सामान्य होने में षायद अभी और वक्त लगेगा। बीते 21 नवम्बर को खाद्य एवं उपभोक्ता मामले के मंत्री राम विलास पासवान ने कहा था कि एक पखवाड़े में प्याज की कीमत सामान्य हो जायेगी पर इसके आसार अब दिखाई नहीं देते। उन्होंने कहा था कि कीमत को काबू में रखने के लिए एमएमटीसी 2 हजार टन प्याज का आयात करेगी एवं नेफेड के जरिये 10 हजार टन प्याज की खरीद की जायेगी। खास यह भी है कि सरकार ने प्याज के निर्यात पर 850 डाॅलर का न्यूनतम मूल्य भी घोशित कर दिया है बावजूद इसके अभी तक इसकी कीमत खुदरा बाजार में 50 रूपये प्रति किलो की दर से नीचे नहीं आ पायी है।
भारत की बहुत सी आर्थिक समस्याओं में महंगाई की समस्या प्रमुखता लिये रहती है। ऐसा भी देखा गया है कि एक सीमा तक जनता किसी न किसी तरह महंगाई को झेल लेती है लेकिन यदि यह लम्बे समय तक टिक जाती है तो आम जन के रक्तचाप को भी बढ़ा देती है। स्थिति तब बहुत अधिक बिगड़ जाती है जब वस्तु विषेश की दोबारा खरीदारी करते समय तुलनात्मक बढ़ी हुई कीमत देनी पड़ती है। देष की सरकार हो, नीति नियोजक या फिर कोई निकाय ही क्यों न हो इस बात पर जरूर ध्यान देना चाहिए कि गरीब और गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले के लिए महंगाई जीवन के लिए ही खतरा बन जाती है। आंकड़े इस बात का समर्थन करते हैं कि देष में हर पांचवा व्यक्ति अभी भी गरीबी रेखा के नीचे है। हालांकि विष्व बैंक की दृश्टि में यह संख्या अधिक है। जिसे दो जून की रोटी जुटाने के लिए बड़ी मषक्कत करनी पड़ती है। सरकार के नियोजन और उसमें निहित लाभ से भी यह इसलिए वंचित रह जाते हैं क्योंकि अषिक्षा और जागरूकता की कमी के चलते अधिकार को भी नहीं पहचानते हैं। इतना ही नहीं गरीबों के हक से बिचैलिये मालामाल होते हैं और आर्थिक खाई गहरी होती जाती है। इस बात के लिए मोदी सरकार की सराहना की जा सकती है कि सहायता के कई संदर्भ सीधे खाताधारकों से संलग्न किये गये पर महंगाई की मार के चलते राहत भी बेमतलब सिद्ध हो रही है। रसोई गैस पर सब्सिडी खाते में तो आती है पर जिस गति से इसकी कीमत बढ़ी है उसे देखते हुए यह एक हाथ से देने दूसरे से लेने जैसा है। दो टूक यह भी है कि कीमतों में निरंतर वृद्धि एक दहषतकारी मोड़ होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्नत और विकासमान जीवन जीने की इच्छा इसके चलते धुंधली हो जाती है। 
वास्तव में बाजार हमारी समूची अर्थव्यवस्था का दर्पण है और इस दर्पण में सरकार और जनता का चेहरा होता है। जाहिर है महंगाई बढ़ती है तो दोनों की चमक पर इसका फर्क पड़ता है। खास यह भी है कि  अगर महंगाई और आमदनी के अनुपात में बहुत अंतर आ जाये तो भी जीवन असंतुलित होता है। वैसे महंगाई को समस्याओं की जननी कहा जाय तो अतार्किक न होगा। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन के आंकड़े मौजूदा महंगाई को ही उजागर नहीं करते बल्कि कई और क्षेत्रों में गणित बिगाड़ने के संकेत भी दे रहे हैं। अर्थषास्त्रियों का यह मानना है कि महंगाई दर अनुमान से कहीं ज्यादा है ऐसे में मौजूदा वित्तीय वर्श में ब्याज दर में कटौती की सम्भावना लगभग खत्म हो गयी है। सम्भावना तो यह भी जताई जा रही है कि भारतीय रिजर्व बैंक अगले छः माह तक ब्याज दर में कटौती नहीं करेगा। यह इस बात का संकेत है कि बैंकों से ऋण लेने वाले एक तरफ महंगाई की मार झेलेंगे तो दूसरी तरफ ब्याज दर में राहत से भी वंचित रहेंगे। चिंतन तो इस बात का भी है कि प्याज, टमाटर और अन्य सब्जियों की कीमत में वृद्धि का अनुमान मौजूदा समय में उम्मीद से ज्यादा असर डाल रहा है जिस पर काबू पाने के लिए सरकार को कड़ी मषक्कत करनी पड़ेगी। महंगाई का एक वृहद् पक्ष कच्चे तेल की कीमत भी है जिसका दाम 10 जून 2015 के बाद पहली बार 65 डाॅलर प्रति बैरल को पार किया जाहिर है यह दो साल का उच्चतम स्तर है। जिसमें इसे देखते हुए यह संकेत मिल रहा है कि पेट्रोल और डीजल के दाम में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है। यदि ऐसा हुआ तो सरकार के माथे पर चिंता के बल लाज़मी हो जायेंगे। वैसे भी इन दिनों तेल की कीमत आसमान छू रही है। गौरतलब है कि नवम्बर 2016 में महंगाई दर 3.63 प्रतिषत थी और इसी माह में 8 नवम्बर को नोटबंदी का एलान किया गया था। अर्थषास्त्र का विन्यास बहुत सामान्य नहीं होता हालांकि यह बहुत गूढ़़ भी नहीं होता पर एक सच्चाई है कि इसको अतिरिक्त सहज लेने पर कभी-कभी यह भारी पड़ता है जैसा कि इन दिनों देखा जा सकता है। नोटबंदी के बाद इसी वर्श 1 जुलाई को देष में जीएसटी लागू किया गया। ताबड़तोड़ आर्थिक परिवर्तनों के चलते भी आर्थिक व्यवस्था में दरारें आना स्वाभाविक है। चिंतन का विशय यह भी है कि सरकार हर आर्थिक मोर्चे पर लिये गये निर्णय को अपना सधा हुआ फैसला मानती रही है और इसके दूरगामी नतीजे बता कर अपनी पीठ थपथपाती रही जबकि जनता अनेक समस्याओं समेत महंगाई की गिरफ्त में है। 


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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Monday, December 11, 2017

चुनौती की युक्ति खोजती कांग्रेस

अरब सागर से सटे गुजरात में चुनावी मौसम तूफानी है और देश  के प्रधानमंत्री समेत तमाम राजनेता प्रचण्ड पचासा की भूमिका में वह सब कुछ झोंके हुए है जो वे सियासत साधने के लिए जरूरी समझ रहे हैं। गौरतलब है कि यहां की फिजां में नीच और नीचता भी इन दिनों खूब तैर रही है। कांग्रेस के वरिश्ठ नेता मणिषंकर अय्यर जो अब निलंबित हैं का यह एक अलफाज़ मानो प्रधानमंत्री मोदी के लिए गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने का फाॅर्मूला दे दिया हो। ऐसा देखा गया है कि चुनाव के दिनों में केवल वायदों का अम्बार नहीं होता बल्कि जुबान फिसलने पर उसकी तेजी से धर-पकड़ भी होती है। जाहिर है इसके पहले बिहार विधानसभा चुनाव में भी ऐसे नमूने खूब देखे गये थे। गुजरात प्रधानमंत्री मोदी का घर भी है और गढ़ भी पर जिस तरह वे विरोधियों पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं उससे साफ है कि चुनावी आंच का उन्हें भी डर सता रहा है। खास यह भी है कि 22 साल से गुजरात में सत्तासीन भाजपा यहां कांग्रेस मुक्त का नारा उतना बुलन्द नहीं कर रही है जैसा वह पहले करती रही है। मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने दो दषक के भाजपाई सरकार के विकास का हिसाब-किताब चुनावी रैलियों में रख कर काफी हद तक अपना वजन बढ़ाया है साथ ही पाटीदारों के चलते गुजरात की फिजां में भाजपा का रंग बदरंग हुआ है। जहां तक जान पड़ता है प्रधानमंत्री मोदी देष के किसी भी विधानसभा चुनाव में इतना प्रचार नहीं किया जितना गुजरात में कर रहे हैं। इसके पीछे विरोधी भय नहीं तो क्या कहा जायेगा। भाजपा जानती है कि न तो कांग्रेस 2014 जैसी है और न ही गुजरात के वोटर पहले जैसे हैं इतना ही नहीं यहां की सियासत का मजनून भी पहले जैसा नहीं है। यदि यहां से कुछ अनबन होती है तो विरोधियों को न केवल ताकत मिल जायेगी बल्कि घर में हार के दंष वर्शों तक पीछा नहीं छोड़ेंगे।
कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि भले ही 2014 से उसकी हार के सिलसिले अभी भी जारी हैं बावजूद इसके चुनाव वैसे ही लड़ो जैसे जीतने के लिए लड़ा जाता है। हालांकि इसी बीच पंजाब में कांग्रेस सत्तासीन हुई और मणिपुर तथा गोवा में भी स्थिति अच्छी बनाये रखने में कामयाब रही। दो टूक यह भी है कि यदि गुजरात में कांग्रेस बाजी मारती है जिसके नतीजे 18 दिसम्बर को आयेंगे या फिर 2012 की तुलना में व्यापक बढ़त भी बना लेती है तो मौजूदा समय को देखते हुए दुर्बल कांगे्रस में नई ऊर्जा का संचार होना लाज़मी है और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भी उसे अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक ताकत मिल जायेगी। बेषक गुजरात जीतना कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी चुनौती है पर राहुल गांधी अपनी दलीय स्थिति को दौर के अनुपात में समझते हुए न केवल उसे नव उदारवाद की ओर ले जा रहे हैं बल्कि स्वयं को उदारवादी हिंदुत्व की ओर झुका भी रहे हैं जो अपने आप में बड़ी खास बात है। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के ठीक उलट राहुल मन्दिर-मन्दिर जा रहे हैं। षायद कांग्रेस के रणनीति बनाने वालों को भी यह समझ आ चुकी है कि भाजपा से मिल रही चुनौती में मंदिर एक समाधान की युक्ति हो सकती है। जब से केन्द्र में मोदी सरकार काबिज है तब से देष में उग्र हिन्दुत्व का कमोबेष वातावरण तेजी से निर्मित हुआ है जिसे षायद भारत के आमजन व आम हिन्दू कम ही पसंद करता है। बुद्धिजीवी वर्ग भी ऐसे संदर्भों से ज्यादा घालमेल नहीं रखते। वर्श 2015 में लेखकों एवं रचनाकारों द्वारा असहिश्णुता को आगे करके अवाॅर्ड वापसी का दौर इसके नाप-झोक में आ सकता है। सटीक संदर्भ यह भी है कि राजनेता सुविधा के हिसाब से राजनीति करते हैं और देष की जनता सुविधा की फिराक में इनसे बार-बार छली जाती है पर ऐसा प्रतीत होता है कि कालांतर में उग्र हिन्दुत्व हो या उग्र राजनीति खारिज हो जायेगी। कांग्रेस की इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने 1975-77 में आपात की स्थिति लाकर इसी उग्रता का परिचय दिया था। जिसे 1977 के चुनाव में खारिज कर दिया गया था और जब 1980 में उसकी पुर्नवापसी हुई तो सत्तासीन तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी उग्र के बजाय उदार की राह पर थीं।
मौजूदा समय में कांग्रेस में राहुल युग का सूत्रपात तो हो रहा है पर अनेकों चुनौतियों से वे घिरे हुए हैं। मोदी के मुकाबले व्यक्तित्व में निखार और जनता के सामने उनकी पेषगी उनके सामने बड़ा प्रष्न रहेगा हांलाकि वे इस मामले में पहले से काफी बदले दिख रहे हैं। भरभरा उठी कांग्रेस पार्टी की संरचना को न केवल पुर्निजीवित करना चुनौती है बल्कि कांग्रेसियों में यह उम्मीद भरना कि भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत के विचार से मुक्त होकर देष की जनता के बीच कैसे जगह बनाये से युक्त हो जाये खासा मषक्कत भरा काज है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है। रही बात वंषवाद के आरोप से तो राहुल गांधी इससे मुक्त नहीं हो सकते और फिलहाल कांग्रेस के पास इसका कोई इलाज भी नहीं है। कांग्रेस लगातार हार के चलते जिस रास्ते पर खड़ी है वहां से अब और कमजोर होना इसलिए कम प्रतीत होता है क्योंकि केन्द्र में साढ़े तीन साल की सत्ता चला रही एनडीए की कई कमजोरियां भी अब देष के सामने विपक्ष रख सकता है। बार-बार इस बात को लेकर मोदी सरकार अपना बचाव नहीं कर सकती कि उसे भरपूर वक्त अभी नहीं मिला है। दो टूक यह भी है कि राहुल गांधी धार्मिक बनने की हड़बड़ाहट में दिख रहे हैं जो उन पर ताजा आरोप है पर राजनीति में एक खास बात यह रही है कि आरोपों से सियासतदानों के कद आंके गये हैं। राहुल गांधी का मन्दिर जाने वाला मामला भाजपा को तिलमिला सकता है और यदि धार्मिक मामले में भाजपा इसे राहुल की सेंध समझ रही हो तो इस युक्ति को वे सफल करार दे सकते हैं। 
इतिहास के पन्नों को उलट-पलट कर देखा जाय तो कांग्रेस के लिए परेषानी का कारण एक नहीं अनेक है जिसमें नेहरू से लेकर इन्दिरा एवं राजीव गांधी तक की सरकारों का लेखा-जोखा सियासी भंवर में तैरते रहेंगे साथ ही वंषवाद की राजनीति का दंष भी चलता रहेगा। वंषवाद और आन्तरिक लोकतंत्र की कमी का ठीकरा षायद कांग्रेस पर आगे भी फोड़ा जाता रहेगा पर यह आरोप कितना लाज़मी कि राहुल गांधी ने औरंगजेब की तरह पार्टी की अध्यक्षता हासिल की। गौरतलब है कि औरंगजेब ने सत्ता अपने भाईयों से लड़कर प्राप्त की थी जबकि राहुल गांधी निर्विरोध हैं। हांलाकि षहजाद पूनावाला जैसे कुछ कांग्रेसी विरोधी वक्तव्य दिये पर ये कोई खास मायने नहीं रखता। मणिषंकर अय्यर भी वरिश्ठ हैं पर कहीं न कहीं पार्टी के लिए मुसीबत हैं। आये दिन वे इसका सबूत भी देते रहते हैं। इस बात पर भी ध्यान देना सही है कि पिछले चार सालों से देष की सियासी फिजा में वंषवाद के चंगुल से मुक्ति की बात हो रही है बावजूद इसके सोनिया गांधी के बाद कांग्रेस का षीर्शस्थ पद वंष परम्परा का निर्वहन करते हुए राहुल गांधी के पास ही आयी। साफ है कि चुनावी हश्र कुछ भी हो वंषवाद की जोड़-तोड़ से कांग्रेस बाहर नहीं है। वैसे यह आरोप केवल राहुल गांधी पर ही क्यों भाजपा समेत कई दल ऐसे हैं जहां यह कमोबेष मिल जायेगा पर कांग्रेस पर यह भारी पड़ता है क्योंकि वहां सत्ता में भी और दल के अन्दर भी यह परम्परा रही है। सौभाग्य से राहुल को खुला मैदान मिला है और कोई प्रतिद्वन्दी नहीं है। ऐसे में वे चुनौतियों से पाड़ पाते हुए यदि पार्टी को मौजूदा स्थिति से उबार लेते हैं तो वे न केवल कई आरोपों से मुक्त हो जायेंगे बल्कि उनका दल बदले राजनीति में कुछ हद तक सषक्तता से युक्त भी मान लिया जायेगा। 


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
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Wednesday, December 6, 2017

एक उन्माद जो कहीं नहीं पहुंचा

आज से ठीक 25 बरस पहले 6 दिसम्बर को जब इस बात के लिए जन सैलाब उमड़ा था कि राम मन्दिर निर्माण के लिए जो बन पड़ेगा करेंगे तो भले ही भारत का समाजषास्त्र कई विचारों में बंट हो गया हो पर एक बात तो साफ थी कि बड़ा परिवर्तन होगा। इसी दिन बाबरी मस्जिद ढहा दिये जाने की घटना हुई जिसे एक युग बीत चुका है। तारीखें बदल गयीं, राजनीति बदल गयी, सियासतदानों ने अयोध्या के नाम पर कम-ज्यादा रोटियां भी सेंकी बावजूद इसके अयोध्या की सीरत नहीं बदली, हां सूरत जरूर बदली है। इस लिहाज़ से कि राम जन्मभूमि के आस-पास के चैराहे अब आबाद होकर बाजार में तब्दील हो गये हैं। इतिहास इस बात के लिए हमेषा प्रबल दावेदारी कर सकता है कि अयोध्या में राम मन्दिर के निर्माण को लेकर एकमत होने का साहस किसी में नहीं था। बरसों से राम जन्मभूमि को लेकर सियासत हो रही है और मामला अदालतों में धूल फांक रहा है। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के विवाद में गरमागरम बहस पहले भी होती रही और यह सिलसिला अभी रूका नहीं है। इसी का एक नमूना बीते 5 दिसम्बर को तब देखने को मिला जब सुन्नी वक्र्फ बोर्ड और बाबरी एक्षन कमेटी के वकीलों ने प्रधान न्यायाधीष जस्टिस दीपक मिश्रा द्वारा सुनवाई करने का विरोध किया। इसके पीछे वजह यह बतायी गयी कि उनके कार्यकाल में कार्यवाही पूरी नहीं हो पायेगी। गौरतलब है कि मौजूदा प्रधान न्यायाधीष का कार्यकाल 2 अक्टूबर, 2018 तक है। सियासी दांव-पेंच के साथ अदालत में लम्बित मन्दिर विवाद को लेकर जब देष की षीर्श अदालत ने तत्परता दिखाई तब भी कईयों के पास इसे उलझाये रखने का कोई न कोई तर्क था। रोचक यह भी है कि सुन्नी बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने सुन्नी वक्र्फ बोर्ड के वकील का इस बात के लिए समर्थन किया कि आखिर सुनवाई में इतनी जल्दी क्यों। परिप्रेक्ष्य और दृश्टिकोण यह है कि 25 साल बीत जाने के बावजूद इस मामले में अभी भी इस बात के दांव पेंच हो रहे हैं कि इसका राजनीतिक मुनाफा कहीं किसी को न मिल जाये।
इसमें कोई दो राय नहीं कि राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद हमेषा सियासी चष्में से देखा जाता रहा है। मामले को देष की राजनीति को प्रभावित करने वाला बताया जाना इस बात का भी द्योतक है कि ध्यान समस्या के हल पर नहीं बल्कि सत्ता की पैरोकारी में है। सभी जानते हैं कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देष है बावजूद इसके जब धर्मनिरपेक्षता की रचना और गणना हर कोई अपने ढंग से करता है और उसे अपने राजनीतिक मुनाफे में तब्दील करना चाहता है तब उसका समर्थन करना कठिन हो जाता है। भारतीय संविधान में इस बात का पूरा ताना-बाना है कि भारत का कोई धर्म नहीं है। देष बड़ा लोकतंत्र वाला है पर यह बात कहीं अधिक सच्चाई से ओतप्रोत है कि इसी देष में नीति को नहीं नेता को देखकर नीयत में फेरबदल होता रहा है। कई धर्मावलंबी मन्दिर के समर्थन में अच्छे तर्क दिये होंगे साथ ही कई मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इसके समर्थन में बातें कहीं पर मुद्दे से बर्फ पिघली नहीं बल्कि वक्त के साथ तारीख की मोटाई ही बढ़ी है। कहा जाय तो अयोध्या के जो सवाल 25 साल या उससे पहले भी जहां पर थे आज भी वहीं पर खड़े हैं। जाहिर है देष में एक न्यायपालिका है जो विवादों को न केवल हल देती है बल्कि स्वस्थ न्याय की परम्परा का अनुपालन भी करती है और कराती है अब सारा दारो-मदार इसी पर है। गौरतलब है कि तीन सदस्यीय पीठ चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में इस मामले को लेकर आगामी 8 फरवरी से रोजाना सुनवाई करेगी। 
अयोध्या में अब तक क्या हुआ एक दृश्टि इस पर लाज़मी है। विवादित ढांचा 6 दिसम्बर को ढहाया गया था। इसके करीब दो साल बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ में मुकदमा षुरू हुआ था। मुकदमे के दौरान कई आरोपी और गवाह प्रस्तुत होते रहे जिसमें कई अब इस दुनिया में नहीं है। जब विवादित ढांचा जमींदोज हुआ तो इसका जिम्मेदार कौन है यह पता करना भी समय की दरकार थी और न्यायसंगत भी। जिसके लिए लिब्राहन आयोग का गठन किया गया और घटना को एक दषक बीत गया। जनवरी 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बातचीत से विवाद सुलझाने के लिए अपने कार्यालय में अयोध्या प्रकोश्ठ षुरू किया। इसी वर्श अप्रैल में विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने सुनवाई षुरू की। 2009 में लिब्राहन आयोग ने बड़े लम्बे कोषिष और वक्त के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की तब प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह थे। ठीक एक साल बाद सितम्बर 2010 में देष की षीर्श अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका को खारिज किया। समय के साथ अदालती संघर्श न केवल लम्बे हुए बल्कि विवाद और सघन होते जा रहे थे और वह दिन भी आया जब 30 सितम्बर, 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्से में बांटने का निर्णय सुनाया। जिसमें एक हिस्सा राम मन्दिर, दूसरा सुन्नी वक्र्फ बोर्ड और तीसरा निर्मोही अखाड़ा को मिला पर देष की षीर्श अदालत ने इस फैसले पर रोक के आदेष दे दिये। वक्त बीतता चला गया और समाधान अभी भी उतनी ही दूरी पर खड़ा था। इसी बीच जुलाई 2016 में बाबरी मामले के सबसे उम्रदराज हाषिम अंसारी का निधन हो गया। हाषिम अंसारी ऐसे षख्स थे जो इस मामले में 1949 से जुड़े थे। तारीखे इतिहास होती गयी, संघर्श करने वाले भी आते-जाते रहे। बताते चलें कि निर्मोही अखाड़े के रामचन्द्र परमहंस भी पहले ही इस दुनिया को छोड़ चुके थे। एक रोचक संदर्भ का उल्लेख यहां लाज़मी है कि परमहंस की मृत्यु पर मुद्दई हाषिम अंसारी ने कहा था कि दोस्त चला गया अब लड़ाई में मजा नहीं आयेगा। दो टूक यह भी है कि लम्बे समय से बाबरी मस्जिद व राम मन्दिर मसले को लेकर उठा विवाद वादी-प्रतिवादी को भी इतना संवादी बना दिया कि उनके न होने का रंज एक-दूसरे को था और इसका पुख्ता सबूत रामचन्द्र परमहंस और हाषिम अंसारी हैं।
6 दिसम्बर, 1992 से 6 दिसम्बर, 2017 के बीच 100 साल का एक चैथाई वक्त बीत गया। इस ढ़ाई दषक ने देष में नये परिवर्तन को जन्म दिया। राजनीति की दिषा कहीं से कहीं चली गयी और लोकतंत्र जो उथल-पुथल के दौर में था वो प्रखर होकर फलक पर चमकने लगा। बहुमंजली इमारतों वाली सत्तायें जमींदोज होकर एक दल में समा गयीं। इस उम्मीद के साथ कि विकास की धारा और वक्त के साथ बढ़ी मांग वाली विचारधारा में यह कहीं अधिक पुख्ता सिद्ध होगी। यह कितनी सार्थक है इसकी पड़ताल बाद में होगी पर एक सच्चाई यह है कि देष की राजनीतिषास्त्र और समाजषास्त्र ही नहीं बल्कि अर्थषास्त्र में भी बड़ा परिवर्तन हुआ है। अयोध्या में भी परिवर्तन हुआ है सिवाय इसके कि 6 दिसम्बर, 1992 को जहां थे अभी भी वहीं हैं पर अब यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले कुछ महीनों या वर्शों में न्याय की प्रतीक्षा समाप्त होगी। गौरतलब है कि इसी वर्श सुप्रीम कोर्ट ने मार्च में कहा था कि आपसी सहमति से विवाद सुलझा लें जिसे लेकर कोषिषें भी हुईं। बीते अप्रैल में षीर्श अदालत ने बाबरी मस्जिद गिराये जाने के मामले में कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने के आदेष दिये जिसमें भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृश्ण आडवाणी और मुरली मनोहर भी षामिल हैं। फिलहाल भरोसा किया जा सकता है कि तमाम जोड़-तोड़ के बावजूद जो हल नहीं निकला षीर्श अदालत की चैखट से भविश्य में दिखेगा।




सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
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वह दिन जब दुनिया औचक्क रह गयी

इसी वर्श 20 जनवरी को जब राश्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाऊस में प्रवेष किया तब बामुष्किल सप्ताह भर ही बीते थे कि वे अपने स्वभाव के अनुरूप ताबड़तोड़ निर्णय लेते हुए सात मुस्लिम बाहुल्य देषों को अमेरिका में प्रवेष पर रोक लगा दी जिसमें ईरान, यमन, सोमालिया, लीबिया, सीरिया आदि षामिल थे। उस दौरान व्हाइट हाऊस से यह भी संकेत मिल रहा था कि प्रतिबंधों की सूची में पाकिस्तान को भी षामिल किया जा सकता है और इसकी एक बड़ी वजह पाकिस्तान का आतंकियों को षरण देना माना जा रहा था। हालांकि अभी तक ऐसा नहीं हुआ है परन्तु जिस तरह पाकिस्तान आतंक की राह पकड़े हुए है और डोनाल्ड ट्रंप की धमकी जारी है उससे साफ है कि पाक की गर्दन पर प्रतिबंध की तलवार अभी भी लटकी हुई मानी जा सकती है। सबके बावजूद प्रासंगिक प्रष्न यह है कि मुस्लिम देषों पर प्रतिबंध लगाने से किसकी इच्छा पूरी हुई। इसे अमेरिका की इच्छाओं की पूर्ति माना जाय या फिर डोनाल्ड ट्रंप की दबी हुई आकांक्षा की भरपाई। फिलहाल अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने करीब 11 माह पुराने डोनाल्ड ट्रंप के फैसले पर अपनी मोहर लगाकर उनकी आकांक्षा को पूरा कर दिया है। ये बात और है कि निचली अदालतों में अभी भी इस मामले के कानूनी दांवपेंच पर बहस जारी है। खास यह भी है कि निचली अदालतों में अमेरिका में उक्त मुस्लिम देषों के प्रवेष को ट्रंप की मुस्लिम विरोधी नीतियों का हिस्सा बताकर खारिज कर दिया गया था परन्तु अब अमेरिका की षीर्श अदालत के फैसले से प्रतिबंध पुख्ता हो गया है। गौरतलब है कि एक्षन और रिएक्षन के बीच ट्रंप के इस निर्णय को ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी से लेकर इंडोनेषिया तक खूब आलोचना हुई थी। जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने तो यहां तक कहा था कि आतंक के खिलाफ वैष्विक लड़ाई का यह मतलब नहीं कि किसी देष के नागरिकों को आने पर ही प्रतिबंध लगा दिया जाय। उन्होंने जेनेवा समझौते की याद भी उन दिनों दिलाई थी पर इसका असर न तब हुआ था और न अब। गौरतलब है कि पोलैण्ड डोनाल्ड ट्रंप के निर्णय के साथ खड़ा था।
वैसे देखा जाय तो डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला षुरू से ही विवादों में घिरा था। सत्ता पर काबिज होते ही जारी आदेष को बाद में वापस भी लेना पड़ा और कुछ संषोधनों के साथ जो दूसरे आदेष भी आये उनका भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। जिस आदेष पर अमेरिका की षीर्श अदालत ने अपनी मोहर लगाई है वह आदेष का तीसरा प्रारूप है जाहिर है कि डोनाल्ड ट्रंप की अति महत्वाकांक्षा यदि यह थी कि ईरान, सोमालिया, सीरिया तथा लीबिया जैसे देषों पर प्रतिबंध हो तो वह मूल फैसला नहीं बल्कि संषोधित फैसला है और इस संषोधित आदेष पर भी रिचमंड, वर्जीनिया एण्ड सेन फ्रान्सिस्कों और कैलिफोर्निया की षीर्श अदालतों में चुनौती मिली जहां फैसले की समीक्षा जारी है। इन्हीं अदालतों में फैसले को ट्रंप के मुस्लिम विरोधी रवैये के तौर पर देखा जा रहा है। दरअसल ट्रंप राश्ट्रपति के चुनाव के अपने अभियानों में इस बात का गाहे-बगाहे उल्लेख करते थे कि सत्ता में आने पर कुछ इस प्रकार के निर्णय लेंगे। भले ही ट्रंप राश्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताकर और आतंक की बात कह कर प्रतिबंध वाले अपने निर्णय को सही साबित कर दिया हो पर ऐसे फैसले की सारगर्भिता पर सवाल उठने लाज़मी हैं क्योंकि इससे दुनिया कई खेमों में बंट सकती है और आतंक की लड़ाई से लेकर जलवायु परिवर्तन की समस्या से जूझ रही दुनिया को झटका भी लग सकता है। गौर करने वाली बात यह भी है कि अमेरिका ने आतंकवाद के नाम पर कुछ देषों के नागरिकों पर पाबंदी तो लगायी पर इसमें वही मुस्लिम देष षामिल हैं जहां से अमेरिका के व्यापारिक हित आड़े नहीं आते।
वैसे फैसले में भी कई खामियां व झोल दिखाई देते हैं। प्रतिबंध की जद् में जो देष हैं उन सभी पर यह समान रूप से लागू होता नहीं दिखाई देता। यहां बताते चलें कि उत्तर कोरिया के कुछ लोगों और वेनेजुएला के कुछ समूहों का प्रवेष भी अमेरिका में प्रतिबंधित हो गया है। जाहिर है वेनेजुएला का महज़ एक नागरिक समूह इससे प्रभावित होता है तो वहीं उत्तर कोरिया के चंद नाम इसमें आते हैं। उत्तर कोरिया के साथ अमेरिका का छत्तीस का आंकड़ा है और इन दिनों तो दोनों देष बिल्कुल लड़ाई के मुहाने पर खड़े हैं। ऐसे में यदि उत्तर कोरिया पर भी डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी प्रवेष पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाते हैं तो षायद ही ट्रंप के इस निर्णय से षेश दुनिया औचक्क हो। ईरान के साथ षैक्षिक आदान-प्रदान की नीति प्रभावित होते नहीं दिखाई देती। साफ है कि अमेरिका जाने वाले छात्रों का कुछ नहीं बिगड़ेगा। आतंक के नाम पर प्रतिबंध वाला डोनाल्ड ट्रंप का यह निर्णय पूरी तरह गले इसलिए भी नहीं उतरता क्योंकि इस सूची में पाकिस्तान नहीं है जबकि अमेरिका भी जानता है और मानता है कि आतंक का सबसे बड़ा षरणगाह तो पाकिस्तान ही है। षायद यही वजह है कि अमेरिकी जनता से लेकर डोनाल्ड ट्रंप के आलोचक तक यह संदेष गया है कि प्रतिबंध मुस्लिम विरोधी नीति और उनका निजी एजेण्डा है। षायद एक वजह यह भी है कि वक्त की नज़ाकत को देखते हुए ट्रंप आतंक के मामले में पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात करते रहते हैं। ट्रंप यह भी जानते हैं कि प्रतिबंध से उनकी आर्थिक व व्यापारिक स्थिति पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ रहा है। ऐसे में यह माना जा सकता है कि प्रतिबंध वाला निर्णय अचानक नहीं बल्कि सोचा-समझा फैसला था। गौरतलब है कि प्रतिबंध लगाते समय डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि बुरे लोगों को अमेरिका से दूर रखने के लिए सात मुस्लिम देषों पर प्रतिबंध लगाया है। जाहिर है लाभ-हानि के मापतौल में ट्रंप का ही पलड़ा भारी दिखाई देता है। 
क्या वाकई में प्रतिबंध के पीछे आतंकी खतरा है या किसी अन्य प्रकार के अमेरिकी हित साधने का कोई दूरगामी फाॅर्मूला। अमेरिकी जनता के मुताबिक यह हितों और सिद्धांतों के खिलाफ है और दुनिया ने भी इसको सही नहीं माना है। हालांकि इस मामले में भारत तटस्थ स्वभाव लिए रहा। एक बात यह भी हो सकती है कि ट्रंप आतंकी देषों को इन देषों पर प्रतिबंध के सहारे कठोर होने का संदेष दे रहे हैं पर यह बात भी पूरी तरह पुख्ता नहीं प्रतीत होती क्योंकि पाकिस्तान जैसे देषों पर इसका कोई असर ही नहीं हुआ। फिलहाल षीर्श अदालत के निर्णय किन्तु-परन्तु पर विराम लगा दिया है। देखा जाय तो ट्रंप सुविधा की फिराक में विष्व के कई देषों की नजरों में आ गये हैं। इतना ही नहीं कई मामलों में उनका चेहरा भी बार-बार बेनकाब हो रहा है। जिस चतुराई से ट्रंप दुनिया में धौंस जमाना चाहते हैं वह कूटनीति भी बहुत वाइब्रेंट नहीं है। भारत से गहरी दोस्ती परन्तु चीन से तनिक मात्र भी मित्रता न घटाना ट्रंप की दोहरी चाल ही कही जायेगी। दक्षिणी चीन सागर में भारत, अमेरिका और जापान का अभ्यास जहां चीन को खटकता है वहीं उत्तर कोरिया से अमेरिका की तनातनी भी चीन को षायद ही भाता हो। षुरूआती दिनों में रूस के साथ ट्रंप की स्थिति सुधरती हुई दिख रही थी परन्तु वक्त के साथ तल्खी वहीं की वहीं रह गयी। षेश दुनिया से बेहतर सम्बंध की समझ वाले अमेरिका ने भी अपनी निजी नीतियों को तवज्जो देते हुए बाकियों को झटका दिया है। पेरिस जलवायु समझौते से उसका हटना इसका पुख्ता सबूत है। निहित परिप्रेक्ष्य यह भी है कि अपने निर्णयों से दुनिया को औचक्क करने वाले ट्रंप को यदि मुस्लिम विरोधी छवि से बाहर निकलना है तो सधे हुए कदम के साथ आतंक को साधने वाले देषों पर प्रहार करना ही होगा।


सुशील कुमार सिंह
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सुशासन का साहित्य है संविधान

26 नवम्बर को राश्ट्रीय विधि दिवस के पावन अवसर पर जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका अपने दायरे में रहते हुए एक-दूसरे की आवष्यकताओं को समझते हुए काम करें तब हम जनता की बेहतर सेवा कर पायेंगे। उक्त से यह बात एक बार फिर उजागर होती है कि संविधान में निहित सीमाओं के संरक्षण से ही सुषासनिक कृत्य सम्भव हैं। गौरतलब है कि इसी दिन 1949 में देष के संविधान के कुछ हिस्से को लागू किया गया था जबकि 26 जनवरी, 1950 को पूरी तरह संविधान भारतीय संविधान दुनिया के फलक पर आया था। संविधान और सुषासन के रिष्ते को सात दषक पूरे हो चुके हैं। संविधान जहां राजनीतिक अधिकारों एवं लोक कल्याण का वृहत्तम संयोजन है तो वहीं सुषासन एक जन केन्द्रित, कल्याणकारी तथा संवेदनषील षासन व्यवस्था है। विधि के षासन की स्थापना के साथ-साथ संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राप्त करने का प्रयास सुषासन है जिसके केन्द्र में नागरिक और उसका सषक्तिकरण देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा संविधान दिवस पर कई उन्मुख बातों को उजागर करने के पीछे एक बड़ी वजह दायरे को दायरे में रखने से भी सम्बंधित कही जा सकती है। विदित हो कि संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत कार्यपालिका का निर्माण व्यवस्थापिका से होता है जबकि नीति निर्देषक तत्व के अन्तर्गत अनुच्छेद 50 के अधीन न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखा गया है। बावजूद इसके एक-दूसरे पर हस्तक्षेप का इतिहास भी इन सात दषकों में देखा जा सकता है। स्वतंत्र न्यायपालिका संविधान की एक ऐसी षक्ति है जिस पर देष का प्रत्येक नागरिक गर्व महसूस कर सकता है और ऐसा सोचता है कि निश्पक्ष न्यायपालिका के चलते उसके अधिकारों का न तो हनन सम्भव है और न ही सरकार व प्रषासन द्वारा उसे मसला और कुचला जा सकता है। संदर्भित पक्ष यह भी है कि तीन स्तम्भों की व्यवस्था में सभी की अपनी भूमिका है और सभी के अपने दायरे हैं। यदि इसे हमेषा अनुपालन में रखा जाय तो सुषासन से जुड़े काज को न केवल बढ़त मिलेगी बल्कि प्रधानमंत्री की चिंता को भी कम किया जा सकता है। 
सुषासन की कई स्पश्ट व्याख्यायें हैं जो संविधान के मार्ग से गुजरती हैं। यह एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है जो सरकार को कहीं अधिक खुला, पारदर्षी और उत्तरदायी बनाता है जबकि सरकार को संविधान से षक्तियां प्राप्त हैं और सीमायें भी। राजनीतिक उत्तरदायित्व, नौकरषाही की जवाबदेहिता, सूचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा मानव अधिकारों का संरक्षण समेत कई कृत्य संविधान की परिपाटी में देखे जा सकते हैं और उक्त का सीधा सम्बन्ध सुषासन के साक्ष्य के तौर पर भी देखा जा सकता है। जब हम संवेदनषील षासन की बात करते हैं तो मुख हमेषा संविधान की ओर होता है। प्रषासन जनमित्र व संवेदनषील बन सके तथा नागरिक व सरकार के बीच अन्र्तसम्बंध व अन्र्तक्रिया मजबूत हो सके ये सभी सुषासन से ही तय होंगे और यह तब सम्भव होगा जब सीमाओं से परे कृत्य नहीं होंगे। मोदी का यह कहना कि अपनी-अपनी कमजोरियां हम जानते हैं, अपनी-अपनी षक्तियों को भी पहचानते हैं। निहित परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो कथन का लब्बोलुआब संविधान और सुषासन को साथ लेकर चलना है और आपस में हस्तक्षेप से उथल-पुथल को अख्तियार करने से गुरेज रखना है। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की अपनी-अपनी व्याख्यायें और अपनी-अपनी षक्तियां हैं जो देष को समुचित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही ताकतें जब आपसी हस्तक्षेप से उलझती हैं तो सुषासन की राह को भी खतरा पहुंचता है और जब यही सीमाओं में रह कर अपनी कारगुजारियां करती हैं तो न केवल नागरिकों के अधिकार सबल होते हैं बल्कि देष में विकास की नई धारा भी विकसित होती है। गौरतलब है संविधान एक गतिषील अवधारणा है जाहिर है सात दषकों से नागरिकों के अधिकारों को बनाये रखने में इसकी विधिवत भूमिका रही है। 
प्रधानमंत्री मोदी ने बड़ी सधी हुई एक बात यह भी कही है कि 68 वर्शों में संविधान में एक अभिभावक की तरह हमें सही रास्ते पर चलना सिखाया है और इसी ने देष को लोकतंत्र के रास्ते पर बनाये रखा। उक्त संदर्भ लाख टके का है। जब धारा और विचारधारा का संयोजन करके देष को ऊंचाई देने की बात आती है तो सुषासन की परिपाटी स्वयं में उजागर हो जाती है। किसी देष का संविधान उसकी राजनीतिक व्यवस्था का बुनियादी ढांचा निर्धारित करता है। यही संविधान कुछ बुनियादी नियमों का एक ऐसा समूह है जिससे समाज के सदस्यों के बीच एक न्यूनतम समन्वय और विष्वास बनाये रखता है। जब षासन का आधार सुषासन होता है तो यह बात भी मापतौल में आ जाती है कि देष का  संविधान कैसा है। प्रधानमंत्री मोदी का संविधान की तुलना एक अभिभावक से करना बिल्कुल दुरूस्त है। इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि दषकों से संविधान ने सभी के जीवन को संजीवनी दी है। विधायिका ने विधियों का निर्माण किया है, कार्यपालिका ने जनहित को सुनिष्चित करने के लिए विधियों को अमलीजामा पहनाया है और अधिकारों के हनन में न्यायपालिका हमेषा नागरिकों के साथ खड़ी रही है। षायद इसी का परिणाम है कि कागज की किष्ती को समुन्दर में आज भी डूबने से हम बचा ले गये हैं। संसदीय प्रणाली की एक विधा यह भी है कि हुकूमत जनता की होगी, ताकत संविधान से मिलेगी और इससे मुंह फेरने वालों को सजा जनता ही देगी। 
संदर्भित यह भी है कि 26 नवम्बर की तिथि देष के इतिहास में बड़े उच्च दर्जे की है। संविधान और विधि दिवस का परिप्रेक्ष्य है तो थोड़ी चर्चा संवैधानिक इतिहास से भी होना लाज़मी रहेगा है। गौरतलब है कि 1946 में संविधान सभा की स्थापना हुई थी जिसमें 389 सदस्य थे। सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को डाॅ0 संच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में हुई। ठीक दो दिन बाद 11 दिसम्बर को डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद इसके स्थायी अध्यक्ष भी हुये। देष के वृहद् संविधान को बेहतर बनाने की फिराक में कई अड़चनों से भी जूझना पड़ा। संविधान देष चलाने का एक पावर हाऊस है और प्रधानमंत्री मोदी की नजरों में अभिभावक भी। ऐसे में सम्पूर्णता का पूरा ख्याल रखा जाना स्वाभाविक था। 8 मुख्य समितियां तथा 15 अन्य समितियां इस बात का संकेत है कि ताकतवर नियम संहिता बनाने में संविधानविदों ने कोई कोताही नहीं बरती है। डाॅ0 अम्बेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति का गठन और संविधान को अन्तिम रूप मिला। देखा जाय तो 2 साल, 11 महीने और 18 दिन मे मौजूदा संविधान बनकर देष के सुषासन की परिपाटी को पगडण्डी पर दौड़ाने को तैयार हुआ। जिस क्लेवर और फ्लेवर के साथ संविधान ने अपने मूर्त रूप को लिया है उसमें अब तक सौ से अधिक संषोधन हो चुके हैं। बावजूद इसके जनता के अधिकारों और लोक कल्याण के निहित भावों को आज भी कोई ठेस नहीं पहुंची है। संविधान समाज की आकांक्षाओं का पिटारा होता है। यह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करता है। जिससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके साथ ही सरकार व सत्ता जनमानस के लिए सुविधा प्रदायक की भूमिका में हमेषा रहे यही सुषासन की परिपाटी है। एक सरकार संविधान का सहारा लेकर उसमें निहित ताकत का प्रयोग करके स्वयं में सुषासन का समावेषन सुनिष्चित कर लेती है ऐसे में वह लोकप्रिय सत्ता का न केवल भागीदार होती है बल्कि सीमाओं और मर्यादाओं के साथ स्वयं को गतिषील बनाती है। खास यह भी है कि हमारा संविधान षीर्शस्थ मापदण्डों में अभी भी सवालों से परे है। जब भी अड़चनें आई हैं षीर्श अदालत ने संवैधानिक सम्प्रभुता को पुर्नस्थापित कर लिया है और व्यवस्थापिका से लेकर कार्यपालिका तक को समय-समय पर यह बताती रही है कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है। संविधान और सुषासन परस्पर एक ऐसी अन्र्तक्रिया हैं जिसके केन्द्र में मात्र और मात्र देष की जनता है। 

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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मूडीज़ ने बढाई मोदी की साख

मूडीज़ को विष्वास है कि आर्थिक सुधारों के देष में कारोबारी माहौल सुधरेगा, उत्पादकता बढ़ेगी, विदेषी और घरेलू निवेष में तेजी आयेगी अन्ततः मजबूत एवं सतत् विकास होगा। प्रधानमंत्री मोदी का यह वक्तव्य अमेरिका की वैष्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज़ की उस रिपोर्ट के बाद आया जिसमें उसने 13 साल में पहली बार भारत की रेटिंग को एक पायदान सुधारा है। जीएसटी और नोटबंदी को अर्थव्यवस्था के लिए समुचित बताने वाली मूडीज़ ने साल भर से आलोचना झेल रही मोदी सरकार की फिलहाल साख तो बढ़ा दी है। मोदी सरकार के लिए अक्टूबर और नवम्बर के महीने भी बड़े अच्छे रहे। बीते अक्टूबर के मध्य में अन्तर्राश्ट्रीय मुद्रा कोश की अध्यक्ष क्रिस्टीन लिगार्ड ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहद मजबूत राह पर बता कर जहां सरकार की स्थिति को आर्थिक तौर पर संभालने का काम किया वहीं इसी माह के अंत में विष्व बैंक की ईज़ आॅफ डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट ने कारोबारी सुगमता को लेकर भारत के 130वें स्थान से 100वें स्थान की छलांग की बात मौजूदा सरकार के लिए तो एक स्वास्थवर्धक अर्थव्यवस्था का मानो खिताब ही दे दिया हो। आर्थिक मोर्चे पर केन्द्र सरकार के लिए लगातार आ रही अच्छी खबरे जाहिर है आलोचनाओं के बीच संतोश का काम कर रही होंगी। मूडीज़ के द्वारा निर्धारित रेटिंग में इस बात का पता चलना कि आर्थिक और संस्थागत सुधारों से भारत में विकास की सम्भावनायें बढ़ी हैं जाहिर है बीएए-3 से बीएए-2 होना भारत को हर लिहाज़ से बेहतर कहा जायेगा। मूडीज़ ने बीते 17 नवम्बर को जारी रिपोर्ट में जीएसटी, मोनेटरी पाॅलिसी फ्रेमवर्क में सुधार सहित कई प्रयासों को सराहा है। नोटबंदी, बायोमैट्रिक व्यवस्था हेतु आधार का विस्तार एवं डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के चलते सब्सिडी की रकम सही व्यक्ति तक पहुंचाने जैसे उपायों को उचित करार देते हुए सही माना है। 
देखा जाय तो सुषासन की राह को समतल बनाने की फिराक में मोदी सरकार ने कई जोखिम लिए हैं जिसमें नोटबंदी और जीएसटी तो आर्थिक इतिहास के पन्नों में पहली बार है। सुषासन एक लोकप्रवर्धित अवधारणा है और यह तभी सम्भव है जब प्रत्यक्ष लाभ और न्याय जनता को मिले। कई बुनियादी तत्वों समेत विभिन्न आर्थिक आयामों से युक्त व्यवस्थाओं को समुचित रूप देते हुए सरकार ने अपने हिस्से का सुषासनिक कृत्य न निभाया होता तो षायद अन्तर्राश्ट्रीय एजेंसियां सिलसिलेवार तरीके से सरकार की साख को इतना तवज्जो न देती। सम्भव है कि मौजूदा सरकार ने उन पहलुओं को छुआ है जिससे सुधारों की सराहना इन दिनों मिल रही है। मूडीज़ रिपोर्ट से निर्धारित रैंकिंग से दुनिया में भारत की आर्थिक छवि सुधर गई है। कर्ज मिलने में आसानी से लेकर कर्ज पर ब्याज भी कम होना विकास की कई सम्भावनाओं को बढ़ा देता है। हालांकि देष में करोड़ों की तादाद में युवा बेरोज़गार हैं तमाम कोषिषों के बावजूद सरकार इस मामले में बेहतर उपाय नहीं ला पा रही है। प्रति वर्श दो करोड़ रोज़गार देने के वायदे के बावजूद बेरोज़गारी का आलम बढ़ा हुआ है। स्टार्टअप इण्डिया एण्ड स्टैण्डअप इंडिया समेत स्किल इण्डिया आदि से सम्भावनायें प्रखर होते नहीं दिखाई दे रहीं। सम्भव है कि रोज़ागर के भी अवसर आने वाले दिनों में बढ़ेंगे पर अभी तो इस मामले में निराषा ही है। गौरतलब है कि साल 2004 में मूडीज़ ने भारत की क्रेडिट रैंकिंग बीएए-3 निर्धारित की थी और एक दषक बाद 2015 में क्रेडिट रैंकिंग आउटलुक अर्थात् भविश्य परिदृष्य को स्थिर से सकारात्मक कर दिया था। एक वाजिब तर्क यहां यह भी समझना सही होगा कि उदारीकरण के बाद से भारत की अर्थव्यवस्था सरपट दौड़ी थी। जब संर्कीण आर्थिक दीवार 24 जुलाई 1991 को ढहाई गयी और उदारीकरण से देष को सराबोर किया गया तब दुनिया से भारत का नये अर्थ के साथ साक्षात्कार हुआ था। तभी से दुनिया भर के देषों समेत आर्थिक एजेंसियों की नज़र भारत से हटी नहीं।
मूडीज़ ने मौजूदा वित्तीय वर्श 2017-18 के लिए भारत की जीडीपी की विकास दर का अनुमान 7.1 जो 2016-17 से घटाकर 6.7 कर दिया था अब एजेंसी ने 2018-19 में 7.5 की दर से आगे बढ़ने की सम्भावना जता रही है। गौरतलब है कि जब 8 नवम्बर, 2016 को देष में नोटबंदी हुई थी उसके बाद मूडीज़ की रिपोर्ट ने भारत की विकास दर गिरने की सम्भावना जून, 2017 तक के लिए व्यक्त की गयी थी और ऐसा हुआ भी था। निरूपित मापदण्डों में देखें तो जिन सम्भावनाओं को लेकर मूडीज़ ने भारत के विकास दर के बढ़ने की बात कही है उसकी धरातल फिलहाल भारत में मज़बूत हो रही है। देष की टैक्स व्यवस्था बेहतर हुई है जुलाई से सितम्बर तक के तिमाही में जीएसटी के चलते संचित निधि में कर संग्रह बढ़ा है। नोटबंदी के चलते काला धन और समानांतर अर्थव्यवस्था को काफी पैमाने पर झटका लगा है। हालांकि काले धन के मामले में अभी कुछ कह पाना सम्भव नहीं है पर संदिग्ध खातों की जांच जारी है, नतीजे बाद में ही मिलेंगे। अभी की स्थिति तो यह है कि हजार और पांच सौ के जो 86 फीसदी धनराषि संचालन में थी उसमें से 99 फीसदी की बैंकों में वापसी हो चुकी है। देष में भ्रश्टाचार मुखर दिखाई नहीं दे रहा है। इसके चलते भी अर्थव्यवस्था को सुधरे हुए राह पर करार दिया जा रहा है। कई मायनों में सरकार ने बिचैलियों को रास्ते से हटा दिया। इससे न केवल ग्राहकों को सीधा लाभ पहुंचा बल्कि सरकार को 57 हजार करोड़ का मुनाफा भी हुआ। आधार लिंक के चलते इस तरह की सम्भावनायें और मजबूत हुई हैं। सकारात्मक प्रयासों का नतीजा यदि मूडीज़ की रेटिंग है तो यह सवाल खड़ा होता है कि यह सकारात्मकता आंकड़ों से बाहर निकलकर वास्तविकता में आम जन तक कम दिखेगी। प्रष्न यह उठता है कि हमारी अर्थव्यवस्था सही राह पर है, कारोबार के लिए सुगम है और अब तो आर्थिक सुधार भी सराहना के फलक पर है तो फिर गरीबी, बीमारी, बेरोज़गारी समेत दर्जनों महामारी से देष को क्यों छुटकारा नहीं मिल रहा है। अन्तर्राश्ट्रीय एजेंसियों के आधार पर किये गये आंकलन पर अविष्वास नहीं है पर विष्वास पूरी तरह तब होगा जब सब को बुनियादी जीवन का अधिकार देने में सरकार सफल होगी। 
मूडीज़ द्वारा निर्धारित रेटिंग से कई आर्थिक मायने निकाले जा सकते हैं जिसमें सस्ता और आसान कर्ज तो षामिल ही है साथ ही विदेषी कम्पनियां भी भारत की ओर बड़े पैमाने पर रूख कर सकती हैं। मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना मेक इन इण्डिया में तेजी आ सकती है। आर्थिक विकास तेज होगा क्योंकि लोगों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा तुलनात्मक बढ़ेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि महंगाई घटेगी पर मौजूदा समय में लोग इससे परेषान हैं। रूपया मज़बूत होगा अंदाजा लगाना गैरवाजिब नहीं है परन्तु अभी तो हमारी हालत इस मामले में काफी पतली है। देष में आर्थिक माहौल बेहतर होने के कयास लगाये जा रहे हैं। जाहिर है जब निवेष बढ़ेगा तो रूपया भी मजबूत होगा। इसके अलावा बाॅण्ड और इक्विटी मार्केट भी मजबूती की राह पकड़ेगा। ऐसे में सरकार का राजस्व बढ़ सकता है। राजस्व बढ़ने के चलते नीतियों को गति मिलेगी, बजटीय घाटा कम होगा और लोक कल्याण को लेकर सरकार अपनी स्पीड बढ़ा सकेगी। देखा जाय तो मूडीज़ ने मोदी के आर्थिक मूड को बड़ी तल्लीनता से समझा है पर लोग इसको तभी तवज्जो देंगे जब मुनाफा उनके हिस्से में आयेगा। वैसे कई माध्यमों में सुगमता बढ़ी है, बुनियादी जरूरतों की मारामारी कम हुई है मसलन रसोई गैस। बावजूद इसके आर्थिक परिभाशा और विषेशता के अन्तर्गत कारगर सुधार की आवष्यकता अभी भी बरकरार है। जिस देष में हर चैथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे हो और इतने ही अषिक्षित हों वहां आर्थिक नीतियां व्यापक सुधार और बड़े रफ्तार की मांग करती हैं। सम्भव है कि सरकार बढ़ी हुई साख के साथ लोगों के जीवन मूल्य को भी बढ़ाने की कवायद में खरी उतरेगी।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
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