Monday, September 25, 2017

आईने पर दोष मढ़ता स्याह पाकिस्तान

जब भारत समेत दुनिया के तमाम देष संयुक्त राश्ट्र के मंच पर अपनी खूबियां गिना रहे थे तो उसी मंच से पाकिस्तान दुनिया को फर्जिस्तान होने का सबूत भी दे रहा था। कह सकते हैं कि आतंकवाद समेत पाकिस्तान से जुड़े कई मुद्दों पर भारतीय विदेष मंत्री सुशमा स्वराज के जोरदार जवाब से तिलमिला कर पाकिस्तान ने यहां भी ओछी हरकत कर दी। सुशमा स्वराज ने जिस भांति भारत का पक्ष रखा उसका विरोधी भी समर्थन कर रहे हैं। जिस तेवर के साथ भारतीय विदेष मंत्री ने संयुक्त राश्ट्र में भारत की उपलब्धियों को पाकिस्तान की तुलना में परोसा उसे देखते हुए पाकिस्तान को कुछ तो करना ही था पर राइट टू रिप्लाई के अंतर्गत जवाब देते हुए पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने कष्मीर के मसले पर भारत की खामियां बताने की फिराक में दुनिया को गुमराह कर दिया। इतना ही नहीं उस पाकिस्तान को जो दुनिया को अपने फरेब से भ्रमित करता रहा है संयुक्त राश्ट्र के मंच पर भी फरेबी सिद्ध हुआ। दरअसल मलीहा लोधी ने भारत पर कष्मीर में मानवाधिकारों के हनन का आरोप लगाते हुए एक लड़की की तस्वीर दिखाई जिसके पूरे चेहरे पर जख्म के निषान देखे जा सकते हैं। इस दावे के साथ कि यही भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है परन्तु उनकी यह करतूत पाकिस्तान के दामन को ही अन्तर्राश्ट्रीय स्तर पर दागदार बना दिया। इन दिनों यह तस्वीर समाचार पत्रों एवं टेलीविजन में सुर्खियां लिए हुए हैं। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान की स्थाई प्रतिनिधि जो तस्वीर दिखा रही थी वह कष्मीर से हजारों किलोमीटर दूर गाजा पट्टी के एक अस्पताल में इलाज कराते समय ली गयी एक फिलिस्तीनी राव्या अबू जोमा की थी जो 2014 में इज़राइल के हमले से घायल हुई थी। इस तस्वीर को कैमरे में कैद करने वाले फोटो पत्रकार हेइदी लेवाइन थे जिन्हें गाजा पट्टी में खींची गई तस्वीरों के लिए इंटरनेषनल वूमन मीडिया फेडरेषन ने पुरस्कृत भी किया था। 
फिलहाल पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अब्बासी संयुक्त राश्ट्र में दिये 20 मिनट के भाशण में 17 बार कष्मीर और 14 बार भारत का नाम लेते हुए भारत के प्रति जहर उगलने के सिलसिले को बरकरार रखा। गौरतलब है कि पिछले वर्श जब नवाज़ षरीफ यहां प्रधानमंत्री की हैसियत से आये थे तब भी उन्होंने भारत के खिलाफ जहर उगला और कष्मीर को लेकर न केवल अपने विकृत मानसिकता का परिचय दिया बल्कि भारत के चेहरे को भी विकृत बनाने की कोषिष की थी। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान का फरेब प्रति वर्श की दर से लगातार बढ़त बनाये हुए है और भारत के पास इस बात के प्र्याप्त आधार रहे हैं कि पाकिस्तान ने भारत को आतंकियों के माध्यम से आये दिन चोट पहुंचाई है। बावजूद इसके पाकिस्तान पर लगाम लगाना पूरी तरह सम्भव नहीं हुआ है। अमेरिका की ओर से दी जाने वाली आर्थिक सहायता को न रोक पाना भी पाकिस्तान के मनोबल को षिकस्त न मिल पाना रहा है। कई मौकों पर पाकिस्तान को अमेरिकी राश्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खरी-खोटी सुनाई। आतंक के मामले में तो ट्रंप ने पाकिस्तान को वह सब कहा जो पहले कभी नहीं कहा गया परन्तु पाकिस्तान अपने आप में कोई सुधार नहीं कर रहा है। दो टूक यह भी है कि अमेरिका जैसे धमकी देने वाले देष इसलिए भी कोरे सिद्ध हो रहे हैं क्योंकि जमीन पर वे भी कुछ करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। फलस्वरूप आतंक के मामले में अमेरिका की धौंस पाकिस्तान केवल लफ्बाजी मान रहा है और सबूतों के बावजूद सुरक्षा परिशद् में चीन के वीटो के चलते उसका भारत भी कुछ खास बिगाड़ नहीं पा रहा है। स्पश्ट है कि फरेब के मार्ग पर चलने वाला पाकिस्तान अभी भी दुनिया को अपने जाल में कुछ हद तक फंसाये हुए है जिसमें चीन जैसे देष पाकिस्तान का साथ देकर भारत को हाषिये पर धकेलने की कोषिष में लगे हुए हैं। अजहर मसूद और लखवी के मामले में चीन की करतूत से सभी वाकिफ हैं। 
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अब्बासी इस्लामाबाद से कष्मीर को किस चष्मे से देखता है और भारत के लोकतांत्रिक चेहरे को किस आईने में झांकता है बता पाना बड़ा मुष्किल है। संयुक्त राश्ट्र के भीतर जब उन्होंने यह कहा कि भारत ने कष्मीरियों के संघर्श को कुचलने के लिए 7 लाख सैनिकों को यहां तैनात किया है तो उनकी कोरी बकवास एक बार फिर उजागर हो गयी। इतना ही नहीं यह भी आरोप मढ़ दिया कि भारत सुरक्षा परिशद् के प्रस्ताव को लागू करने से इंकार कर रहा है जबकि पाकिस्तान अपने गिरेबान में झांके तो उसको यह पता चल सकता है कि संयुक्त राश्ट्र ने स्वयं कहा है कि कष्मीर भारत का अभिन्न अंग है और संयुक्त राश्ट्र ने उस प्रस्ताव में पहले पाकिस्तान को अपनी सेना हटाने की बात कही है। अब्बासी का यह कहना कि कष्मीर मुद्दे को न्यायसंगत, षान्तिपूर्ण और तेजी से निपटाना चाहिए परन्तु भारत पाकिस्तान से षान्ति वार्ता के लिए तैयार नहीं है। दुनिया जानती है कि मात्र तीन वर्शों के इतिहास में ही प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तर्ज पर पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और जिस तरह एक सच्चे और अच्छे पड़ोसी होने का कत्र्तव्य निभाया इस उदारता को पाकिस्तान बेजा इस्तेमाल किया। सभी जानते हैं कि मोदी ने 25 दिसम्बर 2015 को लाहौर जाने का जो जोखिम लिया था वो षायद ही कोई षीर्शस्थ सत्ताधारियों ने कभी किया हो। अन्तर्राश्ट्रीय मंचों पर जिस प्रकार भारत ने पाकिस्तान को तवज्जो दिया और आतंक के मुद्दे पर जिस प्रकार पाकिस्तान ने भारत से वायदे किये उसको कभी उसने निभाया ही नहीं। कभी पठानकोट तो कभी उरी में हमले करके साथ ही सीमा पर आये दिन आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देकर भारत की भावनाओं से वह खेलता रहा और अपने फरेबी नीयत के साथ दुनिया को भी इस धोखे में रखने की कोषिष करता रहा कि आतंक का मारा तो वह स्वयं है। पाकिस्तान यह भूल गया कि जहर का पेड़ लगाओगे तो फल भी जहर का ही होगा। जैष-ए-मोहम्मद, जमात-उद-दावा से लेकर हक्कानी नेटवर्क तक की लहलहाती खेती पाकिस्तान की जमीन में अंदर तक है। विदेष मंत्री सुशमा स्वराज ने भारत के आईआईटी और आईआईएम की तुलना इन्हीं आंतकी संगठनों से किया। सुशमा स्वराज ने जिस तर्ज पर तुलना किया उसमें दर्जनों बातें हैं और जिसके एक-एक अक्षर सही है। 
भारत और पाकिस्तान के संयुक्त राश्ट्र के मंच पर दिये गिये भाशण की बारीक पड़ताल की जाय तो दोनों की नीयत का भी खुलासा होता है। सुशमा स्वराज ने भाशण का आरंभ विष्व में पनपे वर्तमान संकटों से किया। समाधान कैसे होगा तथा विष्व कल्याण के सम्बंध में भारत क्या सोचता है? आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, समेत पलायन व साइबर खतरे जैसे तमाम संकट की चर्चा की। दुनिया के नेताओं को यह जताने की कोषिष की कि षिमला समझौते से लेकर लाहौर घोशणापत्र तक पाकिस्तान की रजामंदी रही है। बावजूद इसके इसे उसने कभी अमल में नहीं लाया। गौरतलब है कि 9 दिसम्बर 2015 में षीत सत्र के दौरान सुशमा स्वराज इस्लामाबाद गई थीं जबकि इसके ठीक पहले नवम्बर में पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान करीब एक वर्श से अधिक वक्त के बाद षरीफ और मोदी की दो मिनट की बात हुई थी। जाहिर है आतंक के मामले पर पाकिस्तान की करतूतों के चलते मुख्यतः पठानकोट हमले के बाद दोनों देषों के बीच बातचीत बिल्कुल बंद हो गयी थी। 70 साल बीते चुके हैं रस्सी जल गयी पर पाकिस्तान की ऐंठन नहीं जा रही। द्विपक्षीय मामला हो या दुनिया के सामने पाकिस्तान का मुंह खोलना रहा हो। कष्मीर के बगैर उसके पेट का पानी नहीं पचता है। बार-बार स्याह चेहरे वाला पाकिस्तान आईने को ही दोशी ठहरा रहा है जबकि सच तो यह है कि उसकी सूरत में ही फरेब भरा हुआ है।



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन  आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502
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महिला आरक्षण का समाजशास्त्र

कई वर्शों से धूल खाती महिला आरक्षण की फाइल एक बार फिर फलक पर आ सकती है। असल में बीते दिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने में मदद को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखी है जिसके चलते एक बार फिर यह चर्चा आम है कि संसद में महिलाओं को दिये जाने वाले 33 फीसदी आरक्षण विधेयक अब अधिनियमित हो सकते हैं। गौरतलब है कि वर्श 2010 में राज्यसभा द्वारा पारित यह विधेयक लोकसभा में लटका हुआ है। चर्चा तो इस बात की भी है कि सोनिया गांधी का मोदी के नाम लिखा खत वाकई महिलाओं के प्रति चिंता है या फिर कोई राजनीतिक दांव। गौरतलब है कि मोदी कैबिनेट में विदेष व रक्षा मंत्री के तौर पर महिलाओं की तैनाती है। यह अपने आप में एक तार्किक पक्ष है कि विदेष और रक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनषील विभाग महिलाओं के सुपुर्द करके मोदी ने बड़ा और कड़ा संदेष दिया है साथ ही कैबिनेट के अन्य हिस्सों में महिलाओं की हिस्सेदारी देकर इस बात की गुंजाइष भी बनाये रखा कि उनका अभियान बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि सरकार चलाने में भी बातौर यह षामिल है। यदि कोई चुभने वाली बात है तो वह यह कि बिना आरक्षण के महिलाओं की संख्या सदन में निहायत अल्प रहती है और सुखद यह है कि मौजूदा 16वीं लोकसभा में 61 महिलाएं जो अब तक में सर्वाधिक हैं। इसके पहले 15वीं में 58 महिलाएं जबकि 14वीं लोकसभा में 45 महिलाएं थी। हालांकि 1999 में 13वीं लोकसभा के दौरान इनकी संख्या 49 थी जबकि सबसे कम 1957 में दूसरी लोकसभा में मात्र 22 महिलाएं चुनी गयी थी। स्पश्ट है कि 545 लोकसभा की तुलना में ये संख्या बहुत न्यून है। ऐसे में 33 फीसदी आरक्षण असंतुलन को समाप्त करने में काफी हद तक कारगर होगा।
सुगबुगाहट तो यह भी है कि सरकार षीतकालीन सत्र में महिला आरक्षण बिल लाने की तैयारी में है पर सोनिया गांधी की चिट्ठी सरकार को इस चिंता में डाल सकती है कि कहीं महिला आरक्षण पारित कराने की उनकी प्रतिबद्धता का श्रेय कांग्रेस को न मिल जाय। वैसे समाजवादी और आरजेडी जैसी पार्टियां इस बिल का विरोध करती रहीं हैं। गौरतलब है कि 9 मार्च 2010 को कांग्रेस की संयुक्त अर्थात् यूपीए सरकार ने राज्यसभा में इस विधेयक को पारित किया था परन्तु लोकसभा में इसे मंजूरी अभी तक नहीं मिली है। इसके पीछे राजनीतिक दलों में आम राय का न बन पाना रहा है। इतना ही नहीं 33 फीसदी महिला आरक्षण में भी वर्ग के आधार पर आरक्षण की मांग भी इसकी एक और पेंचीदगी थी। वैसे देखा जाय तो उज्जवला योजना के अन्तर्गत रसोई गैस के वितरण से गरीब महिलाओं के एक बड़े हिस्से को सरकार ने लाभ दिया है। तीन तलाक के मसले पर प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी राय स्पश्ट करके मुस्लिम महिलाओं का भी दिल जीता है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ से लेकर कई ऐसी योजनाओं को धरातल पर उतारकर उन्होंने आधी दुनिया के प्रति सकारात्मक रूख दिखाया है। ऐसे में संसद में 33 फीसदी का महिलाओं को दिया जाने वाला आरक्षण यदि इनकी षासनकाल की देन होती है तो बेषक मुनाफा इन्हीं के हिस्से में जायेगा और देष की राजनीतिक संरचना तथा प्रषासनिक क्रियाकलाप में बड़ा बदलाव भी देखने को मिलेगा। 
गौरतलब है कि जब इन्दिरा गांधी 1975 के दौर में प्रधानमंत्री थी तब टुवर्ड्स इक्वैलिटी नाम की एक रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति का विवरण था और आरक्षण की बात भी की गयी थी। इसका एक रोचक पहलू यह भी है कि रिपोर्ट तैयार करने वाली कमेटी के अधिकतर सदस्य आरक्षण के खिलाफ थे और महिलाएं चाहती थी कि वे आरक्षण से नहीं अपने बलबूते स्थान बनायें पर आज की स्थिति में नतीजे इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। रिपोर्ट के एक दषक बाद राजीव गांधी के षासनकाल में 64वें और 65वें संविधान संषोधन विधेयक द्वारा पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की कोषिष की गयी। हालांकि यह कोषिष 1992 में 73वें, 74वें संविधान संषोधन के तहत मूर्त रूप लिया। अन्तर इतना था कि सरकार तो कांग्रेस ही थी पर प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे। हालांकि अब स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण है। ढ़ाई दषक से स्थानीय निकायों में आरक्षण के बावजूद देष की सबसे बड़ी पंचायत में महिलाओं को आरक्षण न मिल पाना थोड़ा चिंता का विशय है। वो भी तब जब पंचायतों में इनके द्वारा निभाई गयी भूमिका को सराहना मिल रही हो। वैसे कई आरक्षण को 33 फीसदी के बजाय 50 फीसदी के पक्ष में भी है। बसपा की मायावती दलित और ओबीसी महिलाओं को अलग आरक्षण की बात भी करती रही है। वर्तमान उपराश्ट्रपति और तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री वैंकेया नायडू का एक बयान था कि सरकार पार्टियों के बीच सहमति बनाने की कोषिष कर रही है। यह तर्क दमदार है कि जब महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलेगा तब 50 फीसदी के सुर उठने लाज़मी होंगे। 
गौरतलब है कि दुनिया के कई देषों में महिला आरक्षण की व्यवस्था संविधान में दी गयी है। यदि संविधान में उपलब्ध नहीं था तो विधेयक द्वारा इसे प्रावधान में लाया गया। कई राजनीतिक दल तो अपने स्तर पर भी इसे लागू करते हैं मगर भारत में इसमें से कोई भी बात लागू नहीं होती केवल स्थानीय निकायों में आरक्षण को छोड़कर। पड़ताल बताती है कि अर्जेंटीना में 30 फीसदी, अफगानिस्तान में 27 जबकि पाकिस्तान में 30 प्रतिषत महिलाओं को देष की सबसे बड़ी पंचायत में जाने को लेकर आरक्षण मिला हुआ है। पड़ोसी बांग्लादेष में भी 10 प्रतिषत आरक्षण का कानून है। उक्त के अलावा राजनीतिक दलों में भी आरक्षण देने की परम्परा को बनाये रखने में डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड समेत कई यूरोपीय देष षामिल देखे जा सकते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देष है चीन के बाद जनसंख्या के मामले में दूसरे नम्बर पर है। भले ही महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था न हो पर दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में 45 राश्ट्रपति बनने के बावजूद एक भी महिला षामिल नहीं है जबकि भारत में राश्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष समेत कई ऐसे संवैधानिक षीर्शस्थ पद मिल जायेंगे जहां महिलाएं विराजमान रही हैं। 
इस समय लोकसभा में राजग को बहुमत है और कांग्रेस यदि इसमें सहयोग कर देती है तो इसे पारित होने से कोई नहीं रोक सकता। जो महिला आरक्षण विधेयक का मुद्दा दो दषकों से ज्यादा समय से अटका पड़ा है उसे मूर्त रूप देने का यह एक सही वक्त भी है। हो सकता है कई राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षा किसी भी सूरत में पूरी न हो पर गांधी का यह कथन कि हर सुधार का कुछ न कुछ विरोध अनिवार्य है परन्तु विरोध और आंदोलन एक सीमा तक, समाज में स्वास्थ्य के लक्षण होते हैं। कथन के आलोक में यह कहना लाज़मी है कि दो दषक पुरानी महिला आरक्षण की कोषिष अब नई करवट की ओर जानी चाहिए। वो भी तब जब दुनिया में हमारी तूती बोल रही हो। संसद में महिलाओं के आरक्षण से फायदे और नुकसान की परिपाटी पर भी दृश्टि डाली जाये तो सामाजिक और राजनीतिक उत्थान इसका बड़ा लाभ है और पुरूशों का वर्चस्व का मात्रात्मक घटना उसका नुकसान है। अब सवाल यह है कि कौन, किस बिन्दु पर खड़ा है। जाहिर है महिलाओं का आरक्षण तय स्थानों के अंदर है न कि अलग से स्थान बनाना है। ऐसे में पुरूश वर्ग नुकसान में जायेगा पर ध्यान रहे कि आधी दुनिया का समाजषास्त्र दषकों तक असंतुलित रहा है। 21वीं सदी के दूसरे दषक में बड़े बदलाव और विकास के प्रेणेताओं को फिलहाल इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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Wednesday, September 20, 2017

नहीं खुलेगा देश का दरवाज़ा

बेशक रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर हर भारतीय में सहानुभूति होगी पर अवैध ढंग से भारत में रह रहे इन रोहिंग्याओं को लेकर जो आषंका सरकार ने व्यक्त किया है उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि इस समय देष में करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान हैं और भारत सरकार के पास इस बात का पुख्ता सबूत है कि दलालों के जरिये इन्हें योजनाबद्ध तरीके से देष में कैसे प्रवेष कराया गया है। केन्द्र सरकार द्वारा रोहिंग्या षरणार्थियों के मसले पर देष की षीर्श अदालत में दायर हलफनामे में स्पश्ट किया है कि अवैध रूप से घुसे इन षरणार्थियों से देष की सुरक्षा को गम्भीर खतरा है। गौरतलब है कि रोहिंग्या षरणार्थियों को भारत से बाहर करने के सरकार के निर्णय को चुनौती दी गई है। अन्तर्राश्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का उल्लंघन करार देते हुए संयुक्त राश्ट्र षरणार्थी आयोग में पंजीकृत दो रोहिंग्या षरणार्थी ने इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील दायर किया है जिसे लेकर बीते 18 सितम्बर को केन्द्र सरकार ने अपना पक्ष रखा। इस मसले पर भारतीय नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का जिक्र करते हुए सरकार ने कहा कि अवैध रोहिंग्या षरणार्थियों को नागरिकों के तरह के अधिकार यूं ही नहीं दिये जा सकते। स्पश्ट है कि सरकार इस रूख पर कायम है कि कोई भी सीमा का उल्लंघन करके किसी भी देष का नागरिक किसी भी वजह से यदि भारत में आता है तो उसके लिए अतिथि देवो भवः की अवधारणा प्रत्येक परिस्थितियों में सम्भव नहीं होगी और ऐसे में तो बिल्कुल नहीं जब इनकी वजह से देष कई षंकाओं से भरा हो। सरकार ने षीर्श अदालत में जो दलील दी है उसमें कुछ जगहों पर आबादी के अनुपात का बिगड़ना साथ ही नाॅर्थ ईस्ट काॅरिडोर की स्थिति को और बिगड़ने की आषंका व्यक्त करना षामिल है। इतना ही नहीं देष में रहने वाले बौद्ध नागरिकों के खिलाफ रोहिंग्या हिंसक कदम उठा सकते हैं साथ ही हलफनामे में यह भी कहा गया है कि इन षरणार्थियों में से कई के हवाला कारोबार, मानव तस्करी जैसे अवैध और देष विरोधी गतिविधियों में षामिल होने जैसी स्थिति भी है। इसी क्रम में यह भी है कि जम्मू, दिल्ली, हैदराबाद और मेवात में सक्रिय कुछ रोहिंग्या षरणार्थियों के पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संपर्क की भी जानकारी मिली है। गौरतलब है कि हाल ही में कुछ रोहिंग्या इसमें लिप्त पकड़े भी गये हैं। फिलहाल मामले का अदालती रूप होने के चलते गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इसे न्यायालय पर टाल दिया है जबकि न्यायालय इसकी अगली सुनवाई 3 अक्टूबर तय करते हुए कहा है कि वह कानून के अनुरूप काम करेगा।
उपरोक्त को विवेचित किया जाय और यह समझने की कोषिष हो कि यदि जो जानकारियां सुरक्षा एजेंसियों ने सरकार को उपलब्ध कराई है यदि उसी प्रकार की सच्चाई से रोहिंग्या षरणार्थी ओतप्रोत है तो सरकार की चिंता नाजायज कैसे है। दूसरे अर्थों में देखें तो यदि इन्हें भारत में रहने का अवसर दे भी दिया जाय तो देष में पहले से बढ़े जन दबाव के चलते क्या और जन असंतुलन व्याप्त नहीं होगा। ऐसे में इनकी वजह से न केवल संसाधनों का बोझ बढ़ेगा बल्कि कुछ जगहों पर आबादी बेषुमार बढ़ जायेगी। तथाकथित परिप्रेक्ष्य यह भी है कि इस समस्या को सिर्फ भारत की दृश्टि से न देखकर इस नज़रिये से भी देखने की जरूरत है कि आखिरकार म्यांमार में मौजूदा समय में ऐसे हालात क्यों बनी जिसकी वजह से ऐसी भीशण घटना हुई तथा रोहिंग्या को दर-बदर होना पड़ा। म्यांमार से उपजी इस समस्या को भारत आखिर क्यों झेले? वैसे भी भारत द्वारा किसी भी षरणार्थी को नागरिक का दर्जा देना साथ ही संविधान में निहित मूल अधिकार को उपलब्ध कराना इतनी आसान प्रक्रिया भी नहीं है। भारतीय संविधान के भाग 2 में अनुच्छेद 5 से 11 के बीच नागरिकता का वर्णन है जबकि भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 के बीच मूलभूत अधिकारों की चर्चा है। नागरिकता अधिनियम 1955 की पड़ताल बताती है कि नागरिक बनने के पांच प्रमुख आधारों में एक में भी रोहिंग्या खरे नहीं उतरते। ऐसे में भारत सरकार यदि इन्हें बाहर नहीं करने के फैसले को वापस ले भी लें तो दूसरा संकट यह होगा कि देष के अंदर ये किस अधिकार से रहेंगे। गौरतलब है कि बिना नागरिकता के मूलभूत अधिकार निहायत संकुचित रहते हैं। ऐसे में केन्द्र सरकार द्वारा न्यायालय में दिये हलफनामे और कई वैधानिक स्थिति को देखते हुए रोहिंग्या को भारत से बाहर करने का उसका फैसला समुचित प्रतीत होता है परन्तु इस पर आखिरी निर्णय तो न्यायालय का ही होगा।
फिलहाल हालिया परिप्रेक्ष्य यह है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर आंग सान सू की के ताजा बयान का भारत ने स्वागत किया। जिसमें सू ने कहा कि हाल के दिनों में राखिने प्रान्त में उत्पन्न स्थिति न केवल देष के लोगों के लिए बल्कि पड़ोसी देषों यहां तक कि हमारे लिए भी चिंता का विशय है। गौरतलब है कि चीन में इसी माह की षुरूआत में 3 से 5 सितम्बर तक ब्रिक्स सम्मेलन हुआ जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने षिरकत की थी तत्पष्चात् 5 से 7 सितम्बर के बीच उनकी यात्रा का पड़ाव म्यांमार भी था। उस दौरान भी दोनों देषों ने बड़ी षालीनता से इस मसले को निपटाने का रूख दिखाया। इस पहलू पर भी गौर कर लिया जाय कि इस समस्या के बुनियादी सवाल क्या थे। दरअसल साल 2012 में म्यांमार के रखाइन प्रान्त में एक हिंसा हुई जो मध्य म्यांमार और माण्डले तक फैल गयी। हिंसा के पीछे यौन उत्पीड़न और स्थानीय विवाद मुख्य रूप से देखे जा सकते हैं। छोटे तरीके से उठा ये विवाद साम्प्रदायिक संघर्श का कब रूप ले लिया इसका पता ही नहीं चला। इसी दौरान बौद्ध और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच हुई हिंसा में 200 रोहिंग्या मारे गये और हजारों का दर-बदर होना पड़ा। तभी से हिंसा और विवाद की लपटें लगातार उठ रही हैं। अगस्त 2013, जनवरी 2014 और जून 2014 में हुई साम्प्रदायिक हिंसा से रोहिंग्या स्त्री, पुरूश समेत बच्चों के मरने की तादाद बढ़ गयी। एक विचारणीय सवाल है कि आखिर रोहिंग्या समुदाय म्यांमार की सरकार के साथ सामंजस्य क्यों नहीं बिठा पाते साथ ही आंग सान सू की जो म्यांमार में दषकों तक लोकतंत्र की लड़ाई लड़ी वे इनके मामले में इतनी उदार क्यों नहीं हैं? हालांकि उन्होंने मंगलवार को एक बयान में कहा कि म्यांमार के कुछ रोहिंग्या षरणार्थियों को वापस लेने के लिए वे तैयार है। बता दें कि रोहिंग्या को लेकर इन दिनों म्यांमार पर अन्तर्राश्ट्रीय दबाव बढ़ा है। संयुक्त राश्ट्र महासचिव गुटरेस ने कहा है कि रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सैन्य अभियान बंद किया जाना चाहिए। फ्रांस ने भी इसी प्रकार का रूख दिखाया है साथ ही ब्रिटेन और अमेरिका भी इस मामले में अपने-अपने तरीके से प्रतिक्रिया कर रहे हैं। इस बीच भारत सरकार की ओर से ताजा बयान यह आया है कि किसी भी कीमत पर देष में रोहिंग्या मुसलमानों के लिए दरवाजा नहीं खुलेगा। पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैष-ए-मोहम्मद मसूद अजहर ने रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में म्यांमार के खिलाफ जिहाद छेड़ने की धमकी दी है। कहा जाय तो सभ्य दुनिया को तो छोड़िये आतंकी भी रोहिंग्या के मामले में चिंतित दिखाई दे रहे हैं। ये वही आतंकी हैं जो पठानकोट के हमले का जिम्मेदार है और जिसे भारत संयुक्त राश्ट्र की सुरक्षा परिशद् में अन्तर्राश्ट्रीय आतंकी का तगमा दिलाना चाहता है जिसमें चीन रोड़ा बना हुआ है। फिलहाल म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों के पलायन का मामला इन दिनों दुनिया भर में चर्चा का विशय बना हुआ है। सबके बावजूद रोहिंग्या को लेकर देष की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताने वाली केन्द्र सरकार का एक बार फिर यह कहना कि रोहिंग्याओं के लिए भारत का दरवाजा नहीं खुलेगा इससे उसकी बड़ी चिंता परिलक्षित होती है। 


सुशील कुमार सिंह
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हाईस्पीड में भारत-जापान सम्बन्ध

हाईस्पीड में भारत-जापान सम्बंध
हाल के वर्शों में भारत-जापान सम्बंधों में महत्वपूर्ण और गुणात्मक बदलाव आया है। मौजूदा समय में तो यह बुलेट ट्रेन सरीखी रफ्तार ले लिया है। जापानी प्रधानमंत्री षिंजो एबे द्वारा सृजित ष्लोगन ‘जय जापान, जय इण्डिया‘ इस बात को और पुख्ता करता है। गौरतलब है कि जापान के प्रधानमंत्री षिंजो एबे की सितम्बर यात्रा वैसे तो बुलेट ट्रेन के चलते कहीं अधिक सुर्खियों में रही है परन्तु गुजरात के गांधीनगर में प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक में जो कुछ हुआ उससे स्पश्ट है कि रणनीतिक व सुरक्षा सम्बंधी मापदण्डों पर भारत और जापान तुलनात्मक कहीं अधिक स्पीड से आगे बढ़ना चाहते हैं। दोनों देषों ने एक प्रकार से यह जता दिया कि दोनों रणनीतिक सहयोग के साथ दायरा बढ़ाने का मनसूबा फिलहाल रखते हैं। गौरतलब है कि भारत जापान की तरफ से जारी संयुक्त घोशणापत्र का सीधा तात्पर्य प्रषान्त महासागर से लेकर हिन्द महासागर तक किसी भी देष को मनमानी की छूट नहीं होगी। जाहिर है चीन और उत्तर कोरिया समेत कईयों के लिए यह एक बड़ा और कड़ा संदेष है। जिस तर्ज पर थल सेना से लेकर नौसैनिक क्षेत्र तक में दोनों देषों ने खाका खींचा है उससे भी स्पश्ट है कि अमेरिका के बाद अगर वैष्विक जगत में कोई रणनीतिक साझीदार भारत का है तो वह जापान ही है। जापानी प्रधानमंत्री की बीते 14 सितम्बर की यात्रा रेल परिवहन की दृश्टि से भारत में एक बड़ी दस्तक ही कही जायेगी। अहमदाबाद से मुम्बई के बीच की बुलेट ट्रेन की परियोजना के कुल खर्च 110 हजार करोड़ में 88 हजार करोड़ का निवेष जापान द्वारा किया जाना साथ ही तकनीक भी उपलब्ध कराना इस बात का इषारा है कि भारत और जापान के सम्बंध केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक परिपाटी के साथ नैसर्गिक मित्रता की ओर बढ़ रहे हैं। वैसे इसमें इस बात का भी संकेत दिखाई देता है कि जापान भी नहीं चाहता कि भारत के इस प्रकार की सुविधा में किसी प्रकार से चीन का हस्तक्षेप हो। गौरतलब है कि बुलेट ट्रेन के मामले में जापान की भांति चीन भी अव्वल है। हो न हो चीन की नजर व्यापारिक दृश्टि से बुलेट ट्रेन के मामले में भारत की ओर रही हो पर जापान से मिली सौगात से यह रास्ता उसके लिए न केवल बंद हो गया बल्कि दोनों की गाढ़ी दोस्ती से उसे जोर का झटका भी लगा है। 
इतिहास को खंगाला जाय तो छठी षताब्दी में बौद्धिक धर्म के उदय तथा जापान में इसके प्रचार-प्रसार के समय से ही दोनों देषों के बीच मधुर सम्बंध रहे हैं। भारत और जापान के बीच अप्रैल 1952 से राजनयिक सम्बंधों की स्थापना हुई जो मौजूदा समय में सौहार्दपूर्ण सम्बंध का रूप ले चुकी हैं। दोनों देषों के द्वारा अनेक संयुक्त उपक्रमों की स्थापना से सम्बंधों की गहराई का पता चलता है। भारत और जापान 21वीं सदी में वैष्विक साझेदारी की स्थापना करने हेतु आपसी समझ पहले ही दिखा चुके हैं तब यह दौर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का था। इण्डो-जापान ग्लोबल पार्टनरषिप इन द ट्वेंटी फस्र्ट सेन्च्युरी इस बात का संकेत था कि जापान भारत के साथ षेश दुनिया से भिन्न राय रखता था। इतना ही नहीं वर्श 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं जापानी प्रधानमंत्री के साथ एक संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ जिसका षीर्शक था नये एषियाई युग में जापान-भारत साझेदारी। गौरतलब है कि दिसम्बर 2006 में मनमोहन सिंह और यही जापानी प्रधानमंत्री षिंजो एबे ने सामरिक उन्मुकता को ध्यान में रखते हुए मसौदे को आगे बढ़ाया। उपरोक्त परिप्रेक्ष्य इस बात को भावयुक्त करते हैं कि जापान और भारत कई दषकों से एक-दूसरे के लिए सकारात्मक रहे हैं। प्रधानमंत्री एबे ने एक दषक पहले कहा था कि किसी अन्य द्विपक्षीय सम्बंधों की तुलना में भारत और जापान के सम्बंधों में असीम सम्भावना है। जाहिर है वर्तमान में भी दोनों इसी कसौटी पर एक बार फिर खरे उतरते दिखाई दे रहे हैं। भारत और जापान के भावी रिष्ते को जिस तरीके से जापानी प्रधानमंत्री ने यह कहते हुए कि हम ‘जय जापान जय भारत‘ को सच साबित करने के लिए काम करेंगे उसमें भी गाढ़ी दोस्ती का ही रहस्य छुपा हुआ है। दो टूक यह भी है कि जापान की तुलना में इसका लाभ भारत के हिस्से में ही अधिक आने वाला है। हालांकि ‘जय जापान, जय भारत‘ के ष्लोगन से अनायास ही 1954 का हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा उभर आया जो 1962 में चीन आक्रमण के साथ इसलिए भरभरा गया क्योंकि इसकी व्यावहारिकता पर कभी काम ही नहीं किया गया था पर जापानी प्रधानमंत्री का नारा ‘जय जापान, जय भारत‘ इसलिए कहीं अधिक दृढ़ है क्योंकि यह सात दषकों के सम्बंधों के बाद पनपाया गया है। 
प्रधानमंत्री मोदी और उन्हीं के समकक्ष षिंजो एबे ने बुलेट ट्रेन के षिलान्यास के साथ रिष्तों की नई इबारत लिख दी है। मोदी ने साबरमती स्टेषन पर बुलेट ट्रेन के षिलान्यास के मौके पर कहा कि यह जापान से लगभग मुफ्त में मिल रही है। जापान का यह कहा जाना मेक इन इण्डिया के लिए जापान प्रतिबद्ध है। यह बात इसलिए दमदार है क्योंकि भारत इसी के बूते दुनिया से अपने देष में निवेष की इच्छा रखता है। षिंजो एबे का यह वक्तव्य कि मेरे अच्छे मित्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूरदर्षी नेता हैं दषकों की गाढ़ी दोस्ती का एक दूसरा रंग ही है। जिस तर्ज पर एषिया और प्रषान्त महासागरीय देष आये दिन उथल-पुथल में रहते हैं और जिस प्रकार सीमा विवाद को लेकर चीन भारत को धौंस दिखाने का अवसर खोजता रहता है इसे भी संतुलित करने में जापान की दोस्ती बड़े काम की है। गौरतलब है कि 72 दिनों तक डोकलाम पर भारत और चीन की सेना आमने-सामने डटी रही। इसी तनातनी के दौर में जापान का बयान भारत के पक्ष में आया था। जाहिर है चीन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में यह काम आया और बीते 14 सितम्बर को प्रधानमंत्री मोदी और जापानी पीएम षिंजो एबे के संयुक्त बयान में यह कहना कि पाकिस्तान 2008 के मुम्बई और 2016 के पठानकोट हमलों के दोशियों को जल्द-से-जल्द सज़ा दिलवाये इससे पाकिस्तान को तो कड़ा संदेष मिला ही है साथ ही पाकिस्तान के आतंकियों का समर्थन करने वाले चीन और उसकी बढ़ती आक्रमकता को भी निषाने पर लिया गया है। सभी जानते हैं कि उत्तर कोरिया का भी चीन समर्थन करता है जिससे जापान इन दिनों काफी परेषान है और अमेरिका उत्तर कोरिया के दुस्साहस को देखते हुए सबक सिखाने के मूड में है। बीते 3 सितम्बर को चीन में ब्रिक्स सम्मेलन होने से पहले 28 अगस्त को डोकलाम समस्या से जैसे-तैसे छुटकारा मिला। यहां भी भारत की कूटनीति फलक पर जबकि चीन हाषिये पर जाता दिखाई देता है। भारत-जापान की दोस्ती भी चीन को फिलहाल बहुत खल रही होगी। भारत और जापान के बीच हुए 15 अहम समझौते और हाई स्पीड रेल परियोजना साथ ही चीन के वन बेल्ट, वन रोड की काट खोजना भी इस बात का द्योतक है कि दक्षिण एषिया में ही नहीं वरन् वैष्विक फलक पर भारत अपना कद तुलनात्मक कहीं अधिक विकसित कर चुका है। गौरतलब है कि जब बुलेट ट्रेन 1964 में जापान में पहली बार आई थी तब जापान का पुर्नजन्म हुआ था। जनसंख्या और क्षेत्रफल की दृश्टि से छोटा जापान और उसी की तुलना में दोनों मामले में अव्वल भारत भी रेल परिवहन में बुलेट ट्रेन का भूमिपूजन करके इस राह पर चल पड़ा है। इससे परिवहन के इस क्षेत्र में न केवल सरलता और सुगमता का विकास होगा बल्कि भारत और जापान के बीच दोस्ती भी कहीं अधिक हाईस्पीड वाले होंगे।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502
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हांफते पाकिस्तान के दौड़ यूएनओ तक

अज़हर मसूद को न्याय के कटघरे में लाकर रहेंगे। भारत की ओर से किया जा रहा यह दृढ़ संकल्प अब इसलिए रंग ला सकता है क्योंकि वैष्विक फलक पर भारत की कूटनीति तुलनात्मक चमकदार हुई है। संयुक्त राश्ट्र द्वारा अज़हर मसूद को अन्तर्राश्ट्रीय आतंकी घोशित कराये जाने की भारत की कोषिष पुरानी है पर सफलता दर से अभी यह दरकिनार है। इसके पीछे बड़ा कारण संयुक्त राश्ट्र की सुरक्षा परिशद् को आगे बढ़ने से रोकने में चीन का वीटो है। गौरतलब है भारत ने अज़हर मसूद की पहचान 2 जनवरी, 2016 को पठानकोट में हुए आतंकी हमले के मास्टरमाइंड के रूप में की। इसके अलावा उसके भाई रऊफ समेत पांच अन्य को भी आरोपी बताया था। ध्यान्तव्य हो कि इस हमले में भारत के 7 जवान षहीद हुए थे जबकि 6 आतंकी भी ढेर हुए थे। तभी से यह मंथन है कि पाक को घुटने के बल लाने के लिए वहां के आतंकियों को नेस्तोनाबूत करना है पर इस दिषा में सफलता दर बहुत कम रही। संयुक्त राश्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरूद्दीन का यह कहना कि मामला विचाराधीन है और संयुक्त राश्ट्र समिति के समक्ष है उम्मीद है कि आतंकी घोशित करने में वह अपनी भूमिका का निर्वहन करेंगे। यह जान कर हैरत होगी कि पाकिस्तान का षरणागत आतंकी अज़हर मसूद पर चीन की बड़ी कृपा है। इसे वैष्विक आतंकी घोशित करवाने के भारत के प्रयासों को चीन बार-बार अवरूद्ध करता रहा है। इतना ही नहीं आतंकी लखवी के मामले में भी चीन अपने वीटो का बेजा इस्तेमाल किया है। भारत के इस मामले में दिये गये प्रस्ताव को अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन का समर्थन है पर पड़ोसी चीन अपनी कुटिल चाल के चलते भारत को पाकिस्तान के मुकाबले बनाये रखने तथा स्वयं की कूटनीति को तृप्ति के चलते प्रस्ताव के विरूद्ध हैं। दो टूक यह भी है कि पाकिस्तान संयुक्त राश्ट्र में पिछले 70 सालों से दौड़ लगाते-लगाते हांफने लगा है पर उसका मैराथन समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है।
संयुक्त राश्ट्र संघ में भारत ने पाकिस्तान को दो टूक कह दिया है कि वह कष्मीर का सपना छोड़ दे। साथ ही यह भी चेताया कि आतंकियों को जड़ से खत्म करे और सरकारी नीति के हथियार के रूप में उनका इस्तेमाल बंद करे। गौरतलब है कि भारत की विदेष मंत्री सुशमा स्वराज 23 सितम्बर को संयुक्त राश्ट्र महासभा में अपना भाशण देंगी जाहिर है पाकिस्तान भी इसके उलट कुछ राय जरूर रखेगा। सभी जानते हैं कि नवाज़ षरीफ पनामा मामले के चलते पद गंवा चुके हैं और प्रधानमंत्री के तौर पर षाहिद खाकन अब्बासी काम कर रहे हैं। रोचक यह भी है कि यह अस्थाई प्रधानमंत्री हैं जब नवाज़ षरीफ के भाई इस पद की योग्यता में आ जायेंगे तब इनकी छुट्टी हो जायेगी। फिलहाल संयुक्त राश्ट्र महासभा को अब्बासी सम्बोधित करेंगे। आवाज भले ही अब्बासी की हो पर बोल पाकिस्तान पर दबाव बनाने वाले आकाओं का ही होगा। पाकिस्तानी विदेष मंत्रालय की मानें तो प्रधानमंत्री अब्बासी एक बार फिर संयुक्त राश्ट्र में कष्मीर का मुद्दा उठायेंगे। हालांकि पाकिस्तान की यह सोची-समझी चाल रहती है वह आतंक के मुद्दे को कष्मीर की आड़ में कमजोर करने की हमेषा कोषिष करता रहा है। एक सच्चाई यह भी है कि संयुक्त राश्ट्र में कष्मीर का मुद्दा उठाकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इस्लामाबाद में कुछ दिन चैन से गुजार लेते हैं। गौरतलब है कि पाक यदि कष्मीर का मुद्दा छोड़ दे तो आतंक और आईएसआई के साथ वहां की सेना का गठजोड़ खत्म हो सकता है पर वह ऐसा करके स्वयं पर वार नहीं करा सकता। हो न हो पाकिस्तानी सत्तधारियों के लिए कष्मीर एक ऐसा अचूक हथियार है जिसके बूते सियासत की रोटियां सेकी जाती हैं जबकि पाक की जनता भूख, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी तथा बेकारी से जूझ रही होती है। पाक अधिकृत कष्मीर इस बात का पुख्ता प्रमाण है। जहां के बाषिन्दे इस्लामाबाद के खिलाफ न केवल आवाज़ बुलन्द करते हैं बल्कि आतंकियों के सताये हुए भी हैं।
भारत ने आतंक पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कह दिया है कि पाकिस्तान में आतंकियों को सुरक्षित पनाह दिया जाना जारी है। संयुक्त राश्ट्र में बार-बार मुंहकी खाने वाला पाकिस्तान आदत से बाज नहीं आ रहा है उसके पीछे एक बड़ी वजह चीन का समर्थन भी है। पाकिस्तान द्वारा कष्मीर मुद्दा उठाने को लेकर भारत ने तंज कसा है और इसे मियां की दौड़ मस्जिद तक बताया है। इसी का दूसरा चरित्र यह है कि पाकिस्तान बीते कई दषकों से कष्मीर का मुद्दा उठाते-उठाते, संयुक्त राश्ट्र संघ की दौड़ लगाते-लगाते हांफने लगा है पर नीयत को दुरूस्त करने के बजाय बेहूदा नीति पर अभी भी अड़ा हुआ है जबकि पाकिस्तान के भारत में रहे पूर्व राजनयिक ने हाल ही में कहा था कि पाकिस्तान को कष्मीर मुद्दे के अलावा कुछ और सोचना चाहिए क्योंकि अब दुनिया अब उसके इस नीति पर संजीदा नहीं होती है। एक तरफ दुनिया आतंक को लेकर एकजुट हो रही है तो दूसरी तरफ चीन जैसे देष आतंक के प्रति स्पश्ट रूख नहीं अख्तियार कर रहे हैं। जापान के प्रधानमंत्री षिंजो एबे बीते 14 सितम्बर को भारत आये थे। जैष-ए-मोहम्मद और लष्कर-ए-तैयबा पर मोदी और जापानी प्रधानमंत्री ने खूब लानत-मलानत की। इन आतंकी संगठनों समेत अलकायदा के खिलाफ मिलकर मुकाबला करने पर सहमति जताई। मोदी और षिंजो एबे ने बीते 14 सितम्बर को संयुक्त बयान में कहा कि पाकिस्तान 2008 के मुम्बई और 2016 के पठानकोट आतंकी हमलों के दोशियों को जल्द-से-जल्द सजा दिलवाये। इस बयान से साफ है कि जापान भारत के साथ आतंक के मामले में होकर न केवल पाकिस्तान को सचेत किया है बल्कि चीन को भी कड़ा संदेष दिया है। जाहिर है भारत और जापान की दोस्ती से चीन के माथे पर बल आया है। चीन एक तरफ पाकिस्तान के आतंकियों का समर्थन करता है तो दूसरी तरफ दुस्साहस से भरे उत्तर कोरिया को भी समर्थन देने का ही काम करता रहा है। जिस तर्ज पर भारत और जापान समेत दुनिया के तमाम देष आतंक के विरोध में हैं वैसी हरकत चीन की नहीं दिखाई देती और ऐसा सिर्फ पाकिस्तान को लेकर इसलिए क्योंकि वह अपनी कूटनीति को इसके माध्यम से हल करता है। 
फिलहाल वैष्विक फलक पर अब सब कुछ इतना आसान नहीं है चीन जैसा चाहता है अब पूरी तरह वैसा कर पाये इसकी व्यावहारिकता थोड़ी कम ही दिखाई देती है। पाकिस्तान आतंकियों पर अपनी नीतियों से बाज नहीं आने वाला पर चीन कुछ मामलों में कमजोर दिखता है। एक तरफ भारत जापान की प्रगाढ़ होती दोस्ती तो दूसरी तरफ उत्तर कोरिया पर अमेरिका की टेढ़ी हुई नज़रें। इतना ही नहीं जिस पाकिस्तान के आतंकियों का वह मजबूत समर्थक है उस पर भी अमेरिका की नज़रे तिरछी हैं। बीते दिनों अमेरिकी राश्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान को खूब लताड़ लगाई और साफ किया कि वह नहीं सुधरेगा तो उसको वह स्वयं सुधार देंगे। संयुक्त राश्ट्र संघ भी अब पाकिस्तान के कष्मीर मुद्दे को बहुत संवेदनषीलता से नहीं लेता दिखाई देता है। इसका मुख्य कारण उसकी आतंकी छवि ही है। स्पश्ट यह भी है कि भारत पूरी दुनिया को यह बताने मेें सफल रहा कि वह पाक आयातित आतंकवाद से वह बेइंतहा परेषान है। बदली वैष्विक परिस्थितियां फिलहाल भारत के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं। चीन को छोड़कर संयुक्त राश्ट्र के सभी स्थाई सदस्य भारत का साथ निभाने का वायदा कर चुके हैं पर इसकी एक गहरी बात यह भी है कि यदि सुरक्षा परिशद् के स्थाई सदस्यों में से एक ने भी मामले के विरूद्ध वीटो किया तो बात बनती नहीं है। ऐसे में सवाल है कि अज़हर मसूद को न्याय के कटघरे में लाने का जो संकल्प भारत कर रहा है क्या वह चीन की बेरूखी से अधर में नहीं है। सम्भव है कि वक्त के साथ कुछ और बदलाव आये पर वर्तमान की सच्चाई तो यही है।


सुशील कुमार सिंह
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देशी हिंदी का विदेशी प्रभाव

अगर मुझे हिन्दी नहीं आती तो मैं लोगों तक कैसे पहुंच पाता। प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन भाशाई सुचिता को समझने का बड़ा अवसर देता है। तथाकथित परिप्रेक्ष्य यह भी है कि भाशा एक आवरण है जिसके प्रभाव में व्यक्ति न केवल सांस्कृतिक सम्बद्धता से अंगीकृत होता है बल्कि विकास की चोटी को भी छूता है। भाशा किसी की भी हो, कैसी भी हो सबका अपना स्थान है पर जब हिन्दी की बात होती है तो व्यापक भारत के विषाल जनसैलाब का इससे सीधा सरोकार होता है। इतना ही नहीं दषकों से प्रसार कर रही हिन्दी भाशा ने दुनिया के तमाम कोनों को भी छू लिया है। आज दुनिया का कौन सा कोना है जहां भारतीय न हो। भारत के हिन्दी भाशी राज्यों की आबादी लगभग आधी के आसपास है। वर्श 2011 की जनगणना के अनुसार देष की सवा अरब की जनसंख्या में लगभग 42 फीसदी की मातृ भाशा हिन्दी है। इससे भी बड़ी बात यह है कि प्रति चार व्यक्ति में तीन हिन्दी ही बोलते हैं। पूरी दुनिया का लेखा-जोखा किया जाय तो 80 करोड़ से ज्यादा हिन्दी बोलने वाले लोग हैं। तेजी से बदलती दुनिया का सामना करने के लिए भारत को एक मजबूत भाशा की जरूरत है। सभी जानते हैं कि अंग्रेजी दुनिया भर में बड़े तादाद की सम्पर्क भाशा है जबकि मातृ भाशा के रूप में यह संकुचित है। चीन की भाशा मंदारिन सबसे बड़ी जनसंख्या को समेटे हुए है पर एक सच्चाई यह है कि चीन के बाहर इसका प्रभाव इतना नहीं है जितना बाकी दुनिया में हिन्दी का है। पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेष, श्रीलंका से लेकर इण्डोनेषिया, सिंगापुर यहां तक कि चीन में भी इसका प्रसार है। तमाम एषियाई देषों तक ही हिन्दी का बोलबाला नहीं है बल्कि ब्रिटेन, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, आॅस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड समेत मानचित्र के सभी महाद्वीपों जैसे अमेरिका और मध्य एषिया में इसका बोलबाला है। स्पश्ट है कि हिन्दी का विस्तार और प्रभाव भारत के अलावा भी दुनिया के कोने-कोने में है। 
हिन्दी के बढ़ते वैष्वीकरण के मूल में गांधी की भाशा दृश्टि का महत्वपूर्ण स्थान है। दुनिया भर में गांधी की स्वीकार्यता भी इस दिषा में काफी काम किया है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान भी विदेषों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार व पाठ्यक्रमों के योगदान के लिए जानी-समझी जाती है। हिन्दी में ज्ञान, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विशयों पर सरल और उपयोगी पुस्तकों का फिलहाल अभी आभाव है पर जिस कदर भारत में व्यापार और बाजार का तकनीकी पक्ष उभरा है उससे यह संकेत मिलता है कि उक्त के मामले में भी हिन्दी बढ़त बना लेगी। दक्षिण भारत के विष्वविद्यालयों में हिन्दी विभागों की तादाद बढ़ रही है पर यह भी सही है कि उत्तर दक्षिण का भाशाई विवाद अभी भी जड़ जंग है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाशाओं का उल्लेख है जबकि कुल 53 भाशा और 1600 बोलियां भारत में उपलब्ध हैं। भारत विविधता में एकता का देष है जिसे बनाये रखने में भाशा का भी बड़ा योगदान है। हिन्दी के प्रति जो दृश्टिकोण विदेषियों में विकसित हुआ है वो भी इसकी विविधता का चुम्बकीय पक्ष ही है। बड़ी संख्या में विदेषियों को हिन्दी सीखने के लिए अभी भी भारत में आगमन होता है। दुनिया के सवा सौ षिक्षण संस्थाओं में भारत को बेहतर ढंग से जानने के लिए हिन्दी का अध्ययन हो रहा है जिसमें सबसे ज्यादा 32 षिक्षण संस्था अमेरिका में है। लंदन के कैम्ब्रिज विष्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। जर्मनी और नीदरलैंड आदि में भी हिन्दी षिक्षण संस्थाएं हैं जबकि 1942 से ही चीन में हिन्दी अध्ययन की परम्परा षुरू हुई थी और 1950 में जापानी रेडियों से पहली बार हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित किया गया था। रूस में तो हिन्दी रचनाओं एवं ग्रन्थों का व्यापाक पैमाने पर अनुवाद हुए। उपरोक्त से पता चलता है कि वैष्विक परिप्रेक्ष्य में हमारी हिन्दी विदेष में क्या रंग दिखा रही है साथ ही हिन्दी भाशा में व्यापक पैमाने पर विदेषी षिक्षण संस्थाएं किस भांति निवेष कर रही हैं। 
सितम्बर 2015 के भोपाल में तीन दिवसीय हिन्दी अन्तर्राश्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने हिन्दी भाशा की गरिमा और गम्भीरता को लेकर कई प्रकार की बातों में एक बात यह भी कही थी कि अगर समय रहते हम न चेते तो हिन्दी भाशा के स्तर पर नुकसान उठायेंगे और यह पूरे देष का नुकसान होगा। प्रधानमंत्री मोदी के इस वक्तव्य के इर्द-गिर्द झांका जाय तो चिंता लाज़मी प्रतीत होती है। स्वयं मोदी ने बीते तीन वर्शों से अधिक समय से विदेषों में अपने भाशण के दौरान हिन्दी का जमकर इस्तेमाल किया। षायद पहला प्रधानमंत्री जिसने संयुक्त राश्ट्र संघ में षामिल एक तिहाई देषों को हिन्दी की नई धारा दे दी जिसका तकाजा है कि हिन्दी के प्रति वैष्विक दृश्टिकोण फलक पर है। यह सच है कि भाशा किसी भी संस्कृति का वह रूप है जिसके बगैर या तो वह पिछड़ जाती है या नश्ट हो जाती है जिसे बचाने के लिए निरंतर भाशा प्रवाह बनाये रखना जरूरी है। देष में हिन्दी सम्मेलन, हिन्दी दिवस और विदेषों में हिन्दी की स्वीकार्यता इसी भावना का एक महत्वपूर्ण प्रकटीकरण है। 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है जबकि सितम्बर के पहले दो सप्ताह को हिन्दी पखवाड़ा के रूप में स्थान मिला हुआ है। यहां यह भी समझ लेना जरूरी है कि यदि हिन्दी ने दुनिया में अपनी जगह बनाई है तो अंग्रेजी जैसी भाशाओं से उसे व्यापक संघर्श भी करना पड़ा है। भारत में आज भी हिन्दी को दक्षिण की भाशाओं से तुलना की जाती है जबकि सच्चाई यह है कि कोई भी भाशा अपना स्थान घेरती है हिन्दी तो इतनी समृद्ध है कि कईयों को पनाह दे सकती है। संयुक्त राश्ट्र संघ में हिन्दी को अधिकारिक भाशा का दर्जा देने की मांग उठती रही है। डिजिटल दुनिया में अंग्रेजी, हिन्दी और चीनी के छाने की सम्भावना बढ़ी हुई है ऐसा प्रधानमंत्री मोदी भी मानते हैं। जिस तर्ज पर दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी का भाशाई प्रयोग हिन्दी की ओर झुक रहा है उसमें भी बड़ा फायदा हो सकता है। इंटरनेट से लेकर गूगल के सर्च इंजन तक अब हिन्दी को कमोबेष बड़ा स्थान मिल गया है साथ ही बैंकिंग, रेलवे समेत हर तकनीकी विधाओं में अंग्रेजी के साथ हिन्दी का समावेषन हुआ है। 
विष्व तेजी से प्रगृति की ओर है विकसित समेत कई विकासषील देष अपनी भाशा के माध्यम से ही विकास को आगे बढ़ा रहे हैं पर भारत में स्थिति थोड़ी उलटी है यहां अंग्रेजी की जकड़ बढ़ रही है। रोचक यह भी है कि विदेषों में हिन्दी सराही जा रही है और अपने ही देष में तिरछी नज़रों से देखी जा रही है। एक हिन्दी दिवस के कार्यक्रम में हिन्दी की देष में व्यथा को देखते हुए एक नामी-गिरामी विचारक ने हिन्दी समेत भारतीय भाशा को चपरासियों की भाशा कहा। यहां चपरासी एक संकेत है कि भारतीय भाशा को किस दर्जे के तहत रखा जा रहा है। हालांकि वास्तविकता इससे परे भी हो सकती है पर कुछ वर्श पहले सिविल सेवा परीक्षा के 11 सौ के नतीजे में मात्र 26 का हिन्दी माध्यम में चयनित होना और कुल भारतीय भाशा में से मात्र 53 का चयनित होना देष के अन्दर इसकी दयनीय स्थिति का वर्णन नहीं तो और क्या है। हालांकि अब इसमें भी सुधार हो रहा है। अंग्रेजी एक महत्वपूर्ण भाशा है पर इसका तात्पर्य नहीं कि इसे हिन्दी की चुनौती माना जाय या दूसरे षब्दों में हिन्दी को अंग्रेजी के सामने खड़ा करके उसे दूसरा दर्जा दिया जाय। प्रधानमंत्री मोदी का राजनीतिक और कूटनीतिक कदम चाहे जिस राह का हो पर इस बात को मानने से कोई गुरेज नहीं कि हिन्दी विस्तार की दषा में उनकी कोई सानी नहीं। फिलहाल हिन्दी भाशा में दुनिया के कोने-कोने से बढ़ते निवेष को देखते हुए कह सकते हैं कि हिन्दी धारा और विचारधारा के मामले में मीलों आगे है। 


सुशील कुमार सिंह
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सुशासन के दौर में बच्चे असुरक्षित

हरियाणा के रेयान इंटरनेषनल स्कूल में एक बच्चे की हत्या और दिल्ली के एक स्कूल में एक बच्ची से बलात्कार इतना समझने के लिए पर्याप्त है कि वे मासूम जो न तो चमक-दमक की दुनिया समझते हैं और न ही ऐसी दुनिया का समाजषास्त्र और दर्षनषास्त्र फिर भी कुछ लोग उनकी जान के दुष्मन हैं। जब हम बड़ी षिद्दत से यह कहते हैं कि सुरक्षा और संरक्षा का वातावरण विकसित करने में हमारी कोई सानी नहीं साथ ही कानून और व्यवस्था भी बहुत चैकस है तब ऐसी घटनाएं इस बात का इषारा हैं कि गढ़े गये कषीदे सिद्धान्त में कुछ और व्यवहार में कुछ और हैं। स्कूल किसी भी कद का हो, षहर किसी भी स्तर का हो बच्चों की सुरक्षा में तो बेबस ही हैं। देखा जाय तो आधुनिक युग में षिक्षा को लेकर पैरामीटर बदले हैं साथ ही स्कूलों के मापदण्ड भी तुलनात्मक कहीं अधिक ऊँचे हुए हैं साथ ही षिक्षा व्यवस्था में भी व्यापक बदलाव आया है परन्तु इन्हीं ऊँची इमारतों में बच्चों के लिए असुरक्षा का वातावरण भी अब बनता दिख रहा है। रेयान इंटरनेषनल स्कूल के अंदर जिस तरह एक 7 बरस के एक मासूम को मौत के घाट उतारा गया इससे तो यही छवि बनती दिखाई देती है। साफ है कि स्कूल चलाने वाले प्रबंधक अच्छे वातारण का ढिंढोरा कितना भी पीट लें पर हालात यह बताते हैं कि बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा वे भी नहीं उठा पा रहे हैं। आधुनिक युग में सुषासन की अवधारणा की यात्रा अनेक चरणों से गुजरी हैं कई वर्गों को इसका लाभ भी हुआ होगा पर कुछ वर्ग अभी इस सूनेपन से भरे हैं जाहिर है बच्चे इसकी जद्द में हैं। दृश्टिकोण व परिप्रेक्ष्य को देखते हुए एक स्वाभाविक प्रष्न उभरता है कि बच्चों के लिए आखिर कब होगा सुषासन। यह बात इसलिए भी क्योंकि बड़े षहरों में आये दिन बच्चे बड़े तादाद में गायब हो रहे हैं। आंकड़ों की मानें तो एक घण्टे में 12 बच्चे गुम हो जाते हैं।
बीते तीन बरसों से सुषासन की विषेशता और विष्लेशण दोनों में खूब इजाफा हुआ है पर कई वर्शों से बच्चों के गायब होने से जुड़ी समस्याएं भी बेलगाम हुई हैं। नौनिहालों की सुरक्षा और संरक्षा पर आज भी सवालिया निषान लगा हुआ है। विमर्ष यह है कि इस समाज व सरकार के बीच रहने वाले लाखों बच्चे आज भी षोशण का षिकार हो रहे हैं, लाखों की मात्रा में गुम हो रहे हैं और बहुतायत को जान से हाथ भी धोना पड़ रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में प्रत्येक वर्श औसतन एक लाख बच्चे गायब हो रहे हैं। जनवरी 2011 से जून 2014 के बीच 3 लाख 27 हजार बच्चे लापता हुए जिनमें से 45 फीसदी बच्चों का अब तक कोई अता-पता नहीं है और यह क्रम कमोबेष आज भी कायम है। लापता बच्चों का न मिलना उनके अभिभावकों के लिए अन्तहीन पीड़ा है और जीवनपर्यनत उन्हें भोगना भी है। बच्चे किन परिस्थितियों में गायब हुए इसकी भिन्न-भिन्न विवेचना हो सकती है पर स्कूल प्रांगण के षौचालय में बच्चे की गर्दन चाकू से रेत दी जाय यह हतप्रभ करने वाली घटना नहीं तो क्या है? मामले की गम्भीरता को देखते हुए राज्य और केन्द्र सरकार इस मामले में हरकत में आई है पर स्कूल प्रबंधन और पुलिस का रवैया अभी भी भरोसा जगाने वाला नहीं लगता। जिस बस कंडक्टर को हत्या का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है उस पर न तो बच्चे के माता-पिता और न ही उस व्यक्ति के घरवाले यह मानने के लिए तैयार हैं कि हत्या उसी ने की है इसे स्कूल और पुलिस का शड्यंत्र भी माना जा रहा है। घटना बड़ी है और देष को झकझोरने वाली है। जाहिर है इसके समाधान भी सटीक और न्यायोचित होने चाहिए।
दुष्वारियां तो बढ़ रही हैं समस्याएं भी बेलगाम हुई हैं सुरक्षा को लेकर मुख्यतः बच्चों के मामले में कोई समझौता न तो किया जा सकता है, न तो अभिभावक ऐसी कोई गलती करना चाहते हैं बावजूद इसके यह विकराल रूप लिए हुए है। अक्सर यह सुनने को मिलता है कि स्कूल के वाटरटैंक में गिर कर बच्चे की मौत हो गयी, षिक्षक ने होमवर्क नहीं करने पर बच्चे की पिटाई की और वह गम्भीर रूप से घायल हुआ, कभी-कभी मरने की भी खबर आती है। इसके अलावा स्कूल की बस और वैन में यौन षोशण व असुरक्षा का वातावरण साथ ही इनकी दुर्घटना के चलते दर्जनों बच्चे काल के ग्रास में भी चले जाते हैं। यह हैरान करने वाला है कि निजी स्कूल स्तरीय पढ़ाई और षानदार सुविधाओं के लिए भारी-भरकम फीस लेते हैं परन्तु बड़ा सवाल यह है कि जिन बच्चों के माता-पिता के पैसों से वे अपने स्कूल का कायाकल्प करते हैं उन्हीं के नौनिहाल यहां भी असुरक्षित क्यों हैं। इतना ही नहीं अपनी षर्तों पर प्रवेष देने वाले स्कूल जब प्रांगण में कोई ऊँच-नीच होने के बाद उन पर सवाल उठाये जाते हैं तो वे इससे पल्ला झाड़ने में तनिक मात्र भी देरी नहीं करते हैं। फिलहाल रेयान इंटरनेषनल स्कूल की घटना को लेकर सीबीआई जांच की मांग हो रही है। न्याय में क्या निकलेगा यह तो बाद में पता चलेगा पर एक मासूम की हत्या हुई है इस सच से सभी वाकिफ हैं। बच्चों से जुड़े कुछ अन्य पहलू पर नजर गड़ाई जाय तो पता चलता है कि मानसिक और षारीरिक रूप से अविकसित मासूम देष भर से आये दिन गुम होते रहते हैं। बच्चों के इस स्थिति को देखते हुए षीर्श अदालत ने वर्शों पहले सरकार को फटकार लगाई थी और कहा था कि देष में बच्चे गुम हो रहे हैं ऐसे में आपका रवैया सुस्त कैसे हो सकता है। यही फटकार एक बार भारी-भरकम फीस लेने वाले स्कूलों को भी लगाने की जरूरत है। बच्चों का गायब होना केवल देष की कानून व्यवस्था की ही नहीं बल्कि भारत के भविश्य पर भी सवाल खड़े कर रहा है। सवाल है कि व्यापक संख्या में गायब बच्चों का आखिर होता क्या है और यह बच्चे कहां जाते हैं। देह व्यापार, अंगों की तस्करी, बाल मजदूरी, भीग मंगवाना, वैष्यावृत्ति, चोरी और लूटपाट आदि में इनका उपयोग धड़ल्ले से किया जाता है। रिपोर्ट भी यह खुलासा करती है कि 5 से 12 वर्श के बच्चे षोशण और दुव्र्यवहार का सबसे अधिक षिकार होते हैं। आंकड़े तो यह भी है कि प्रत्येक तीन में से 2 बच्चे षारीरिक षोशण का षिकार बनते हैं। यकीनन लापता बच्चों का भविश्य अंधेरे में ही रहता है। मोदी सरकार का एक अच्छा काज यह है कि षिक्षा पर खर्च के लिए ज्यादा बड़ा वित्तीय हिस्सा राज्यों को सौंप दिया है परन्तु सषक्त माॅनिटरिंग के अभाव में उद्देष्य षायद ही पूरे हों। भारत में कानून और व्यवस्था को लेकर चिंता दषकों पुरानी है जबकि सुषासन ढ़ाई दषक पुरानी षब्दावली है। इसका तात्पर्य लोक प्रवर्धित अवधारणा से लगाया जाता है। बार-बार अच्छा षासन भी इसके अर्थ में आता है जिसमें सुरक्षा से लेकर कानून-व्यवस्था का परिप्रेक्ष्य निहित है पर नौनिहालों का गायब होना या हत्या होना सुषासन की अवधारणा को ही धता बताने का काम कर रहा है। क्या सरकार को बच्चों की सुरक्षा को लेकर कोई नायाब तरीका नहीं ढूंढना चाहिए। जिस प्रकार समाज बदल रहा है, षिक्षा बदल रही है और सोच बदल रही है साथ ही अपराध के प्रारूप भी बदल रहे हैं उसे देखते हुए नौनिहालों की सुरक्षा हेतु बेहतर होमवर्क की आवष्यकता नहीं है। समाज और सरकार दोनों को चाहिए कि लापता हो रहे बच्चों को लेकर अतिरिक्त संवेदनषीलता दिखायें और स्कूलों को चाहिए कि अपने कत्र्तव्यों की सूची में हर हाल में बच्चों की सुरक्षा वाले कत्र्तव्य जोड़ लें। जाहिर है बच्चों को अतिरिक्त सुरक्षा और संरक्षा चाहिए अन्यथा असुरक्षा के आभाव में अच्छे दिन की कल्पना भी कोरी रह जायेगी।




सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन  आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
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