Thursday, September 15, 2016

मोल-तोल वाले बाज़ार में रिलायंस जियो

आज से एक दषक पहले जब मोबाइल की दुनिया में क्रान्ति पुख्ता हो रही थी तब रिलायंस ने महंगे मोबाइल फोन और महंगी काॅल दर की होड़ के बीच अपना सिम सहित मोबाइल सस्ते दर पर बाजार में उतारा था जिसकी खरीदारी को लेकर उपभोक्ताओं में होड़ मची थी। तब संचार के क्षेत्र में रसूख की नई होड़ से युक्त रिलायंस ने इस कदर एंट्री मारी थी कि बाकी कम्पनियों को भी अपना होमवर्क ठीक करना पड़ा था। अब मुकेष अंबानी ने एक बार फिर रिलायंस जियो के माध्यम से डेढ़ लाख करोड़ रूपए का दुस्साहस से भरा दांव खेलकर प्रतिद्वन्दी कम्पनियों के बीच एक बार फिर बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि इससे आम उपभोक्ता काफी सहज महसूस कर रहा है। सस्ती दरों पर बेहतर सेवायें मिलने की जो सम्भावना जियो में व्यक्त की गयी है उसे देखते हुए साफ है कि 21वीं सदी के दूसरे दषक के मध्य में एक नई संचार क्रान्ति का क्षितिज पर होना सुनिष्चित है। जियो के द्वारा किये गये पेषकष से पता चलता है कि ट्रैरिफ प्लान के हिसाब से वाॅयस काॅल फिलहाल मुफ्त है जो मोलतोल की बाजारी व्यवस्था से अभी बाहर है। रिलायंस जियो का परिप्रेक्ष्य और दृश्टिकोण क्या है इसकी भी बारीकी से पड़ताल होनी चाहिए। कैसे एक कम्पनी अपने ग्राहकों के लिए इतना सुगम पथ विकसित कर सकती है इसे समझने की उत्सुकता भी षायद सभी में होगी। जिस तर्ज पर रिलायंस ने एक विस्फोटक अंदाज में जियो को बाजार के बीच उतारा है और उपभोक्ताओं को लुभाने वाले सारे साजो-सामान से इसे युक्त बनाया है इससे यह भी संकेत मिलता है कि रिलायंस जैसी कम्पनियां ऐसे ही बड़ी नहीं बनी हैं। 
फिलहाल जियो किसी धमाके से कम नहीं है। कई खासियत से युक्त जियो इन दिनों ग्राहकों के बीच धमाल मचाये हुये है। 5 सितम्बर, 2016 से लाॅन्च रिलायंस जियो में दरअसल इसी वर्श के 31 दिसम्बर तक प्रिव्यू पेषकष सभी ग्राहकों के लिए मुफ्त होगा। उसके बाद 2017 तक 1250 रूपए प्रति माह की कीमत वाले एप्स का प्रयोग मुफ्त रहेगा। वाईफाई, हाॅट स्पाॅट के माध्यम से अतिरिक्त डेटा तक पहुंच साथ ही मीडिया और मनोरंजन समेत भुगतान करने वाले विभिन्न एप्लीकेषन के अलावा वाॅयस काॅल और रोमिंग भी निःषुल्क है। 4जी डेटा से युक्त जियो महज़ कुछ दरों पर असीमित प्रयोग में लाया जा सकेगा जबकि छात्रों के लिए 25 फीसदी अतिरिक्त डेटा का प्रावधान भी इसमें देखा जा सकता है। सवाल है कि रिलायंस जियो दूसरी कम्पनियों की सेवाओं से किस तरह अलग है? देखा जाये तो इसके कई पहलू हैं। पहला पहलू तो इसकी तकनीक ही है। असल में एलटीई एक स्वतंत्र और नई तकनीक है जो मौजूदा प्रणालियों से भिन्न नेटवर्क पर काम करती है। पहले की सभी प्रणालियां सर्किट आधारित थी। देखा गया है कि जैसे-जैसे तकनीक क्षमता बढ़ती है वैसे-वैसे कई और सेवायें देना मुमकिन हो जाता है साथ ही इसमें गुणवत्ता भी समावेषित रहती है। किसी भी मोबाइल नेटवर्क का बुनियादी तत्व स्पेक्ट्रम है जो जियो जैसी तकनीक में काफी बढ़त के साथ है। जियो की क्षमता के मुकाबले एयरटेल फिलहाल 15, आइडिया 10 और वोडाफोन 8 सर्किल में 4जी सेवायें देने में सक्षम हैं। एक खासियत यह है कि जियो अपने समूचे स्पेक्ट्रम का प्रयोग एलटीई सेवाओं के लिये कर सकता है परन्तु उनके प्रतिद्वन्दी जो अपने मौजूदा स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल 2जी और 3जी के लिए कर रहे हैं उनके पास 4जी की भी क्षमता कम रह जायेगी। ऐसे में जियो बाकियों से अलग और आगे दिखाई देता है। इतना ही नहीं जियो के पास एक और लाभ उसके फाइबर आॅप्टिकल केबल नेटवर्क से आता है जिसमें डेटा की बड़ी क्षमता है जो आगे चलकर 5जी के लिए इस्तेमाल में आ सकता है। 5जी मोबाइल दूरसंचार मानकों के लिए प्रस्तावित अगला महत्वपूर्ण चरण है।
राज्यसभा सांसद और बीपीएल मोबाइल के संस्थापक राजीव चन्द्रषेखर का मानना है कि रिलायंस के लाॅन्च करने का तरीका अभूतपूर्व है। रिलायंस के आक्रामक प्रवेष रणनीति से क्षुब्ध कई कम्पनियों का दावा है कि रिलायंस का परीक्षण षुरूआत से ही वाणिज्य लाॅन्च की षक्ल में था। देखा जाय तो पिछले तीन साल में डेटा कीमतों में निरन्तर कमी आती रही है और बाजार में इस बात की प्रतिस्पर्धा रही है कि कौन कितने सस्ते दर पर डेटा पैकेज उपलब्ध करा पाता है। भारत में 90 करोड़ सक्रिय सिम इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता हैं जिनमें केवल 25 करोड़ को एयरटेल सेवायें देती है, लगभग 20 करोड़ ग्राहकों के साथ वोडाफोन और 18 करोड़ के आसपास आइडिया के अलावा 10 करोड़ के साथ आरकाॅम मौजूद है। जियो के मामले में भी अम्बानी कम कीमत और अधिक आकार का दांव खेल रहे हैं जिससे बाजार में तोड़फोड़ मचना स्वाभाविक है। जियो मोबाइल ब्राॅडबैंड बाजार को 2020 तक 65 करोड़ उपभोक्ता तक पहुंचने का लक्ष्य है जो अपने आप में किसी क्रान्ति से कम नहीं है। जियो का दावा है कि उसके पास 72 प्रतिषत आबादी को 4जी एलटीई सेवा मुहैया कराने के ढांचागत क्षमता है। यहां बताते चलें कि एलटीई यानि लाॅन्ग टर्म इवाॅल्यूषन का मतलब उच्च गति वाले वायरलेस नेटवर्क के बीच संचार का मानकीकृत तरीका। ऐसा लगता है कि रिलायंस कम दरों की भरपाई अधिक डेटा उपयोग से करेगा। आंकड़े इस बात का समर्थन करते हैं कि एक भारतीय औसतन प्रति माह 400 एमबी डेटा का उपभोग करता है। साफ है कि रिलायंस जियो के माध्यम से डेटा उपभोग को भी बढ़ाना चाहता है। एक षोध फर्म इण्डिया रेटिंग्स को उम्मीद है कि डेटा दरों में भारी बदलाव आने वाले दिनों में आयेगा। देखा जाय तो जियो की लाॅन्चिंग से टेलीकाॅम की दुनिया में आषंका भी बढ़ी है पर मोलतोल से पटी वर्तमान बाजारी व्यवस्था में जियो कितना सफल और सार्थक सिद्ध होगा अभी कहना कठिन है। 
कईयों का मानना है कि जियो का मौजूदा टैरिफ प्लान असल में कम दरों के बजाय स्मार्ट पैकेजिंग की मिसाल है। ऐसा भी देखा गया है कि टैरिफ प्लान इस तरह बनाये जाते हैं कि न्यूनतम दर पर अधिक से अधिक डेटा दिये जायेंगे परन्तु उपभोक्ता समय सीमा के अन्दर उसे खर्च नहीं कर पाता। ऐसे में कम्पनियों के डेटा बचे रह जाते हैं जबकि उपभोक्ता उसकी भी कीमत चुकाया होता है। सस्ते दर की नुमाइष करने वाली कम्पनियां किसी भी सूरत में उपभोक्ता से मन माफिक फायदे ले ही लेती है लेकिन जिस तर्ज पर जियो उपभोक्ताओं के बीच अपनी पैठ बना रहा है उससे साफ है कि उसके अर्थषास्त्र का कद तुलनात्मक बढ़ेगा। जियो की पहल के अपने जोखिम हैं और उसकी कामयाबी पर न केवल रिलायंस कम्पनी को मुनाफा होगा बल्कि देष की डिजीटल अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी साथ ही प्रतिद्वन्दियों में भी विभिन्न प्रकार की उथल-पुथल मचेगी। बाजार में उपलब्ध मौजूदा खिलाड़ियों को भी एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा जाहिर है उनके ग्राहक भी उनसे बेहतर सेवा की मांग करेंगे। यह देखना भी दिलचस्प रहेगा कि अन्य कम्पनियां जियो के निर्धारित नये मापदण्ड की तुलना में अपने को कैसे पुख्ता करती हैं। यह देखना भी रोचक होगा कि जियो की मुफ्तगीरी को लेकर भी उनकी रणनीति क्या रहेगी। जियो की व्यावसायिक अवधारणा और उसकी पटकथा यह भी दर्षाती है कि उसे हर हाल में बाजार में न केवल अपना सिक्का जमाना है बल्कि औरों की तुलना में सौ कदम आगे भी रहना है। यदि यह सब कुछ मौजूदा सोच के अनुपात में आगे बढ़ा तो इसमें कोई षक नहीं कि जियो उपभोक्ताओं के जीवन में दाखिल हुए बगैर नहीं रह सकेगा।

सुशील कुमार सिंह

Wednesday, September 14, 2016

देश किस सिद्धांत पर चले

उदारीकरण, निजीकरण और वैष्विकरण के ढ़ाई दषक का दौर बीतने के बाद अब एक बार फिर इस बात की पड़ताल करने की जरूरत है कि देष किस सिद्धान्त पर चले। दो टूक यह भी है कि प्रषासन आरंभ से ही वैष्विक वातावरण से प्रभावित होता रहा और लोकतंत्र में जन उत्थान की भावना सरकारों की प्राथमिकता रही है पर सफल कितनी हुई यह भी पड़ताल का ही विशय है। आज 21वीं सदी में यह मत मान्य है कि सुषासन कोई पष्चिमी अवधारणा नहीं है क्योंकि जो नकारात्मक तथ्य थे वे विष्व बैंक द्वारा हटा दिये गये। जाहिर है अब यह एक वैष्विक अवधारणा है जिसमें लोक प्रवर्धित विचारधारा का समावेषन है। जिस गति से देष में विकास की मांग है उसे देखते हुए हमारे प्रषासनिक सिद्धान्त भी बदलाव की मांग कर रहे हैं। डिजीटल इण्डिया समेत कई नूतन कार्यक्रमों में यदि गति बरकरार नहीं रही तो विरोधी पानी पी-पीकर सरकार की आलोचना करेंगे।
उदारीकरण के 25 वर्श बीत चुके हैं और देष ने बहुत कुछ हासिल भी किया है। वैष्विक ध्रुवीकरण की दिषा में भी इसके कदम अब कमजोर नहीं हैं। अमेरिका जैसे देषों से अब समकक्षता के साथ बातचीत होती है। मंगल ग्रह तक भारत की पहुंच हो चुकी है। बस जरूरत है तो जमीन पर बिखरी व्यवस्था को सुदृढ़ करने की। मोदी विगत् ढ़ाई वर्शों में करीब 60 देषों का दौरा कर चुके हैं। मेक इन इण्डिया और उसमें होने वाले निवेष को लेकर षेश विष्व को अवगत कराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। कह सकते हैं कि कृशि प्रधान भारत अब धीरे-धीरे विष्व के तमाम देषों को अपनी ओर आकर्शित करने में काफी कूबत झोंक चुका है। दुनिया के तमाम महाद्वीप में बसे देष भारत की ओर भी काफी समझदारी भरी दृश्टि डाली है। जाहिर है अब देष चलाने के सिद्धान्त में भी पुराने नियम षायद उतने काम नहीं आयेंगे। 
दक्षिण अफ्रीका का एक सिद्धान्त लोकस-फोकस है जिसमें इस बात की गुंजाइष रहती है कि निहित उद्देष्य और स्थान पर उपजाऊ बल खर्च किया जाय। ध्यानतव्य हो कि 1960 के दषक में अमेरिकी समाज उथल-पुथल से भरा था। वियतनाम युद्ध, औद्योगिकरण, तीव्र नगरीकरण आदि प्रषासन के सामने नई चुनौतियां खड़ी की थीं जिससे उस दौर का प्रषासन निपटने में नाकाम रहा। तब प्रषासन के सिद्धान्त एवं व्यवहार की समीक्षा मिन्नोब्रुक सम्मेलन के तहत की गई। तभी से नूतन प्रविधियों का जन्म हुआ। 60 के दषक से 90 तक के बीच भारत भी इस मांग की ओर जा चुका था कि यहां भी नई प्रवृत्ति स्थान घेरे जिसका नतीजा उदारीकरण था पर अब इस पर भी ढ़ाई दषक खर्च हो चुके हैं। जाहिर है इसमें भी नयापन भरने की जरूरत है। 
सुधारात्मक प्रयासों के तहत बाजार और निजी क्षेत्र की भूमिका अब तीव्र स्थान ले रही है जबकि सरकार संरक्षक की भूमिका में है। सुषासन और सुराज को लेकर नये-नये पैमाने गढ़ने की कोषिष भी की जा रही है। यही कारण है कि प्रषासनिक, राजनीतिक प्रणाली में व्यापक सुधार की आवष्यकता पड़ी है। नीति आयोग इसी का परिणाम है। इतना ही नहीं सरकार को अधिक जनमित्र और संवेदनषील बनने की भी आवष्यकता है। नागरिक, प्रषासन और सरकार के अन्तरसम्बन्ध पहले से प्रगाढ़ हुए हैं और यह वर्तमान दौर की जरूरत भी है। प्रधानमंत्री मोदी जिस तर्ज पर जनता से संवाद करना चाहते हैं उसमें पुराने सिद्धान्त प्रचुर मात्रा में षायद ही काम कर पायें। ऐसे में नियमों को भी खुली हवा में सांस लेने का अवसर देना होगा जिसे कर पाने में मोदी सक्षम दिखाई देते हैं। राजनीतिक उत्तरदायित्व और नौकरषाही की जवाबदेहिता साथ ही सूचना और संचेतना के इस दौर में मानव अधिकारों को लेकर चिंतायें बढ़ी हैं। ऐसे में सरकार और प्रषासन को ऐसी सेवा से सम्बन्धित होना है जो दक्ष हो, न्यायिक हो और विष्वसनीय भी हो ताकि उसे बदले दौर के हिसाब से कहीं अधिक न्यायोचित करार दिया जा सके। यह व्यवस्था पहले चाहे जैसी रही हो पर अब इस सिद्धान्त को अपनाये बगैर वैष्विक फलक पर उठान लेना मुष्किल होगा।



सुशील कुमार सिंह

मोदी, राहुल और किसान

मोदी जी किसानों के बीच नहीं जाते क्योंकि 15 लाख का सूट गंदा हो जायेगा। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अक्सर अपने वक्तव्य में कुछ इसी प्रकार के षब्दों के साथ प्रधानमंत्री मोदी पर प्रहार करना नहीं भूलते। बीते कुछ दिनों से उत्तर प्रदेष में उनकी खाट पंचायत वाली रैली जिस तर्ज पर चुनावी मुहिम को अंजाम देने की कोषिष में है उसमें यह भी झलकता है कि उनका अपना एजेंडा पीछे और मोदी पर निषाना आगे है। आजमगढ़ में बीते रविवार एक बार फिर तंज भरे लहज़े में राहुल गांधी ने रैली में लोगों से पूछा क्या आपने कभी नरेन्द्र मोदी की किसी किसान के साथ फोटो देखी है? स्वयं जवाब देते हुए कहा नहीं देखी क्योंकि उनके कपड़े गंदे हो जायेंगे। यही वजह है कि वो आपके बीच नहीं आते और ओबामा से मिलने अमेरिका जाते हैं। इसके अलावा उन्होंने बसपा और सपा पर भी निषाना साधा। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बीते एक सप्ताह से उत्तर प्रदेष की अपनी किसान यात्रा में विरोधियों की लानत-मलानत कर रहे हैं। मामले को समझना कठिन नहीं है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। जाहिर है आगामी वर्श के मुहाने पर उत्तर प्रदेष का विधानसभा चुनाव खड़ा है और 1989 से लगातार सदस्यों के मामले में वह यहां दहाई से आगे नहीं बढ़ पाई है। इस बार इस सूखे को खत्म करने की फिराक में ये सब कुछ किया जा रहा है। इसी के चलते तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी षीला दीक्षित को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में उत्तर प्रदेष में उतार कर राजनीति की चाल कांग्रेस द्वारा पहले ही चली जा चुकी है। रोचक यह भी है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में चाय पर चर्चा जोरों पर थी तो उत्तर प्रदेष में राहुल गांधी की खाट पंचायत इन दिनों पर है। 
किसानों की रैली भारतीय राजनीति में किसानों की समस्या के समाधान के लिए होती रही या उनके अंदर छुपे वोट को आकर्शित करने के लिए इस पर भी नजरिया साफ होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी जब 2014 में षीत सत्र के बाद भूमि अधिग्रहण अध्यादेष लागू किया था तब देष भर के किसानों ने इसका विरोध किया था। 2015 के बजट सत्र के दौरान दिल्ली में भारत के आधे राज्यों से अधिक दूर-दराज से आये किसानों ने अपनी जमीन बचाने के लिए यहां जमकर हल्ला बोला था तभी से मोदी पर यह आरोप जड़ दिया गया कि वे किसान के हितैशी नहीं हैं। इतना ही नहीं उन्हें उद्योगपतियों का हित साधक के रूप में प्रचार-प्रसार किया जाने लगा। हांलाकि कई प्रयासों के बावजूद अभी भी उनका उद्योगपतियों के प्रति आकर्शण में घटाव नहीं माना जाता है। यह भी सही है कि मोदी ने 2016 के आम बजट में किसानों के लिए काफी कुछ करने की कोषिष की है। इस बजट को गांव उन्मुख बजट की भी संज्ञा दी गयी। यहां तक कि यह भी कहा जाने लगा कि इस बजट के माध्यम से मोदी अपनी छवि बदलना चाहते हैं। गौरतलब है कि वर्श 2015 के मार्च-अप्रैल में दर्जनों बार हुए बेमौसम बारिष से रबी की फसलें चैपट हो गयी थी और थोक के भाव किसानों ने आत्महत्या किया था जबकि कमजोर मानसून के चलते खरीफ की फसल की पैदावार में भी जोरदार गिरावट आई थी जिसके चलते किसानों की बची खुची उम्मीद भी हाषिये पर चली गयी थी। यह एक ऐसा दौर था जब किसी भी सरकार को एक बेहतर कार्यपालक की भूमिका में होना चाहिए था। प्रधानमंत्री मोदी पर यहां भी आरोप रहा कि किसानों के नुकसान की भरपाई में वे विफल रहे। हालांकि सरकार की ओर से किसानों के नुकसान को लेकर संजीदगी तो दिखाई गयी पर यह पड़ताल का विशय है कि मोदी का रिपोर्ट कार्ड इस मामले में कितना बेहतर है।
संदर्भ तो यह भी है कि किसान यात्रा करने वाले राहुल गांधी यह क्यों भूल जाते हैं कि मोदी से पहले 10 बरस की सरकार केन्द्र में उन्हीं के दल की रही है। उन्होंने 2004 से 2014 के बीच किसानों के लिए क्या किया आखिर इसका भी हिसाब कौन देगा? एक विपक्षी होने के नाते यदि राहुल गांधी इसका जवाब देना जरूरी नहीं समझते तो सरकार चला रहे मोदी पर किसानों को लेकर इतनी लानत-मलानत क्यों कर रहे हैं? मोदी पहले भी कह चुके कि राज्य सहयोग करे तो 2022 तक किसानों की इनकम दोगुनी कर देंगे। उन्होंने यह भी कहा है कि आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए कृशि को पहली प्राथमिकता बनाने की जरूरत है। गौरतलब है कि मोदी अपनी चुनावी रैलियों में भी किसानों के जीवन को ऊँचाई देने के तमाम वादे किये थे पर इसमें सफल कितने हुए यह बात भी साफ होनी चाहिए। किसानों को भारत की जान बताने वाले प्रधानमंत्री यह भी मानते हैं कि इनकी समृद्धि के बगैर देष की खुषहाली की बात सोची नहीं जा सकती। बावजूद इसके इनकी किसान विरोधी छवि क्यों है? देखा जाये तो केन्द्र सरकार ने किसान के हित में प्रधानमंत्री फसल बीमा, सिंचाई बीमा, मृदा राजस्व कार्ड जैसी कई योजनायें षुरू की है। जरूरत है कि राज्य कृशि और किसानों के काम को अपनी प्राथमिकता में लेकर दिगदर्षित करने की। बुंदेलखण्ड की हालत किसी से छुपी नहीं है। बेषक बसपा और सपा को इसके लिए कसूरवार ठहराया जा सकता है। हालात यह हैं कि पांच नदियों वाला बुंदेलखण्ड में ट्रेन से पानी भेजा जाता है। राहुल गांधी को पूर्वी एवं पष्चिमी उत्तर प्रदेष ही नहीं बल्कि बुंदेलखण्ड की भी चिंता करनी चाहिए और उन्हें भी यह जवाब देना चाहिए कि दस साल तक केन्द्र में रहते हुए बुंदेलखण्ड को संकट से उबारने में उन्होंने क्या किया?
साढ़े छः लाख गांवों से भरे भारत में अभी भी दो दृश्टिकोण चलते हैं एक ग्रामीण भारत तो एक षहरी। षहरी भारत का अपना जोखिम और अपनी समस्या है पर ग्रामीण भारत की बुनियादी समस्या यह है कि दो लाख से अधिक गांव अभी भी बिजली, पानी के लिए तरस रहे हैं। 2019 तक हर गांव में बिजली पहुंचाने की बात कही जा रही है। उत्तर प्रदेष के हजारों गांवों में अभी भी बिजली का खंभा नहीं गड़ा है और जहां गड़ा है वहां बिजली नहीं पहुंची है और जहां बिजली पहुंची है वहां भी पूरे मन से यह नहीं कहा जा सकता कि स्थिति संतोशजनक है। राहुल गांधी किसानों की बेहतरी चाहते हैं। पंजाब में भी उन्होंने मोदी को कई बार ललकारा कि यहां आकर किसानों की हालत देखें पर वही सवाल फिर खड़ा होता है कि क्या वाकई में राहुल गांधी किसानों के बड़े हितैशी हैं या फिर प्रधानमंत्री मोदी किसानों को लेकर अछूत राय रखते हैं। बड़ा सच यह है कि सियासी भंवर में जब भी किसानों को धकेला जाता है तो सियासतदान के हिस्से में मलाई और किसानों के हिस्से में सूखी रोटी ही आई है जब चुनाव सिर पर मंडराने लगता है तब खेत-खलिहान में नेता उग जाते हैं। इस वादे के साथ कि सत्ता पाने के बाद उनकी जिन्दगी को चकमक कर देंगे पर पिछले 65 वर्शों में सियासी हाथों से छले जाने वाले किसान क्या इन बातों पर एक बार फिर भरोसा कर सकते हैं। आधारभूत संरचना से कटे गांव और वहां के बाषिन्दे एक बेहतर सरकार लाने की बेचैनी में तो रहते हैं पर वह छले नहीं जायेंगे इसकी गारंटी कौन लेगा। इस बात को समझना भी मर्म से भरा होगा कि चाहे राहुल गांधी की किसान रैली हो या प्रधानमंत्री मोदी की या फिर किसी और सियासतदान की सत्ता हथियाने के बाद उनका रूख किसानों के प्रति क्या वैसा रहता है? क्या किसानों की उम्मीदों पर वे खरे उतरते हैं? जब ऐसा नहीं होता तब मन मारकर आखिरकार किसानों को अपनी किसमत के सहारे एक बार फिर जीवन ढोना ही पड़ता है।



सुशील कुमार सिंह


Thursday, September 8, 2016

अधूरे होमवर्क की वजह भी है डेंगू.

यह बेहद चिन्ताजनक है कि इन दिनों कई प्रदेष डेंगू की मार झेल रहे हैं। डेंगू और मलेरिया के प्रकोप बढ़ने के बीच एक खबर यह भी है कि श्रीलंका मलेरिया मुक्त हो गया है। हिन्द महासागर का एक छोटा सा द्वीप और भारत के दक्षिण में सबसे नज़दीकी पड़ोसी श्रीलंका से आई इस खबर से दो परिप्रेक्ष्य उभरते हैं एक यह कि यदि कोषिष की जाय तो मलेरिया जैसी बीमारी से न केवल निपटा जा सकता है बल्कि इससे मुक्ति भी पाई जा सकती है। दूसरा यह कि भारत में इसकी मुक्ति की डेडलाइन 2030 है। जाहिर है यहां भी कुछ सीख लेने की जरूरत है। पिछले पांच साल की तुलना में इस साल डेंगू के सबसे ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। भारत के कई प्रान्त कमोबेष इसकी चपेट में है। हिमालय में बसे और ठण्डे इलाके के लिए जाना जाने वाला उत्तराखण्ड भी इन दिनों डेंगू की चपेट में है। विगत् दो माह से यहां मरीजों की संख्या निरंतर वृद्धि लिए हुए है। वर्तमान में पूरे प्रदेष में यह आंकड़ा साढ़े सात सौ के आस-पास है जिसमें सात सौ से अधिक मामले तो राजधानी देहरादून से हैं। हैरत और रोचक तथ्य तो यह भी है कि प्रदेष के बड़े से बड़ा आला अफसर देहरादून में रहता है बावजूद इसके चैकसी की कमी के चलते और सरकारी तंत्र की लचर कार्यप्रणाली ने मरीजों की संख्या बढ़ाने में काफी मदद की है। दरअसल डेंगू की रोकथाम और इसके उपचार के मामले में प्रदेष की पूरी व्यवस्था केवल सरकारी अस्पतालों तक सिमटी हुई है जबकि यहां के अस्पतालों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। राजधानी का दून हाॅस्पिटल मरीजों के दबाव में हांफने लगता है। पारिस्थितिकी और अन्य समस्याओं के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं हमेषा से ही चरमराई रही है जिसे देखते हुए हर बीमारी के उपचार का रूख देहरादून की ओर रहता है। 
डेंगू के बचाव के लिए लोगों को जागरूक रहने की नसीहत देने वाला स्वास्थ्य महकमा भी स्वयं इसकी चपेट में है। क्या पुलिस, क्या प्रषासन और क्या चिकित्साकर्मी सभी को इसका डंक लग चुका है। अभी तक डेंगू का मच्छर मलीन बस्तियों व अन्य काॅलोनियों में ही आतंक मचा रहा था लेकिन अब इस प्रकोप की चपेट में चिकित्सालय भी आ चुके हैं। दून मेडिकल काॅलेज चिकित्सालय के महिला विंग में स्टाफ के ग्यारह लोगों को डेंगू हुआ है जिसमें डाॅक्टर, नर्स और वाॅर्ड ब्वाॅय सभी षामिल हैं। इतना ही नहीं दून अस्पताल की पैथोलाॅजी में ब्लड सैम्पल इक्ट्ठा करने वाले मरीजों के हालचाल पूछने तक से काम नहीं चलेगा इस पर कोई ठोस कदम उठाना होगा। हालांकि मुख्यमंत्री ने इसके लिए कई कदम उठाये हैं पर हालात को देखते हुए यह नाकाफी कहे जायेंगे। यहां के स्वास्थ्य मंत्री ने कह दिया है कि अकेले स्वास्थ्य विभाग का काम डेंगू से निपटना नहीं है। अपर पुलिस अधीक्षक समेत कई कानून के रखवाले भी डेंगू की मार झेल रहे हैं। जिस कदर प्रदेष में डेंगू को लेकर कहर बरपा है जाहिर है उसे देखते हुए सरकार की नींद भी टूटी है। दहषत अभी बरकरार है और इसके बीच उपचार और निदान के रास्ते खोजे जा रहे हैं। षहर की सफाई व्यवस्था के लिए अतिरिक्त तैनाती की जा रही है। फाॅगिंग मषीनों के लिए अलग से बजट भी मंजूर किये जा रहे हैं। कुछ समाज सेवी संगठन बदहाल स्वास्थ्य सेवा को लेकर स्वास्थ्य मंत्री का इस्तीफा भी मांग रहे हैं। फिलहाल प्रदेष में डेंगू को लेकर क्या स्थिति है इसका भी कोई स्थिर सरकारी आंकड़ा नहीं है। रोजाना आंकड़ों की तस्वीर बदलती जा रही है। हालांकि जिस खौफनाक मंजर तक डेंगू ने क्षेत्र विषेश को कब्जे में लिया है उसे देखते हुए स्पश्ट है कि आने वाले दिनों में इससे निपटने हेतु तंत्र को और गम्भीर बनना होगा। 
उत्तराखण्ड समेत भारत के कई प्रदेष इस जानलेवा समस्या से जूझ रहे हैं। कुछ इलाके तो ऐसे हैं जहां डेंगू के सैकड़ों मरीज हैं। पष्चिम बंगाल में इस साल डेंगू से सबसे ज्यादा मौत की सूचना है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि राज्य में अगस्त में 22 लोगों की मौत हो गई जबकि पिछले साल यहां इसी बीमारी से मरने वालों की संख्या 14 थी। बंगाल के बाद उड़ीसा और केरल का नाम आता है, इसके बाद कर्नाटक को देखा जा सकता है। दिल्ली में दो लोगों की मौत की बात कही गयी है। इस साल अब तक देष के डेंगू प्रभावित राज्यों में करीब 28 हजार के आस-पास मामले रहे हैं जिसमें 60 की मौत बताई गयी है। देखा जाय तो डेंगू जैसी बीमारी प्रतिवर्श बढ़त के साथ गिरफ्त में लेती रहती है। डेंगू से बचाव का सबसे प्रभावषाली तरीका मच्छरों की आबादी पर काबू करना है। इसके लिए लार्वा पर नियंत्रण करना होता है या फिर वयस्क मच्छरों की संख्या पर। एडीज़ मच्छर कृत्रिम जल संग्रह पात्रों में जनन करते हैं जैसे टायर, बोतल, कूलर, गुलदस्ते आदि। इन जल पात्रों को अक्सर खाली करना चाहिए। यही लार्वा पर नियंत्रण का सबसे अच्छा तरीका है जबकि वयस्क मच्छरों को काबू में लाने के लिए कीटनाषक धुंए का सहारा लिया जाता है। कहने का आषय यह हुआ कि मच्छर को काट देने से रोकने का तरीका भी डेंगू से बचना है अर्थात् होमवर्क सटीक हो तो डेंगू को भयावह रूप लेने से रोका जा सकता है। खास यह भी है कि इस प्रजाति के मच्छर दिन में काटते हैं जिसे देखते हुए मामला गम्भीर बन जाता है। उपरोक्त बिन्दु से यह भी स्पश्ट होता है कि क्लीन इण्डिया भी इस बीमारी से निजात के बारे में मददगार सिद्ध हो सकता है। इसके अलावा जन जागरूकता और सरकारी महकमे के द्वारा इसके बचाव में उठाये गये कदम भी मारक सिद्ध हो सकते हैं पर ऐसा देखा गया है कि सरकारें अपनी दिनचर्या में ऐसे बिन्दुओं को दरकिनार रखती है और जब पानी सर के ऊपर जाता है तब वे भी गति में आ जाते हैं। 
देखा जाय तो दुनिया भर के कई देष डेंगू के प्रकोप में कभी न कभी रहे हैं। एषिया पेसिफिक के देषों में भारत समेत आॅस्ट्रेलिया, चीन, इण्डोनेषिया, मलेषिया, पाकिस्तान, फिलिपीन्स समेत कई देष समय-समय पर इस भयावह समस्या से गुजरते रहे हैं। वैसे तो डेंगू एक उश्णकटीबंधीय देषों की समस्या है। ऐसे में साफ है कि ज्यादातर डेंगू की समस्याएं कर्क और मकर रेखा के बीच स्थित देषों को होती है। हालांकि जिस प्रकार से जलवायु परिवर्तन अपनी बदलाव की मुहिम में है उसे देखते हुए बीमारी के विन्यास और विस्तार दोनों में बड़ा अन्तर आया है। अब बीमारियों का भी ग्लोबलाइजेषन हो रहा है। मौजूदा परिस्थिति में जीका, चिकनगुनिया, मलेरिया, स्वयं डेंगू इसका बेहतर उदाहरण है। एक सच यह भी है कि डेंगू के डंक से सरकारें भी बौनी हो जाती हैं और स्वास्थ्य के मामले में बड़े-बड़े दावे करने वाले महकमे बीमारियों के आगे घुटने टेकते हुए दिखाई देते हैं। स्पश्ट है कि सरकार को ऐसे मामलों में प्राथमिकता के साथ कदम उठाना चाहिए पर हैरत इस बात की है कि पर्याप्त सुविधाओं के आभाव में बड़ी से बड़ी बहुमत वाली सरकारें जो लोक कल्याण की भावनाओं से युक्त होती हैं वे भी आम जनता की तरह ही मजबूर हो जाती हैं। कुछ प्रदेषों में निजी क्षेत्र के अस्पतालों का अच्छा खासा विस्तार है, उत्तराखण्ड भी इसमें षुमार है। सरकार को चाहिए कि जन स्वास्थ्य अधिनियम व क्लीनिकल इस्टैब्लिष्मेंट एक्ट का पालन मजबूती से सुनिष्चित कराये। सरकारी के साथ निजी अस्पतालों का तालमेल बिठाये ताकि पैर पसार रही बीमारियों से निपटना आसान हो जाय साथ ही यह नहीं भूलना चाहिए कि आम जन की जिम्मेदारी इस मामले में सरकार से पहले है। 


सुशील कुमार सिंह


Wednesday, September 7, 2016

पिटी लकीर पर हुर्रियत

हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं की ओर से पहले पाकिस्तान से बातचीत की षर्त से एक बार फिर यह साफ हो गया कि दषकों से कष्मीर की घाटी में जड़े जमा चुके अलगाववादी कष्मीर के हितैशी तो कतई नहीं हैं और यह भी स्पश्ट कर दिया कि पिटी लकीर पर ही चलना इनकी फितरत है। जिस तर्ज पर बातचीत बेनतीजा रही उससे भी यह संकेत मिलता है कि हुर्रियत के नेताओं और सरकार के बीच कोई तालमेल था ही नहीं। हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस पर स्पश्ट कह दिया है कि हम पहले देष में रहने वाले लोगों से बात करेंगे, पाकिस्तान से बात करने का कोई सवाल ही नहीं उठता जबकि हुर्रियत कांफ्रेंस पाकिस्तान को साथ लिये बिना चलना ही नहीं चाहता। ऐसे में आगे क्या होगा कहना बहुत मुष्किल है। देखा जाय तो सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल के घाटी दौरे से मुख्य धारा के राजनीतिक दलों को एक साथ लाने में सरकार को सफलता तो मिली परन्तु कष्मीर में षान्ति बहाली को लेकर चुनौती कहीं से कम नहीं हुई। अलगाववादियों ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल के सदस्यों से बात न करके एक और कोषिष को नाकाम कर दिया है। पाकिस्तान परस्त हुर्रियत जिस घाटी के ठेकेदार बनने की कोषिष करते हैं वे उसी के रसूक को तिनका-तिनका करने में दषकों से प्रयासरत् हैं। संदर्भ और परिप्रेक्ष्य तो यह भी है कि दो महीने से कष्मीर कफ्र्यू से कराह रहा है और अलगाववादी अपने सियासी बाजार को गरम किये हुए हैं। 
आॅल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस जम्मू-कष्मीर के 23 विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठनों का गठबंधन है जो कष्मीर के भारत से अलगाव की वकालत करता है और भारतीय सेना की कार्यवाही को सरकारी आतंकवाद तक का नाम देता है। इतना ही नहीं कष्मीर पर भारत के षासन के खिलाफ हड़ताल और प्रदर्षन करता है साथ ही 15 अगस्त और 26 जनवरी के समारोहों का बहिश्कार भी करता रहा है। हुर्रियत स्वयं को कष्मीरी जनता का असली प्रतिनिधि बताता है परन्तु अभी भी यह एक भी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। कष्मीर के इतिहास में दर्ज हुर्रियत एक ऐसा राजनीतिक मोर्चा है जिसका एक सूत्रीय काम कि घाटी में चैन पसरने न दिया जाय। इसके अलावा षान्ति प्रक्रिया के प्रयास को भी पाकिस्तान के बहाने हमेषा हाषिये पर फेंकता रहा है। नवम्बर, 2000 में भारत सरकार के एकतरफा युद्ध विराम और षान्ति प्रक्रिया षुरू करने के एलान के बाद हुर्रियत कांफ्रेंस ने बातचीत में पाकिस्तान को भी षामिल करने की मांग की और यह भी मांग की कि वह अपना एक दल पाकिस्तान भेजकर चरमपंथी संगठनों से भी बात करना चाहता है जिसे भारत ने ठुकरा दिया। केन्द्र सरकार ने केसी पंत को कष्मीरी चरमपंथियों से बात करने के लिए नियुक्त किया। कई दिनों के उठा-पटक के बाद हुर्रियत ने बातचीत की पेषकष को ठुकरा दिया। तब हुर्रियत नेता अब्दुल गनी बट ने कहा था कि पाकिस्तान जाने की अनुमति नहीं दी इसलिए ऐसा किया और इस बार की बातचीत का बेनतीजा होने में पाकिस्तान ही नासूर है।
जम्मू-कष्मीर में अलगाववादियों पर सरकार प्रत्येक वर्श करोड़ों खर्च कर रही है जबकि आम कष्मीरी अभी भी कमाई के मामले में बहुत पीछे छूट गया है। पिछले दो महीने से जब से घाटी उथल-पुथल में फंसी है तब से वहां के स्कूल, काॅलेज बंद पड़े हैं जिससे षिक्षा व्यवस्था भी चैपट हो रही है। पिछले पांच वर्श में राज्य सरकार अलगाववादी नेताओं पर पांच सौ करोड़ से अधिक खर्च कर चुकी है जबकि जम्मू-कष्मीर के सर्व षिक्षा अभियान का बजट इससे कम है। प्रत्येक वर्श सौ करोड़ रूपए से अधिक इन नेताओं की सुरक्षा पर खर्च होता है। इतना ही नहीं करोड़ों रूपए पैट्रोल, डीजल पर खर्च कर दिये जाते हैं। एक ओर अलगाववादी देष को करोड़ों का घाटा करा रहे हैं तो दूसरी तरफ घाटी में अवसरवाद का जहर बोकर अमन-चैन को निगल रहे हैं। घाटी में कष्मीरी किस हाल में है इसकी फिक्र षायद ही उन्हें हो। 2011 की जनगणना के अनुसार देष की साक्षरता 74 फीसदी से थोड़ा अधिक है जबकि जम्मू-कष्मीर में यह दर 65.5 फीसदी है। आय के मामले में भी यह प्रांत काफी पिछड़ा माना जाता है। यहां प्रति व्यक्ति आय 60 हजार से कम है। इस मामले में यह दूसरे प्रांतों की तुलना में 25वें स्थान पर है और प्रति व्यक्ति कर्ज का औसत तो और भयावह है। सैयद अली षाह गिलानी, उमर फारूख और यासीन मलिक समेत कई अलगाववादी नेता रसूख के मामले में कईयों को पीछे छोड़ने की कूबत रखते हैं। 
हिजबुल मुजाहिद्दीन के बुरहान वानी के जुलाई में मारे जाने के बाद से घाटी में अषान्ति की स्थिति बनी हुई है। महबूबा मुफ्ती की सरकार यह कह चुकी है कि मुट्ठी भर लोगों ने यहां का चैन छीना है पर उन पर काबू कैसे पाया जाय इस मामले में उन्हें भी कुछ सुझाई नहीं दे रहा है। भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चला रही पीडीएफ पर भी यह आरोप खूब लगता रहा कि अलगाववादियों को संरक्षण देने के काम में यह पीछे नहीं है। यही कारण है कि भाजपा की भी लानत-मलानत समय-समय पर होती रही है और तंज कसा जाता रहा कि घाटी में सत्ता मोह के चलते भाजपा ने बेमेल समझौता कर लिया है। फिलहाल आतंकियों के मारने पर देष के अंदर रहनुमा क्यों पैदा हो जाते हैं और क्यों हालात बिगाड़ते हैं। इस सवाल का भी जवाब किसी के पास अभी नहीं है। कष्मीर की बनावट में मुष्किलें कई हैं और इसमें हुर्रियत जैसे अलगाववादी और कठिन राह बना देते हैं पर एक सच्चाई यह भी है कि कष्मीर के अलगाव को लेकर भी हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं में आम राय नहीं हैं। कुछ कष्मीर के पाकिस्तान में विलय की बात करते हैं जबकि जम्मू-कष्मीर लिब्रेषन फ्रण्ट स्वतंत्रता की बात करता है। अब्दुल गनी बट कष्मीर को राजनीतिक मुद्दा बताते हैं जबकि सैयद अली षाह गिलानी इसे एक धार्मिक मुद्दा मानता है। जाहिर है राय जुदा तो है पर षान्ति के खिलाफ दोनों खड़े हैं। राजनाथ सिंह के इस बयान से जिसमें उन्होंने कहा है कि कि हुर्रियत नेताओं का सलूक यह दर्षाता है कि उनका कष्मीरियत, इंसानियत और जमूरियत में यकीन नहीं है। यह लाख टके से भरा सच है। इसके अलावा एक और सच यह है कि हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठनों की पैदाइष षान्ति बहाली के लिए नहीं, उथल-पुथल के लिए ही हुआ है।



सुशील कुमार सिंह


Tuesday, September 6, 2016

नतीजे वाले एजेंडे की ज़रूरत

आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी का एजेंडा बिल्कुल स्पश्ट रहता है और जब मंच अन्तर्राश्ट्रीय होता है तो वे इसकी गति और बढ़ा लेते हैं। मोदी ने ब्रिक्स नेताओं की बैठक में आतंक को लेकर बिना नाम लिए पाकिस्तान पर कड़ा प्रहार किया उन्होंने कहा कि आतंकवाद, इसके प्रयोजकों और समर्थकों पर समूह के देष सख्त कार्यवाही करें ताकि इन्हें अलग-थलग किया जा सके। ठीक दूसरे दिन सोमवार को जी-20 के सम्मेलन में उन्होंने यहां तक कहा कि दक्षिण एषिया में सिर्फ एक देष आतंक के एजेंट फैला रहा है। जाहिर है दोनों बार निषाना पाकिस्तान पर ही था। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी पहले भी आतंकवाद को लेकर चिंता जता चुके हैं परन्तु विष्व समुदाय आतंक पर रोक लगाने के मामले में न तो उतना प्रतिबद्ध दिखाई दिया और न ही इस मामले में लिये गये संकल्प में मजबूती दिखाई देती है। दक्षिण एषिया या किसी अन्य क्षेत्र में आतंकियों के पास न तो बैंक हैं और न ही हथियारों का कारखाना। इससे साफ है कि कोई न कोई उन्हें पैसा और हथियार दे रहा है। ब्रिक्स की अवधारणा को एक समुच्च रूप देने में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका को देखा जा सकता है। भारत इस संगठन का अध्यक्ष होने के चलते आगामी 15-16 अक्टूबर को होने वाले 8वें ब्रिक्स षिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। हालांकि मोदी ने बिना नाम लिये आतंक को लेकर कार्यवाही करने की जो बात कही है उससे भी यह स्पश्ट कर दिया है कि वैष्विक मंच पर भारत आतंकवाद की चर्चा किये बिना चैन से तो नहीं बैठने वाला साथ ही पाकिस्तान जैसे देष जब तक आतंक की पाठषालाओं पर लगाम नहीं लगायेंगे तब तक वे आड़े हाथ लिये जाते रहेंगे। जाहिर है कि वर्तमान में आतंकवाद वैष्विक फलक पर हिंसा, उत्पात तथा अस्थिरता का मुख्य कारण बना हुआ है साथ ही किसी भी देष और समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा भी। ऐसे में यह चिंता अकेले भारत की ही नहीं हो सकती। 
बीते रविवार को चीन के होंगझोऊ में जी-20 का 11वां षिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इस षिखर सम्मेलन में कई नई समावेषी और वैचारिक प्रभावषीलता का परिदृष्य भी उभरता दिखाई देता है। नवम्बर, 2008 से वांषिंगटन डीसी से प्रारम्भ इस मंच की यात्रा में कई समसमायिक आयाम भी जुडे़ हैं। असल में जी-20 षिखर सम्मेलन वैसे तो वैष्विक-आर्थिक समस्याओं पर विमर्ष करने का एक साझा मंच है परन्तु वर्तमान में अब यह देषों के बीच समरसता और आर्थिक उदारता का भाव भी समेटे हुए है। प्रधानमंत्री मोदी ने जी-20 सम्मेलन में आर्थिक नरमी से निपटने के लिए 10 खास बातें बताते हुए कहा कि गूढ़ बातचीत करना ही काफी नहीं है बल्कि जी-20 के सदस्य देषों की ओर से सम्मिलित, समन्वित और लक्षित कार्यवाही करने की भी जरूरत है। मोदी जताना चाहते हैं कि जी-20 दुनिया में जिस दृश्टि से देखा जाता है उस कसौटी पर उसे षब्दांषतः खरा उतरना चाहिए साथ ही, साथ होने का दावा ही न करें बल्कि हम साथ-साथ हैं की अवधारणा पर भी चलें। चर्चा-परिचर्चा का वैष्विक परिप्रेक्ष्य चाहे जैसा हो पर नतीजे तो जी-20 के भी बेहतर नहीं रहे हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने नतीजे वाले एजेण्डे की जरूरत बताई। मोदी का यह कहना कि हम ऐसे समय में मिल रहे हैं जब दुनिया जटिल राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही है। इससे भी साफ है कि वे हालिया वैष्विक विकास की अवधारणा और तत्काल में मचे उथल-पुथल से संतुश्ट नहीं है तभी तो उन्होंने वित्तीय प्रणाली में भी सुधार की जरूरत बताई। इतना ही नहीं घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन, बुनियादी ढांचे के विकास के लिए निवेष बढ़ाने से लेकर मानव पूंजी का सृजन करने जैसों पर मोदी का जोर था। हाल ही में डिजिटल क्रान्ति को समाज के सबसे निचले तबके तक पहुंचाने का उनका आह्वान भी इससे जोड़कर देखा जा सकता है।
मानचित्र पर दो सौ से अधिक देषों की जमावट देखी जा सकती है जिसमें सभी एक जैसे सम्पन्न नहीं हैं। आज भी एषिया, मध्य अफ्रीका तथा दक्षिण अमेरिका के कई देष बुनियादी विकास के लिए तरस रहे हैं और षेश दुनिया मालामाल तो है परन्तु आतंक के अन्तर्राश्ट्रीय स्वरूप और जलवायु परिवर्तन की चिंताओं से वे भी मुक्त नहीं हैं। भारत, अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैण्ड तथा आॅस्ट्रेलिया समेत कई देष आतंक की जद् में फंसे हैं साथ ही जलवायु परिवर्तन की चिंता में पूरा विष्व घुला जा रहा है। भले ही आर्थिक उच्चस्थता कोई कितनी ही कायम कर ले और जीवन में तमाम सहूलियतों को स्थान दे दे पर बिना इन समस्याओं से निपटे सजग विष्व का निर्माण सम्भव नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी का यह तीसरा जी-20 सम्मेलन है। जब उन्होंने पहली बार 9वें षिखर सम्मेलन में आॅस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में षामिल हुए थे तब उन्होंने काले धन और आतंकवाद को लेकर अतिरिक्त संवेदनषीलता दिखाई थी जिसमें सफल भी रहे। जी-20 का षिखर सम्मेलन नवम्बर, 2015 मेु तुर्की में हुआ तब भी मोदी ने आतंकवाद से मुकाबला जी-20 की बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए कहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि हमारी बैठक आतंकवाद के खौफनाक साये में हो रही है। इसके अलावा उन्होंने जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के लिए सात सूत्रीय एजेंडे का प्रस्ताव किया पर आतंकी गतिविधियां बेलगाम जारी हैं बल्कि कहा जाय तो तुलनात्मक बढ़ी भी हैं जबकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्बन क्रेडिट से ग्रीन क्रेडिट की ओर जाने की जरूरत से लेकर ईंधन की खपत घटाने तक का विचार अभी भी खटाई में है। मुष्किल यह भी है कि जो परिवर्तन कर सकते हैं उनमें भी एकाकीपन की कमी है। षायद यही कारण है कि बड़े मंच और बड़े सम्मेलन की थ्योरी आती-जाती रहती है पर समस्याएं ठहरी रहती हैं। यदि इसकी भी पड़ताल की जाये कि इस मामले में सर्वाधिक चिंतिंत कौन है तो बेषक भारत ही आगे दिखाई देगा।
पड़ताल भी यह बताती है कि दुनिया की 43 फीसदी आबादी ब्रिक्स के पांच देषों में रहती है जो उभरती हुई अर्थव्यवस्थायें हैं। वैष्विक सकल घरेलू उत्पाद में इनका 37 फीसदी हिस्सा है जबकि वैष्विक कारोबार में हिस्सेदारी 17 प्रतिषत है। इस आंकड़े से बाहर निकलकर देखा जाये तो जी-20 के षामिल सदस्यों का वैष्विक सकल घरेलू उत्पाद 85 फीसदी मिलता है। साफ है कि जी-20 और ब्रिक्स जैसे देषों की वैष्विक फलक पर बड़ी एहमियत है और यहां से निकले नतीजे प्रभावषाली भी होते हैं पर धरातल पर कितने साबित होंगे अभी कहना कठिन है। जी-20 के इसी सम्मेलन में चीनी राश्ट्रपति षी जिनपिंग से भी मोदी की मुलाकात हुई। बताते चलें कि यहां पहुंचने से पहले मोदी वियतनाम गये थे जहां दोनों देषों के बीच 12 अहम समझौते भी हुए हैं। 15 वर्श बाद किसी प्रधानमंत्री का वियतनाम के करीब होना चीन पर कूटनीतिक दबाव के काम भी आ रहा है। गौरतलब है कि दक्षिण चीन सागर के विवादित क्षेत्र में चीन अपना दबदबा बढ़ाने की कोषिष कर रहा है। हालांकि हाल ही में भारत, अमेरिका और जापान मिलकर यहां पर सैन्य अभ्यास के जरिये उसे घेरने की कोषिष कर चुके हैं। यह बात दुरूस्त है कि मोदी वैष्विक मंचों पर जो मषविरा देते हैं उसे बाकी देषों को स्वीकार करने में षायद ही कोई आपत्ति हुई हो। सम्मेलन में षिरकत कर रहे अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बार फिर कर सुधारों को लेकर मोदी की सराहना की है। गौरतलब है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री षरीफ की रणनीति का जवाब और पाक को छोड़कर पड़ोसी देषों को ब्रिक्स सम्मेलन में न्यौता देकर मोदी ने आतंक फैलाने वाले देष को अलग-थलग करने का इरादा जता दिया है। अब इस पर चलने की बारी षेश विष्व की है।
सुशील कुमार सिंह


अमेरिका की मान्यता बदल गया है भारत

अपनी चौथी भारत यात्रा पर आये अमेरिकी विदेष मंत्री जाॅन केरी की मान्यता है कि भारत बदल गया है जो सुनने में निहायत सुखद है पर पड़ताल का विशय है कि यहां कहां और कितना बदलाव हुआ है। पहली बार 1990 में भारत यात्रा पर आये केरी ने तब से अब में पाया है कि भारत पहले की तुलना में बिलकुल बदल गया है। भारत के दौरे पर आये अमेरिकी विदेष मंत्री ने सुशमा स्वराज की भी जमकर तारीफ की। कहा कि इन्हें भारत और यहां के लोगों की पैरोकारी करने में महारत हासिल है। इसके अलावा उनका यह भी मानना है कि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय सम्बंधों की मजबूती पर भारतीय विदेष मंत्री हमेषा अपने विष्वास पर कायम रही हैं। ये तमाम बातें उस समय उभरी जब जाॅन केरी और सुशमा स्वराज संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। इस दौरान अमेरिकी विदेष मंत्री की फस्र्ट नेम थ्योरी भी दिखाई दी। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस के समय कई बार भारतीय विदेष मंत्री को सुशमा कहकर पुकारा जो इस वाकये की ओर ध्यान खींचता है जब 2015 के गणतंत्र दिवस पर अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा भारत यात्रा पर थे तब ऐसे ही एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राश्ट्रपति को बराक कहकर सम्बोधित किया था। देखा जाय तो मोदी षासनकाल का लगभग ढ़ाई वर्श हो गया है। 26 मई, 2014 से प्रधानमंत्री की यात्रा षुरू करने वाले मोदी सितम्बर, 2014 में सप्ताह भर की यात्रा पर नवरात्र के उपवास के दिनों में पहली बार अमेरिका के दौरे पर थे तब इस बात का अंदाजा नहीं था कि अमेरिका भी इतना बदल गया है कि भारत से सम्बंध को लेकर बेहतरीन नतीजे के इंतजार में है। हालांकि इसे मोदी कूटनीति और उनकी रणनीति को वजह मानी जाती है। इसमें भी कोई षक नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी ने वैदेषिक नीति को लेकर जो मैराथन दौड़ लगाई वह षायद पहले कभी हुआ हो पर एक सच्चाई यह भी है कि दूसरी पारी खेल रहे अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा भी वैदेषिक परिप्रेक्ष्य को देखते हुए काफी उदार और भारत सानिध्य की ओर झुके थे। जाहिर है ऐसे में द्विपक्षीय सम्बंध का परवान चढ़ना स्वाभाविक था।
अमेरिकी विदेष मंत्री जाॅन केरी अभी भी भारत में ही हैं। भारत से अपनी रवानगी को दो दिन के लिए टाल दी है। ऐसा करने के पीछे इसी सप्ताह के अन्त में चीन में होने वाली जी-20 की बैठक है। असल में इस बैठक में अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा को षामिल होना है और जाॅन केरी को भी। ऐसे में उनके कार्यक्रम में यह बदलाव सम्भव हुआ है। ऐसा देखा गया है कि जब भी देष में अमेरिका का कोई भी राश्ट्राध्यक्ष या मंत्री होता है तो आतंकवाद पर जिक्र जरूर करता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि पड़ोसी पाकिस्तान को भारत की जमीन से कही गयी बात षायद अधिक असरदार लगती है। जाॅन केरी ने भारत और अफगानिस्तान में अषान्ति के जिम्मेदार पाकिस्तान में जमे आतंकी गुट को बताया। अमेरिका के इस रूख से आतंकी गुटों में बौखलाहट तो है ही साथ ही पाकिस्तान की भी परेषानी थोड़ी बढ़ती हुई दिखाई देती है। कष्मीर के नाम पर आतंक का खेल नहीं चलेगा जैसे संदर्भों की पड़ताल की जाये तो साफ है कि पाकिस्तान की पूरी ताकत घाटी को उलझाने में लगी रहती है जबकि सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि पाकिस्तान द्वारा कष्मीर मुद्दे की आड़ में अपनी धरती पर पल रहे आतंक से ध्यान हटाने की उसकी कोषिष सफल नहीं होगी। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान ने कष्मीर को लेकर हर तरह के हथकंडे अपनाये हैं और उसकी यह इच्छा रही है कि सीमा के भीतर सक्रिय आतंकवादी गुटों को कष्मीर में आंदोलन के नाम पर जायज़ ठहराये परन्तु ऐन मौके पर अमेरिका ने भारत के इस तर्क को महत्व दे दिया है कि आतंक का समर्थन किसी भी सूरत में नहीं किया जा सकता। कहा तो यह भी जा रहा है कि अमेरिका ने पठानकोट हमले से जुड़े मामले को स्वयं खंगाला है और उसे पता है कि हमले में पाकिस्तान ही है। बावजूद इसके कथन से बात आगे क्यों नहीं बढ़ती यह बात समझ से परे है।
इन दिनों देष के कई राज्य जलमग्न और बाढ़ की चपेट में भी है मानसूनी बारिष से दिल्ली भी बेअसर नहीं है। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी विदेष मंत्री जाॅन केरी के बीच हुई बैठक के दौरान यह चर्चा का विशय बन गयी। गौर-तलब है कि भारी बारिष के चलते जाॅन केरी का काफिला दो घण्टे तक बारिष में फंसा रहा। जाहिर है इस बदलाव को भी केरी ने महसूस किया होगा। इसी दिन उन्हें आईआईटी दिल्ली के छात्रों को सम्बोधित करना था। हल्के-फुल्के अंदाज में केरी ने छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आप सभी लोग आज यहां पहुंचने के लिए अवाॅर्ड के हकदार हैं। मैं नहीं जानता कि आप यहां नांव से आये हैं या पानी पर चलने वाले किसी वाहन से। केरी ने भारत के कम्प्यूटर साइंस के छात्रों को जिस तर्ज पर मेधावी बताया है और जिस प्रकार यहां के काॅलेजों द्वारा नहीं लिये जाने के बाद उन्हें एमआईटी सहर्श स्वीकार करता है का वक्तव्य दिया उससे भी साफ है कि भारत के बदलाव को लेकर उनकी सोच गम्भीर है। देखा जाय तो भारतीय छात्र आज भी अध्ययन और रोजगार दोनों में अमेरिका को प्राथमिकता देते हैं। पहले भी अमेरिकी राश्ट्रपति द्वारा यह कहा जा चुका है कि भारतीयों की गणित पर पकड़ अमेरिकियों की तुलना में बेहतर होती है। फिलहाल दषकों से अमेरिका के साथ भारत का षैक्षणिक रिष्ता भी बहुत मजबूत रहा है। पिछले कुछ सालों से दोनों देषों के बीच व्यापार भी दोगुना हुआ है। इतना ही नहीं भारत से सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका में ही होता है। ये तमाम संदर्भ दोनों देषों के बीच दूरियां घटाने के तौर पर भी जानी-समझी जा सकती है। केरी का यह कहना कि हम दोनों ने नेपाल में भूकम्प पीड़ितों की मदद की, यमन में हिंसा में फंसे लोगों को निकाला और अफ्रीका में षान्ति मिषन में लगे लोगों को ट्रेनिंग दी। इससे भी द्विपक्षीय सम्बंधों को नई आंच मिलती है। इतना ही नहीं अभी हाल ही में दक्षिण चीन सागर में अमेरिका, भारत और जापान मिलकर जो समुद्री अभ्यास किया वह भी सम्बंधों के लिहाज़ से भारत का बदलता परिप्रेक्ष्य भी है और चीन को संतुलित करने का परिमाप भी। 
फिलहाल भारत के प्रति बदलाव वाले दृश्टिकोण पर कायम रहते हुए केरी ने पड़ोसी पाकिस्तान और चीन को कुछ हद तक संतुलित करने का भी काम किया है। अफगानिस्तान पर अपना प्रभाव जमा रहे पाकिस्तान को केरी ने यह कहकर एक और झटका दिया कि सितम्बर में संयुक्त राश्ट्र की बैठक के बाद भारत और अफगानिस्तान के साथ अमेरिका त्रिपक्षीय वार्ता करेगा जबकि आक्रामक चीन को उन्होंने संदेष दिया कि दक्षिण चीन सागर विवाद का सैन्य संघर्श से हल नहीं निकल सकता। केरी ने यह भी स्पश्ट किया कि अमेरिका विवाद को और भड़काना नहीं चाहता बल्कि उसका कूटनीतिक हल निकालने का पक्षधर है। ऐसा देखा गया है कि वैष्विक फलक पर जब भी कूटनीति का प्रवाह होता है और उसमें अमेरिका गति देने की कोषिष करता है तो कहीं उथल-पुथल तो कहीं संतुलन का विकास हो जाता है। अमेरिका द्वारा भारत के साथ अपनाई जा रही नीति इसलिए भी अधिक प्रभावषाली कही जायेगी क्योंकि व्यापार, विज्ञान, विचार के अलावा एमटीसीआर की सदस्यता से लेकर एनएसजी तक की कोषिष में वह साथ है। सम्भावना है कि बदल रहे भारत के साथ अमेरिका ऐसे ही रूख पर आगे भी कायम रहेगा। 



सुशील कुमार सिंह