Thursday, February 11, 2016

राज्यपाल को राष्ट्रपति और शीर्ष अदालत की दो टूक

बहुधा ऐसा कम ही रहा है कि जब राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल को संविधान की गरिमा बनाये रखने की नसीहत दी गई हो। हालांकि राज्यपाल के सम्मेलनों में इस प्रकार की औपचारिक बातचीत अक्सर होती रही है पर इस बार के सम्मेलन में बात कुछ अलग थी। बीते दिनों राज्यपालों के दो दिवसीय सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए राश्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि देष ने आजादी के बाद निरंतर मजबूती हासिल की है और ऐसा संविधान के अनुपालन की दृढ़ता के चलते सम्भव हुआ है। यहां पर राश्ट्रपति की टिप्पणी भले ही अतिरिक्त सौम्यता लिए हुए हो पर अरूणाचल प्रदेष में राश्ट्रपति षासन लागू करने के क्रम में राज्यपाल की भूमिका पर इसे एक सवालिया निषान के रूप में देखा जा रहा है। असल में बीते 26 जनवरी से अरूणाचल प्रदेष राश्ट्रपति षासन का षिकार है और मामला सर्वोच्च न्यायालय गया। इसी मामले की सुनवाई करते हुए बीते 8 फरवरी को देष की षीर्श अदालत ने अरूणाचल प्रदेष के राज्यपाल जे.पी राजखोवा पर टिप्पणी की जिसमें अदालत ने कहा कि राज्यपाल राज्य विधानसभा का सत्र अपनी मर्जी से नहीं बुला सकते हैं साथ ही यह भी कहा कि स्पीकर को हटाये जाने के बाद सदन की कार्रवाई का प्रभार डिप्टी स्पीकर के हाथों में होने के वक्त यदि विधानसभा में तुकी सरकार के विरोध में अविष्वास प्रस्ताव पारित होता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। एक ओर राश्ट्रपति द्वारा राज्यपालों को दिया जाने वाला नसीहत तो दूसरी ओर अदालत की इस खरी-खरी के चलते एक बार देष भर के राज्यपालों में संविधान के प्रति नई आस्था का मापदण्ड जरूर विकसित हुआ होगा। इतना ही नहीं उच्चतम न्यायालय के इस कथन के आलोक में यह भी साफ होता है कि अरूणाचल प्रदेष में सियासी आबोहवा के बीच संविधान के मूल भावना को चोट पहुंचाई गयी है। उक्त परिप्रेक्ष्य में राश्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय की चिंता को इसलिए भी वाजिब करार दिया जायेगा क्योंकि एक संविधान संरक्षक है तो दूसरा संविधान के साथ हुए उचित-अनुचित क्रियाकलाप को लेकर व्याख्या और विषदीकरण करता है।
देखा जाए तो भारतीय संविधान में अवरोध एवं संतुलन के सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप से स्वीकार किया गया है। इसमें षक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त भी अपनाया गया है और इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि लोकतांत्रिक स्वभाव में ही सब कुछ घटित हो पर अरूणाचल प्रदेष में लगे राश्ट्रपति षासन से मामला इससे अलग दिखाई दे रहा है। इसको लेकर पहले भी 4 फरवरी को देष की षीर्श अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि लोकतंत्र की हत्या को वह मूकदर्षक की तरह नहीं देख सकता। जस्टिस जे.एस. केहर के नेतृत्व वाली पांच जजों की बेंच ने यह टिप्पणी उस दलील पर की जिसमें भाजपा विधायकों के वकील कह रहे थे कि अदालत राज्यपाल के निर्णय पर सुनवाई नहीं कर सकती। गौरतलब है कि आज से दो दषक पहले न्यायपालिका की सक्रियता के चलते लोकतंत्र के हिमायतियों को कई सूझबूझ मिली थी पर लगता है कि अब वह मानस पटल से मिट चुका है। यह नहीं भूलना चाहिए कि अक्रर्मण्य एवं दिग्भ्रमित कार्यपालिका को उचित मार्ग पर लाने का काम न्यायपालिका बरसों से करती रही है।
संविधान के अनुच्छेद 356(1) के तहत अरूणाचल में राश्ट्रपति षासन का लगाये जाने के चलते देष में एक बार फिर लोकतांत्रिक विमर्ष जोर लिए हुए है। देखा जाए तो बीते षीतकालीन सत्र के दौरान भी अरूणाचल का मुद्दा उठा था पर कांग्रेस ने हो-हल्ला करके कार्रवाई नहीं चलने दी। अरूणाचल में राश्ट्रपति षासन क्यों लगाया गया इसे तफ्सील से समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना होगा। असल में यहां संकट फरवरी, 2014 से ही कायम है तब चुनाव से कई महीने पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री नवाब तुकी ने विधानसभा भंग कर दी थी। यहां की 60 सदस्यों वाली विधानसभा में 42 विधायकों के साथ कांग्रेस फिर से सरकार बनाने में सफल रही पर मुख्यमंत्री का सपना देख रहे कांग्रेस के विधायक के. पुल ने अपनी ही सरकार पर वित्तीय अनियमित्ता का आरोप लगाते हुए बगावत का बिगुल फूंका। 16 दिसम्बर, 2015 को जब देष में षीत सत्र चल रहा था तब कांग्रेस के 21 बागी विधायकों समेत भाजपा के 11 और 2 निर्दलीय के साथ एक अस्थाई जगह पर विधानसभा सत्र आयोजित किया गया। इसमें विधानसभा अध्यक्ष नवाब रेबिया पर महाभियोग चलाया गया। देखा जाए तो विधानसभा अध्यक्ष को लेकर महाभियोग जैसा जिक्र संविधान में है ही नहीं। फिलहाल कांग्रेस के बागी विधायकों ने नवाब तुकी के स्थान पर कैलिखो पाॅल को नेता चुना जिसके चलते स्पीकर ने इनकी सदस्यता रद्द कर दी। नवाब तुकी ने राज्यपाल को भाजपा का एजेंट होने का आरोप भी लगाया। इन तमाम झगड़ों को देखते हुए राश्ट्रपति षासन की रस्म अदायगी भी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन पूरी कर दी गयी।
अरूणाचल प्रदेष में राश्ट्रपति षासन की पूरी पटकथा के बीच कई चीजें आमने-सामने हो गयी हैं।  केन्द्रीय गृह मंत्रालय के भी अपने स्पश्टीकरण हैं उनकी दृश्टि में चीन के खतरे को मद्देनजर रखते हुए अरूणाचल प्रदेष में राजनीतिक स्थिरता बनाये रखने के लिए ऐसा किया जाना जरूरी था जो पूरी तरह गले नहीं उतरती है। बेषक अरूणाचल पर चीन की तिरछी नजरें हैं परन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि वहां लोकतंत्र को उजाड़ दिया जाए। हो सकता है कि केन्द्र के पास इसके अलावा कोई विकल्प न रहा हो पर पूरी तरह विकल्पहीन थे इसे लेकर भी सरकार को क्लीन चिट नहीं दिया जा सकता। लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि राश्ट्रपति षासन को हमेषा तिरस्कार की दृश्टि से देखा गया है और इसे उन्हीं परिस्थितियों में लगाने की बात रही है कि जब पानी सर के ऊपर चला जाये पर इस पर मनमानी भी खूब हुई है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि राज्यपाल की नियुक्ति सरकार की सिफारिष पर राश्ट्रपति करते हैं परन्तु वह संविधान के प्रति जवाबदेह है न कि सरकार के प्रति। हालांकि 1967 से ही राज्यपालों के स्वविवेकीकरण में अमूल-चूल परिवर्तन देखा जा सकता है पर संविधान में अपनी मर्जी चलाने की गुंजाइष इन्हें नहीं है। इसी चूक के चलते देष की षीर्श अदालत ने न केवल राज्यपाल पर तल्ख टिप्पणी की बल्कि राश्ट्र के मुखिया ने भी इन्हें सजग होने का मषवरा दिया।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

Wednesday, February 10, 2016

आतंक का अतिवाद और सभ्य लोकतंत्र की कशमकश

इस तथ्य को गैर वाजिब नहीं कहा जायेगा कि पिछले कुछ वर्शों में दुनिया में इस्लाम के नाम पर गठित किये जा रहे आतंकी संगठनों की बाढ़ आई हुई है। अनुमान तो यह भी है कि इनकी तादाद दिन दूनी रात चैगुनी की तर्ज पर सौ से अधिक है। कुछ दिन पूर्व संयुक्त अरब अमीरात ने 83 आतंकी संगठनों की सूची जारी की थी। इसके अतिरिक्त अमेरिका भी कमोबेष ऐसी ही सूची जारी कर चुका है। देखा जाए तो भारत की जुबान पर भी दर्जनों आतंकी संगठनों का नाम दर्ज है जिनके चलते वह दषकों से लहुलुहान होता रहा है। यह जद्दोजहद का विशय है कि इतनी बड़ी संख्या में पनप रहे आतंकियों को खाद-पानी कौन दे रहा है। पाकिस्तान में आतंकी संगठन के पहले और अब के संदर्भ को देख कर अंदाजा लगाना सहज है कि पाक आतंकियों को सुरक्षा देने में कितना समर्पित रहा है। अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा का यह कथन कि पाकिस्तान आतंकियों के लिए सर्वाधिक सुरक्षित षरणगाह है इस बात को और पुख्ता करता है। इन दिनों आतंकी डेविड हेडली उर्फ दाऊद गिलानी पाकिस्तान को लेकर जो खुलासे कर रहा है उसे सुनकर आंखें खुली की खुली रह जायेंगी। भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले जमात-उद-दावा पूर्व के लष्कर-ए-तैयबा के  हाफिज सईद से निर्देषित होकर वह काम करता था और भारत के कई स्थान आतंक की जद में थे। बीते दो दिनों से जो खुलासे हो रहे हैं उससे साफ है कि भारत को तबाह करने में पाकिस्तान के आतंकी संगठन कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते थे साथ ही उसका यह कहना कि आईएसआई के फण्ड से 26/11 का हमला हुआ यह सुनिष्चित करता है कि आतंक और आईएसआई दोनों एक ही संगठन के दो प्रतिरूप हैं। लष्कर, जैष-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और हरकत-उल-मुजाहिदीन ये वे आतंकी संगठन हैं जो भारत में बरसों से तबाही के सामान रहे है जिसके बारे में हेडली ने बाकायदा अदालत में बताया। इन संगठनों का पाक के कब्जे वाले कष्मीर में पूरी ठाट-बाट है। हैरत इस बात की है कि पाकिस्तान सब कुछ जानते हुए भारत को दषकों से सबूत देने के बावजूद भ्रम में रखे हुए है और इसी काम में आगे भी लगा हुआ है।
फिलहाल पाकिस्तान के आतंकी संगठन समेत दुनिया में कई संगठन सभ्य देषों के लिए चुनौती बने हुए हैं। आईएसआईएस इन दिनों सारी दुनिया में पहला ऐसा आतंकी संगठन है जो अपने लिए अलग राश्ट्र स्थापित करने में सफल रहा है यही कारण है कि इस्लामी आतंकी संगठनों में उसका दबदबा निरंतर बढ़ता जा रहा है। एक दौर था जब अलकायदा इसी प्रकार का दबदबा कायम करने की फिराक में 2001 में अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला किया जिसकी कीमत थोड़ी देर से ही सही उसे अपनी जान गवां कर चुकानी पड़ी जब अमेरिका पाकिस्तान के एटबाबाद में षरण लिए अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को न केवल निस्तोनाबूत किया बल्कि उसे कब्र भी नसीब नहीं होने दिया। असल में दुनिया पर आतंक के बड़ा खतरा का इस कदर विस्तार लेना किसी भी सभ्यता से भरे लोकतांत्रिक देष के लिए एक नाजुक दौर है। जिस तर्ज पर मुम्बई से लेकर पेरिस के अलावा पहले और बाद इंग्लैण्ड, आॅस्ट्रेलिया, इण्डोनेषिया सहित कई देषों में आतंकी हमले हुए हैं और हो रहे हैं वे बाकियों के लिए चुनौती है। ‘ग्लोबल टेरारिज़्म इण्डैक्स 2015‘ के मुताबिक वर्श 2014 में पूरी दुनिया में 13 हजार से अधिक आतंकी वारदातें हुई जो पिछले वर्श से 35 फीसदी अधिक हैं। ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण हमले में अनगिनत लोग मारे गये जिसमें 78 फीसदी इराक, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और सीरिया के थे। यह जानकर हैरत होगी कि इन देषों के बाद भारत का नाम आता है जहां 416 लोग मारे जा चुके हैं। तथ्य चैतरफा असंतोश से भरे हैं पर उनका क्या हुआ जो इसके जिम्मेदार हैं। निष्चित तौर पर इन घटनाओं ने उनके मनोबल में बढ़त का ही काम किया।
बरसों से भारत पर हुए आतंकी हमले को लेकर बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जाता रहा है। इस बात का भी ताना देने से गुरेज नहीं रहा है कि भारत आतंक के मामले में कठोर रवैया नहीं अपनाता है। बीते ढ़ाई दषकों से सबूत पर सबूत देने के बावजूद पाकिस्तान हिलाहवाली करता रहा और भारत आतंक-दर-आतंक सहता रहा बावजूद इसके इसका हल सलीखे के दायरे में होने का इंतजार भी भारत ने किया है। कुछ ने तो यहां तक भी कहा है कि भारत ऐसी समस्याओं से उबर ही नहीं पायेगा। दुःख इस बात का है कि हमारे प्रयासों को विष्व बिरादरी भी कमतर आंकती रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र को सिराहने रखने वाले भारत में होने वाले आतंकी हमले को समझने में दुनिया ने देरी की है। इसके चलते भी कई लोगों को जो बर्बर नहीं हो सकते थे उन्हें भी बढ़त लेने का अवसर मिला है। पिछले डेढ़ दषक से जब से अमेरिका हमले की जद में आया तभी से दुनिया इसको लेकर चैकन्नी हुई पर नतीजे क्या हैं सिफर तो नहीं पर दहाई तक भी तो नहीं पहुंचे हैं जबकि आतंकविहीन दुनिया के लिए सौ का आंकड़ा छूना है। कभी-कभी इतिहास, संस्कृति और राजनीति की गहराईयों में इसकी खोजबीन होती है तो लगता है कि समावेषी लोकतंत्र के इस दौर में मानव अस्तित्व के लिए खतरा बनने वाले आतंकी इतने व्यापक पैमाने पर बढ़त कैसे बना लिए? भारत के पड़ोस में बंग्लादेष, पाकिस्तान, नेपाल और अब तो म्यांमार भी लोकतंत्र का घर है पर लोकतंत्र के बावजूद पाकिस्तान जैसों ने आतंक को खाद-पानी देने से गुरेज क्यों नहीं किया? इससे महसूस होता है कि लोकतंत्र को लेकर पाकिस्तान जैसों ने अपनी ही परिभाशा बना ली जिसमें आतंक की भी साझेदारी निहित है पर उनका क्या जिनके लोकतंत्र में आतंक तिनके के स्वरूप में भी बर्दाष्त नहीं है। भारत ऐसे देषों में षुमार है जहां लोकतंत्र की सर्वोच्चता और सोच के अलावा किसी भी विध्वंसक प्रवृत्ति को तनिक मात्र भी बर्दाष्त नहीं करता।
कई वजनदार प्रष्न हैं जो अनायास फूट पड़ते हैं कि दुनिया का हर देष और तबका आतंक की आग में क्यों झुलस रहा है? आईएसआईएस का दबदबा क्यों बढ़ रहा है? पाकिस्तान आतंकी संगठनों को लेकर इतना उदार क्यों बना हुआ है? क्यों दूसरों की करतूतों को हम सहें या वे जो सभ्य हैं, जो रीत-नीति से चलते हैं और जिनके यहां विकास की पैदावार होती है आखिर वे भी विध्वंस को कब तक सहेंगे? प्रधानमंत्री मोदी ने बीते 20 महीनों में आतंक को लेकर वैष्विक मंचों पर जो चिंता जाहिर की है और इसे समाप्त करने को लेकर जो एकजुटता दिखाई है वह काबिल-ए-तारीफ है पर मुष्किल यह है कि दवा के साथ दर्द कम नहीं हो रहा है। आतंकवाद आज के दौर में एक ऐसे बिसात पर चल पड़ा है जहां सभ्य देषों की चालें अनुपात में कारगर सिद्ध नहीं हो रही हैं। पेरिस हमले के बाद जो पलटवार फ्रांस ने किया उसके नतीजे भी अनुकूल नहीं है। आतंकी पनाह को लेकर अमेरिका द्वारा पाकिस्तान पर की गयी टिप्पणी का वजन भी अभी तक नहीं दिखा है। पठानकोट के हमले के मामले में पाक को दिये गये सबूत पर मामला खटाई में पड़ा हुआ है। आतंक को लेकर अन्तर्राश्ट्रीय कानून भी बहुत स्पश्ट नहीं है। ऐसे बहुत से क्या और क्यों हैं जो एक-दो कदम से आगे नहीं बढ़ पाये हैं। डिजिटलाइजेषन के इस दौर में आतंकियों का जो प्रभाव बढ़ा है वह सभी के माथे पर बड़ा बल पैदा कर रहा है। बड़े आतंकी नेटवर्क से निपटने के लिए बड़े स्तर के रणनीतिक होमवर्क की अवष्यकता पड़ेगी। अब कच्ची चाल में पूरी सफलता की गारंटी सम्भव नहीं है।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

Monday, February 8, 2016

निडर उत्तर कोरिया का एक और दुस्साहस

उत्तर कोरिया द्वारा बीते 6 जनवरी, 2016 को किये गये चैथे परमाणु परीक्षण से दुनिया अभी चिंता से मुक्त नहीं हो पाई थी कि उसने प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण करके एक बार फिर सभी के माथे पर बल डाल दिया। संयुक्त राश्ट्र महासचिव और अमेरिका सहित कई देषों ने इसकी घोर निन्दा की है। तात्कालिक घटना को लेकर फिर वही सवाल उठता है कि इसका निदान क्या है? हालांकि तत्काल न्यूयाॅर्क में एक आपात बैठक के बाद सुरक्षा परिशद् ने कहा कि उत्तर कोरिया के खिलाफ नए प्रतिबंधों का प्रस्ताव षीघ्र ही पारित किया जाएगा पर सवाल तो यह है कि उत्तर कोरिया पर किसी भी प्रतिबंध का असर क्यों नहीं हो रहा है? क्यों उत्तर कोरिया वैष्विक चेतावनी को नजरअंदाज कर रहा है? रही बात प्रतिबंध की तो इसके पहले भी 2006 के परमाणु परीक्षण के बाद सुरक्षा परिशद् ने प्रस्ताव पारित किये थे तब से लेकर अब तक दो प्रस्ताव और आ चुके हैं, बावजूद इसके उत्तर कोरिया के दुस्साहस में कोई कमी नहीं दिखाई दे रही है। विषेशज्ञ मानते हैं कि उत्तर कोरिया अमेरिका को निषाना बनाने के लिए परमाणु हथियार बना रहा है। अगर इस तकनीक का इस्तेमाल सेटेलाइट प्रक्षेपण में हो तो यह राॅकेट लाॅन्चर है पर विस्फोटक लाद दिये जाएं तो यह ‘इंटर काॅन्टिनेंटल मिसाइल‘ में बदल जायेगा। उत्तर कोरिया पहले ही ऐसी मिसाइल बना चुका है जो अमेरिका पर हमला करने में सक्षम है जिसकी मारक क्षमता 10 हजार किलोमीटर है। जाहिर है कि उत्तर कोरिया के इस कदम से अमेरिका सहित दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देषों की परेषानी बढ़ी है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुरक्षा परिशद् की बैठक दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका के आग्रह पर बुलाई गयी थी साथ ही जापान ने अमेरिका का समर्थन करते हुए उत्तर कोरिया के खिलाफ कड़े प्रतिबन्ध का समर्थन किया जबकि 6 जनवरी, 2016 में परमाणु परीक्षण के चलते दक्षिण कोरिया ने उत्तर कोरिया को सबक सिखाने की बात कही थी।
उत्तर कोरिया पिछले एक दषक से विवादों को जन्म देने वाला देष भी बन गया है। 2006 से 2016 के बीच चार बार परमाणु परीक्षण और राॅकेट प्रक्षेपण करके सुर्खियों में है साथ ही ऐसा कहा जा रहा है कि वह पांचवें एटमी परीक्षण की तैयारी में भी है। उत्तर कोरिया अन्तर्राश्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद लगातार अपने परमाणु क्षमता को बढ़ाने के दुस्साहस से पीछे नहीं हट रहा है। हालांकि उसका कहना है कि उसने एक उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने के लिए राॅकेट छोड़ा है पर इस बात पर विष्वास करना मुनासिब नहीं समझा गया। यह माना जा रहा है कि इसके बहाने उसका असल मकसद बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण करना है। उत्तर कोरिया का प्रमुख सहयोगी चीन इस पूरे प्रकरण को उकसावे वाली कार्रवाई मानता है जबकि दक्षिण कोरियाई नौसेना ने चेतावनी के चलते उत्तर कोरिया के पोत पर गोलियां तक दाग दी हैं। माना तो यह भी जाता है कि उत्तर कोरिया के पास छोटे परमाणु हथियार और कम और मध्यम दूरी की मिसाइल है परन्तु जिस प्रकार इसकी हरकतों से विष्व बिरादरी तनाव में है उसे देखते हुए हथियारों के मामले में इसे क्लीन चिट नहीं दी जा सकती। सबके बावजूद यक्ष प्रष्न यह है कि उत्तर कोरिया की इन हरकतों से कैसे निजात पाया जा सकता है। क्या चीन के रहते हुए इस पर प्रतिबंध लगाना सम्भव है। संयुक्त राश्ट्र में वीटो देषों के समूह में चीन भी है जिसके अड़ंगे बाजी के चलते प्रतिबंध मुमकिन नहीं है। हालांकि चीन सहित रूस ने मिसाइल परीक्षण की निन्दा की है। देखा जाए तो परमाणु परीक्षण रोकने के लिए बीते जनवरी में उत्तर कोरिया ने षान्ति संधि की मांग की थी जो एक प्रकार से पहले के प्रस्तावों की भांति ही था जिसमें उसने कहा था कि वह अमेरिका के साथ एक षान्ति सन्धि में हस्ताक्षर करने और अमेरिका व दक्षिण कोरिया के बीच सालाना सैन्य अभ्यास रोकने के बदले अपने परमाणु परीक्षण बन्द कर सकता है जिसे अमेरिका ने सिरे से पहले की भांति ही ठुकरा दिया था।
बदलते हुए अन्तर्राश्ट्रीय परिदृष्य में अपनी सुरक्षा और आत्मविष्वास के लिए कई देष परमाणु सामग्रियों को जुटाने में अनावष्यक उर्जा खर्च कर रहे हैं जबकि वे खतरे से या तो बाहर हैं या उसके निषान से काफी नीचे हैं। असल में किम जोंग अपने निजी समस्याओं के चलते भी इस अंधेरगर्दी पर उतरा हुआ है और अन्तर्राश्ट्रीय ताकतें इस मामले में खुलकर कुछ खास नहीं कर पा रही हैं। सोचने वाली बात तो यह भी है कि उत्तर कोरिया वैष्विक पटल पर इतनी बड़ी सुरक्षा सामग्री के कद का भी नहीं है। तानाषाह किम जोंग के मन्सूबे भी हैरत में डालने वाले हैं उसने सत्ता से हटाये इराक के राश्ट्रपति सद्दाम हुसैन और लीबिया के गद्दाफी का एक माह पूर्व उदाहरण देते हुए कहा था कि जब देष अपनी परमाणु महत्वाकांक्षा को छोड़ देते हैं तो उनके साथ ऐसा ही होता है। इस बात को जायज नहीं करार दिया जा सकता क्योंकि कई देष परमाणु संसाधनों की होड़ में ना होने के बावजूद स्वयं के साथ और विष्व के लिए भी अमन-चैन के बेहतर उदाहरण बने हुए हैं। संयुक्त राश्ट्र परमाणु हथियारों की समाप्ति की कवायद में 70 के दषक से लगा हुआ है और उसे फिर एक बार झटका लगा है। इस मामले में सीटीबीटी व एनपीटी जैसी नीतियां देखी जा सकती हैं। सीटीबीटी का उद्देष्य है कि कोई भी देष चाहे वह परमाणु षस्त्र धारक है या नहीं, किसी भी तरह का परीक्षण नहीं कर सकता। इस संधि के अनुच्छेद 4 में यह भी है कि संदेह के आधार पर किसी भी देष में जाकर निरीक्षण भी किया जा सकता है। हालांकि भारत सहित कुछ देषों ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि यह किसी भी देष की सम्प्रभुता के विरूद्ध है। परमाणु अस्त्र अप्रसार सन्धि (एनपीटी) भी इसी प्रकार की एक सन्धि है जिसके अनुच्छेद 6 में यह वर्णित है कि परमाणु षस्त्र सम्पन्न राश्ट्र परमाणु षस्त्र को समाप्त करने के लिए प्रत्येक 25 वर्श में इसका निरीक्षण करेंगे जिसे लेकर वर्श 1995 में सम्मेलन किया गया पर बिना किसी नतीजे के यह अनिष्चितकाल के लिए आगे बढ़ा दिया गया। हालांकि सन्धियों की परिस्थितियों को देखते हुए भारत सीटीबीटी और एनपीटी दोनों का विरोध करता रहा है।
विरोध के बावजूद मिसाइल दागने को लेकर दुनिया को हैरत में डालने वाला उत्तर कोरिया वैष्विक सुर्खियां भी खूब बटोरे हुए। चर्चित परन्तु अलोकप्रिय तानाषाह किम जोंग इस बात से परे है कि षेश दुनिया पर उसकी हरकतों का क्या प्रभाव पड़ रहा है। उत्तर कोरिया बीते 5 साल में तुलनात्मक कहीं अधिक विष्व के लिए खतरा बनता जा रहा है। इसके पीछे वजह दिसम्बर, 2011 में तानाषाह किम जोंग का सत्ता पर काबिज होना है। किम जोंग के अब तक के कार्यकाल की पड़ताल भी बताती है कि यहां पर व्याप्त समस्याएं बड़े पैमाने पर विकास कर चुकी हैं। बावजूद इसके किम जोंग इससे बेअसर रहते हुए अपने निजी एजेण्डे मसलन परमाणु षस्त्र एवं मिसाइल आदि को तवज्जो देने में लगा हुआ है। यह बात भी समुचित है कि जब कोई तानाषाह लोककल्याण की अवधारणा से विमुख होता है और लोकतंत्र को मटियामेट कर अनाप-षनाप निर्णय पर उतारू हो जाता है तो ऐसे ही कृत्य उनकी प्राथमिकताओं में होते हैं। भुखमरी, बीमारी और बेरोजगारी समेत अनगिनत समस्याओं से जूझ रहे उत्तर कोरिया के तानाषाह के दुस्साहस से दुनिया स्तब्ध है पर दुनिया इसको लेकर क्या कदम उठाएगी अभी कहना कठिन है।




सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

तीन दशक से सबूत के बावजूद

अमेरिका के एक अखबार ‘न्यूयाॅर्क टाइम्स‘ ने अपने सम्पादकीय लेख में लिखा कि दुनिया भर की जिहादी ताकतों की मजबूती में पाकिस्तान का हाथ है और यह भी सम्भव है कि आईएस के फलने-फूलने के लिए भी इस्लामाबाद से खाद मिल रही हो। आगे यह भी कहा गया कि ऐसे बहुत से सबूत पाये गये हैं जो बताते हैं कि पाकिस्तान ने तालिबान के अभियान में योगदान दिया है। इसके अलावा पाकिस्तानी खूफिया एजेन्सी आईएसआई लम्बे समय से मुजाहिदीन बलों के प्रबन्धक के रूप में काम भी किया है। मुष्किल यह है कि पाकिस्तान का सर्वाधिक आतंक झेलने वाला भारत विगत् तीन दषकों से सबूतों के साथ यह कहता रहा कि पाक आतंक की फैक्ट्री है पर यह बात कभी भी षिद्दत से नहीं ली गयी। पठानकोट हमले के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब पाकिस्तान सबूतों के बिनाह पर कार्रवाई का भरोसा जताया। हालांकि एक माह बीतने के बाद भी कार्रवाई के नाम पर जो भागम-भाग हुई उसमें रास्ते तय नहीं हुए हैं। न्यूयाॅर्क टाइम्स के ताजा लेख से यह साफ होता है और विष्लेशकों के पास ब्यौरा और सबूत भी यह संकेत करते हैं कि पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों को लेकर अब मामला ‘इंटरनेषनल डोमेन‘ में है पर सवाल यह रहेगा कि इन सबके बावजूद भी भारत कितने लाभ में होगा।
26/11 के हमले की योजना और घटनाओं के क्रम से डेविड हेडली से बहुत उम्मीद की जा रही है। 170 प्रष्नों के उत्तर में हेडली ने सोमवार को कई खुलासे किये जिसमें उसने मास्टर माइंड हाफिज़ सईद का नाम लिया है जो जमात-उद-दावा का सरगना है और पाकिस्तान में मान्यता प्राप्त षहरी है। डेविड हेडली ने यह भी कहा है कि उसने हाफिज़ सईद के भाशण से प्रभावित होकर यह सब काम किया। असल में डेविड हेडली का असली नाम दाऊद गिलानी है और वह भारत में 26 नवम्बर, 2008 के हमले में षामिल रहा है। हमले से पहले वह सात बार भारत आ चुका था। सोमवार का दिन भारतीय न्यायिक इतिहास में पहला मौका था जब एक आतंकी वीडियो लिंक के जरिये गवाही दिया और जानकारी रिकाॅर्ड की गयी। जाहिर है आतंक से पिछले तीन दषक से लड़ने वाले भारत के लिए यह और पक्के सबूत होंगे। समझने वाली बात यह है कि पाकिस्तान जिस षिद्दत से सबूतों को नकारने में लगा रहा और बार-बार भारत की उम्मीदों को तार-तार करता रहा बावजूद भारत हर घटना का सबूत देने में कभी कोई कोताही नहीं बरती। हेडली के बयान से साजिष की न केवल परतें खुलेंगी बल्कि इसके पीछे बड़ा दिमाग किसका है इसका भी पता चलेगा। जिसके कारण 160 से अधिक लोगों को जान गवानी पड़ी। अमेरिकी एजेन्सियों के सामने दिये बयान की प्रतियां राश्ट्रीय जांच एजेन्सी को मिली हैं। इससे साफ भी हुआ है कि मामला कितने परत वाला है। हेडली ने यह भी बताया है कि मुम्बई के अलावा दिल्ली में उपराश्ट्रपति आवास, इण्डिया गेट और सीबीआई मुख्यालय की भी रेकी की थी जिसमें मुख्य हेंडलर की भूमिका में आईएसआई के मेजर इकबाल और समीर अली षामिल थे।
बीते रविवार को पंजाब के खेमकरण सेक्टर में बीएसएफ ने भारतीय सीमा में पाक तस्करों की घुसपैठ की कोषिष को नाकाम करते हुए चारों को मार गिराया। ड्रग्स तस्करी का खेल भी पाकिस्तान से भारत की सीमा के अन्दर बरसों से खेला जा रहा है। देखा जाए तो आठ हजार करोड़ रूपए के ड्रग्स हर साल पाकिस्तान से पंजाब आ रही है। एम्स के सर्वे से यह भी पता चलता है कि दो लाख लोग पंजाब में अफीम के आदि हैं जबकि 20 करोड़ रूपए रोज पंजाब में ड्रग्स सेवन के लिए खर्च किये जाते हैं। तथ्य इस बात का पुख्ता सबूत है कि पड़ोसी देष पाकिस्तान से आतंकी ही नहीं जहर भी भारत में आता रहा है। ध्यानतव्य है कि बीते 2 जनवरी को आतंकी हमले का षिकार पठानकोट में आतंकी तस्करी की आड़ में अन्दर प्रवेष करने की संदिग्धता बताई गयी है। इसमें दो राय नहीं कि तस्करी के मामले में पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान सहित कई ऐसे पष्चिमोत्तर एषियाई देष हैं जहां बड़ा नेटवर्क है और इस चपेट में भारत के सीमावर्ती क्षेत्र भी हैं। प्रधानमंत्री मोदी की बातों में पहले भी यह जिक्र आया है कि आतंक और नषीले पदार्थों का काफी गाढ़ा रिष्ता है। बीते 5 से 7 फरवरी के बीच हिन्द महासागर में इंटरनेषनल फ्लीट रिव्यू, 2016 का आयोजन किया गया। मोदी ने रविवार को समुद्र के रास्ते आतंकवाद और लूटपाट की घटनाओं का जिक्र करते हुए समुद्री सुरक्षा के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियों में इन्हें माना है। यह सही है कि समुद्री खुलापन भी आतंक और तस्करी का हमेषा से जरिया रहा है।
फिलहाल पाकिस्तान पर आतंक को लेकर नकेल कसने की कवायद इस दौरान सही दिषा और दषा में है। अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा भी पाकिस्तान को आतंकियों का सबसे सुरक्षित स्थान बता चुके हैं। अन्तर्राश्ट्रीय दबाव से भी पाकिस्तान इन दिनों गुजर रहा है। जिस ताकत के साथ भारत आतंक को लेकर प्राथमिकता बनाये हुए है उसे देखते हुए अंदाजा लगाना आसान है कि पाकिस्तान को बचने का आगे बहुत अवसर नहीं मिलेगा। जिस प्रकार चैक-चैबंद बढ़ी है उससे भी लगता है कि नतीजे बहुत अच्छे नहीं तो बहुत खराब भी नहीं आयेंगे। सबके बावजूद पाकिस्तान के घड़ियाली आंसू पर भी तिरछी नजर डालनी ही होगी। आतंकियों का भरण-पोशण करने वाला पाकिस्तान भारत की भावनाओं के साथ भी खिलवाड़ करने जैसी गलती करता रहा है। हालांकि इन दिनों पाकिस्तान भी आतंक की चपेट में देखा जा सकता है। ताजा घटनाक्रम बीते जनवरी माह में पेषावर के बाचा विष्वविद्यालय में आतंकी हमले से पाकिस्तान के 16 दिसम्बर, 2014 में पेषावर के ही आर्मी स्कूल में हुए आतंकी हमले की याद ताजा हो जाती है। असल बात तो यह है कि पाकिस्तान में विगत् कई दषकों से आतंकियों को लेकर जो ढीला रवैया अपनाया उसका भी नतीजा है कि अब नकेल कसने के टाइम में उसी पर पलटवार हो रहा है पर देखने वाली बात यह भी रहेगी कि इन सबके बावजूद भी क्या पाकिस्तान आतंक को लेकर कोई साफ-सुथरा दिमाग भी इस्तेमाल करेगा।



लेखक, वरिश्ठ स्तम्भकार एवं रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन के निदेषक हैं
सुशील कुमार सिंह
निदेशक
प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्ससाइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2710900, मो0: 9456120502


Friday, February 5, 2016

लोकतंत्र की चिंता में संविधान संरक्षक

भारतीय संविधान में अवरोध एवं संतुलन के सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप से स्वीकार किया गया है। इसमें शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त भी अपनाया गया है और इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि लोकतांत्रिक स्वभाव में ही सब कुछ घटित हो पर अरूणाचल प्रदेश में लगे राष्ट्रपति शासन से मामला इससे अलग दिखाई दे रहा है। अरूणाचल में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने पर 4 फरवरी को देश की शीर्ष अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतंत्र की हत्या को वह मूकदर्शक की तरह नहीं देख सकता। जस्टिस जे.एस. केहर के नेतृत्व वाली पांच जजों की बेंच ने यह टिप्पणी उस दलील पर की जिसमें भाजपा विधायकों के वकील कह रहे थे कि अदालत राज्यपाल के निर्णय पर सुनवाई नहीं कर सकती। गौरतलब है कि आज से दो दषक पहले न्यायपालिका की सक्रियता के चलते लोकतंत्र के हिमायतियों को कई सूझबूझ मिली थी पर लगता है कि अब वह मानस पटल से मिट चुका है। यह नहीं भूलना चाहिए कि अक्रर्मण्य एवं दिग्भ्रमित कार्यपालिका को उचित मार्ग पर लाने का काम न्यायपालिका बरसों से करती रही है। इतना ही नहीं आपात के दौर में तो कार्यपालिका और न्यायपालिका आमने-सामने तक थे। भारत में न्यायिक सक्रियता का विकास भी अचानक नहीं हुआ है बल्कि परिस्थितियों के अनुपात में इसे देखा जा सकता है। हालांकि इस षब्द का सृजन प्रेस द्वारा न्यायालय के लीक से हट कर लिए गए कुछ निर्णयों के आधार पर किया गया है। देखा जाए तो अरूणाचल प्रदेष के मामले में न्यायपालिका का वक्तव्य वाकई में कहीं अधिक चिंता से युक्त प्रतीत होता है। असल में अब यह बात पूरी तरह पचाना मुष्किल होता है कि लोकतंत्र के इस प्राइम टाइम में भी लोकतांत्रिक सरकारें राश्ट्रपति षासन का षिकार होती हैं।
चीन की सीमा से सटे अरूणाचल प्रदेष में गणतंत्र दिवस के दिन ही राश्ट्रपति षासन प्रभावी हुआ। संविधान के अनुच्छेद 356(1) के तहत अरूणाचल में राश्ट्रपति षासन का लगाये जाने के चलते देष में एक बार फिर लोकतांत्रिक विमर्ष जोर लिए हुए है। देखा जाए तो बीते षीतकालीन सत्र के दौरान भी अरूणाचल का मुद्दा उठा था पर कांग्रेस ने हो-हल्ला करके कार्रवाई नहीं चलने दी। अरूणाचल में राश्ट्रपति षासन क्यों लगाया गया इसे तफ्सील से समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना होगा। असल में यहां संकट फरवरी, 2014 से ही कायम है तब चुनाव से कई महीने पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री नवाब तुकी ने विधानसभा भंग कर दी थी। यहां की 60 सदस्यों वाली विधानसभा में 42 विधायकों के साथ कांग्रेस फिर से सरकार बनाने में सफल रही पर मुख्यमंत्री का सपना देख रहे कांग्रेस के विधायक के. पुल ने अपनी ही सरकार पर वित्तीय अनियमित्ता का आरोप लगाते हुए बगावत का बिगुल फूंका। 16 दिसम्बर, 2015 को जब देष में षीत सत्र चल रहा था तब कांग्रेस के 21 बागी विधायकों समेत भाजपा के 11 और 2 निर्दलीय के साथ एक अस्थाई जगह पर विधानसभा सत्र आयोजित किया। इसमें विधानसभा अध्यक्ष नवाब रेबिया पर महाभियोग चलाया गया। देखा जाए तो विधानसभा अध्यक्ष को लेकर महाभियोग जैसा जिक्र संविधान में है ही नहीं। फिलहाल कांग्रेस के बागी विधायकों ने नवाब तुकी के स्थान पर कैलिखो पाॅल को नेता चुना जिसके चलते स्पीकर ने इनकी सदस्यता रद्द कर दी। नवाब तुकी ने राज्यपाल को भाजपा का एजेंट होने का आरोप भी लगाया। इन तमाम झगड़ों को देखते हुए राश्ट्रपति षासन की रस्म अदायगी भी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन पूरी कर दी गयी जिसका मामला इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में है और पांच सदस्यों की पीठ इसकी सुनवाई कर रही है।
अरूणाचल प्रदेष में राश्ट्रपति षासन की पूरी पटकथा के बीच कई चीजें आमने-सामने हो गयी हैं। यह पूरा घटनाक्रम अतिनाटकीय भी प्रतीत होता है। यह सही है कि लोकतंत्र ऐसी षासन व्यवस्था है जहां किसी भी घटना को न पूरी तरह सत्य और न ही असत्य करार दिया जा सकता है पर इसी लोकतंत्र में इस बात की भी गुंजाइष बनी रहती है कि राजनीतिक पार्टियां अपना हित साधने के चलते कोई संवैधानिक संकट भी खड़ा कर सकती हैं। इस मामले में केन्द्रीय गृह मंत्रालय के भी अपने स्पश्टीकरण हैं उनकी दृश्टि में चीन के खतरे को मद्देनजर रखते हुए अरूणाचल प्रदेष में राजनीतिक स्थिरता बनाये रखने के लिए ऐसा किया गया है जो पूरी तरह गले नहीं उतरती है। बेषक अरूणाचल पर चीन की तिरछी नजरें हैं परन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि वहां लोकतंत्र को उजाड़ दिया जाए। इसमें भी कोई षक नहीं कि अरूणाचल प्रदेष में राश्ट्रपति षासन सियासी लड़ाई के चलते लगा है। हो सकता है कि केन्द्र के पास इसके अलावा कोई विकल्प न रहा हो पर पूरी तरह विकल्पहीन थे इसे लेकर भी सरकार को क्लीन चिट नहीं दिया जा सकता। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि लोकतंत्र की हत्या बर्दाष्त नहीं है। सियासत और सत्ता में कई बातें अधूरी होते हुए भी पूरी प्रतीत होती हैं बावजूद इसके उस अधूरेपन के साथ भी बेफिक्री कायम रहती है। कई मुद्दे ऐसे भी होते हैं जिसमें एक दल दूसरे के बगैर सरकार होने का पूरा दावा नहीं कर सकता। षायद यह लोकतंत्र की महान परिभाशा होगी कि विरोधी के बगैर यहां सरकार भी पूरी तरह जीवित नहीं रहती है। लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि राश्ट्रपति षासन को हमेषा तिरस्कार की दृश्टि से देखा गया है और इसे उन्हीं परिस्थितियों में लगाने की बात रही है कि जब पानी सर के ऊपर चला जाये पर इस पर मनमानी भी खूब हुई है।
मोदी सरकार दो आरोपों से स्वयं को बरी नहीं कर सकती प्रथमतः यह कि राज्यपालों की बर्खास्तगी या उन्हें हटाकर अपनों को नियुक्त करने के मामले में कांग्रेस की भांति नहीं रही है, दूसरे यह कि राश्ट्रपति षासन के मामले में भी उसका रवैया कांग्रेस के मुकाबले भिन्न है बावजूद इसके इस बात से सरकार को राहत दी जा सकती है कि करीब 20 महीने के कार्यकाल में जम्मू-कष्मीर के राज्यपाल षासन समेत तीन बार ही राश्ट्रपति षासन की नौबत आई है जबकि कांग्रेस के दिनों में तो छमाही के दर पर प्रदेष राश्ट्रपति षासन के षिकार होते थे। राश्ट्रपति षासन के मामले में पूरी तरह केन्द्र को ही दोशी नहीं ठहराया जा सकता। काफी कुछ दारोमदार प्रदेष के राज्यपाल पर भी निर्भर करता है। इस बात की भी गुंजाइष अक्सर बन ही जाती है कि राज्यपाल और प्रदेष के मुख्यमंत्री के बीच तनाव व्याप्त होने से मुष्किलें बढ़ जाती हैं। अरूणाचल प्रदेष भी इससे परे नहीं था। देखें तो गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी की भी राज्यपाल से पटरी नहीं खाई है और यह टकराव तब अधिक बढ़ा था जब तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल ने लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी थी। मामला अदालत तक गया और वहां पर भी सरकार को ही मुंहकी खानी पड़ी थी। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि राज्यपाल की नियुक्ति सरकार की सिफारिष पर राश्ट्रपति करते हैं परन्तु वह संविधान के प्रति जवाबदेह है सरकार के प्रति नहीं, पर व्यवहार में यह बात उतनी उम्दा नहीं है। नये दौर की राजनीति में राज्यपालों का भी राजनीतिकरण हुआ है ऐसे में बहस होना लाज़मी है कि सरकार के अधिकार को किस सीमा तक बर्दाष्त किया जाए। जाहिर है संविधान सभी को ताकत देता है पर ताकत का बेजा इस्तेमाल करने पर संविधान के संरक्षक की भूमिका में न्यायपालिका को आगे आना ही पड़ता है।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

Wednesday, February 3, 2016

आरक्षण पर आश्वासन का आशय

कोयम्बटूर की रैली में एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी यह आष्वासन देते हुए देखे गये कि देष से आरक्षण समाप्त नहीं होगा। 2 फरवरी को आयोजित इस रैली को तमिलनाडु में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव के अभियान के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि यह रैली स्थानीय राजनीति से परे थी पर प्रधानमंत्री मोदी का कांग्रेस पर परोक्ष मगर तीखा प्रहार इस रैली में देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा कि देष को विघटित करने के लिए यह सोची समझी साजिष है और दलितों के मुद्दे पर झूठ का अभियान षुरू किया गया है। असल में आरक्षण का मुद्दा एक ऐसी सामाजिक समस्या है जिसमें किसी भी सत्ताधारी के लिए किसी जोखिम से कम नहीं है। ध्यान्तव्य हो कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिया गया आरक्षण विरोधी बयान को भाजपा की हार से जोड़ा गया था। हालांकि बाद में भागवत की भी आरक्षण के पक्ष में ही सफाई आई थी। प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि सामाजिक वर्गीकरण के अन्तर्गत व्याप्त आरक्षण अत्यंत संवेदनषील मुद्दा है। ऐसे में यदि इसके साथ कोई ऊंच-नीच हुई तो बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। यही कारण है कि वे आरक्षण को लेकर पहले भी स्थिति स्पश्ट कर चुके हैं और अब भी उसी पर कायम है यह संदेष जनता के बीच भेजना चाहते हैं। प्रधानमंत्री का बयान ऐसे समय में आया जब आंध्र प्रदेष में ओबीसी दर्जे के तहत आरक्षण की इन दिनों मांग चल रही है। कापू जाति के प्रदर्षन के चलते बीते 31 जनवरी को रत्नांचल एक्सप्रेस के आठ डिब्बे आग के हवाले कर दिये गये थे और अभी भी वहां अफरा-तफरी का माहौल कायम है। जाहिर है प्रधानमंत्री के बयान से उन्हें राहत मिली होगी जिन्हें पहले से आरक्षण प्राप्त है पर आरक्षण की मांग करने वालों के बारे में अभी कुछ कह पाना सम्भव नहीं है।
जब भी आरक्षण के मुद्दे परिलक्षित होते हैं और साफ-सफाई का दौर आता है तब इस बात की समझ भी विकसित होने लगती है कि आखिर जब संविधान नागरिकों के बीच भेदभाव का निशेध करता है तो फिर आरक्षण की आवष्यकता और औचित्य क्या है? अब यह समझना जरूरी है कि आरक्षण क्या है और क्यों दिया जाता है? असल में समाज में उपलब्ध अवसरों को किसी वर्ग विषेश के लिए उपलब्ध कराना या अवसरों के लिए निर्धारित मापदण्डों में किसी वर्ग विषेश के लिए छूट देना आरक्षण है पर देने के पीछे का तथ्य समानता के सिद्धांत को कायम करना है। भारतीय संविधान निर्माता इस तथ्य से बाखूबी परिचित थे इसी कारण उन्होंने संविधान में स्त्रियों, बच्चों, एससी/एसटी तथा पिछड़ों आदि के लिए विषेश उपबन्ध कराने का प्रावधान रखा। पिछड़े वर्गों के आरक्षण का इतिहास खंगाले तो इसकी षुरूआत गरीबी दूर करने और राज्य प्रषासन में नौकरी देने से हुई जिसे लेकर महाराश्ट्र के कोल्हापुर के छत्रपति साहू जी महाराज ने 1901 में षुरू किया था। औपनिवेषिक काल में आरक्षण की ऐतिहासिक रूपरेखा 1909 एवं 1935 आदि के अधिनियम में देखी जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 16(4) में सामाजिक एवं षैक्षणिक दृश्टि से पिछड़े वर्गों के नियुक्तियों और पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध हैं। इससे यह स्पश्ट है कि आरक्षण के पीछे निहित उद्देष्य सामाजिक और षैक्षणिक समानता की स्थापना थी पर इसे समय के साथ कूबत पाने का तरीका भी मान लिया गया। देखा जाए तो मण्डल कमीषन की सिफारिषों के अनुरूप अन्य पिछड़े वर्गों को 27 फीसदी आरक्षण 1993 से मिला हुआ है पर गौरतलब यह है कि दो दषक बीतने के बावजूद इस बात का मूल्यांकन करने की जहमत किसी ने नहीं उठाई कि जिन उद्देष्यों के लिए इसे लागू किया गया वह पूरा हो भी रहा है या नहीं। ऐसा न कर पाने के पीछे भी राजनीतिक मजबूरियां ही रही हैं क्योंकि सत्ता एवं गैरसत्ताधारी दोनों जानते हैं कि कम-से-कम आरक्षण के मूल्यांकन एवं हटाने की सोच उन पर कितनी भारी पड़ सकती है।
आरक्षण को राजनीतिक दलों ने चुनाव जीतने के औजार के रूप में भी उपयोग किया है। वर्ग विषेश से ताल्लुक रखने वाले राजनेता भी इसकी जमकर वकालत करते रहे हैं। पिछली यूपीए सरकार ने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिशद् की विषेशज्ञ समिति की सिफाारिष पर जाठों को आरक्षण देने का फैसला किया था। देष की षीर्श अदालत ने इसे गलत करार देते हुए कहा था कि तत्कालीन सरकार ने राश्ट्रीय पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि जाति आरक्षण देने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है मगर पिछड़ापन निर्धारित करने के लिए यह अकेले ही पर्याप्त नहीं है। इसी कसौटी पर आन्ध्र प्रदेष की कापू सहित अन्य जातियां जो आरक्षण मांग रही हैं उन्हें भी कसने की आवष्यकता है ताकि यह समझना मुमकिन हो कि वाकई में इसके पीछे का मजबूत आधार क्या है? देखा जाए तो संविधान के अनुच्छेद 15 एवं 16 में सामाजिक एवं षैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है मगर यह सिद्ध भी होना चाहिए कि औरों के मुकाबले अमुक जाति या वर्ग षैक्षणिक रूप से पिछड़ी है। यह भी सही है कि अगर समाज के सभी तबके तरक्की करते हैं तो देष में अच्छा वातावरण बनेगा पर आरक्षण को मात्र क्षतिपूर्ति के लिए प्रयोग तो नहीं किया जा सकता। पर यह सही है कि इसकी बुनियादी पड़ताल समय-समय पर होनी चाहिए।
सवाल यह भी है कि आरक्षण को लेकर राजनीतिक चर्चा-परिचर्चा आये दिन जोर क्यों पकड़ती है। दरअसल इसके पीछे मत विभाजन की अवधारणा भी निहित है। यही कारण है कि चुनावी अवसरों पर इस पर विमर्ष बढ़ जाता है। आगे के एक साल के अन्दर उत्तर प्रदेष, उत्तराखण्ड, तमिलनाडु तथा असम समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसे देखते हुए सरकार की आरक्षण से जुड़ी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है जिसके चलते प्रधानमंत्री मोदी रैलियों में इसके पक्ष में बयान देना जरूरी समझ रहे हैं जबकि विरोधी इन्हें आरक्षण विरोधी बताकर अपनी राजनीतिक जमीन चिकनी करना चाहते हैं। असल में आरक्षण हमेषा से सत्ता हथियाने का एक जरिया भी रहा है। आरक्षण की सीमा को लेकर भी देष में एकरूपता का आभाव देखा जा सकता है। तमिलनाडु में सर्वाधिक 69 फीसदी जबकि महाराश्ट्र में 52 फीसदी तथा अन्य राज्यों में तय सीमा 50 फीसदी के दायरे में इसे देखा जा सकता है। 1963 में बाला जी के मामले में फैसले को दोहराते हुए इन्दिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता क्योंकि एक तरफ मेरिट तो दूसरी तरफ सामाजिक न्याय को भी ध्यान में रखना है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ही मण्डल कमीषन केस में यह साफ किया कि अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग आरक्षण स्थिति हो सकती है। बेषक आरक्षण सामाजिक न्याय की अवधारणा से ओत-प्रोत है पर इसकी मांग करने वाले हिंसा का रास्ता अख्तियार करने से बाज नहीं आते। राजस्थान के गुर्जर और जाठ, गुजरात के पाटीदार समेत हर आरक्षण की मांग करने वालों ने सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाने में कोई गुरेज नहीं किया। सबके बावजूद इस बात को भी समझना होगा कि आरक्षण सामाजिक उत्थान का जरिया है और इसे इसी रूप में बने रहना चाहिए।



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

Tuesday, February 2, 2016

किस मोड़ पर जम्मू-कश्मीर की सत्ता और सियासत

सत्ता और सियासत में सौदेबाजी का सहःमिलन लोकतंत्र में एक ऐसी अनचाही वास्तविकता रही है जिसे कोई भी सियासतदान षिद्दत से स्वीकार नहीं करेगा। इन दिनों जम्मू-कष्मीर कुछ इसी प्रकार के दौर से गुजर रहा है। असल में 10 महीने पुरानी पीडीपी और भाजपा गठबंधन की सरकार का तब अवसान हुआ था जब बीते 7 जनवरी को वहां के मुख्यमंत्री के पद पर कार्यरत मुफ्ती मोहम्मद सईद का असमय निधन हुआ तभी से यहां न केवल सियासत सुर्खियों में रही बल्कि सत्ता की बनावट भी सस्पेंस लिए हुए है। इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सत्ता के ध्रुवीकरण में व्यक्ति विषेश का बड़ा महत्व होता है और यह तब अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब दो अलग-अलग विचारधारा के दल आपस में एक होकर सरकार चलाने की इच्छा रखते हों। करीब एक महीने के सरकार विहीन जम्मू-कष्मीर में कई उतार-चढ़ाव देखे जा सकते हैं। सरकार गठन की प्रक्रिया को बाधित होते देख 9 जनवरी से जम्मू-कष्मीर राज्यपाल षासन के अधीन आया। राज्यपाल एन.एन. बोहरा की सिफारिष और गृहमंत्री की अनुषंसा देखते हुए राश्ट्रपति ने इसकी अनुमति दे दी। तब कारण बताया गया कि मुख्यमंत्री की दावेदार पीडीपी की नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती षोकाकुल होने के कारण कुछ दिनों तक षपथ नहीं लेना चाहती पर सियासी संदर्भ यह भी उभरा कि पीडीपी और भाजपा पूर्व की षर्तों में हेरफेर करना चाहते हैं। भाजपा चाहती है कि बारी-बारी से दोनों पार्टियों के मुख्यमंत्री बनें साथ ही अधिक महत्वपूर्ण विभाग उनको मिले जबकि महबूबा मुफ्ती उप-मुख्यमंत्री के पद को मना करने और रोटेषन में सीएम जैसी बातें नहीं चाहती हैं। इतना ही नहीं संवेदनषील मुद्दों पर भाजपा चुप रहे साथ ही राज्य को अधिक केन्द्रीय सहायता दी जाए जैसी तमाम इच्छाएं रही हैं।
देखा जाए तो जो विचारधारा मुफ्ती मोहम्मद सईद की भाजपा के साथ थी वैसी ही महबूबा की भी रहेगी इसके आसार कम ही हैं जो समझौते पहले के थे उन पर नये सिरे से कोषिष करना इसका पुख्ता सबूत है। बावजूद इसके भाजपा और पीडीपी इन दिनों सरकार बनाने के पेषोपेष से बाहर नहीं हैं। पीडीपी को यह डर जरूर होगा कि घाटी की रैयत के साथ यदि कोई अनहोनी हुई तो इसकी जिम्मेदारी कहीं उस पर न आ जाये जबकि भाजपा जो पहली बार यहां सत्ता तक पहुंची है वह भी कोई जोखिम नहीं लेना चाहेगी। साफ है सरकार बनाने की मजबूरी से दोनों परे नहीं है। संकेत तो यह भी था कि एक सप्ताह के षोक के बाद कभी भी षपथ हो सकती है पर मामला खटाई में ही रहा। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जम्मू-कष्मीर में सईद का असमय निधन होना घाटी के लिए एक राजनीतिक दुर्घटना भी थी। फिलहाल इस बात को भी समझना ठीक होगा कि गठबंधन में मौजूदा परिस्थितियां ही अधिक प्रभावी होती हैं। भाजपा जानती है कि पीडीपी की तुलना में वह महज तीन सीट ही पीछे है। सईद की सीट हटा दें तो यह आंकड़ा दो का ही बचता है पर यहां झगड़ा सीटों के अन्तर का नहीं वरन् अतिमहत्वाकांक्षा का है। मुख्यमंत्री पद की दावेदार महबूबा मुफ्ती का यह कहना कि सईद ने इस उम्मीद में बीजेपी के साथ गठजोड़ करने का एक साहसिक पर अलोकप्रिय फैसला किया था कि केन्द्र में नरेन्द्र मोदी जम्मू-कष्मीर के राजनीतिक एवं आर्थिक मुद्दों को हल करने के लिए निर्णायक उपाय सिद्ध होंगे। महबूबा मुफ्ती का उक्त कथन यह दर्षाता है कि घाटी में सरकार की सूरत में केन्द्र को वे सौदेबाजी के केन्द्र में रखना चाहती हैं। असल में पीडीपी राज्य की स्थानीय दल है उसकी अपनी कुछ मजबूरियां हैं पर उन्हें यह भी समझना होगा कि यदि वे अपनी राजनीतिक प्रवृत्तियों को लेकर अतिरिक्त स्थूल बनी रहेंगी तो गठबंधन की परिभाशा में भी कैसे बनी रहेंगी?
महबूबा मुफ्ती का इस ओर संकेत करना कि अगर बीजेपी गठबंधन के एजेण्डे को पूरा नहीं करती है तो वे दोबारा राज्य में चुनाव में जाने से नहीं हिचकेंगी। सवाल है कि यदि संकेत सही साबित होते है तो जम्मू-कष्मीर की सियासत का परिदृष्य क्या होगा? पीडीपी भले ही घाटी की स्थानीय पार्टी हो और वहां पर अच्छा खासा रसूख रखती हो पर उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा भी सीटों के मामले में तुलनात्मक बहुत पीछे नहीं है। यहां तक की प्रधानमंत्री मोदी जम्मू-कष्मीर में करीब आधा दर्जन दौरा कर चुके हैं। कई केन्द्रीय मंत्रियों का राज्य में आना-जाना लगा रहता है। इतना ही नहीं जब घाटी अक्टूबर 2014 में भीशण बाढ़ की चपेट में थी तब केन्द्र की मोदी सरकार ने राहत और बचाव के लिए पूरी कूबत झोंक दी थी। इस बात से भी वहां के लोग अनजान नहीं हैं। जिस वायदे और इरादे के साथ भाजपा ने जम्मू-कष्मीर में जबरदस्त एन्ट्री की है उसे भी कमतर नहीं आंका जा सकता है। यदि मेलजोल और सियासती सौदेबाजी से सरकार बनाने का रास्ता साफ होता है तो इसमें भला दोनों का ही है परन्तु यदि ऐसा न हुआ तो नुकसान और फायदे के सस्पेंस में दोनों रहेंगे। अक्सर गठबंधन की सत्ताओं में महत्वाकांक्षी अवधारणाओं का घालमेल हमेषा से रहा है जिसके चलते सियासत बनती और बिगड़ती रही है। वर्तमान में जम्मू-कष्मीर इसी दौर से गुजर रहा है। षोकाकुल महबूबा मुफ्ती से बीते 10 जनवरी को कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने भी मुलाकात की थी हांलाकि इसका कोई राजनीतिक अर्थ नहीं है पर जब दो सियासतदान मिलते हैं तो निहितार्थ ढूंढने की कोषिष की ही जाती है। ध्यान्तव्य है कि 2002 से 2008 के बीच कांग्रेस पीडीपी की सरकार राज्य में रही है।
फिलहाल जम्मू-कष्मीर में सरकार गठन को लेकर पीडीपी अपने रूख पर अड़ी हुई है। महबूबा मुफ्ती भाजपा से यह ठोस आष्वासन चाहती हैं कि उनके पिता की विचारधारा का अनुसरण किया जाए पर उन्हें भी यह समझना होगा कि गठबन्धन का धर्म निभाने के लिए एकतरफा जिद् का बहुत महत्व नहीं होता। समय और काल के अनुपात में गठबंधन के धर्म और कर्म दोनों जगह से खिसके हैं और खिसकते रहें हैं और आगे भी ऐसी सम्भावना बनी रहेगी इसलिए जिद् का नहीं बीच का रास्ता सियासत के स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है। सबके बावजूद भाजपा को भी यह समझना होगा कि जिस उम्मीद से जम्मू-कष्मीर ने उन्हें हैसियत प्रदान की है उसकी सुरक्षा करने का दायित्व निभायें। दूरदृश्टि का अनुपालन करते हुए एक सकारात्मक मापदाण्ड की लकीर खींचे ताकि राज्य में हुई राजनीतिक दुर्घटना को मरम्मत करके पुनः पटरी पर लाया जा सके। फिलहाल इस संषय से अभी पूरी तरह बाहर निकलना मुष्किल प्रतीत होता है। जिस कदर राज्य में सरकार बनाने को लेकर सौदेबाजी अभी थमी नहीं है उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार बनाने की जल्दबाजी में न ही पीडीपी है और न ही भाजपा। फिर भी यदि नेक नियति के साथ यहां की सियासती धुंध छंटती है तो भाजपा-पीडीपी स्वयं के साथ लोकतंत्र को भी फायदा पहुंचाने के लिए जाने और समझें जाएंगे।



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502