Thursday, January 14, 2016

खतरे का संकेत है ठण्ड में ठण्ड का न होना

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दुनिया जिस रूप में हुआ करती थी फिलहाल अब वैसी नहीं रही साथ ही सदियों से अनवरत् बनी रहने वाली ऋतुएं भी अपनी कक्षा से भटकी प्रतीत होती हैं। वर्तमान षीत ऋतु के आलोक में उक्त कथन को कहीं अधिक पुख्ता करार दिया जा सकता है। जनवरी माह का एक पखवाड़ा निकल गया मजबूत सर्दी के लिए पहचान रखने वाला यह महीना बिना हाड़-मांस को कंपकपाये ही रूख़सत होने की ओर है साथ ही कई ऐसे प्रभावों और आषंकाओं को भी मजबूती दे रहा है जिसे लेकर बरसों से कवायद चल रही है। गर्मी, बारिष और सर्दी का सही अनुपालन समय के साथ न होने के पीछे एक बड़ी वजह पृथ्वी पर लगातार बिगड़ रही जलवायुवीय स्थिति है। जलवायु परिवर्तन को लेकर वर्तमान समय में चर्चा और तापमान दोनों पहले की तुलना में भी कहीं अधिक गर्माहट लिए हुए है। बीते कुछ वर्शों से ऋतुएं जिस प्रकार ध्यान आकर्शित कर रही हैं उसे देखते हुए यह सोच विकसित होना लाज़मी है कि जलवायु का मिजाज़ ठिकाने पर नहीं है। यदि सब कुछ पहले जैसा कायम होते हुए देखना है तो जलवायु में हो रहे परिवर्तन को रोकना बेहद जरूरी है जो फिलहाल नाप-तौल से कहीं ऊपर चला गया है। दूसरे षब्दों में कहें तो पिछली सदी से इस सदी तक जो अंधेरगर्दी हुई है उसी की बदौलत आज हालात ऐसे हुए हैं।
बदलाव के चलते मौसम का मिजाज़ लोगों की समझ में नहीं आ रहा। रात में सर्दी पड़ रही है जबकि दिन में धूप लोगों को ठीक-ठाक गर्मी का एहसास करा रही है। मैदानी क्षेत्रों को तो छोड़िए हिमालयी क्षेत्र भी आधी से अधिक सर्दी का सीजन निकल जाने के बावजूद इस मामले में वंचित रहे हैं। हिमालय के ग्लेषियर भी ग्लोबल वार्मिंग के चलते सिकुड़ रहे हैं। ऊँचाई वाले क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो अमूमन मसूरी जैसे क्षेत्र में भी अभी तक एक बार भी बर्फबारी नहीं हुई है। वर्श 2000 में यहां इतनी बर्फबारी हुई थी कि पिछले 30 वर्श का रिकाॅर्ड टूटा था परन्तु हालात को देखते हुए प्रतीत होता है कि इस बार यहां कम बर्फबारी और कम सर्दी का रिकाॅर्ड बनाने में हिमालय भी पीछे नहीं रहेगा। इस अनुभव को बांटना समुचित प्रतीत होता है कि बीते रविवार को मैं स्वयं सपरिवार मसूरी में था। जहां मैंने कैम्पटी फाॅल के ठण्डे झरनों से निकलने वाले पानी में लोगों को बड़े आनंद के साथ नहाते हुए देखा साथ ही ऐसे इलाकों में चटक धूप के साथ बिना सर्दी वाले सुगम दिनचर्या को देखना भी अपने आप में कहीं अधिक रोचक था। ठण्ड का अनुमान इस आधार पर लगा सकते हैं कि इन दिनों यहां दिन का तापमान 12 डिग्री सेल्सियस जबकि रात में 2 डिग्री तक बना हुआ है। मौसम का बदलता रूख उत्तराखण्ड के चार धाम की स्थिति को भी बदल कर रख दिया है। बद्रीनाथ धाम भी ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में है। षीतकाल में बर्फ की आगोष में रहने वाला बद्रीनाथ इन दिनों बर्फ विहीन है। ऊँची-ऊँची चोटियों पर बर्फ जमी है पर मन्दिर के आस-पास स्थिति नाम मात्र की है। 11,000 फीट की ऊँचाई वाले केदारनाथ धाम में भी पहले जैसी झमाझम बर्फबारी नहीं हुई है। यमुनोत्री और गंगोत्री सहित कई तीर्थाटन एवं पर्यटक स्थल पर होने वाली बर्फबारी इस बार ग्लोबल वार्मिंग की बुरी नजरों की चपेट में है। मौसम विज्ञान एवं षोध केन्द्र दिल्ली के महानिदेषक डाॅ. एल.एस. राठौर का कहना है कि वर्श 2015 विष्व में अभी तक के सबसे गर्म वर्शों में से एक है। बीते अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर सबसे गर्म माह रहे हैं। पष्चिमी विक्षोभ जम्मू-कष्मीर और हिमाचल प्रदेष तक सीमित हैं जबकि आगे इसके प्रभाव नहीं दिख रहे हैं। इसका भी प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग ही है।
ठण्ड के दिनों में ठण्ड नहीं पड़ रही है जिसके चलते असर इधर भी है और उधर भी। मैदानी इलाकों में षीत वस्त्र भी इस बार बेकार सिद्ध हुए हैं। इन इलाकों का तापमान जनवरी माह में कोहरे और अति षीत के चलते जहां चार-पांच डिग्री तक चले जाते थे कभी-कभी तो कुछ इलाकों में यही तापमान 2 डिग्री से कम भी रहा है पर इन दिनों मौसम की रूखाई इस कदर बढ़ी है कि ये सारी डिग्रियां मानो बेमानी हो गयी हो। भारत की राजधानी दिल्ली भी इस बार ठण्ड का स्वाद ठीक से नहीं चख पाई है अन्य क्षेत्रों का भी कमोबेष यही हाल है। इस वर्श मौसम भी खूब खींचातानी में मषगूल रहा है। बीते मार्च-अप्रैल में बेमौसम दर्जनों बार बारिष होना और मानसून के समय में बारिष का कम होना किसी तबाही का संकेत ही है। आम तौर पर जुलाई, अगस्त और सितम्बर माह की मानसूनी बारिष कुल वर्श भर की बारिष का 80 फीसदी होती है लेकिन पिछले वर्श की तुलना में भी यह अधिक गिरावट वाली थी। बेमौसम बारिष से किसान बेमौत मारे गये जबकि बारिष के दिनों में अकाल ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। यह सब जलवायु परिवर्तन का ही दुश्परिणाम है साथ ही इस बात भी इषारा है कि भारतीय कृशि को बचाने के लिए नये दर्षन और नये ज्ञान की ओर चलने की जरूरत है। दिसम्बर के महीने में चेन्नई व्यापक बाढ़ की चपेट में आयी जो एक इतिहास बन गया। यह भी जलवायु परिवर्तन में हुए फर्क का ही नतीजा था। बीते 30 नवम्बर को पेरिस में जलवायु परिवर्तन को लेकर सम्मेलन हुआ एक पखवाड़े तक चलने वाले इस सम्मेलन में व्यापक विचार विमर्ष के बाद 195 देषों ने ऐतिहासिक समझौतों पर हस्ताक्षर किये और ये समझौते उन्हीं परिवर्तनों को परिवर्तित करने के लिए हुए जो दुनिया को परिवर्तित करने पर आमादा है। 
भारत पर जलवायु परिवर्तन की मार स्पश्ट हो चली है नदियां रास्ता बदल रही हैं और कई अनचाहे लक्षण से भारत की धरती भी वाकिफ हो रही है। इस बार की ठण्ड के दिनों में ठण्ड की कमी इसका पुख्ता सबूत है। मौसम अजीब ढंग से व्यवहार करने लगा है यह बात वैज्ञानिक भी मानते हैं। देष की आधी से अधिक आबादी खेती पर निर्भर है और आधी खेती बारिष पर निर्भर है। यदि मानसून का मिजाज काबू में नहीं आया तो अन्नदाताओं के अस्तित्व पर उमड़ा खतरा बादस्तूर जारी रहेगा। रिकाॅर्ड दर्षाते हैं कि 19वीं सदी के औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का तापमान बढ़त में आया। कोयले और तेल जैसे जीवाष्म ईंधनों के विस्तृत प्रयोग के चलते वायुमण्डल में कार्बन डाई आॅक्साइड बेहिसाब वृद्धि ले ली। मीथेन, ओजोन और अन्य गैसों की भी बढ़ोत्तरी हुई जिसका सीधा असर पृथ्वी की जलवायु पर पड़ा और इस जलवायु परिवर्तन ने प्रकृति के सारे चक्र को तहस-नहस कर दिया। अब इसी को पटरी पर लाने की कवायद चल रही है। सदियों में बिगड़े हालात को कुछ वर्शों में तो ठीक नहीं होंगे पर कोषिषों में और ईमानदारी भरने की जरूरत है।




सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

फिलहाल सरकार मोड में दिखी घाटी

सियासत और सत्ता के धु्रवीकरण में व्यक्ति विषेश का बड़ा महत्व होता है और यह तब अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब दो अलग-अलग विचारधारा के दल आपस में एक होकर सरकार चलाने की मंषा रखते हैं। जम्मू-कष्मीर में पीडीपी और भाजपा गठबंधन की पिछले दस माह से सरकार चल रही थी जो बीते 7 जनवरी को मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के असमय निधन के चलते ठप हो गयी। तभी से यहां की सियासत भी कुछ हद तक सुर्खियों में रही और इसी बीच यह सस्पेंस भी स्थान लेने लगा कि दोनों दलों के बीच पूर्ववत् षर्तों के आधार पर गठबंधन को आगे बढ़ाना सम्भव होगा या नहीं। फिलहाल बीते मंगलवार को यह अटकलें खारिज हो गईं और अब यह तय हो गया कि दोनों दल गठबंधन को जारी रखेंगे और सरकार निर्विवाद रूप से आगे बढ़ेगी। इन तमाम स्वीकार्य पक्षों के बावजूद बीते एक सप्ताह में जो प्रष्न उभरे उसमें एक यह भी है कि क्या भाजपा जो मात्र तीन सीटों से पीडीपी से पीछे है फिलहाल मुफ्ती मोहम्मद सईद की सीट हटाने के बाद यह आंकड़ा दो का है वो पूर्ववत् षर्तों के अनुरूप ही मुख्यमंत्री की दावेदार महबूबा मुफ्ती का साथ देगी। अक्सर सियासत में गठबंधन अपना कद अख्तियार करता है साथ ही व्यापक पैमाने पर सौदेबाजी भी होती है। मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ जो विचारधारा भाजपा की थी क्या वैसी ही महबूबा मुफ्ती के साथ रहेगी? जाहिर है कि भाजपा भी इस पेषोपेष में होगी पर विकल्प अत्यंत सीमित हैं। ऐसे में कद के बजाय सरकार को तवज्जो देना भाजपा की मजबूरी कही जायेगी।
फिलहाल नई सरकार के गठन की कवायद अभी पूरी नहीं हुई है। संकेत मिला है कि एक सप्ताह के षोक के बाद कभी भी षपथ हो सकता है जिसका समय बीत चुका है। बीते दिनों को देखें तो सईद के असमय निधन से जो सरकार में खालीपन आया उसकी भरपाई तत्काल न हो पाने के चलते 9 जनवरी से जम्मू-कष्मीर एक बार फिर राज्यपाल षासन के अधीन आ गया। राज्यपाल एन.एन. बोहरा की सिफारिष और गृह मंत्री की अनुषंसा को देखते हुए राश्ट्रपति ने इसकी मंजूरी दे दी। हालांकि वजह यह बताई गई कि मख्यमंत्री की दावेदार पीडीपी की नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती कुछ दिनों तक मुख्यमंत्री की षपथ लेने से मना करने के चलते ऐसा हुआ पर सियासी संदर्भ यह भी उभरा है कि पीडीपी और भाजपा की पूर्व की षर्तों में हेरफेर के चलते सरकार गठन में रूकावट आई जिसमें निहित भाव यह है कि भाजपा चाहती है कि बारी-बारी से दोनों पार्टियों के मुख्यमंत्री बनें साथ ही अधिक महत्वपूर्ण विभाग उनकी पार्टी को मिले जबकि महबूबा उप-मुख्यमंत्री के पद को मना करने और रोटेषन में सीएम जैसी बातें नहीं चाहती हैं। इसके अलावा संवेदनषील मुद्दों पर भाजपा चुप रहे सहित राज्य को अधिक केन्द्रीय सहायता दी जाए जैसी तमाम प्रकार की मंषा रखती हैं। हालांकि पीडीपी इसे अनर्गल करार दे रही है और स्पश्ट किया है कि दोनों पार्टियां उसी एजेण्डे और एलाइंस पर संतुश्ट हैं और कोई नई षर्त नहीं होगी।
इस बात को भी समझना ठीक होगा कि गठबंधन में मौजूदा परिस्थितियां ही अधिक प्रभावी होती हैं और इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि गठबंधन विभिन्न राजनीतिक दलों का किसी विषेश उद्देष्य के लिए अस्थाई सहमिलन होता है। जाहिर है कि भाजपा पीडीपी इस व्यवस्था से परे नहीं है दोनों ने एक-दूसरे के विरूद्ध और अलग-अलग एजेंडे पर जनता से अपने-अपने हिस्से का वोट हासिल किया है। ऐसे में दोनों दल जन-जिम्मेदारी के चलते कोई जोखिम नहीं लेना चाहेंगे। हांलाकि पहले जो गठबंधन हुआ था उस सरकार का रोडमैप अभी तो बदलाव की स्थिति में नहीं दिख रहा है पर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मापतौल पूरी हो गयी है। छः बरस के लम्बे कार्यकाल में कोई मुष्किल नहीं आयेगी ऐसा कहना भी अतिष्योक्ति ही कहा जायेगा। अक्सर गठबंधन की सत्ताओं में महत्वाकांक्षी अवधारणाओं का घालमेल रहा है जिसके चलते सियासत बनती और बिगड़ती रही है। ऐसे उदाहरणों से जम्मू-कष्मीर की सरकार को बिल्कुल अलग-थलग नहीं माना जा सकता। भाजपा एक राश्ट्रीय पार्टी है उसके अपने विस्तारवादी मंसूबे हैं जबकि पीडीपी जम्मू-कष्मीर तक सीमित होने के साथ यहां की जनता को लेकर अति संवेदनषील हो सकती है ऐसे में समय के साथ उद्देष्य टकराने की सम्भावना भी बनी रहेगी। मुफ्ती मोहम्मद सईद के समय भी कई बार ऐसे उदाहरण देखने को मिले थे। फिलहाल प्रदेष में सरकार बनने का पथ चिकना और चमकीला हो चुका प्रतीत होता है।
षोकाकुल महबूबा मुफ्ती से बीते 10 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने मुलाकात की। हालांकि इस मुलाकात का कोई राजनीतिक अर्थ नहीं था फिर भी जब दो अलग दल के सियासतदान साथ होते हैं तो राजनीतिक निहितार्थ ढूंढने की कवायद कुछ लोग जरूर करते हैं। ध्यानतव्य है कि 2002 से 2008 के बीच कांग्रेस-पीडीपी की गठबंधन सरकार जम्मू-कष्मीर में पहले रह चुकी है। जिस प्रकार सोनिया गांधी ने घाटी जाकर महबूबा मुफ्ती को उनके दुःख में काम आई उसे देखते हुए महबूबा मुफ्ती के मन में भी षायद यह बात उमड़ी हो कि भाजपा के षीर्श नेता प्रधानमंत्री मोदी भी यदि ऐसा करते तो उन्हें कहीं अधिक संतुश्टि मिलती। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली में मुफ्ती मोहम्मद सईद के देहांत के उपरांत मिलने गये थे। देखा जाए तो ऐसे दिन सियासत की मजबूती के लिए बेजोड़ भी रहे हैं। फिलहाल एक बरस पुराना गठबंधन ‘सरकार मोड‘ में षीघ्र ही वापस लौटेगा। जम्मू-कष्मीर विधानसभा की दलीय स्थिति को देखें तो 28 सीटों के साथ पीडीपी इस सूबे का सबसे बड़ा दल है। 25 सीटों के साथ भाजपा दूसरा बड़ा दल है जबकि नेषनल कांफ्रेंस 15, कांग्रेस 12, पीपुल्स कांफ्रेंस 2 के अलावा माकपा की एक सीट तथा अन्य 4 भी षामिल हैं जो इन दिनों सूक्ष्म अवधि के लिए राज्यपाल षासन से गुजर रहा है। भारत के 29 राज्यों में जम्मू-कष्मीर ही मात्र एक ऐसा राज्य है जहां आपात दो प्रकार से लगाये जाते हैं। पहला जम्मू-कष्मीर के संविधान की धारा 92 के तहत राज्यपाल का षासन जबकि दूसरा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के अधीन राश्ट्रपति षासन।
राज्यपाल षासन की पड़ताल से पता चलता है कि अब तक सात बार ऐसा किया जा चुका है। दिलचस्प यह है कि इन सभी अवसरों पर मुफ्ती मोहम्मद सईद किसी न किसी तरह महत्वपूर्ण भूमिका में रहे हैं। विषेश राज्य का दर्जा प्राप्त जम्मू-कष्मीर संविधान की पहली अनुसूची में षामिल 15वां राज्य है जो अनुच्छेद 370 के अधीन कुछ उपबन्धों के चलते अन्यों से अलग है। यहां का लोकतंत्र अत्यंत चुनौतियों से भरा है। इस सूबे को कई अलगावादी और कट्टरपंथियों से भी जूझना पड़ता है साथ ही आतंकी हमलों से कई बार छलनी यहां की घाटी कई समस्याओं से आज भी घिरी है। स्वास्थ्य, षिक्षा, रोजगार सहित कई बुनियादी समस्याओं का यहां अम्बार लगा है। ऐसे में सरकार चाहे पूर्ववत् षर्तों पर बने या कद और कत्र्तव्य के अनुपात में आगे चलकर किसी फेरबदल के साथ रहे पर असली परीक्षा तो यहां की जनता को वो सब देने की रहेगी जिसका वादा करके वे आयें हैं।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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घाटी में राज्यपाल शासन के निहित परिप्रेक्ष्य

जम्मू-कष्मीर में पिछले वर्श 1 मार्च को भाजपा पीडीपी के साथ मिलकर पहली बार घाटी में सत्तासीन हुई थी। गठबंधन की षर्तों के तहत मुफ्ती मोहम्मद सईद को पदासीन होते हुए देखा जा सकता है जिनका बीते 7 जनवरी को बीमारी के चलते दिल्ली के एम्स में असमय निधन हो गया। जम्मू-कष्मीर विधानसभा में 87 सदस्यों के मुकाबले 25 पर जीत सुनिष्चित करने वाली भाजपा की घाटी में यह एक जबरदस्त एंट्री थी जो 65 वर्श के लोकतांत्रिक इतिहास में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्षन के लिए जाना जाता है। यहां की 10 महीने से निरंतरता लिए हुए सरकार मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के साथ ही ठप हो गयी। फिलहाल नई सरकार के गठन की कवायद अभी पूरी नहीं हुई है। कुछ वजहों से फिलहाल सरकार गठन की प्रक्रिया को आगे के लिए टालना ही मुनासिब समझा गया परिणामस्वरूप बीते 9 जनवरी से जम्मू-कष्मीर एक बार फिर राज्यपाल षासन के अधीन आ गया। राज्यपाल एन.एन. बोहरा की सिफारिष और गृह मंत्री की अनुषंसा को देखते हुए राश्ट्रपति ने इसकी मंजूरी दे दी। हालांकि वजह यह बताई जा रही है कि मख्यमंत्री की दावेदार पीडीपी की नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती कुछ दिनों तक मुख्यमंत्री की षपथ लेने से मना करने के चलते ऐसा हुआ पर सियासी संदर्भ यह भी उभरा है कि पीडीपी और भाजपा की पूर्व की षर्तों में हेरफेर के चलते सरकार गठन में रूकावट आई है। भाजपा चाहती है कि बारी-बारी से दोनों पार्टियों के मुख्यमंत्री बनें साथ ही अधिक महत्वपूर्ण विभाग उनकी पार्टी को मिले जबकि महबूबा उप-मुख्यमंत्री का पद को मना करने और रोटेषन में सीएम जैसी बातें नहीं चाहती हैं। इसके अलावा संवेदनषील मुद्दों पर भाजपा चुप रहे सहित राज्य को अधिक केन्द्रीय सहायता दी जाए जैसी तमाम प्रकार की मंषा रखती हैं।
भारतीय राजनीति में बहुदलीय व्यवस्था के चलते केन्द्र में एक तरफा सत्ता हथियाने का चलन विगत् ढ़ाई दषकों से नहीं रहा है। हालांकि कुछ राज्यों में इस दौर में भी एकदलीय व्यवस्था वाली सरकारें आती रहीं और आज भी हैं। दरअसल गठबंधन विभिन्न राजनीतिक दलों का किसी विषेश उद्देष्य के लिए अस्थाई सहमिलन है। विचारक रोस्टर क्रस्टन के अनुसार विभिन्न दलों या राजनीतिक विचारधारा या पहचान रखने वाले समूहों के बीच आपसी समझौता गठबंधन कहलाता है। जाहिर है कि भाजपा पीडीपी इस व्यवस्था से परे नहीं है दोनों ने एक-दूसरे के विरूद्ध और अलग-अलग एजेंडे पर जनता से अपने-अपने हिस्से का वोट हासिल किया है। ऐसे में दोनों दल जन-जिम्मेदारी के चलते कोई जोखिम नहीं लेना चाहेंगे। हांलाकि पहले जो गठबंधन हुआ था उस सरकार का रोडमैप वक्त के साथ बदलाव की स्थिति में दिख रहा है। इसका अर्थ यह भी है कि उस दौर में सियासत के कद को भी नाप-तौल कर ही सहमति बनाई गयी थी। जाहिर है कि मुखिया बदलाव के चलते महबूबा के साथ भी भाजपा अलग तरीके से नये मापदण्ड स्थापित करना चाहेगी। भाजपा यह भी जानती है कि अभी छः बरस के कार्यकाल का एक वर्श भी नहीं बीता है ऐसे में संतुलन का सिद्धान्त अपनाते हुए घाटी में काबिज रहना सही रहेगा पर बदले परिप्रेक्ष्य और परिस्थितियों में सत्ता से जुड़े सौदेबाजी को भी वे दरकिनार नहीं कर सकते। बीते रविवार को कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने षोक से युक्त महबूबा से मुलाकात की। हालांकि इस मुलाकात का कोई राजनीतिक अर्थ नहीं है फिर भी जब दो अलग दल के सियासतदान साथ होते हैं तो राजनीतिक निहितार्थ ढूंढने की कवायद कुछ लोग जरूर करते हैं। ध्यानतव्य है कि 2002 से 2008 के बीच कांग्रेस-पीडीपी की गठबंधन सरकार जम्मू-कष्मीर में पहले रह चुकी है।
जम्मू-कष्मीर को लेकर सियासी अटकलें तेज जरूर हैं पर भाजपा और पीडीपी का लगभग एक बरस पुराने गठबंधन को देखते हुए अनुमान है कि दोनों ‘सरकार मोड‘ में षीघ्र ही लौटेंगे। हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी तक भाजपा ने महबूबा को समर्थन नहीं दिया है। जम्मू-कष्मीर विधानसभा की दलीय स्थिति को देखें तो 28 सीटों के साथ पीडीपी इस सूबे का सबसे बड़ा दल है हालांकि मुफ्ती मोहम्मद सईद से सम्बंधित एक सीट अब रिक्त मानी जायेगी। 25 सीटों के साथ भाजपा दूसरा बड़ा दल है जबकि नेषनल कांफ्रेंस 15, कांग्रेस 12, पीपुल्स कांफ्रेंस 2 के अलावा माकपा की एक सीट तथा अन्य 4 भी षामिल हैं। सियासी गर्मी के बीच एक बार फिर राज्यपाल षासन होना अकारण तो नहीं है पर वक्त के साथ सियासत का रूख भी स्पश्ट हो जायेगा। भारत के 29 राज्यों में जम्मू-कष्मीर ही मात्र एक ऐसा राज्य है जहां आपात दो प्रकार से लगाये जाते हैं। पहला जम्मू-कष्मीर के संविधान की धारा 92 के तहत राज्यपाल का षासन जबकि दूसरा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के अधीन राश्ट्रपति षासन। राज्यपाल षासन की पड़ताल से पता चलता है कि अब तक सात बार ऐसा किया जा चुका है। दिलचस्प यह है कि इन सभी अवसरों पर मुफ्ती मोहम्मद सईद किसी न किसी तरह महत्वपूर्ण भूमिका में रहे हैं। इसके पूर्व तथा छठवीं बार भी राज्यपाल षासन 2015 के जनवरी माह में ही 51 दिनों के लिए लागू हुआ था। वजह तत्कालीन कार्यकारी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का त्यागपत्र और चुनाव के बाद गठजोड़ में लग रहा समय था जो 1 मार्च, 2015 को मुफ्ती मोहम्मद सईद के सीएम बनने तक लागू रहा और अब उनके असमय निधन के चलते सातवीं बार राज्यपाल षासन लगाया गया है।
पहली बार जम्मू-कष्मीर में 26 मार्च, 1977 को उस समय राज्यपाल षासन लगा था जब मुफ्ती मोहम्मद सईद की अध्यक्षता वाली कांग्रेस इकाई ने षेख अब्दुल्ला सरकार से समर्थन वापस लिया था। दूसरी बार तब लगा जब मार्च, 1986 में कांग्रेस ने गुलाम मोहम्मद षाह की चल रही सरकार से समर्थन वापस लिया। इस समय सईद प्रदेष कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। नब्बे में जब तीसरी बार राज्यपाल षासन आया तब मुफ्ती केन्द्र में गृह मंत्री थे। वर्श 2002 में सईद की 16 सीट वाली पीडीपी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी तब चैथी बार लगे राज्यपाल षासन का अंत हुआ था। पांचवीं बार वर्श 2008 में राज्यपाल षासन उस वक्त लगा जब सईद की पीडीपी ने श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड के मामले में गुलाम नबी आजाद की गठबंधन सरकार से समर्थन वापसी की थी। उपरोक्त परिप्रेक्ष्य यह दर्षाते हैं कि जम्मू-कष्मीर भूगोल और इतिहास के साथ लोकतांत्रिक रूपरेखा में भी कहीं अधिक संवेदनषील रहा है और मुफ्ती मोहम्मद सईद कभी राज्यपाल षासन लगाने के जिम्मेदार तो कभी इसे समाप्त करने की भूमिका में रहे हैं। जम्मू-कष्मीर सीमा पार से जुड़ी कई अनचाही समस्याओं से भी आये दिन जूझता रहता है। इस खूबसूरत राज्य में पाकिस्तान के नारे लगाने वालों की भी कमी नहीं है। सर्वाधिक आतंक सहने वालों में भी यह षुमार रहा है। सियासत का बिखराव, एकता और अखण्डता को चोट पहुंचाने वाले साथ ही अलगावादियों और कट्टरपंथियों का भी यहां जमावड़ा है। इन सबके बीच एक सधा हुआ लोकतंत्र का यहां पर बनाये रखना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। परिप्रेक्ष्य यह भी है कि सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भ और भूगोल के चलते भी लोकतंत्र की अपनी करवट होती है। जम्मू-कष्मीर की सियासत और लोकतंत्र अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक बिलगाव लिए हुए है। ऐसे में इसे कुछ अलग दृश्टि से देखने की आवष्यकता है।



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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Sunday, January 10, 2016

अपनी ही ज़मीन पर लड़ना पड़ता है युद्ध

जब दर्द में डूबा पठानकोट
पिछले ढ़ाई दषक से मुम्बई, दिल्ली समेत भारत के कई स्थानों पर आतंकी हमले होते रहे। बीते 2 जनवरी पठानकोट भी इसकी जद में आया। सीमा पार से आए आत्मघाती आतंकियों का आधा दर्जन समूह यहां तबाही का खौफनाक खेल खेला। एक अरसे से यह दावा किया जा रहा है कि देष की सीमाओं को विषेशतः पाकिस्तान और बांग्लादेष से लगती हुई सीमा को अमेद्य बनाया जायेगा पर आज तक इस पर कोई गम्भीर कार्य षायद ही हुआ हो। ये सीमाएं कहीं अधिक लम्बी होने के साथ-साथ नदी, नालों की सघनता से भी युक्त हैं जिसके चलते ऐसे इलाकों से घुसपैठ रोकना भी काफी हद तक कठिन बना रहता है मगर इसका तात्पर्य यह नहीं कि विकट परिस्थितियों के चलते सीमा सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम लिया जाए। पठानकोट के एयरफोर्स बेस में छिपे सभी आतंकियों को मारने में चार दिन से अधिक वक्त लगा और देष ने सात जाबांज आर्मी आॅफिसर और जवानों को भी खो दिया जिनके घर आज भी मायूसी पसरी है। यह कैसी मजबूरी है कि पाक प्रायोजित आतंक से भारत को बार-बार जूझना पड़ता है। पाकिस्तानी आकाओं के इषारे पर कुछ दहषतगर्द देष में बार-बार घुस आते हैं और हमें अपनी ही जमीन पर ऐसे दुष्मनों से युद्ध लड़ना पड़ता है।
सीमा पार के आतंकी स्कूल
पिछले वर्श जनवरी में ही जमात-उद-दावा समेत 12 आतंकी संगठनों को लेकर पाकिस्तान प्रतिबंध वाले इरादे तक ही सीमित रह गया। संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् ने मुम्बई आतंकी हमले के तुरन्त बाद दिसम्बर 2008 में जमात-उद-दावा को आतंकी संगठन घोशित किया था। तब पाकिस्तान ने अन्तर्राश्ट्रीय दबाव के चलते इसे छः माह के लिए नजरबंद कर दिया था। उसके बाद से इसका मुखिया हाफिज़ सईद खुले आम घूमता है और भारत के खिलाफ जहर बोता है। जब से अंडर वल्र्ड डाॅन छोटा राजन इंडोनेषिया से गिरफ्तार हुआ है आतंकियों समेत पाकिस्तान की भी नींद उड़ी हुई है। देखा जाए तो पाकिस्तान भारत से लड़ने के लिए जिहादियों को, मुजाहिदीनों को और अपनी सेना को ही तैयार नहीं किया है बल्कि दहषतगर्दी के कई स्कूलों को भी संरक्षण दिया है जिनकी तादाद लगातार बढ़ रही है। जिसमें हाफिज़ सईद, लखवी और मसूद जैसे मास्टरमाइंड आचार्य और प्राचार्य बने हुए हैं। पठानकोट के मामले में आतंकी सीमा पार के थे बाकायदा इसका सबूत भारत ने पाकिस्तान सरकार को पहुंचा दिया है जिसे लेकर पाकिस्तान कुछ करते हुए दिखाई तो दे रहा है पर पाकिस्तान जिस सोच का है उम्मीद कम ही है। इसके पूर्व भी मुम्बई सहित कई आतंकी घटनाओं में षामिल दाऊद इब्राहिम, हाफिज़ सईद और लखवी से जुड़े सबूत भी दिये जा चुके हैं पर पाकिस्तान कार्रवाई के बजाय भारत को चकमा देता रहा।
भरोसे में भारत
बीते एक हफ्ते से पठानकोट को लेकर चर्चा और विमर्ष काफी जोर पकड़े हुए है। इस घटना को बीते 25 दिसम्बर को अकस्मात् मोदी का लाहौर पहुंचने और नवाज़ षरीफ से हुई मुलाकात से भी जोड़ा जा रहा है। नवम्बर, 2014 के काठमाण्डू सार्क सम्मेलन से लेकर बात बिगड़ने वाला सिलसिला रूस के उफा में उफान पर आया जब आतंकियों के मामले में मोदी से जो वादा षरीफ ने किया इस्लामाबाद जाकर पलट दिया पर 30 नवम्बर, 2015 षुरू पेरिस में जलवायु परिवर्तन के दौरान दो मिनट की मुलाकात ने सम्बंधों को एक नया रास्ता दिया। विदेष मंत्री सुशमा स्वराज दिसम्बर, 2015 में तुरंत इस्लामाबाद गयी और भारत ने बड़ी सूझबूझ दिखाई। दरअसल भारत पड़ोसी के साथ सम्बंध को लेकर निहायत संवेदनषील रहा है पर लाहौर में हुई मुलाकात का एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि पठानकोट आतंकियों की चपेट में आ गया जिसकी जवाबी कार्रवाई में बेहिसाब रक्त बहा और अपने लोगों की जान गयी।
हमारी भी साख है
सवाल है कि क्या हम भीरू लोगों के देष में रहते हैं? हमने जमाने से आक्रमण सहे हैं, कीमत चुकाई है पर इसका तात्पर्य यह कहीं से नहीं कि आज की सभ्यता से भरी दुनिया में भी दहषतगर्दी बर्दाष्त करते जायें। षान्ति वार्ता का प्रतीक भारत जितना बन पड़ा पाकिस्तान को साथ लेकर चलने का प्रयास किया अब बारी पाकिस्तान की है। नवाज़ षरीफ के भरोसे पर कितना भरोसा किया जाए सवाल इसका भी है। यदि नवाज़ षरीफ भारत के दिये गये सबूतों पर सकारात्मक रूख अख्तियार करने में सक्षम होते हैं तो हर हाल में इसका लाभ वे स्वयं भोगेंगे। इससे न केवल पाकिस्तान से वैष्विक दबाव कम होगा बल्कि भारत-पाक के बीच नये सिरे से षुरू होने वाली वार्ता को भी टूटन से बचाया जा सकेगा।
अब पाकिस्तान के एक्षन पर होगा भारत का रिएक्षन
भारत ने अब यह तय कर लिया है कि आगे बातचीत तभी होगी जब पाकिस्तान पठानकोट के मसले पर दिये गये सबूतों पर कार्यवाही करेगा। गौरतलब है कि इसी माह की 15 तारीख को विदेष सचिव स्तर की वार्ता इस्लामाबाद में प्रस्तावित है जो अधर में लटकी हुई मानी जा सकती है। अब गेंद पाकिस्तान के पाले में है यदि पाकिस्तान ऐसी कोई कार्यवाही आतंकियों पर करता है जिसकी अपेक्षा भारत को है तो बेषक भारत सिलसिले को आगे बढ़ाने में पीछे नहीं हटेगा। दो टूक में भारत ने पाकिस्तान को यह भी चेता दिया है कि उसे ही भविश्य का रास्ता तय करना है और आतंकवाद किसी भी कीमत पर बर्दाष्त नहीं किया जायेगा। भारत ने पाकिस्तान को चार हैंडलर्स के नाम सौंपते हुए कहा है कि इन्हें जल्द गिरफ्तार करके सौंपने को भी कहा है। इन चार हैंडलर्स में षामिल अजहर मसूद पठानकोट के हमले का मास्टरमाइंड है। यह वही अजहर मसूद है जिसकी 1999 में एयर इण्डिया विमान अपहरण काण्ड में चार आतंकियों के साथ कंधार से विमान छोड़ने के बदले में रिहाई हुई थी। मसूद के अलावा अब्दुल रऊफ असगर, अषफाक अहमद और कासिम ने मिलकर पठानकोट की साजिष रची थी। इस बार भारत जिस प्रकार प्रतिक्रिया करने के अंदाज में है उसे देखते हुए पाकिस्तान की बौखलाहट बढ़ना लाज़मी है। इस्लामाबाद में पठानकोट को लेकर नवाज़ षरीफ का एक्षन मोड दिखा है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने लगातार दो दिन उच्च स्तरीय बैठक कर अपने अधिकारियों को निर्देष दिया है कि भारत से मिले सबूतों पर तेजी से काम करें। हालांकि भारत को सहयोग देने का उसके द्वारा दिया गया भरोसा फिलहाल तभी विष्वास के लायक होगा जब कुछ नतीजे सामने दिखेंगे। सबके बावजूद यदि पाकिस्तान कोई चूक करता है और भारत के दिये गये सबूतों को नजरअंदाज करता है तो उसे निःसंदेह एक बार फिर आतंक के पक्षकार के तौर पर ही देखा जायेगा।
सवाल उठता है
    क्या पाकिस्तान पठानकोट के हमले को लेकर भारत की अपेक्षाओं पर खरे उतर पायेंगे जबकि आईएसआई और आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने में वे स्वयं बरसों से विफल रहे हैं।
    क्या षरीफ, मोदी की चिंता से स्वयं को सच्चे मन से जोड़ने वाला मंसूबा भी रखते हैं।
फिलहाल गेंद पाकिस्तान के पाले में
    विदेष मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ किया है कि वार्ता पर गेंद अब पाकिस्तान के पाले में है। यदि पाकिस्तान इस पर एक सफल कदम उठाता है तो वैष्विक स्तर पर न केवल स्वयं पर से दबाव कम करेगा बल्कि भारत के मामले में वार्ता को भी टूटने से बचा सकता है।
भारत को पाक से कार्रवाई का इंतजार
    बीते 7 और 8 जनवरी को लगातार दो दिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने पठानकोट के मामले पर उच्च स्तरीय बैठक की। त्वरित और निर्णायक कार्रवाई को लेकर नवाज़ षरीफ एक्षन मोड में तो दिख रहे हैं पर इसके पूरा होने और अपेक्षानुरूप नतीजे का भारत बेसब्री से इंतजार कर रहा है।



लेखक, वरिश्ठ स्तम्भकार एवं रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन के निदेषक हैं
सुशील कुमार सिंह
निदेशक
प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्ससाइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2710900, मो0: 9456120502

Friday, January 8, 2016

वैश्विक शांति में खतरा बनता उत्तर कोरिया

निःसंदेह उत्तर कोरिया ने हाइड्रोजन बम का परीक्षण करके विष्व के लिए खतरे की घण्टी बजा दी है। इस ताजा-तरीन परीक्षण के चलते वैष्विक षान्ति की पहल को जहां चोट पहुंचती है वहीं दुनिया नई चिंताओं से सराबोर होती हुई भी दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं उत्तर कोरिया ने इस करतूत के चलते एक बार फिर अन्तर्राश्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को सिरे से नकार दिया। इसके पहले भी तीन बार वर्श 2006, 2009 और 2013 में परीक्षण करने वाला उत्तर कोरिया वैष्विक षान्ति के लिए षुभ न होने का संकेत दे चुका है। निहित परिप्रेक्ष्य यह भी है कि बरसों से परमाणु परीक्षण कार्यक्रम को लेकर उत्तर कोरिया पष्चिमी देषों के निषाने पर भी रहा है बावजूद इसके बिना किसी डर और भय के बीते बुधवार उसने हाड्रोजन बम का परीक्षण किया। सवाल है कि विज्ञान और तकनीक के इस युग में अंधाधुंध विनाष वाले हथियार बनाने से किस सुख की प्राप्ति होगी? जिस भांति 21वीं सदी के इस दूसरे दषक में हाइड्रोजन बम जैसे निर्माण का सनकपन उत्तर कोरिया जैसे देषों में षुमार है उसे देखते हुए संदेह गहरा जाता है कि क्या षान्ति स्थापित करने वाले देषों की कवायद कभी अंजाम तक पहुंचेगी? उत्तर कोरिया का तानाषाह नेता किम जोंग की एक मनोवैज्ञानिक समस्या यह है कि वह विध्वंसक संसाधनों के बूते वर्चस्व हासिल करने की फिराक में है। गौरतलब है कि परमाणु बम के मुकाबले हाइड्रोजन बम हजार गुना ज्यादा षक्तिषाली होता है और इसे बनाना भी तुलनात्मक अधिक कठिन है। 2003 में परमाणु कार्यक्रम की घोशणा करने वाला उत्तर कोरिया हाइड्रोजन बम के परीक्षण सहित बीते एक दषक में चार बार परमाणु परीक्षण कर चुका है।
क्षेत्रफल और जनसंख्या के दृश्टि से विष्व के कई छोटे देषों में षुमार उत्तर कोरिया वैष्विक नीतियों को दरकिनार करते हुए अपने निजी एजेण्डे को तवज्जो दे रहा है। एक तरफ विष्व आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ अद्ना सा देष उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों को प्रोत्साहित करके उसी विष्व को एक नई चुनौती देने का काम कर रहा है जो हर हाल में मानवता के लिए एक बड़ा खतरा है। परमाणु बम से कहीं अधिक षक्तिषाली हाइड्रोजन बम आकार में तो छोटा परन्तु नुकसान बेहिसाब करता है। पड़ताल से पता चलता है कि 1952 में अमेरिका ने पहली बार हाइड्रोजन बम बनाया था जबकि 1955 में रूस ने इसका परीक्षण करके दूसरा राश्ट्र बनने का गौरव प्राप्त कर लिया। इसी क्रम में ब्रिटेन ने भी 1957 में हाइड्रोजन बम का सफल परीक्षण करके ऐसा करने वाला तीसरा देष बना जबकि इसके ठीक एक दषक बाद चीन ने हाइड्रोजन बम वालों की सूची में अपना नाम दर्ज करा लिया। 1968 में फ्रांस भी हाइड्रोजन बम के मामले में पांचवां देष बन गया। चीन की बढ़ी हुई आण्विक षक्ति और लम्बे समय से चल रहे सीमा विवाद के चलते और पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद समेत कई दिक्कतों के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 11 और 13 मई, 1998 को द्वितीय पोखरण परमाणु परीक्षण के तहत पांच परीक्षण किये जिसमें 45 किलोटन का एक तापीय उपकरण भी षामिल था। इसे आमतौर पर हाइड्रोजन बम के नाम से जाना जाता है। अब इस सूची में उत्तर कोरिया भी षामिल हो गया है। हालांकि उत्तर कोरिया के परीक्षण को लेकर अभी भी आषंका जताई जा रही है। संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् के नियमों का उल्लंघन करने वाला उत्तर कोरिया इन दिनों विष्व की भत्र्सना का खूब षिकार है।
तथाकथित परिप्रेक्ष्य यह है कि उत्तर कोरिया जैसे देष को व्यापक पैमाने पर परमाणु हथियारों की आवष्यकता क्यों है? वास्तव में यह उसकी जरूरत है या फिर किसी बड़े संकट का संकेत। संयुक्त राश्ट्र परमाणु हथियारों की समाप्ति की कवायद में 70 के दषक से ही लगा हुआ है। सीटीबीटी व एनपीटी सहित कई कार्यक्रम इसकी रोकथाम में देखे जा सकते हैं पर इसकी गति थमने के बजाय तेजी लिए हुए है। प्रषान्त महासागर के दोनों कोरियाई देष बरसों से छत्तीस के आंकड़ों में उलझे हुए हैं। इस परीक्षण के चलते जहां उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया के लिए बड़ी चुनौती बनेगा वहीं जापान को भी निजी तौर पर प्रभावित करने का काम करेगा। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दक्षिण कोरिया ने उत्तर कोरिया को कीमत चुकाने की बात कहीं है जबकि जापानी प्रधानमंत्री ने इस परीक्षण को जापान की राश्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। चीन ने भी कुछ इसी प्रकार का विरोध किया है। इसके अलावा यूएन ने संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् की तत्काल बैठक बुलाई है जिसमें एक बर पुनः प्रतिबंध वाला निर्णय आ सकता है। अमेरिका समेत अन्य देष भी उत्तर कोरिया के इस कदम से सख्त रूख अख्तियार कर सकते हैं। इन सबके बीच भारत की चिंता कुछ अलग किस्म की दिखाई देती है। विदेष मंत्रालय से आये वक्तव्य में यह साफ होता है कि क्षेत्र की स्थिरता और सुरक्षा के लिए उत्तर कोरिया का यह कदम निहायत खतरनाक है। पूर्वोत्तर एषिया और पड़ोसी पाकिस्तान के बीच परमाणु प्रसार के सम्पर्कों को लेकर भारत एक नई चिंता जाहिर कर रहा है। हालांकि खबर यह भी है कि परीक्षण के लिए गैर सेन्ट्रीफ्यूज़ और अधिकतर मषीनरी की डिजाइनें उत्तर कोरिया को पाकिस्तान ने ही दिया है। इस कीमत के बदले उसने पाकिस्तान को बैलिस्टिक मिसाइलों के कुछ कल-पुर्जे दिये हैं। यदि यह खबरें पुख्ता होती हैं तो चिंता का आंकड़ा भी उछाल लेगा। दरअसल जब खराब देषों का आपसी सहयोग चोरी-छुपे करते हैं तो ऐसे में निजी हितों को साधने के चलते नकारात्मक क्रियाएं जन्म लेती हैं जिससे सभ्य देष हर हाल में नुकसान की ओर होते हैं।
जाहिर है कि उत्तर कोरिया के हाइड्रोजन बम परीक्षण कार्यक्रम से किसी का भला नहीं होने वाला पर सनकी तानाषाह किम जोंग की तृश्णा जरूर षांत होगी। अमेरिका समेत विष्व के मानवता की वकालत करने वाले तमाम देष उत्तर कोरिया के इस मिजाज से भौचक्के होंगे और होना भी चाहिए पर सवाल उठता है कि बरसों से विध्वंसक परमाणु संसाधनों को समाप्त करते-करते इस कदर की बढ़ोत्तरी और बेखौफपन कैसे विकसित हो गया? जापान और दक्षिण कोरिया ने सुरक्षा परिशद् के प्रस्तावों का उल्लंघन माना है पर क्या यूएन के सुरक्षा परिशद् द्वारा एक और प्रतिबंध से उत्तर कोरिया कोई सबक लेगा। उसे जो करना था वह कर चुका है अब तो लकीर ही पीटने का काम होगा। दिसम्बर 2011 से जब से तानाषाह किम जोंग सत्ता पर काबिज हुआ उत्तर कोरिया के गर्त में जाने वाले दिन भी षुरू हो गये। अब तक 70 से ज्यादा अधिकारियों को मौत की सज़ा देने वाला किम जोंग अपने सगे-सम्बंधियों को भी मौत के घाट उतारने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 2006 में पहले परीक्षण के बाद जब उत्तर कोरिया को लेकर संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् ने खिलाफ में प्रस्ताव पारित किया था तब से लेकर अब तक दो बार प्रस्ताव और आ चुके हैं। इन दिनों उत्तर कोरिया भूखमरी, बीमारी, बेरोजगारी और गरीबी से जूझ रहा है आगे की पाबंदी उसके इस संकट को बढ़ाने का ही काम करेंगी। बरसों से यह भी प्रयास रहा है कि कोरियाई प्रायद्वीप के अंदर षान्ति का वातावरण बने। एकीकरण के प्रयास भी जारी हैं और अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिण कोरिया से मिलने वाली आर्थिक मदद व वैष्विक मानवीय मदद पर भी असर पड़ेगा परन्तु तानाषाह किम जोंग षायद इन चिंताओं से मुक्त है।


सुशील कुमार सिंह
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Wednesday, January 6, 2016

इतिहास पर बनी फिल्म का समाजशास्त्र

भारत की फिल्मी दुनिया केवल मनोरंजन के कल-कारखाने के लिए ही नहीं जानी जाती अपितु एक बड़े उद्योग की संज्ञा से भी अभिभूत है, जहां से देष का सामाजिक-आर्थिक पहलू भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। सौ बरस से अधिक के सिनेमाई जगत को खंगाला जाए तो कई ऐतिहासिक घटनाएं फिल्मी रूप-रंग के साथ पर्दे पर उतरी हैं। इन दिनों तो ऐसी फिल्में लोकप्रियता के साथ-साथ कमाई के मामले में भी आगे हैं। पिछले वर्श दिसम्बर माह में 16वीं षताब्दी के इतिहास में लिपटी ऐसी ही एक फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी‘ का आगाज़ हुआ जिसमें मराठा साम्राज्य के इतिहास के उस हिस्से का फिल्मांकन किया गया है जो पेषवा बाजीराव से सम्बन्धित है। फिल्म में पेषवा बाजीराव और एक मुस्लिम नर्तकी के बीच के प्रेम सम्बंधों को चित्रित किया गया है। इतिहास में मस्तानी को एक नर्तकी के रूप में ही उल्लेखित किया गया है। फिल्म में खूबसूरती है, बेहतर नृत्य और गीत-संगीत है, अदाकारी भी बहुत अच्छे से निभाई गयी है, लोकप्रियता के साथ कमाई भी खूब हुई है। संजय लीला भंसाली के निर्देषन में बनी यह फिल्म हर हाल में उम्दा कही जाएगी इसलिए नहीं कि यह एक ऐतिहासिक घटना से सम्बन्धित है बल्कि इसलिए कि इस फिल्म का अपना एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य भी है। ऐसा सामाजिक परिप्रेक्ष्य जो उस दौर के तमाम ताने-बाने को समझने का अवसर देता है। इतिहास के पन्नों को उकेरे तो इस बात का सबूत अक्सर मिलता रहा है कि सामाजिकता विधान से परे नहीं थी और सामाजिक अवधारणाएं परम्पराओं से तौबा नहीं कर सकती थी। उपलब्धियां कितनी ही प्रखर क्यों न हों नियमों के उल्लंघन की मनाही थी। इतना ही नहीं समाज की सजावट और बनावट इस कदर रचित होती थी कि उसे लेकर कोई भी प्रतिकार असहनीय था।
संजय लीला भंसाली ने इस फिल्म में वही भव्यता देने की कोषिष की है जैसा कि वे अन्य फिल्मों में करते रहे हैं और कुछ कम-ज्यादा उसी इतिहास को उद्घाटित करने का प्रयास भी किया है जैसा कि इतिहास की पुस्तकों में वर्णन मिलता है। हालांकि इस बात से गुरेज नहीं किया जा सकता कि मनोरंजन और रोचक बनाने के चलते कुछ अतिरिक्त कवायद की होगी। पेषवाओं के इतिहास पर नजर डाली जाए तो यह राजनीतिक उत्थान और अत्यंत रोचकता से परिपूर्ण रहा है। पेषवाओं के चलते ही महाराश्ट्र को राजनीतिक स्थायित्व और षान्ति मिली थी। योग्यता और षक्ति के बल पर उन्नति करते-करते वे स्वयं भी मराठा साम्राज्य के सर्वेसर्वा बन गये। बालाजी विष्वनाथ से षुरू पेषवाई का यह दौर औरंगजेब की मृत्यु के पांच वर्श बाद 1713 से देखा जा सकता है। इनकी मजबूती का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मराठा साम्राज्य के संस्थापक यदि षिवाजी थे तो द्वितीय संस्थापक पेषवा बालाजी विष्वनाथ कहे जाते हैं। फिल्म में बाजीराव को इतिहास में लिपटी एक प्रेम कहानी के साथ दृष्यमान किया गया है जो बीस वर्श तक पेषवाई के पद पर रहे और लगातार चालीस विजय के साथ सर्वाधिक षक्तिषाली पेषवा कहे जाने वालों में षुमार थे। मुगल साम्राज्य के प्रति अपनी नीति की घोशणा करते हुए बाजीराव ने कहा था कि हमें इस जर्जर वृक्ष के तने पर प्रहार करना चाहिए, षाखाएं तो स्वयं ही गिर जायेंगी। इन्होंने ही ‘हिन्दू पद पादषाही‘ के आदर्ष का प्रचार किया और इसे लोकप्रिय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देखा जाए तो ये उस दौर के तात्कालिक इतिहास की आवष्यकता रही होगी और अपनी जोरदारी के लिए ऐसा करना मुनासिब समझा होगा पर असल मसला यह है कि षक्तिषाली षासकों के सामने भी सामाजिक मूल्य चट्टान की तरह खड़े थे जो मिटने के बजाय टकराने वालों पर भारी पड़ते थे।
प्राचीन काल से ही इतिहास और समाजषास्त्र दोनों की गति समानता के साथ रही है। हिन्दू काल से लेकर ब्रिटिष काल तक के इतिहास में कई सत्ताएं आई और चली गयी, कई पंथ और धर्म भी समय के साथ ऐतिहासिक महत्व को समेटने में कामयाब रहे। फिल्मांकन की गयी पेषवा बाजीराव के 1720 से 1740 के इस कालखण्ड को देखें तो यह एहसास होता है कि समाज अपने परम्परागत नियमों से परे नहीं था। धर्म और सम्प्रदाय के निहित मापदण्डों में ही सारी कार्यप्रणाली थी जबकि बाजीराव और मस्तानी का प्रेम सम्बन्ध इन्हीं मापदण्डों के विरूद्ध समझा गया। बाजीराव ने कट्टर तो नहीं पर समर्पित मानकों से युक्त प्रथा को जब कमजोर करने की कोषिष की तो व्यवस्था से लेकर सगे-सम्बन्धी भी विरोध में खड़े दिखाई दिये। अक्सर फिल्मों की प्रेम कहानियां जब जाति, धर्म और सम्प्रदाय के नियम संगत अवधारणा के विरूद्ध होती हैं तो उनका तमाम होना और अमर होना मानो तय हो और ऐसा ही ‘बाजीराव और मस्तानी‘ के मामले में भी दृश्यमान होता है। हालांकि इतिहास के कुछ कालखण्डों में दृश्टिकोण काफी अलग भी देखने को मिले हैं। मुगल बादषाह अकबर ने साम्राज्य विस्तार की नीति के तहत राजपूताना से वैवाहिक सम्बंध तो स्थापित किये पर जब उसी के पुत्र जहांगीर और अनारकली के बीच प्रेम परवान चढ़ा तो यह असहनीय था। यह प्रकरण भी उस दौर के सामाजिक ताने-बाने और ऊंच-नीच से ग्रस्त समाज के पहलुओं को ही उद्घाटित करता है। जाहिर है इस विमर्ष के चलते ‘मुगल-ए-आज़म‘ एक बार फिर जेहन में उतर आई। पृथ्वीराज कपूर द्वारा निभाई गयी अकबर की भूमिका और जहांगीर के रूप में दिलीप कुमार जबकि अनारकली मीना कुमारी की याद भी ताजा हो गयी। ‘जोधा-अकबर‘ जैसी ऐतिहासिक फिल्में भी इसी की एक कड़ी है। जब भी इतिहास प्रेम कहानी से लिपटा और प्रथाओं ने उसे स्वीकार्य किया तो बात सहज हुई है पर यदि ऐसा न हुआ तो उसी प्रेम कहानी ने उसी इतिहास में अध्याय का रूप ले लिया।
 बाजीराव और मस्तानी के मामले में भी परम्पराएं नीचे उतरने के लिए तैयार नहीं थी। इससे परिलक्षित होता है कि एक ‘आदर्ष संस्कृति‘ की चाह के चलते उपलब्धियां भी हाषिये पर फेंकी जाती थी पर इसमें इस बोध का आभाव भी दिखाई देता है कि प्रेम इकाई-दहाई की सीमाओं में न उलझकर अपनी सीमाएं स्वयं रेखांकित कर लेता है। साफ है कि समाज और सगे-सम्बन्धी अहम् की रक्षा और प्रतिश्ठा के चलते जो किया उसके उल्लंघन में पेषवा बाजीराव को रखा जा सकता है पर इसे दोश की दृश्टि से देखने के बजाय दौर की जकड़न के साथ देखना अधिक सही होगा। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में हम उन तमाम व्यवस्थाओं को चाहते हैं जिसमें सभी के मूल्यों की अहमियत हो, चाहे व्यक्ति उपलब्धियों से भरा हो या सामान्य जन ही क्यों न हो। भारतीय इतिहास की पड़ताल भी बताती है कि ऐसा भेदभाव सदियों से रहा है। प्राचीन काल के वर्ण और जाति व्यवस्था, मध्य काल में मुस्लिम सत्ताओं के चलते सामाजिक परिवर्तन के साथ साम्प्रदायिक चुनौतियां और औपनिवेषिक दिनों में रीतियों और प्रथाओं में होने वाले फेरबदल से निपटना सहज नहीं था। स्वतंत्र भारत के इस दौर में भी समाज अभी भी ऊंच-नीच, भेद-भाव, जात-पात, धर्म-सम्प्रदाय आदि की जकड़न से बाहर नहीं निकल पाया है। एक समाजषास्त्रीय सत्य यह भी है कि समाज का परिवर्तन अचानक न होकर संस्कृतिकरण को समेटते हुए समय के साथ पोशित हुआ है। बारीकी से देखें तो बाजीराव-मस्तानी का समाजषास्त्रीय चित्रण आज के समाज में भी जहां-तहां, कम-ज्यादा मात्रा में जीवटता लिए हुए है दिखाई देगा जो षायद आगे भी रहेगा।


सुशील कुमार सिंह
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यह हमला नहीं, आक्रमण है

इसमें संदेह नहीं कि आधुनिक समय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के चलते सुरक्षात्मक तो हुआ है पर विध्वंसक भी हुआ है मगर इसका तात्पर्य कतई नहीं कि सभ्यता से भरी दुनिया में कुछ को कुछ भी करने की खुली छूट दे दी जाए। इस पर भी गौर करने की जरूरत है कि जो आतंक को अपना ईमान बना चुके हैं और देष-दुनिया को मिटाने के लिए आतुर हैं उनके प्रति देर तक सलीखे वाला रूख अख्तियार करना गैर वाजिब होगा। ताजा वर्णन यह है कि पंजाब के पठानकोट के एयरबेस के भीतर षनिवार के सुबह तीन बजे से ही आतंकियों से भारतीय सेना द्वारा लोहा लिया जा रहा है। जिस तैयारी और इरादे से आतंकियों के मंसूबे थे उससे साफ है कि विगत् कुछ समय से जो यह असमंजस था कि पाकिस्तान आतंक के मामले में पटरी पर आ रहा है यह बिल्कुल उसके उलट है। निष्चित तौर पर इस बात से अवगत होना सही कहा जाएगा कि मोदी-षरीफ की लाहौर भेंट तनिक मात्र भी आतंकियों को रास नहीं आया। बीते कई वर्शों से पाकिस्तान के आतंक को भारत झेलने के लिए मजबूर है। पठानकोट में आतंकी हमला जिस स्तर का है उसे देखते हुए यदि इसे आक्रमण की संज्ञा दी जाए तो बिल्कुल सही होगा। इसके पहले भी देष दषकों से अलग-अलग क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर आतंक झेलता रहा है। मुम्बई से लेकर पठानकोट तक इतनी आतंकी घटनाएं देष में हुई हैं कि सिरे से पड़ताल की जाए तो आज भी आतंकी हमलों के चलते हुए जान-माल की भरपाई सम्भव नहीं हुई है। जिस तर्ज पर पठानकोट की घटना हुई हैं वह पहले की तुलना में अधिक मारक और तकनीकी तौर पर कहीं अधिक मजबूत देखने को मिली है।
बीते 2 जनवरी से हुए आतंकी आक्रमण के चलते देष की सुरक्षा प्रणाली से लेकर राजनयिक संदर्भों का समीकरण भी गड़बड़ा गया है। राश्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अगले सप्ताह होने वाली चीन यात्रा स्थगित कर दी गयी। डोभाल सीमा विवाद को लेकर चीन रवाना होने वाले थे। गौरतलब है कि भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लम्बी सीमा को लेकर आये दिन विवाद रहता है। हालांकि दोनों देष इस विवाद को सुलझाने के लिए अब तक 18 बार बातचीत कर चुके हैं पर मामला जस का तस बना हुआ है। इसी माह के मध्य में भारत-पाक के बीच सचिव स्तर की वार्ता होनी है। इस प्रकार के माहौल में कि पाकिस्तान आतंक को लेकर कोई संजीदगी नहीं दिखा रहा है ऐसे में वार्ता का क्या अर्थ है। जाहिर है उधेड़-बुन में यह वार्ता भी फंस गयी है। रंज यह भी है कि वैष्विक पटल पर आतंक को मुख्य एजेण्डा बनाने वाले प्रधानमंत्री मोदी अपने ही देष में बेलगाम आतंक से जूझ रहे हैं और इस मामले में ऐसे देष से उम्मीद कर रहे हैं जो भरोसे के लायक नहीं है। इस सच से गुरेज न किया जाए तो बेहतर होगा कि पाकिस्तान की सरकार आतंक के मामले में कोई सकारात्मक काज षायद ही कर पाये। पाकिस्तान के अंदर जो आतंकी षिविर चल रहे हैं आज वो विष्वविद्यालय का रूप ले चुके हैं। उन्हें निस्तोनाबूत करना चुनौती ही नहीं कसौटी भी है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ षरीफ इस कसौटी के इर्द-गिर्द फिलहाल नहीं दिखाई देते हैं। सीमा पर सीज़ फायर के उल्लंघन के मामले में भी नवाज़ षरीफ लगातार चूक करते रहे हैं। सीमा पार से आये जिंदा आतंकी भी दबोचे गये हैं, सबूत भी पेष किये गये हैं बावजूद इसके पाकिस्तान न इन्हें मानने के लिए तैयार है और न ही घटनाओं को लेकर कोई सबक ही लेना चाहता है।
पाकिस्तान की एक मुख्य समस्या वहां की सैन्य व्यवस्था भी है। लोकतांत्रिक देष होने के बावजूद पाकिस्तान मानवीय मूल्यों को कभी सहेज कर रख ही नहीं पाया। अप्रत्यक्ष तौर पर कहीं-कहीं तो सीधे तौर पर आतंक और आईएसआई के षिकंजे के चलते यहां की लोकतांत्रिक सरकारें भी लूली-लंगड़ी ही सिद्ध हुई हैं। माना जा रहा है कि मुम्बई हमलावरों की तुलना में पठानकोट में घुसे आतंकी कहीं अधिक प्रषिक्षित थे। जिस पठानकोट के एयरबेस पर आक्रमण हुआ है वहां मिग-21 लड़ाकू विमान और एमआई-25 हेलीकाॅप्टर खड़े होते हैं। आतंकी उन तक भी पहुंचना चाहते थे। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि इनको प्रषिक्षित करने वाले षिविर ‘आर्मी कल्चर‘ से युक्त हैं। जाहिर है यह इस ओर इषारा करता है कि पाकिस्तान की मिलट्री भी इन आतंकियों को दीक्षित करने में ताकत झोंके हुए है। 2008 में मुम्बई हमले की तुलना में ये इतने प्रषिक्षित कैसे हुए, षक करना लाज़मी है। इन्हें विषेश कमांडो जैसी ट्रेनिंग मिली थी। वैसे कहा जा रहा है कि पठानकोट में चल रहे आॅपरेषन को लम्बा चलाने का इरादा नहीं था पर ऐसा करने के पीछे नुकसान को कम करने का लक्ष्य था। सवाल तो यह भी है कि वायु सेना बेस में आतंकियों के घुसने से पहले ही उन पर काबू क्यों नहीं पाया गया। क्या यह सुरक्षा एजेंसियों की चूक नहीं है? इस पर और गौर करें तो पता चलता है कि हमले की आषंका पहले से थी यानी सतर्कता नहीं बरती गयी। हमले से पूर्व आतंकियों के चंगुल में फंसे गुरदासपुर के एसपी सलविन्दर सिंह की बात को भी नजर अंदाज किया गया। सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम की कमी और सर्च अभियान का न चलाया जाना भी इस घटना के होने के अर्थ में षामिल किये जा रहे हैं। सुरक्षा के घेरे को आतंकियों द्वारा कमजोर करना और उन्हें ध्वस्त करना यह इषारा करता है कि ऐसे मामलों में इससे जुड़े इंतजाम और गहरे होने चाहिए। बेषक सुरक्षा एजेंसियां इसे लेकर जान लड़ा रही हैं पर आतंकियों के मंसूबे के एवज में अभी इन्हें और पुख्ता करने की जरूरत है।
जम्मू और कष्मीर के रास्ते पठानकोट में प्रवेष करने वाले आतंकियों की संख्या कितनी है इसका भी पूरा अंदाजा नहीं है। आर्मी के भेश में आये आतंकी एक दर्जन भी हो सकते हैं जिसमें से छ‘ आतंकियों को ढेर किया जा चुका है लेकिन भारत के कई अफसर और जवान भी षहीद हो गये। भारत की धरती पर ही हुई इस हमले वाली कार्यवाही इस कदर लम्बी खिंची कि मानो युद्ध चल रहा हो। अलबत्ता षासक स्तर पर यह गैर मान्यता प्राप्त युद्ध है पर जिस प्रकार पाकिस्तानी सरकार की आदत रही है उसे देखते हुए उसकी मंषा पर संदेह तो होता है। भारत सरकार इस मामले में पाकिस्तान पर नकेल कसने की तैयारी षुरू कर दी है। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद पाकिस्तानी तत्वों के हाथ होने के सबूत उसे भेजकर कड़ी कार्यवाही की मांग की है। भारत ने यह भी चेतावनी दिया है कि यदि ऐसा नहीं होता है तो आगामी विदेष सचिव स्तर की वार्ता अधर में लटक सकती है। यहां पर फिर सवाल उठता है कि यदि पाकिस्तान सबूत को झुठला देता है जैसा कि पहले भी करता रहा है और कोई कार्यवाही नहीं करता है तत्पष्चात् सचिव स्तर की वार्ता भी नहीं होती है तो पाकिस्तान की सेहत पर इसका क्या असर पड़ेगा। फिलहाल  जिस प्रकार पाकिस्तान की आदत रही है उसे देखते हुए उम्मीद कम ही है। लाहौर की मोदी-षरीफ मुलाकात को भी फिलहाल यहां बेअसर होते हुए देखा जा सकता है। इतना ही नहीं जिस प्रकार इस हमले के बावजूद भारत को लेकर उसका रूख स्थिर बना हुआ है उससे भी बहुत कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है।



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
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