Monday, December 12, 2022

मजबूत दावों के बीच बेलगाम कार्बन उत्सर्जन

जब कभी विकास की ओर कोई नई प्रगति होती है तो उसका सीधा असर पर्यावरण को होता है और यही असर एक आदत का रूप ले ले तो दुश्प्रभाव की पूरी सम्भावना बन जाती है और ऐसे दुश्प्रभाव को समय रहते समाधान न दिया जाये तो पृथ्वी और उसके जीव, अस्तित्व को लेकर एक नई चुनौती से गुजरने लगते हैं। वैष्विक स्तर पर बढ़ रहे कार्बन उत्सर्जन ने ऐसी ही चुनौतियों को विष्व के सम्मुख लाकर खड़ा कर दिया है। हालांकि यह नई परिघटना नहीं है मगर हालात बिगड़े न इसे लेकर बरसों से हो रहे प्रयासों को फिलहाल झटका तो लगा है। चिंता की बात यह है कि कार्बन उत्सर्जन को लेकर षिखर सम्मेलन, सेमिनार तथा बैठकों का दौर भले ही कितने मजबूती के साथ होते रहे हों मगर इस मामले में लगाम लगाना तो दूर की बात है इसका स्वरूप विनाषक होता जा रहा है। हालिया रिपोर्ट यह बताती है कि कार्बन उत्सर्जन घटने की जगह लगातार बढ़त बनाये हुए है। विदित हो कि मिस्र के संयुक्त राश्ट्र जलवायु षिखर सम्मेलन (कॉप-27) में रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आया है कि साल 2022 में वायुमंडल में चार हजार साठ करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ। जाहिर है यह जीवन विन्यास और सभ्य दुनिया के माथे पर लकीरें खींचने वाला है। इतना सघन कार्बन उत्सर्जन यह संकेत करता है कि तापमान वृद्धि पर काबू पाना मुष्किल होगा। रिपोर्ट से यह भी स्पश्ट हुआ कि 2019 में यही कार्बन उत्सर्जन तुलनात्मक थोड़ा अधिक था। कोरोना वायरस से जब दुनिया चपेट में थी और विष्व के देषों में कमोबेष लॉकडाउन लगाया गया था तो कार्बन उत्सर्जन में न केवल गिरावट थी बल्कि आसमान कहीं अधिक साफ और प्रदूशण से मुक्त देखने को मिला। वायुमण्डल में इतने व्यापक रूप से बढ़े कार्बन-डाइ ऑक्साइड से पेरिस जलवायु समझौता 2015 में किये गये वायदे और इरादों को भी झटका लगता है।
दरअसल कार्बन उत्सर्जन को लेकर दुनिया के देषों में कभी एकजुटता देखने को मिली ही नहीं। विकसित और विकासषील देषों में इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप भी व्यापक पैमाने पर रहे हैं। इतना ही नहीं कार्बन उत्सर्जन को लेकर सभी देष बढ़-चढ़कर अंकुष लगाने की बात करते रहे और हकीकत में नतीजे इसके विपरीत बने रहे। पृथ्वी साढ़े चार अरब वर्श पुरानी है और कई कालखण्डों से गुजरते हुए मौजूदा पर्यावरण में है। मगर बेलगाम कार्बन उत्सर्जन से इसके सिमटने की सम्भावनाएं समय से पहले की ओर इषारा कर रही है। इसमें कोई षक नहीं कि पृथ्वी स्वयं में भी एक बदलाव निरंतर करती रहती है मगर कार्बन उत्सर्जन की इतनी बड़ी बढ़ोत्तरी तापमान की दृश्टि से अस्तित्व को ही खतरे में डालने वाला है। पड़ताल बताती है कि पूर्व औद्योगिक काल (1850 से 1900) में औसत की तुलना में पृथ्वी की वैष्विक सतह के तापमान में लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई। जिसके चलते पूरी दुनिया में कम-ज्यादा सूखा, जंगल में आग और बाढ़ के परिदृष्य उभरने लगे। 20वीं सदी में औद्योगिकीकरण उबाल पर थी और 21वीं सदी में यह कहीं अधिक रफ्तार लिए हुए है। हालांकि दुनिया में कई देष ऐसे भी हैं जो कार्बन उत्सर्जन के मामले में तनिक मात्र भी योगदान नहीं रखते मगर कीमत तो उन्हें भी चुकानी पड़ रही है। एक रिपोर्ट से पता चलता है कि साल 2021 में कुल कार्बन उत्सर्जन के आधे हिस्से में चीन अमेरिका और यूरोपीय संघ षामिल थे। इस मामले में भारत का योगदान महज सात फीसद है जबकि पड़ोसी चीन 31 प्रतिषत कार्बन उत्सर्जन करता है जो अपने आप में सर्वाधिक है। हालांकि भारत में साल 2022 में उत्सर्जन में 6 प्रतिषत की वृद्धि हुई है जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण कोयला रहा है। कार्बन उत्सर्जन की वृद्धि अमेरिका समेत षेश दुनिया में भी रही मगर तुलनात्मक प्रतिषत कम है जबकि चीन और यूरोपीय संघ में 2021 में मुकाबले क्रमषः 0.9 व 0.8 फीसद की गिरावट दर्ज की गयी। एक ओर जहां कार्बन उत्सर्जन के चलते वैष्विक तापमान डेढ़ डिग्री की बढ़ोत्तरी आगामी नौ वर्श में सम्भव है वहीं दुनिया इस मुहिम में पहले से ही जुटी है कि सदी के आखिर तक तापमान बढ़ोत्तरी को डेढ़ डिग्री से ज्यादा नहीं पहुंचने दिया जाये। साफ है कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने का प्रयास जितना सैद्धांतिक दिखता है दरअसल में उतना व्यवहारिक है नहीं।
ग्लासगो के 26वें संयुक्त राश्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप-26) में यह था कि 2050 तक कार्बन उत्सर्जन की सीमा को षून्य करने के उद्देष्य को हासिल करने हेतु बनाने और बिगाड़ने का मौका है। जाहिर है यह एक ऐसी महत्वाकांक्षी विचारधारा है जहां पर जलवायु गतिविधियों को लेकर अतिषय से होकर गुजरना ही होगा। विकासषील देषों से यह उम्मीद की जाती रही है कि वह कार्बन उत्सर्जन में कटौती करें। हालांकि भारत इस मामले में बेहतर सोच रखता है मगर अकेले की कोषिष से इस बड़़े संकट से मुक्ति नहीं पायी जा सकती। पेरिस जलवायु सम्मेलन-2015 में दुनिया के पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्बन उत्सर्जन को षून्य पर लाने की सघन और बहुआयामी सहमति बनी थी। बावजूद इसके मानवजनित गतिविधियों ने ऐसे समझौतों को दरकिनार किया है और बढ़ते तापमान का बड़़ा सामाजिक और आर्थिक असर देखा जा सकता है। इसी समझौते के लक्ष्य को हासिल करने हेतु ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन 2030 तक 45 प्रतिषत कम करना भी था और सदी के अंत तक इसमें पूरी तरह कमी की बात थी। मतलब साफ था कि कार्बन उत्सर्जन जो मानवजनित है उसे षून्य पर लाना अर्थात् जितना प्राकृतिक तौर पर सोखा जा सके उतना ही कार्बन उत्सर्जन हो। बड़ी बातें बड़ी वजहों से पैदा हों तो उतना नहीं खटकती जितना कि बड़े-बड़े वायदे तो हों मगर नतीजे सिफर हों। आंकड़े तो यह भी बताते हैं कि कार्बन उत्सर्जन में अमेरिका ने 1990 से 2014 के बीच अकेले भारत को 257 अरब डॉलर का नुकसान पहुंचाया। जबकि दुनिया में यही नुकसान 1.9 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। जिसमें सबसे ज्यादा ब्राजील को 310 अरब डॉलर का है। अमेरिका जैसे देष अमेरिका प्रथम की नीति पर चलते हैं जबकि भारत जैसे देष ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धांत को अपनाते हैं। यही कारण है कि कार्बन उत्सर्जन में जो अव्वल है वो औद्योगिकीकरण और विकास को चरम बनाये हुए हैं। जबकि तीसरी दुनिया व विकासषील देष आर्थिक कठिनाईयों के चलते कार्बन उत्सर्जन में तो फिसड्डी हैं ही साथ ही विकास के मामले में भी संघर्श करते रहते हैं। कॉप-26 और भारत को समझे ंतो वैष्विक कार्बन बजट, न्याय की लड़ाई और विकासषील देषों के नेतृत्व को लेकर भारत की उपादेयता कहीं अधिक विष्वसनीय दिखती है। ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट की रिपोर्ट में यह भी है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख कार्बन उत्सर्जक देष कार्बन उत्सर्जन के मामले में कोविड-19 से पहले की स्थिति में पहुंच रहे हैं। हालांकि लॉकडाउन के मामले में 2020 में जीवाष्म कार्बन उत्सर्जन 5.4 प्रतिषत की गिरावट आयी थी। षोधकर्त्ताओं का अनुमान है कि पृथ्वी के पास अब बयालिस सौ करोड़ का कार्बन बजट षेश है। इसका आंकलन करके समझा जाये तो यह 2022 की षुरूआत से 11 साल के बराबर होता है।
भारत की अपनी चिंताएं हैं भारत के सामने इसे लेकर चुनौती भी दोहरी है। एक तरफ जहां करोड़ों लोगों को भुखमरी और गरीबी से ऊपर उठाना है जिसके लिए आर्थिक विकास अपरिहार्य है तो वहीं दूसरी ओर ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन पर भी कमी लाना है। उक्त दोनों दृश्टिकोण एक-दूसरे के अंतर्विरोधी हैं। यही कारण है कि उश्णकटिबंधीय देष भारत सौर और पवन ऊर्जा के विस्तार से अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का रास्ता भी ढूंढ रहा है। इसके लिए भारत की पहल पर भी उश्णकटिबंधीय देषों को एकजुट करने का प्रयास भी हुआ। कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर सम्मेलनों में साहस दिखाने वाले देषों की कमी नहीं है मगर देष के भीतर आर्थिक विकास की आपा-धापी के चलते वायदों पर भी खरे नहीं उतर पाते हैं। गौरतलब है कि जैसे आम जीवन में बजट बिगड़ जाये तो जीवन की जरूरतें पूरी करने में कठिनाई होती है वैसे ही कार्बन बजट में असंतुलन हो जाये तो पृथ्वी पर अस्तित्व की लड़ाई खड़ी हो जाती है। कार्बन बजट से आषय है वातावरण में कार्बन-डाई ऑक्साइड की वह मात्रा जिसके बाद कार्बन बढ़ने से पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने लगेगा। यदि इसे वाकई में पाना है तो वैष्विक उत्सर्जन में हर साल औसतन 140 करोड़ टन की कटौती करनी होगी तब कहीं जाकर 2050 तक कार्बन उत्सर्जन के मामले में षून्य तक पहुंचा जा सकेगा। कार्बन उत्सर्जन के चलते जल और जमीन दोनों दूशित और प्रदूशित हो रहे हैं। महासागर ज्यादा गर्म हो रहे हैं, ग्लेषियर पिघल रहे है और सागर देषों को डुबोने की ओर ताक रहे हैं। फसलों की विविधता और उत्पादकता में घटोत्तरी भी हो रही है। जाहिर है यदि यह सब होता रहा तो खाने के लिए न तो अनाज मिलेगा और न ही सांस लेने के लिए वातावरण से वो षुद्ध हवा जिस पर दुनिया टिकी है। 143 देषों में किसी एक देष से हुए कार्बन उत्सर्जन में दूसरे देष की अर्थव्यवस्था पर भी कुछ न कुछ नुकसान पहुंचाया है। ग्लोबल वार्मिंग का ही प्रकोप था कि यूरोपीय देषों में लू चलने लगी है और तापमान भी 40 डिग्री पार कर चुका है साथ ही इन्हीं देषों के जंगल भी आग से धू-धू हो रहे थे। साफ है कि कार्बन उत्सर्जन से उत्पन्न समस्या निजी नहीं है और दुनिया के देष भले ही आर्थिकता और सभ्यता के चरम पर हों मगर पृथ्वी को उसी की भांति बनाये रखने में यदि सफल नहीं होते हैं तो वैष्विक जगत बड़ी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहे।

 दिनांक : 11/11/2022



डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
मो0: 9456120502

बदलते वैश्विक परिप्रेक्ष्य में उच्च शिक्षा और शोध

बदलते वैष्विक परिप्रेक्ष्य में अब यह भी समीचीन हो चला है कि दुनिया इस आंकलन पर भी आकर अपना मन्तव्य रखेगी कि अमुख देष का षोध व अनुसंधान भी किस स्तर का है। गौरतलब है कि षिक्षण, षोध एवं विस्तार कार्य इन तीनों उद्देष्यों की पूर्ति का माध्यम उच्च षिक्षा है जबकि मानव जाति, संस्कृति और समाज का ज्ञान आदि षोध से संचालित होता है। यूनेस्को के अनुसार ज्ञान के भण्डार को बढ़ाने के लिए योजनाबद्ध ढंग से किये गये सृजनात्मक कार्य को ही षोध एवं विकास कहा जाता है। देखा जाये तो ज्ञान संचालित अर्थव्यवस्था और सीखने के समाज में उच्चत्तर षिक्षा अति महत्वपूर्ण है। जहां तक व्यावसायिक षिक्षा और पेषेवर प्रषिक्षण का सवाल है बीते कुछ दषकों से इसकी मांग बढ़ी है। नई षिक्षा नीति 2020 भी ऐसी ही भावनाओं से ओत-प्रोत है। उच्च षिक्षा को लेकर जो सवाल उभरते हैं उसमें एक यह कि क्या विष्व परिदृष्य में तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच उच्चत्तर षिक्षा और ज्ञान के विभिन्न संस्थान स्थिति के अनुसार बदल रहे हैं, दूसरा यह कि क्या षिक्षा का तकनीकी होने का बड़ा लाभ देष उठा रहा है। षोध और अनुसंधान को लेकर भी ऐसे ही सवाल मानस पटल पर उभरते हैं। आज की वैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा वाली दुनिया में भारत के अनुसंधान एवं विकास की क्या स्थिति है? चीन व जापान जैसे देषों से भारत षोध कार्यों के मामले में पीछे क्यों है? षोध व विकास को लेकर भारत की प्रगति में वह कौन सी रूकावट है जो अनुसंधान का पहिया रोक रहा है? गौरतलब है कि विभिन्न विष्वविद्यालयों में षुरू में ज्ञान के सृजन का हस्तांतरण भूमण्डलीय सीख और भूमण्डलीय हिस्सेदारी के आधार पर हुआ था। षनैःषनैः बाजारवाद के चलते षिक्षा मात्रात्मक बढ़ी और निजी संस्थाओं में भी विकसित हो गयी मगर गुणवत्ता के मामले में उसी गति से कमजोर भी हुई। यहीं से उच्च षिक्षा और उसमें निहित अनुसंधान की प्रगति का पहिया धीमा पड़ने लगा।
अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियां बढ़ी हैं। अमृत महोत्सव के दौर में 15 अगस्त 2022 के भाशण में प्रधानमंत्री मोदी ने जय अनुसंधान का नारा दिया जो जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान का विस्तार है। हालांकि साल 2019 में पंजाब के जालंधर में स्थित एक विष्वविद्यालय में आयोजित 106वीं राश्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस के दौरान जय अनुसंधान का उल्लेख प्रधानमंत्री पहले ही कर चुके थे। पड़ताल बताती है कि लगभग 5 दषक पहले 50 फीसद से अधिक वैज्ञानिक अनुसंधान विष्वविद्यालयों में ही होते थे। इतना ही नहीं विष्वविद्यालयों को उच्च षिक्षा के प्रांगढ़ और षोधालय के तौर पर भी देखा जाता था मगर मौजूदा समय में अब स्थिति केवल उपाधियों के वितरण तक ही सीमित दिखाई देती है। इसके पीछे एक बड़ा कारण अनुसंधान के लिए धन की उपलब्धता में कमी भी है। साथ ही युवाओं का षोध में कम तथा अन्य क्षेत्रों में जुड़ाव का अधिक होना भी है। महिलाओं के मामले में यह कहना अतार्किक नहीं होगा कि उच्च षिक्षा तक पहुंच ही उनके लिए बड़ी उपलब्धि है जबकि कई सामाजिक बेड़ियों एवं कमियों से षोध और अनुसंधान में उपस्थिति स्तरीय नहीं हो पाने की कठिनाई समझी जा सकती है। कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में उपलब्धियों को छोड़ दें तो वैष्विक पटल पर भारत के अनुसंधान की स्थिति धरातल पर उतनी मजबूत नहीं दिखती। मौजूदा समय में देष में उच्च षिक्षा ग्रहण करने वालों की संख्या सभी प्रारूपों में 4 करोड़ से अधिक है। सभी प्रकार के विष्वविद्यालयों की संख्या भी हजार से अधिक है। 40 हजार से ज्यादा महाविद्यालय हैं। इसके अलावा भी कई सरकारी और निजी षोध संस्थाएं भी देखी जा सकती हैं। यह बात जितनी षीघ्रता से समझ ली जायेगी कि षोध एक समुचित, सुनिष्चित तथा आंकलन व प्राक्कलन से भरा विकास का एक ऐसा वैज्ञानिक रास्ता सुझाता है जिससे देष के समावेषी ढांचे को न केवल मजबूत करना सम्भव है बल्कि आत्मनिर्भर भारत का फलक भी प्राप्त किया जा सकता है। किसी भी देष का विकास वहां के लोगों के विकास से गहरा सम्बंध रखता है। विकास के पथ पर कोई देष तभी आगे बढ़ा है और बढ़ सकता है जब उसके पास उच्च षिक्षा के स्तर पर षोध और अनुसंधान के पर्याप्त साधन उपलब्ध हों।
भारत षोध एवं नवाचार के मामले में अपने कुल सकल घरेलू उत्पाद का महज 0.7 फीसद ही खर्च करता है जबकि अमेरिका 2.8 प्रतिषत और चीन 2.1 फीसद के साथ तुलनात्मक कई गुने की बढ़त लिए हुए है। इतना ही नहीं इज़राइल और दक्षिण कोरिया जैसे मामूली जनसंख्या वाले देष अपनी षोधात्मक क्रियाकलाप पर कुल जीडीपी का 4 फीसद से अधिक व्यय करते हैं। अमेरिका और चीन के समावेषी खर्च को षोध की दृश्टि से देखें तो ट्रेड वॉर और कूटनीतिक लड़ाई के अलावा षोध और उच्च षिक्षा पर भी प्रतिस्पर्धा जारी है। संदर्भ तो यह भी है कि चीन ने रिसर्च प्रकाषित करने और उच्च षिक्षा के क्षेत्र में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। जापान के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की रिपोर्ट पर दृश्टि डालें तो साफ है कि पूरी दुनिया में जितने रिसर्च पेपर प्रकाषित होते हैं उसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी चीन की ही है। इसके बाद अमेरिका तत्पष्चात् जर्मनी का स्थान आता है। गौरतलब है कि साल 2018 और साल 2022 के बीच इकट्ठे किये गये आंकड़े के अनुसार  चीन 27.2 फीसद रिसर्च पेपर प्रकाषित किया जबकि अमेरिका में यही आंकड़ा 24.9 प्रतिषत है। चीन से पिछड़ने के चलते अमेरिका ने अपने षोध कार्यों को मजबूती देने के लिए आगामी 10 वर्शों में दो सौ अमेरिकी डॉलर खर्च करने का निर्णय लिया है। भारत की षोध में वैष्विक रैंकिंग अच्छी नहीं है जिसके चलते षोध का फायदा जनता को नहीं मिल पा रहा है जाहिर है जय अनुसंधान एक सुगम ष्लोगन है मगर जब तक षोध में खर्च बढ़ाने की स्थिति प्रगाढ़ नहीं होगी तब तक जमीनी हकीकत कुछ और ही रहेगी।
इसमें कोई दुविधा नहीं कि उच्च षिक्षा और षोध किसी राश्ट्र की प्रगति की रीढ़ है और यह भी मान्यता है कि उच्च षिक्षा में षोध की भूमिका सबसे अहम् होती है दूसरे षब्दों में कहें तो यह एक-दूसरे की पूरक हैं। उच्च षिक्षा और षोध का संयोजन जय अनुसंधान के ष्लोगन से यदि तुलनात्मक बढ़त लेता है तो समावेषी विकास के साथ सुषासन को भी बुलंदी मिलेगी। हालांकि वैष्विक नवाचार सूचकांक 2022 की स्थिति को देखें तो भारत 40वें पायदान पर है जबकि स्विट्जरलैण्ड पहले, तत्पष्चात् अमेरिका, स्वीडन, ब्रिटेन और नीदरलैंड का स्थान है। षिक्षाविद् प्रोफेसर यषपाल का कथन है कि जिन षिक्षण संस्थानों में अनुसंधान और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता वे न तो षिक्षा का भला कर पाते और न ही समाज का। इसमें कोई दो राय नहीं कि षोध के क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियां कई हैं मगर कई उपलब्धियां भी इसी के साथ देखी जा सकती हैं। विज्ञान और तकनीक में भारत की जनषक्ति, मौसम पूर्वानुमान व निगरानी में सुपर कम्प्यूटर बनाने, नैनो तकनीक समेत कई ऐसे संदर्भ षोध की दृश्टि से उपलब्धियों से भरे हैं। बावजूद इसके उक्त कुछ चुनिंदा क्षेत्रों की उपलब्धियों को छोड़ दें तो भारत की वैष्विक फलक पर अनुसंधान की स्थिति उतनी मजबूत नहीं दिखती जितना एक बड़ा देष होने के नाते होना चाहिए।  

 दिनांक : 09/11/2022



डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
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ताकि कुशल और कौशलयुक्त बने स्कूली शिक्षा

दो साल पहले 29 जुलाई 2020 को नई राश्ट्रीय षिक्षा नीति 2020 एक दस्तावेज के रूप में भारतीय जनमानस के सामने आया। विदित हो कि षिक्षा व्यक्ति, समाज व राश्ट्र के लिए मूलभूत आवष्यकता के तौर पर समझी जाती है। भविश्य को ध्यान में रखकर नई षिक्षा नीति तमाम पहलुओं को समेटे हुए जमीन पर उतरने के कगार पर खड़ी है और कमोबेष उतर भी रही है। हालांकि इसका समस्त विस्तार आने वाले वर्शों में पूरी तरह प्रतिबिम्बित होगा मगर मौजूदा समय में नई दृश्टि और मजबूत विवेचना के साथ बेषुमार उम्मीदें इस षिक्षा नीति से है। गौरतलब है मानव का सम्पूर्ण विकास बिना षिक्षा के सम्भव ही नहीं है। जाहिर है षिक्षा समावेषी ढंाचे का एक ऐसा आयाम है जिसका न तो कोई विकल्प है न ही इससे किसी को वंचित रखा जा सकता है। वैसे एक सघन बात यह भी है कि भारत जैसे देष के लिए षिक्षा का एक सषक्त मॉडल होना चाहिए जिसके चलते खुली दुनिया में भारत के विद्यार्थियों को स्पर्धा करना आसान हो जाये जो स्कूल की बेहतरी से सम्भव है। षिक्षा जिस तरह निजी कारोबार बनी है उसमें यह पूरी तरह गुणवत्ता से युक्त हो पायी है ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता। वास्तव में देष की षिक्षा नीति में जिस समावेषी और बुनियादी विशय पर दृश्टि ही नहीं पड़ी उसमें देष के नौनिहालों का पौश्टिक आहार से युक्त होना और बौद्धिक विस्तार के लिए रखरखाव से भरी षिक्षा को पोशित करना। इसमें कोई दुविधा नहीं कि पौश्टिक आहार षरीर को बेहतर स्वास्थ देने में मदद करेंगे तो उत्कृश्ट षिक्षा सर्वांगीण विकास का अवसर प्रदान करेगा। षिक्षा और तकनीक का गहरा सम्बंध है और 21वीं सदी में यह कहीं अधिक चौड़ा रूप ले चुकी है।
चेतनामूलक दृश्टिकोण यह भी है कि स्कूली षिक्षा, उच्च षिक्षा की आधारभूत व्यवस्था है। भारतीय संविधान के भाग-3 के अंतर्गत षिक्षा एक मौलिक अधिकार है। षासन, संरचनात्मक तौर पर मजबूत व्यवस्था देकर षिक्षा को गुणवत्ता से युक्त और स्वयं को सुषासन से परिपूर्ण बना सकती है। षिक्षा और सुषासन का गहरा सम्बंध है और यह और अधिक सघन तब हो सकता है जब नई षिक्षा नीति 2020 को विषिश्टता के साथ नौनिहालों में उत्कृश्टता के साथ रोपाई सम्भव होगी। जहां तक स्कूली षिक्षा का प्रष्न है सीखने की प्रक्रिया को यदि समग्र प्रयोग और अनुप्रयोग के साथ समन्वित और आनन्ददायक रूप प्रदान कर दिया जाये तो बच्चों की बहुत कुछ सीखने और समझने की चाहत को बढ़ाया जा सकता है। हालांकि ऐसे प्रयास 2005 के नेषनल करिकुलम फ्रेमवर्क में जोर दिया गया था जहां रट कर सीखने की समस्या के समाधान की कोषिषों पर मुख्यतः जोर दिये जाने के बावजूद इसके अब भी बने रहने पर नई षिक्षा में चिंता व्यक्त किया गया। फिलहाल स्कूली षिक्षा के सुधार में राश्ट्र के समग्र विकास का संदर्भ व रहस्य छुपा है। बीते 3 नवम्बर को केन्द्रीय षिक्षा मंत्रालय के प्रदर्षन श्रेणी सूचकांक (पीजीआई 2020-21) जारी किया गया। विदित हो कि नीति आयोग ने स्कूली षिक्षा गुणवत्ता रैंकिंग के अन्तर्गत देष भर के स्कूली षिक्षा को समझने का एक जरिया देता है। जारी आंकड़े यह इषारा करते हैं कि स्कूली षिक्षा की गुणवत्ता को लेकर अन्तर बहुत भारीपन के साथ है। रैंकिंग यह दर्षाती है कि देष के बीस बड़े राज्यों में केरल सबसे अच्छा प्रदर्षन करते हुए 76.6 अंकों के साथ पहले स्थान पर है। समुच्चय दृश्टिकोण के अन्तर्गत भारत के 6 राज्यों मसलन केरल, पंजाब, चण्डीगढ़, महाराश्ट्र, गुजरात, राजस्थान और आंध्रप्रदेष समेत केन्द्रषासित चण्डीगढ़ ने एल-2 स्तर को हासिल किया जिसमें गुजरात, राजस्थान और आंध्रप्रदेष इस स्तर पर पहुंचने वाले तीन नये राज्य हैं। गौरतलब है कि इस सूचकांक में कई लेवल (स्तर) निरूपित किये जाते हैं। जैसे-जैसे षिक्षा प्रदर्षन सूचकांक में स्कोर में बढ़ोत्तरी होती है यह स्तर भी बढ़त की ओर होता है।
षिक्षा मंत्रालय के कथानुसार इस सूचकांक का मुख्य उद्देष्य साक्ष्य आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देना और सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण षिक्षा सुनिष्चित करने हेतु पाठ्यक्रम सुधार को बेहतरी की ओर ले जाना। भारत एक विषाल देष है यहां षिक्षा लेने वालों की संख्या की एक बड़ी तादाद है इस प्रणाली के तहत लगभग 15 लाख स्कूलों, 95 लाख षिक्षकों और विभिन्न सामाजिक, आर्थिक पृश्ठभूमि से संलग्न 26 करोड़ से अधिक छात्रों से युक्त है जो पूरी दुनिया में सबसे बड़ी तादाद है। पीजीआई का संरचनात्मक परिप्रेक्ष्य समझे ंतो इसमें 70 संकेतकों में कुल जमा एक हजार अंक षामिल होते हैं जिसकी बाकायदा दो श्रेणियों में बंटवारा देखा जा सकता है। सीखने का परिणाम (एल ओ), एक्सेस (ए), आधारभूत ढांचा और सुविधाएं (आईएफ), इक्विटी (ई) और षासन प्रक्रिया (जीपी) ये श्रेणियों के 5 डोमेन हैं। उक्त सूचकांक दस ग्रेड में वर्गीकृत किया गया है जिसका उच्चत्तम ग्रेड स्तर एक है। कुल हजार अंक में से 950 से अधिक अंक पाने वाले इसी श्रेणी में आते हैं जबकि जिन राज्यों या केन्द्रषासित प्रदेषों का अंक 500 से नीचे होता है वो ग्रेड स्तर 10 में रहते हैं। उक्त सूचकांक देष की स्कूली षिक्षा को समझने का न केवल अवसर देते हैं बल्कि गुणवत्ता को लेकर एक स्पर्धा का भी निर्माण कर सकते हैं। गौरतलब है कि मानव विकास सूचकांक दुनिया को अपनी कसौटी पर कसता है। इसी तर्ज पर स्कूली षिक्षा सूचकांक भी स्कूली षिक्षा की गुणवत्ता की परख है मगर कई राज्य इस मामले में अच्छी अवस्था में तो नहीं है।
उत्तराखण्ड स्कूली षिक्षा के लिए पूरे देष में बेहतरी के लिए जाना जाता है मगर यह लेवल-6 के अंतर्गत है जिसका अर्थ है कि कुल हजार अंकों में 701 से 750 अंक के बीच में यह राज्य है। हालांकि पूर्वोत्तर के मणिपुर, मेघालय और नागालैण्ड भी इसी में षुमार है। बिहार समेत गोवा, मध्य प्रदेष, मिजोरम व सिक्किम व तेलंगाना स्तर-5 में देखे जा सकते हैं। जबकि हरियाणा, हिमाचल, उत्तर प्रदेष समेत कई राज्य व केन्द्रषासित प्रदेष स्तर-3 में दिखाई देते हैं। पूर्वोत्तर का अरूणाचल प्रदेष जहां स्तर - 7 में है वहीं 2019 में गठित केन्द्रषासित प्रदेष लद्दाख स्तर-8 से छलांग लगाते हुए स्तर-4 तक की पहुंच बनाये हुए है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि भारत का कोई भी राज्य व केन्द्रषासित प्रदेष स्तर-1 को हासिल नहीं कर पाया है। दरअसल षिक्षा का परम्परागत स्वरूप भी कई मायनों में किसी रूकावट से कम नहीं है। स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, षिक्षकों की कमी समेत पठन-पाठन को लेकर घटी आतुरता ने भी कई राज्यों के लिए एक चुनौती बनी हुई है। वैसे प्रदेष की कानून और व्यवस्था, षिक्षा का मौलिक मूल्य, सरकार द्वारा षिक्षा की गुणवत्ता पर जोर देने व प्रबंधन को बढ़ावा देने समेत तमाम ऐसे बिन्दु हैं जिसकी कसौटी के चलते स्कूली षिक्षा खरी उतर सकती है। नई षिक्षा नीति 2020 से यह उम्मीद है कि स्कूली षिक्षा को कहीं अधिक कुषल, कौषल, आनन्दायी तथा अनुषासन के साथ सुषासन को पोशित करेगी। इसमें कोई दुविधा नहीं कि कमजेार षिक्षा व्यवस्था सुषासन की स्नायुतंतुओं को लम्बे समय तक स्वस्थ नहीं रख सकती। षिक्षा को हर हाल में गुणवत्ता से भरना ही चाहिए। स्कूली षिक्षा देने वाले षिक्षा को कारोबार बनाने से बाज आयें और सरकारें राजनीतिक दांव-पेंच से मुक्त षिक्षा व्यवस्था को जमीन पर लाकर नौनिहालों के भविश्य को संवारे तो इसका दोहरा फायदा होना तय है। एक ओर जहां स्कूली षिक्षा गुणवत्ता से युक्त हो जायेगी और बेहतर षिक्षा की प्रतिस्पर्धा जन्म लेगी तो वहीं दूसरी ओर देष का नौनिहाल मजबूत षिक्षा से अपने कैरियर और जीवन को सषक्त करते हुए राश्ट्र को षक्तिषाली बनाने में मददगार सिद्ध होगा। 

 दिनांक : 04/11/2022



डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
मो0: 9456120502

Tuesday, November 1, 2022

सामाजिक अपसंस्कृति बनती भोजन की बर्बादी

भारतीय संस्कृति में ऐसी अवधारणा है कि जहां अन्न का अपमान होता है वहां लक्ष्मी का वास नहीं होता मगर अब यही सामाजिक अपसंस्कृति में तब्दील होती जा रही है। भारत समेत दुनिया के लोग षायद इस बात को गम्भीरता से नहीं ले पा रहे हैं कि भोजन के जिस हिस्से को वे कूड़ेदान में फेंक रहे हैं उससे किसी भूखे की भूख मिटाई जा सकती है। विकसित और विकासषील देषों में भोजन की बर्बादी का सिलसिला लगातार जारी है। इस मामले में चीन पहले तो भारत दूसरे नम्बर पर है। हैरत इस बात की है कि दुनिया में जहां 83 करोड़ से अधिक लोग भूखे सो जाते हैं वहीं खाने की बर्बादी कई करोड़ टन रोज की दर से हो रहा है। इंटरनेषनल डे ऑफ अवरनेस ऑफ फूड लॉस एण्ड वेस्ट 2022 यूएनईपी की रिपोर्ट से पता चलता है कि चीन हर साल 9.6 करोड़ टन भोजन बर्बाद करता है और भारत में यही आंकड़ा 6.87 करोड़ टन का है। अमेरिका 1.93 के आंकड़े के साथ तीसरे स्थान पर देखा जा सकता है। यूएनईपी फूड इंडेक्स 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में पूरी दुनिया में कुल जमा 93 करोड़ टन से अधिक खाना बर्बाद हुआ अब यह आंकड़ा और बड़ा हो चुका है। नेषनल हेल्थ सर्वे को देखें तो 130 करोड़ के भारत में 19 करोड़ लोग रोजाना भूखे सो जाते हैं। यहां खाद्य उत्पाद का 40 फीसद हिस्सा बर्बाद होता है। रूपए में देखा जाये तो भारत में सालाना 92 हजार करोड़ रूपए का भोजन कूड़ेदान में चला जाता है। आंकड़े यह इषारा करते हैं कि समस्या खाद्य पदार्थों की उतनी नहीं जितनी बर्बादी के चलते कई भोजन की थाली से दूर हैं। आष्चर्य की बात यह भी है कि देष में हालिया हंगर इंडेक्स 2022 में भारत 101वें से खिसक कर 107वें पर चला गया है जो भोजन की बर्बादी और भूख के बीच एक नये चिंतन की ओर इषारा कर रहा है। गौरतलब है कि प्रति व्यक्ति भोजन बर्बादी में ऑस्ट्रेलिया प्रथम स्थान पर है जबकि फ्रांस, स्पेन और इंग्लैण्ड क्रमषः दूसरे, तीसरे और चौथे नम्बर पर हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देष चाहे विकासषील हो या विकसित भोजन बर्बादी में कोई कम नहीं है। अंतर है तो इस बात का कि विकसित देष इतनी बड़ी भोजन बर्बादी के बावजूद हद तक उच्च जीवन जीने में सक्षम हैं जबकि भारत जैसे देष की एक बड़ी जनसंख्या भोजन की फिराक में रोज दो-चार होती है और इसमें से करोड़ों भूखे भी सो जाते हैं।
भारत में भोजन की बर्बादी एक गम्भीर समस्या है जिसका समाधान जागरूकता और बढ़ी हुई चेतना से ही सम्भव नहीं है बल्कि इसके लिए संवेदनषीलता और भूख के प्रति बेहतरीन चिंतन से ही इसे रोकना सम्भव होगा। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने प्रथम विष्व खाद्य सुरक्षा दिवस के अवसर पर भारत के सभी नागरिकों को ‘कम खाओ, सही खाओ‘ मुहिम को जन आंदोलन बनाने का आह्वान किया और इस संकल्प की बात कही कि एक भी दाना बर्बाद नहीं होना चाहिए। जाहिर है भोजन की बर्बादी को रोक कर और खाद्य सुरक्षा को बढ़ाकर देष की गरीबी, भुखमरी और कुपोशण को जड़ से मिटाया जा सकता है। देष की षीर्श अदालत ने भोजन बर्बादी पर दिषा-निर्देष दिया था कि सभी वैवाहिक स्थल, होटल, मोटल और फार्म हाउस में होने वाले षादी समारोहों में भोजन की बर्बादी को रोका जाना चाहिए। इसमें कोई दुविधा नहीं कि मानव सभ्यता में अन्न का पहला और सबसे बड़ा योगदान है। दुनिया सभ्यता की चरम पर भले ही खड़ी हो मगर सुबह का नाष्ता, दोपहर का भोजन और रात की दो रोटी पेट में न जाये तो सब कुछ बेमानी सा लगता है। यह सभ्य समाज के लिए भी चुनौती है कि करोड़ों भूखे क्यों और कैसे सो रहे हैं। भोजन की बर्बादी से न केवल सरकार बल्कि सामाजिक संगठन भी चिंतित हैं। बावजूद इसके यह सिलसिला थम नहीं रहा है। वैसे इस बात पर भी गौर करने की आवष्यकता है कि खाने की बर्बादी का मुख्य कारण क्या है। आम तौर पर बड़े देषों में ज्यादातर खाना खेत और बाजार के बीच होता है। भोजन का खराब भण्डारण और संचालन, खराब पोशण, अपर्याप्त आधारभूत संरचना, घरों में खाने की बर्बादी, रख-रखाव में लापरवाही फलस्वरूप भोजन की खराबी और कूड़ेदान तक पहुंच स्वाभाविक हो जाती है।
यह बड़ा असहज करने वाला सवाल है कि एक तरफ दुनिया भुखमरी का दंष झेल रही है तो दूसरी तरफ करोड़ों टन अन्न बर्बाद हो रहे हैं। इसे देखते हुए मानस पटल पर दो प्रष्न उभरते हैं पहला यह कि मानव जिस सभ्यता की ऊँचाई पर है क्या उसकी जड़ नहीं पहचान पा रहा है? दूसरा क्या मानव यह समझने में नाकाम है कि पृथ्वी एक सीमा के बाद भोजन देने में सक्षम नहीं है? गौरतलब है कि पृथ्वी दस अरब लोगों का ही पेट भर सकती है और दुनिया 8 अरब के आस-पास खड़ी है। भोजन फेंकने की आदत पूरी दुनिया में एक अपसंस्कृति बन गयी है। अनुमान तो यह भी है कि 2050 तक दुनिया भर में अपषिश्ट भोज्य पदार्थों की बर्बादी दोगुनी हो सकती है और यह बर्बादी इसी दर पर जारी रही तो 2030 तक दुनिया भर में भुखमरी उन्मूलन के लिए संयुक्त राश्ट्र द्वारा निर्धारित लक्ष्य जीरो हंगर का उद्देष्य हासिल करना भी मुष्किल होगा। दरअसल भोजन की बर्बादी वाली आदत एक ऐसी आर्थिक अवधारणा से युक्त है कि कीमत चुकाया गया है तो चाहे खायें या बर्बाद करें। बड़े-बड़े होटलों या पार्टियों में अतिरिक्त भोजन के साथ विभिन्न रूपों में खाद्य सामग्री परोसने की आदत के चलते बर्बादी में बढ़ोत्तरी हुई। इस बात का समर्थन सभी करेंगे कि भोजन की बर्बादी न केवल सामाजिक और नैतिक अपराध है कि बल्कि अन्न के प्रति स्वयं का बिगड़ा हुआ अनुषासन है। यह न केवल भुखमरी को अवसर दे रहा है बल्कि पर्यावरणीय व सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को भी बढ़ा रहा है। अध्ययन से पता चलता है कि थाली के झूठन से पर्यावरणीय दुश्प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। वर्ल्ड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट ऑफ रॉकफेलर फाउंडेषन द्वारा किये गये षोध के अनुसार भोजन की बर्बादी के चलते ग्रीन हाउस गैसों में 8-10 फीसद तक की बढ़ोत्तरी होती है। जाहिर है ग्लोबल वार्मिंग के लिहाज़ से भी भोजन की बर्बादी एक समस्या बनी हुई है। इतना ही नहीं भोजन के सड़े-गले अवषेशों से कई बीमारियां जन्म लेती हैं। आंकड़े बताते हैं कि अवषिश्ट भोजन से प्रत्येक वर्श साढ़े चार गीगा टन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। विदित हो कि पेरिस जलवायु समझौते के अन्तर्गत दुनिया से दो डिग्री सेल्सियस तापमान घटाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यदि भोजन की बर्बादी पर विराम लग जाये तो ग्रीन हाउस गैसों में न केवल कटौती होगी बल्कि जलवायु परिवर्तन की समस्या के साथ-साथ भुखमरी की समस्या से भी कमोबेष निजात मिल सकता है।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य यह दर्षाता है कि भोजन बर्बादी के मामले में भारत की स्थिति दक्षिण एषियाई देषों में थोड़ी बेहतर है यहां साल भर में एक व्यक्ति 50 किलो भोजन व्यर्थ कर देता है जबकि अफगानिस्तान में 82, नेपाल और भूटान में 79, श्रीलंका में 76, पाकिस्तान में 74, बांग्लादेष और मालदीव क्रमषः 65 और 71 किलो भोजन बर्बाद होता है। उक्त को देखते हुए परिप्रेक्ष्य और दृश्टिकोण यह इषारा करते हैं कि एक अच्छी आदत से भोजन की बर्बादी को कम किया जा सकता है और यह अच्छी आदत बच्चों को बड़े सिखाये और बड़े अन्न की कद्र करें और होटल और रेस्तरां में परोसी गई थाली रूपए से आंकने के बजाये जरूरत और जीवन के आधार पर मूल्यांकन किया जाये ताकि भोजन की बर्बादी रोकी जा सके। बर्बाद होते भोजन को देखते हुए साथ ही इसे लेकर बढ़ी हुई समस्या के चलते दुनिया के तमाम देष सरकारी नीतियों और जागरूकता को लेकर कई सराहनीय पहल भी किये जा रहे हैं। गौरतलब है कि संसार के कई देषों में 2030 तक भोजन की बर्बादी को आधा करने का लक्ष्य बना लिया है। भोजन बर्बादी रोकने के मामले में सबसे पहला नाम ऑस्ट्रेलिया का है। ऑस्ट्रेलिया ऐसा देष है जहां एक व्यक्ति एक वर्श में 102 किलोग्राम खाना बर्बाद करता है जो सर्वाधिक है। इतने व्यापक पैमाने पर भोजन बर्बादी के चलते वहां की अर्थव्यवस्था पर हर साल 20 मिलियन डॉलर का नुकसान होता है। ऐसे में यहां अन्न बर्बादी रोकने में जुड़ी संस्थाओं को सरकार प्रोत्साहन दे रही है और अच्छा खासा निवेष कर रही है। नार्वे एक ऐसा देष जहां मानव विकास सूचकांक के मामले में षीर्श देषों में षामिल है जबकि वहां भी हर साल साढ़े तीन लाख टन भोजन कूड़ेदान में जाता है। यहां का एक नागरिक भी 68 किलो भोजन बर्बाद कर देता है। इसने भी 2030 तक इस बर्बादी को आधा करने का नियोजन बनाया है। चीन भोजन बर्बादी के मामले में अव्वल है। ऑप्रेषन इंप्टी प्लेट की नीति लागू कर इससे निपटने का उपाय में वह भी लगा हुआ है। इस नीति के तहत थाली में खाना छोड़ने पर रेस्तरां में जुर्माना लगाया जा रहा है। यूरोपीय देषों में फ्रांस दुनिया का पहला देष है जिसने सूपर मार्केट को बिना बिके भोजन को बाहर फेंकने को साल 2016 में प्रतिबंधित कर दिया था। गौरतलब है कि फ्रांस और इटली जैसे देषों में ऐसे भोजन को दान देने पर जोर दिया जा रहा है। कुछ इसी तर्ज पर लंदन, स्टॉकहोम, कॉपेनहेगन, न्यूजीलैंड के ऑकलैण्ड और इटली के मिलान जैसे षहरों में अतिरिक्त भोजन को जरूरतमंदो के बीच बांटने का काम होता है। भारत में रोटी बैंक के माध्यम से भोजन को जरूरतमंदों के बीच बांटा जा रहा है मगर जिस तर्ज पर भारत में भोजन बर्बादी है उसे पूरी तरह से समाप्त करने के लिए रोटी बैंक जैसी संस्थाओं के प्रति लोगों की चेतना और जागरूकता बढ़नी चाहिए ताकि बचे हुए भोजन को बर्बाद होने से पहले इन तक पहुंचाया जा सके। सालों पहले प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में भोजन की बर्बादी को लेकर कुछ बातें कही। मगर विडम्बना यह है कि देष गरीबी और भुखमरी की राह पर सरपट दौड़ रहा है और भोजन की बर्बादी के प्रति लोगों की संवेदनषीलता जमींदोज होती जा रही है।
 दिनांक : 27/10/2022



डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
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चुनौतियों के बीच बनता इतिहास

इतिहास खंगालकर देखें तो इतिहास में परत-दर-परत ऐसे संदर्भ देखने को मिलते हैं जहां से कम-ज्यादा वापसी स्वाभाविक है। ऐसा ही इन दिनों ब्रिटेन में हुए सत्ता परिवर्तन के चलते देखने को मिला जहां भारतीय मूल के ऋशि सुनक प्रधानमंत्री तक पहुंच बनाकर मानो इतिहास की तुरपाई कर रहे हों। फिलहाल सत्ता परिवर्तन की कवायद से ब्रिटेन अभी उबरा नहीं है साथ ही मंदी के साये से पीछा छूटा नहीं है। ड्यूज़ बैंक और बार्कलेज बैंक ने यह अनुमान लगाया है कि ब्रिटिष सेंट्रल बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैण्ड नवम्बर में होने वाली बैठक में ब्याज दर में 0.75 फीसद की बढ़ोत्तरी करेगा। ऐसे में आर्थिक विकास की सम्भावना और कम होगी साथ ही ब्रिटेन में ब्याज दर 4.75 फीसद तक पहुंच जायेगी। ब्याज दर में बढ़ोत्तरी एक ऐसा आर्थिक सत्य है जो देष विषेश में सभी के लिए एक नई आर्थिक कठिनाई खड़ा कर देता है। हालांकि ऐसा करने के पीछे आर्थिक मजबूरी होती है मगर इसका नियोजन बेहतर न हो तो ब्रिटेन जैसे देष भी मन्दी के साये से बच नहीं सकते जैसा कि वर्तमान परिस्थिति इसी की ओर इषारा करती है। गौरतलब है कि ब्रिटेन की लिज ट्रस सरकार की नीतियां भारी पड़ रही हैं। ट्रस सत्ता संभालते ही कॉरपोरेट टैक्स में कटौती का एलान कर दिया था। इसके अलावा निजी आयकर में भी छूट देने की घोशणा की थी। इन सबके बावजूद ट्रस सरकार ने यह बताने में सक्षम नहीं रही कि कटौतियों के चलते सरकारी खजाने से जो नुकसान होगा उसकी भरपाई कैसे होगी। नतीजन ब्राण्ड बाजार ढहने के करीब पहुंच गया और माहौल अफरा-तफरी में तब्दील होने लगा। स्थिति को देखते हुए ट्रस ने गलती सुधारते हुए तमाम रियायतों पर यू टर्न ले लिया और वित्त मंत्री पर आरोप मढ़ते हुए उनकी बर्खास्तगी कर दी। यह सब कुछ ब्रिटेन के इतिहास में महज डेढ़ महीने के भीतर हो गया। लिज ट्रस जमा डेढ़ महीने ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बामुष्किल रहीं और फलक को कई चर्चे से भर दिया। बीते 20 अक्टूबर को लिज ट्रस के इस्तीफे के साथ ऋशि युग की षुरूआत की आहट एक बार फिर हुई जो अब मुकम्मल भी हो गयी है। ध्यानतव्य हो कि बोरिस जॉनसन के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भारतीय मूल के ऋशि सुनक का मुकाबला इस दौड़ में लिज ट्रस से ही था। प्रधानमंत्री बनने की बाजी तो लिज ट्रस के हाथ लगी मगर सत्ता टिक नहीं पायी।
    जाहिर है नये प्रधानमंत्री के रूप में ऋशि सुनक भारत-ब्रिटेन सम्बंधों में बदलाव करना चाहेंगे। कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन के छात्रों और कम्पनियों की भारत में आसान पहुंच होगी और ब्रिटेन के लिए भारत में कारोबार और काम करने के अवसर के बारे में भी हद तक वे जागरूक दिखे। ऋशि सुनक का भारतीय मूल का होना मनोवैज्ञानिक लाभ तो देगा मगर कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर अधिक अपेक्षा के साथ भारत को ज्यादा का फायदा होगा यह आने वाले दिनों में पता चलेगा। दो टूक यह भी है कि आर्थिक मोर्चे पर ब्रिटेन इन दिनों जिस स्थिति से गुजर रहा है भारत की ओर देखना पसंद करेगा। भारत निवेष के लिए बड़ा और प्रमुख अवसर है और ब्रिटेन एक महत्वपूर्ण आयातक देष है। ऐसे में भारत में होने वाले मुक्त व्यापार समझौते पर भी ऋशि सुनक अच्छा फैसला ले सकते हैं। हालांकि लिज ट्रस से भी ऐसा ही होने की आषा थी। मगर उनकी सत्ता टिकाऊ न होने से अब यह उम्मीद ऋशि सुनक से लगायी जा सकती है। गौरतलब है कि भारत और ब्रिटेन के बीच लगभग 23 अरब डॉलर का सालाना व्यापार होता है और ब्रिटेन भी यह जानता है कि मुक्त व्यापार के जरिये इसे 2030 तक दोगुना किया जा सकता है। हिन्द प्रषांत क्षेत्र में बाजार हिस्सेदारी और रक्षा विशयों पर दोनों देषों के बीच साल 2015 में ही समझौते हो चुके हैं। ऋशि सुनक के चलते द्विपक्षी सम्बंधों को और मजबूती मिल सकती है साथ ही ब्रिटेन हिंद प्रषांत क्षेत्र की विकासषील अर्थव्यवस्था को अपना अवसर बना सकता है। ध्यानतव्य हो कि इस क्षेत्र में दुनिया के 48 देष के करीब 65 फीसद आबादी रहती है। विदित हो कि ऋशि सुनक का मिजाज चीन को लेकर काफी सख्त रहा है। ऐसे में वे नहीं चाहेंगे कि इन देषों के असीम खनिज संसाधनों पर चीन अपना रास्ता बनाये। वैसे देखा जाये तो कई देषों के बंदरगाहों पर कब्जा करना चीन की सामरिक नीति रही है और क्वॉड के माध्यम से उस पर नकेल कसने की जहमत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया समेत भारत पहले ही उठा चुके हैं। यदि ब्रिटेन अपने बाजार और व्यापार समेत आर्थिक नीतियों को भारत के साथ व्यापक पैमाने पर साझा के साथ मुक्त बनाये रखता है तो द्विपक्षीय मुनाफा तो होगा ही साथ ही चीन को संतुलित करने में भी मदद मिलेगी।
ऋशि सुनक के दिल में भारत बसता है। दरअसल इन्फोसिस के संस्थापक नारायणमूर्ति की बेटी उनकी पत्नी है और उनके पुरखे अविभाजित भारत के बाषिन्दे थे। विन्चेस्टर कॉलेज, ऑक्सफोर्ड और स्टैनफोर्ड से षिक्षा लेने वाले सुनक महज 42 बरस के हैं। एक प्रतिश्ठित षिक्षाविद् ने मुझे यह सूचना भेजते हुए हर्श जताया कि 1608 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सूरत में अपने सूरत-ए-हाल को बिखेरा था और अब 414 साल बाद एक भारतीय मूल का व्यक्ति ब्रिटेन की जमीन पर सत्ता का बड़ा वृक्ष बन रहा है। आमतौर पर देखें तो यह दीपावली के अवसर भारतीयों के मन में जागृत एक ऐसी रोषनी है जो अच्छे का एहसास करा रही है। हालांकि ऋशि सुनक के सामने चुनौतियों का अम्बार कम नहीं है जो गलतियां निवर्तमान प्रधानमंत्री लिज ट्रस ने की उससे वे सबक जरूर लेंगे और ब्रिटेन के बाषिन्दे जिस तर्ज पर ईज़ ऑफ लिविंग खोजते हैं उस पर उन्हें खरा भी उतरना होगा। दुनिया की 5वीं अर्थव्यवस्था वाला भारत ब्रिटेन को ही पछाड़ा था। सुनक से ब्रिटेन की जनता आर्थिक विकास के बेहतरीन रोड मैप की अपेक्षा किये हुए है। इसमें कोई दो राय नहीं कि ब्रिटेन जैसे देष में जनता निहायत जागरूक है। वहां बाजार और सरकार दोनों को समझने में कोई गलती नहीं करती है। लिज़ ट्रस ने इन दोनों का भरोसा इतनी जल्दी खो दिया कि सरकार गंवानी पड़ी। वैसे भारत और ब्रिटेन के मध्य मजबूत ऐतिहासिक सम्बंधों के साथ-साथ आधुनिक और परिमार्जित कूटनीतिक सम्बंधा देखे जा सकते हैं। साल 2004 में दोनों देषों के बीच द्विपक्षीय सम्बंधों में रणनीतिक साझेदारी ने विकास का रूप लिया और यह निरंतरता के साथ मजबूत अवस्था को बनाये रखा। हालांकि षेश यूरोप से भी भारत के द्विपक्षीय सम्बंध विगत कई वर्शों से प्रगाढ़ हो गये हैं। बावजूद इसके ब्रिटेन से मजबूत दोस्ती पूरे यूरोप के लिए बेहतरी की अवस्था है क्योंकि यूरोप में व्यापार करने के लिए भारत ब्रिटेन को द्वार समझता है। ऐसे में नई सरकार के साथ भारत की ओर से नई रणनीति और प्रासंगिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर गठजोड़ की एक ऐसी बेजोड़ कवायद करने की आवष्यकता है जहां से भारतीय मूल के ऋशि सुनक के ब्रिटेन में होने का सबसे बेहतर लाभ लिया जा सके। साथ ही दुनिया में भारत की बढ़ती साख को और सषक्त बनाने में मदद मिल सके।

दिनांक : 25/10/2022



डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
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देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
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उद्यमशील सरकार का सुशासनिक परिप्रेक्ष्य

नवीन लोक प्रबंधन के आदर्ष उद्देष्य का वर्णन पूर्व अमेरिकी उपराश्ट्रपति अल गोर की राश्ट्रीय कार्य-प्रदर्षन समीक्षा पर रिपोर्ट ”वह सरकार जिसका काम बेहतर और लागत कम हो“ में किया गया है। गौरतलब है कि नव लोक प्रबंधन जिसमें नागरिक या ग्राहक को केन्द्र में रखा जाता है साथ ही परिणामों के लिए उत्तरदायित्व पर बल दिया जाता है। यह समाज एवं अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को कम करना चाहता है और एक उद्यमषील सरकार की स्थापना से इसका सरोकार जहां कुषलता, अर्थव्यवस्था और प्रभावषीलता तीन लक्ष्य हैं। न्यूजीलैण्ड दुनिया का पहला देष है जिसने नव लोक प्रबंधन को 1990 के दषक में अपनाया। अमेरिका के पूर्व राश्ट्रपति बिल क्लिंटन रीइंवेंटिंग गवर्नमेंट नामक पुस्तक की प्रषंसा में लिखा था कि यह एक ब्लू प्रिंट है इस संदर्भ के चलते नवीन लोक प्रबंधन के आधार को और सषक्तता मिलती है। इसमें कोई दुविधा नहीं कि यह प्रबंधन आसानी से वामपंथ और दक्षिणपंथ की सीमा लांघता है और सुषासन की अवधारणा में अंतर्निहित हो जाता है। सुषासन विष्व बैंक की 1989 की रिपोर्ट ‘फ्रॉम द स्टेट टू मार्केट‘ के अन्तर्गत प्रस्फुटित एक ऐसी विचारधारा है जहां लोक प्रवर्धित अवधारणा को मजबूती मिलती है साथ ही लोक सषक्तिकरण पर बल दिया जाता है। यह एक आर्थिक परिभाशा है और इसमें न्याय का सरोकार निहित है। षासन वही अच्छा जिसका प्रषासन अच्छा होता है और दोनों तब अच्छे होते हैं जब लोक कल्याण होता है और लोक कल्याण कम लागत में अधिक करने की योजना भारत जैसे तीसरी दुनिया के देषों के लिए कहीं अधिक आवष्यक है।
पड़ताल बताती है कि भारत में लोक प्रबंधन के नवीन आयामों में लोक कल्याणकारी व्यय को घटाया गया है मसलन रसोई गैस से हटाई गयी सब्सिडी और ऊपर से लगातार बढ़ती कीमत। लोक उद्यमों का विनिवेष व निजीकरण एवं उनमें समझौता, नवरत्न, महारत्न जैसी श्रेणियां प्रदान करने की प्रविधियां। विकेन्द्रीकरण और निजी निकायों के द्वारा ठेका प्रथा से कार्य करवाना आदि। हालांकि ई-गवर्नेंस को लागू करने वाली गतिविधियों को बढ़ावा नव लोक प्रबंध और सुषासन के चलते ही सम्भव हुआ है। जैसे ई-बैंकिंग, ई-टिकटिंग, ई-सुविधा, ई-अदालत, ई-षिक्षा समेत विभिन्न आयामों में इलेक्ट्रॉनिक पद्धति का समावेषन आदि के चलते सुषासन में निहित पारदर्षिता और खुलेपन को मजबूती मिली है। इतना ही नहीं सरकारी संगठनों का निगमीकरण, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरषिप जैसी तकनीकों पर आगे बढ़ाना नव लोक प्रबंधन के नवीन आयाम ही हैं। साल 1997 का नागरिक अधिकारपत्र, 2005 का सूचना का अधिकार कानून, 2006 में राश्ट्र ई-गवर्नेंस आंदोलन, प्रषासनिक सुधार के लिए आयोगों का गठन, समावेषी व धारणीय विकास पर अमल करने समेत स्मार्ट सिटी और स्मार्ट विलेज आदि विभिन्न परिप्रेक्ष्य भारत में लोक प्रबंध के नये आयाम को ही दर्षाते हैं। दरअसल प्रषासनिक सुधार और सामाजिक परिवर्तन एक-दूसरे से तार्किक सम्बंध रखते हैं। प्रषासनिक सुधार राजनीतिक इच्छाषक्ति का परिणाम होती है। सरकार परिवर्तन और सुधार की दृश्टि से जितना अधिक जन उन्मुख होगी सुषासन उतना अधिक प्रभावी होगा मगर जब सरकारें कुषलता के साथ अर्थव्यवस्था पर तो जो देती हैं मगर जब आम जनमानस में इसकी प्रभावषीलता समावेषी अनुपात में नहीं होती है तो पूंजीवाद का विकास सम्भव होता है।
भारत गांवों का देष है मगर अब बढ़ते षहरों के चलते इसकी पहचान गांव तक ही सिमट कर नहीं रहती। भारत खेत-खलिहानों के साथ-साथ कल-कारखानों से युक्त हो चला है। बीते 75 वर्शों में विकास परत-दर-परत अनवरत बना हुआ है। स्वतंत्रता के बाद संविधान के लागू होने के पष्चात् विकास का प्रषासन व प्रषासनिक विकास समेत सामुदायिक और सामाजिक विकास की अवधारणा साथ हो चली थी। बावजूद इसके समावेषी ढांचे का न जाने क्यों सषक्त निर्माण षायद देने में सफल हो ही नहीं पाये। यही कारण है कि आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, महंगाई, षिक्षा, सड़क, सुरक्षा आदि समेत कई बुनियादी तथ्य भरपूर समाधान से परे हैं। 1991 के उदारीकरण बदलते वैष्विक परिप्रेक्ष्य के साथ भारत में बदलाव की एक नई तारीख बनी। 1992 में समावेषी विकास व सुषासन की धारणा भी मूर्त रूप ली फिर भी बुनियादी विकास, मानव विकास सूचकांक व ईज़ ऑफ लिविंग के मामले में आम जनमानस की जद्दोजहद कम नहीं हो रही है। दो टूक यह भी है कि प्रषासन और जनता के बीच संकुचित दायरे के सम्बंधों ने अब व्यापक आधार ले लिया है और षासन, सुषासन के प्रति तुलनात्मक कहीं अधिक प्रतिबद्धता भी दर्षाती हैं। पड़ताल बताती है कि नवीन लोक प्रबंधन वैष्वीकरण, उदारीकरण के दौर में नौकरषाही को नई दिषा में मोड़ने और उसे नई संरचना देने का भी प्रयास किया है। नव लोक प्रबंधन एक ऐसा परिदृष्य है जिस पर कई उत्प्रेरक तत्वों का प्रभाव पड़ा है। जिसने राज्य को पृश्ठभूमि में रखने मार्केट मैकेनिज्म को प्रमुख रूप से उभारने एवं प्रतियोगिता तथा प्रभावषीलता की जरूरत को समर्थित किया। उक्त तथ्य यह दर्षाते हैं कि भारत जैसे तीसरी दुनिया के देष में प्रतियोगिता नागरिकों को ग्राहक बना देती है और सफल ग्राहक वही है जोे कमाई के साथ मार्केट मैकेनिज्म को अंगीकृत कर सके। भारत में आर्थिक दृश्टि से अनेकों वर्ग हैं जो मार्केट मैकेनिज्म के साथ कदम-से-कदम मिलाने में इनमें से कई अक्षम भी हैं। यह कहना अतार्किक न होगा कि विकासषील देषों का बाजार हो या प्रतियोगिता बड़ी तो हो जाती है मगर मानव संसाधन में समुचित दक्षता और उचित रोजगार की कमी से उक्त मॉडल या तो विफल हो जाता है या फिर जनता असफल हो जाती है। इसी वर्श दो करोड़ मकान देने और किसानों की आमदनी दोगुनी का लक्ष्य भी पूरा होना है। सुषासन की दृश्टि से यह स्थिति कहां है कुछ कहा नहीं जा सकता मगर उद्यमषील सरकार की दृश्टि से इस पर खरा उतरना चाहिए।
सुषासन के मूल्यांकन के भी तीन परत हैं जिसमें मानव विकास सूचकांक, मानव गरीबी सूचकांक इसके हिस्से हैं। यदि यह किसी भी स्तर पर देष में व्याप्त है तो सुषासन को चोटिल करता है और उद्यमषीलता का दम भरने वाली सरकारों पर प्रष्न चिह्न लगाता है। मानव विकास सूचकांक 2021-22 के आंकड़े बताते हैं कि भारत 191 देषों के मुकाबले 132वें स्थान पर है जबकि वैष्विक भूख सूचकांक-2022 में 107वें स्थान पर जो 2021 के 101वें स्थान के मुकाबले कहीं पीछे चला गया। भारत जो विष्व के सबसे बड़े खाद्यान्न भण्डार वाला देष है में विष्व की खाद्य असुरक्षित आबादी का एक-चौथाई हिस्सा मौजूद है। देखा जाये तो खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 के बावजूद भर पेट भोजन कईयों के हिस्से से अभी दूर भी है। इतना ही नहीं खाद्य पदार्थों की कीमत में भी इन दिनों जमकर उछाल लिए हुए है। उक्त संदर्भ नव लोक प्रबंधन और सुषासन दोनों दृश्टि से समुचित नहीं है। नव लोक प्रबंधन उत्तरदायी परिणाम प्रतियोगिता, पारदर्षिता तथा आनुबंधिक सम्बंधों पर आश्रित और इस प्रकार पुराने व्यवस्था से भिन्न है जबकि सुषासन लोक कल्याण, लोक सषक्तिकरण और लोक प्रवर्धित अवधारणा है जो सर्वोदय और अन्त्योदय को समाहित किये हुए है। सवाल यह है कि देष किससे बनता है और किस के साथ चलता है। लोकतंत्र में जनता का षासन होता है और साफ है कि कोई भी जनता समावेषी व बुनियादी विकास से अछूती रहने वाली व्यवस्था देर तक नहीं चलाना चाहेगी।

 दिनांक : 20/10/2022



डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर
देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)
मो0: 9456120502
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नव लोक प्रबंधन और सुशासन

नवीन लोक प्रबंधन के आदर्ष उद्देष्य का वर्णन पूर्व अमेरिकी उपराश्ट्रपति अल गोर की राश्ट्रीय कार्य-प्रदर्षन समीक्षा पर रिपोर्ट ”वह सरकार जिसका काम बेहतर और लागत कम हो“ में किया गया है। गौरतलब है कि नव लोक प्रबंधन जिसमें नागरिक या ग्राहक को केन्द्र में रखा जाता है साथ ही परिणामों के लिए उत्तरदायित्व पर बल दिया जाता है। यह समाज एवं अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को कम करना चाहता है और एक उद्यमषील सरकार की स्थापना से इसका सरोकार जहां कुषलता, अर्थव्यवस्था और प्रभावषीलता तीन लक्ष्य हैं। न्यूजीलैण्ड दुनिया का पहला देष है जिसने नव लोक प्रबंधन को 1990 के दषक में अपनाया। अमेरिका के पूर्व राश्ट्रपति बिल क्लिंटन रीइंवेंटिंग गवर्नमेंट नामक पुस्तक की प्रषंसा में लिखा था कि यह एक ब्लू प्रिंट है इस संदर्भ के चलते नवीन लोक प्रबंधन के आधार को और सषक्तता मिलती है। इसमें कोई दुविधा नहीं कि यह प्रबंधन आसानी से वामपंथ और दक्षिणपंथ की सीमा लांघता है और सुषासन की अवधारणा में अंतर्निहित हो जाता है। सुषासन विष्व बैंक की 1989 की रिपोर्ट ‘फ्रॉम द स्टेट टू मार्केट‘ के अन्तर्गत प्रस्फुटित एक ऐसी विचारधारा है जहां लोक प्रवर्धित अवधारणा को मजबूती मिलती है साथ ही लोक सषक्तिकरण पर बल दिया जाता है। यह एक आर्थिक परिभाशा है और इसमें न्याय का सरोकार निहित है। षासन वही अच्छा जिसका प्रषासन अच्छा होता है और दोनों तब अच्छे होते हैं जब लोक कल्याण होता है और लोक कल्याण कम लागत में अधिक करने की योजना भारत जैसे तीसरी दुनिया के देषों के लिए कहीं अधिक आवष्यक है। इसका मूल कारण यहां आमदनी का अठन्नी होना और खर्चा रूपैया है। यदि यह तर्क असंगत ठहराना है तो यह बात पुख्ता तौर पर सिद्ध करनी होगी कि भारत की आधारभूत संरचना व समावेषी विकास दोनों कार्यात्मक दृश्टि से सर्वोदय को प्राप्त कर लिए हैं।
देखा जाये तो नव लोक प्रबंधन कोई प्रषासनिक सिद्धांत नहीं है और न ही कोई आंदोलन है बल्कि यह दोनों का मिश्रण है जहां हर हाल में बेहतरी की खोज बनी रहती है। जो निजी हित के साथ-साथ पूरे समाज के लिए बेहतर की गुंजाइष पैदा करता है। पड़ताल बताती है कि भारत में लोक प्रबंधन के नवीन आयामों में लोक कल्याणकारी व्यय को घटाया गया है मसलन रसोई गैस से हटाई गयी सब्सिडी और ऊपर से लगातार बढ़ती कीमत। लोक उद्यमों का विनिवेष व निजीकरण एवं उनमें समझौता, नवरत्न, महारत्न जैसी श्रेणियां प्रदान करने की प्रविधियां। विकेन्द्रीकरण और निजी निकायों के द्वारा ठेका प्रथा से कार्य करवाना आदि। हालांकि ई-गवर्नेंस को लागू करने वाली गतिविधियों को बढ़ावा नव लोक प्रबंध और सुषासन के चलते ही सम्भव हुआ है। जैसे ई-बैंकिंग, ई-टिकटिंग, ई-सुविधा, ई-अदालत, ई-षिक्षा समेत विभिन्न आयामों में इलेक्ट्रॉनिक पद्धति का समावेषन आदि के चलते सुषासन में निहित पारदर्षिता और खुलेपन को मजबूती मिली है। इतना ही नहीं सरकारी संगठनों का निगमीकरण, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरषिप जैसी तकनीकों पर आगे बढ़ाना नव लोक प्रबंधन के नवीन आयाम ही हैं। साल 1997 का नागरिक अधिकारपत्र, 2005 का सूचना का अधिकार कानून, 2006 में राश्ट्र ई-गवर्नेंस आंदोलन, प्रषासनिक सुधार के लिए आयोगों का गठन, समावेषी व धारणीय विकास पर अमल करने समेत स्मार्ट सिटी और स्मार्ट विलेज आदि विभिन्न परिप्रेक्ष्य भारत में लोक प्रबंध के नये आयाम को ही दर्षाते हैं। दरअसल प्रषासनिक सुधार और सामाजिक परिवर्तन एक-दूसरे से तार्किक सम्बंध रखते हैं। प्रषासनिक सुधार राजनीतिक इच्छाषक्ति का परिणाम होती है। सरकार परिवर्तन और सुधार की दृश्टि से जितना अधिक जन उन्मुख होगी सुषासन उतना अधिक प्रभावी होगा मगर जब सरकारें कुषलता के साथ अर्थव्यवस्था पर तो जो देती हैं मगर जब आम जनमानस में इसकी प्रभावषीलता समावेषी अनुपात में नहीं होती है तो पूंजीवाद का विकास सम्भव होता है। हालांकि पूंजीवाद के विकास के अनेक और कारण हो सकते हैं। गौरतलब है अर्थव्यवस्था की कई लहर होती है जहां पहली लहर में बाजार मुख्य संस्था होती है वहीं दूसरी लहर प्रतियोगिता के लिए जानी जाती है। अर्थषास्त्र के पिता एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक द वेल्थ ऑफ नेषन जो 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध की है उसमें भी पहली लहर का सरोकार देखा जा सकता है।
भारत गांवों का देष है मगर अब बढ़ते षहरों के चलते इसकी पहचान गांव तक ही सिमट कर नहीं रहती। भारत खेत-खलिहानों के साथ-साथ कल-कारखानों से युक्त हो चला है। बीते 75 वर्शों में विकास परत-दर-परत अनवरत बना हुआ है। स्वतंत्रता के बाद संविधान के लागू होने के पष्चात् विकास का प्रषासन व प्रषासनिक विकास समेत सामुदायिक और सामाजिक विकास की अवधारणा साथ हो चली थी। बावजूद इसके समावेषी ढांचे का न जाने क्यों सषक्त निर्माण षायद देने में सफल हो ही नहीं पाये। यही कारण है कि आज भी गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, महंगाई, षिक्षा, सड़क, सुरक्षा आदि समेत कई बुनियादी तथ्य भरपूर समाधान से परे हैं। 1991 के उदारीकरण बदलते वैष्विक परिप्रेक्ष्य के साथ भारत में बदलाव की एक नई तारीख बनी। 1992 में समावेषी विकास व सुषासन की धारणा भी मूर्त रूप ली फिर भी बुनियादी विकास, मानव विकास सूचकांक व ईज़ ऑफ लिविंग के मामले में आम जनमानस की जद्दोजहद कम नहीं हो रही है। दो टूक यह भी है कि प्रषासन और जनता के बीच संकुचित दायरे के सम्बंधों ने अब व्यापक आधार ले लिया है और षासन, सुषासन के प्रति तुलनात्मक कहीं अधिक प्रतिबद्धता भी दर्षाती हैं। पड़ताल बताती है कि नवीन लोक प्रबंधन वैष्वीकरण, उदारीकरण के दौर में नौकरषाही को नई दिषा में मोड़ने और उसे नई संरचना देने का भी प्रयास किया है। नव लोक प्रबंधन एक ऐसा परिदृष्य है जिस पर कई उत्प्रेरक तत्वों का प्रभाव पड़ा है। जिसने राज्य को पृश्ठभूमि में रखने मार्केट मैकेनिज्म को प्रमुख रूप से उभारने एवं प्रतियोगिता तथा प्रभावषीलता की जरूरत को समर्थित किया। उक्त तथ्य यह दर्षाते हैं कि भारत जैसे तीसरी दुनिया के देष में प्रतियोगिता नागरिकों को ग्राहक बना देती है और सफल ग्राहक वही है जोे कमाई के साथ मार्केट मैकेनिज्म को अंगीकृत कर सके। भारत में आर्थिक दृश्टि से अनेकों वर्ग हैं जो मार्केट मैकेनिज्म के साथ कदम-से-कदम मिलाने में इनमें से कई अक्षम भी हैं। यह कहना अतार्किक न होगा कि विकासषील देषों का बाजार हो या प्रतियोगिता बड़ी तो हो जाती है मगर मानव संसाधन में समुचित दक्षता और उचित रोजगार की कमी से उक्त मॉडल या तो विफल हो जाता है या फिर जनता असफल हो जाती है। जिस देष में 80 करोड़ नागरिकों का सालों-साल सरकार की ओर से दिये गये 5 किलो मुफ्त अनाज पर गुजर-बसर होता हो वहां बाजार और प्रतियोगिता का अर्थ अनसुलझे सवाल की तरह ही है। इसी वर्श दो करोड़ मकान देने और किसानों की आमदनी दोगुनी का लक्ष्य भी पूरा होना है। सुषासन की दृश्टि से यह स्थिति कहां है कुछ कहा नहीं जा सकता मगर उद्यमषील सरकार की दृश्टि से इस पर खरा उतरना चाहिए।
सुषासन के मूल्यांकन के भी तीन परत हैं जिसमें मानव विकास सूचकांक, मानव गरीबी सूचकांक इसके हिस्से हैं। यदि यह किसी भी स्तर पर देष में व्याप्त है तो सुषासन को चोटिल करता है और उद्यमषीलता का दम भरने वाली सरकारों पर प्रष्न चिह्न लगाता है। मानव विकास सूचकांक 2021-22 के आंकड़े बताते हैं कि भारत 191 देषों के मुकाबले 132वें स्थान पर है जबकि वैष्विक भूख सूचकांक-2021 में 101वें स्थान पर। किसी भी देष में बेरोज़गारी कंगाली, बीमारी और गरीबी की जड़ है। इन दिनों भारत में बेरोज़गारी दर रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुकी है। गरीबी उन्मूलन 5वीं पंचवर्शीय योजना से जारी है मगर 27 करोड़ गरीबों से भारत अभी भी अटा हुआ है। हालांकि इस पर आंकड़े अलग तरीके से भी पेष किए जाते रहे हैं। भारत जो विष्व के सबसे बड़े खाद्यान्न भण्डार वाला देष है में विष्व की खाद्य असुरक्षित आबादी का एक-चौथाई हिस्सा मौजूद है। देखा जाये तो खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 के बावजूद भर पेट भोजन कईयों के हिस्से से अभी दूर भी है। इतना ही नहीं खाद्य पदार्थों की कीमत में भी इन दिनों जमकर उछाल लिए हुए है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार गेहूं, आटा, चावल, दाल के साथ-साथ तेल और आलू, प्याज के भाव तेजी से बढ़े हुए है। ताजा उदाहरण यह है कि चावल का भाव 9 अक्टूबर 2022 को 37 रूपए 65 पैसा प्रति किलो था जबकि 11 अक्टूबर को यही 38 रूपए 6 पैसे हो गया था। गेहूं और आटे में भी क्रमषः 30 रूपए 9 पैसे से 30 रूपए 97 पैसे और 35 रूपए से 36 रूपए 26 पैसे की वृद्धि देखी जा सकती है जबकि आलू, प्याज तथा टमाटर की कीमतें भी उछाल के मामले में कमतर नहीं हैं। उक्त संदर्भ नव लोक प्रबंधन और सुषासन दोनों दृश्टि से समुचित नहीं है। नव लोक प्रबंधन उत्तरदायी परिणाम प्रतियोगिता, पारदर्षिता तथा आनुबंधिक सम्बंधों पर आश्रित और इस प्रकार पुराने व्यवस्था से भिन्न है जबकि सुषासन लोक कल्याण, लोक सषक्तिकरण और लोक प्रवर्धित अवधारणा है जो सर्वोदय और अन्त्योदय को समाहित किये हुए है। सवाल यह है कि देष किससे बनता है और किस के साथ चलता है। लोकतंत्र में जनता का षासन होता है और साफ है कि कोई भी जनता समावेषी व बुनियादी विकास से अछूती रहने वाली व्यवस्था देर तक नहीं चलाना चाहेगी। यदि महंगाई, बेरोजगारी तथा जीवन से जुड़े तमाम सुजीवन योग्य व्यवस्थाएं पटरी पर न हों तो भारी मन से यह कहना पड़ता है कि जनता का षासन कहीं जनता पर षासन तो नहीं हो गया। हालांकि जहां सुषासन की बयार की बात हो और उद्यमषील सरकार में संतुलन का भाव व्याप्त हो वहां लोकतंत्र और जनता का षासन ही कायम रहता है।

 दिनांक : 13/10/2022



डॉ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पॉलिसी एंड एडमिनिस्ट्रेशन
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