Tuesday, October 5, 2021

स्टार्टअप इंडिया और सुशासन)

स्टार्टअप इण्डिया अभियान एक राश्ट्रीय भागीदारी और राश्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। भारतीय स्टार्टअप की सफलता की कहानी केवल बिजनेस की सफलता नहीं बल्कि पूरे भारत में हो रहे बदलाव का प्रतीक है। उक्त कथन केन्द्रीय मंत्री पीयूश गोयल का है जिसमें उन्होंने स्टार्टअप इण्डिया के मौजूदा हालात पर अपना एक नजरिया दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि स्टार्टअप-स्टैण्डअप इण्डिया रूपी अभियान का लक्ष्य कहीं अधिक व्यापक है मगर कोविड-19 के दुश्चक्र के चलते नकारात्मकता की ओर भी अग्रसर हुआ। गौरतलब है कि उद्यमषीलता को बढ़ावा देने के उद्देष्य से 5 वर्श पहले 16 जनवरी 2016 को स्टार्टअप इण्डिया स्कीम लाई गयी। हालांकि इसकी घोशणा 15 अगस्त 2015 को लालकिले की प्राचीर से 69वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने की थी और दिसम्बर 2015 में रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात‘ में भी ऐसा ही वादा किया गया था नतीजन यह जनवरी 2016 में दिल्ली के विज्ञान भवन से षुभारम्भ को प्राप्त किया। हालांकि आर्थिक उदारीकरण 1991 से ही देष में आर्थिक बदलाव की बड़ी गौरव-गाथा देखी जा सकती है और स्टार्टअप जैसी योजनाएं दषकों पहले से ही भारत के अर्थ नीति के हिस्से रहे हैं और यही दौर सुषासन की विस्तारवादी सोच को भी धरातल और आकाष देने का बड़ा प्रयास था। सुषासन एक लोक प्रवर्धित विचारधारा है जहां सामाजिक-आर्थिक न्याय को तवज्जो मिलता है। विष्व बैंक की एक आर्थिक परिभाशा से 20वीं सदी के अंतिम दषक में उदित सुषासन की नई परिकल्पना 1992 से ही भारत में देखी जा सकती है जबकि इंग्लैण्ड दुनिया का पहला देष है जिसने आधुनिक सुषासन को पहले राह दिया। उद्यम की प्रगतिषीलता और युवाओं में नवाचार और उद्यम के परिप्रेक्ष्य का विकसित होना सुषासन का निहित एक भाव ही है जो स्टार्टअप इण्डिया को भी स्टैण्डअप इण्डिया की ओर ले जाता है। देष में रोज़गार और नौकरियों के अवसर को बढ़ावा दिये जाने का स्टार्टअप इण्डिया एक बढ़ा प्रयास के रूप में देखा गया। नवाचार से भरी सोच के साथ युवाओं का इसमें आकर्शण होना और सुषासन से भरी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना स्टार्टअप इण्डिया ने उम्मीदों का एक मार्ग भी प्रषस्त किया है।

गौरतलब है कि सुषासन और स्टार्टअप इण्डिया का गहरा नाता है साथ ही न्यू इण्डिया की अवधारणा भी इसमें विद्यमान है। इतना ही नहीं आत्मनिर्भर भारत के पथ को भी यह चिकना बनाने का काम कर सकता है। हुरून इण्डिया फ्यूचर यूनिकाॅर्न लिस्ट 2021 की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय स्टार्टअप कम्पनियों ने जून तिमाही में साढ़े छः अरब डाॅलर का निवेष जुटाया जिसमें स्टार्टअप इकाईयों में निवेष के 160 सौदे हुए जो जनवरी-मार्च की अवधि की तुलना में 2 प्रतिषत अधिक है मगर तिमाही-दर-तिमाही आधार पर यह 71 प्रतिषत की वृद्धि है। गौरतलब है कि कई स्टार्टअप इकाईयां प्रतिश्ठित यूनिकाॅर्न क्लब में षामिल हो गयी हैं। यूनिकाॅर्न का अर्थ है एक अरब डाॅलर से अधिक के मूल्यांकन से है। रिपोर्ट से यह स्पश्ट होता है कि 2021 की दूसरी तिमाही में स्टार्टअप की वृद्धि कहीं अधिक षानदार रही है। हालांकि पिछले साल की रिपोर्ट यह बताती है कि देष में घरेलू यूनिकाॅर्न स्टार्टअप की संख्या 21 थी जबकि चीन में इसकी संख्या 227 थी। मगर चीन में जहां देष से बाहर केवल 16 कारोबार ही थे वहीं इस मामले में भारत की संख्या 40 थी और दुनिया भर में भारतीयों द्वारा स्थापित यूनिकाॅर्न का कुल बाजार मूल्य लगभग 100 अरब डाॅलर देखा गया। आंकड़े यह बताते हैं कि स्टार्टअप के मामले में भारत दुनिया में चैथे स्थान पर है जो अमेरिका, चीन और ब्रिटेन के बाद आता है। नई नौकरियों की उम्मीदों से लदे स्टार्टअप्स भारत जैसे विकासषील देषों के लिये एक बेहतर उपक्रम है। केन्द्रीय मंत्री गोयल कोविड-19 की चुनौतियों के बावजूद भारत में आर्थिक रिवाइवल के स्पश्ट संकेत दिखने की बात कह चुके हैं। निर्यात बढ़ रहा है और एफडीआई प्रवाह सबसे अधिक है। भारतीय उद्योग वास्तव में विकास के रास्ते पर है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इतिहास में पहली बार किसी एक तिमाही में अब तक का सबसे ज्यादा निर्यात हुआ है। गौरतलब है कि वित्त वर्श 2021-22 की पहली तिमाही में 95 अरब डाॅलर का निर्यात हुआ है जो 2019-20 की पहली तिमाही से 18 फीसद ज्यादा है और वित्त वर्श 2020-21 की तुलना में यह 45 प्रतिषत से अधिक है। जाहिर है निर्यात यह संकेत देते हैं कि अंदर हालात पहले जैसे नहीं हैं मगर एक सच यह भी है कि जो हालात पहले बिगड़ चुके हैं अभी भी वे पटरी पर पूरी तरह लौटे नहीं है यह स्टार्टअप्स की स्थिति को देख कर भी समझा जा सकता है। फिलहाल स्टार्टअप पर कोरोना की दूसरी लहर का भी कहर था और हालिया स्थिति यह बताती है कि भारतीय स्टार्टअप ने अपने जुझारू क्षमता का काफी हद तक परिचय भी दिया है। 

कोविड-19 के संक्रमण से देष ग्रसित हुआ और बहुत से स्टार्टअप भी वेंटिलेटर पर चले गये थे। जुलाई-2020 में फिक्की और इण्डियन एंजेल नेटवर्क ने मिलकर 250 स्टार्टअप्स का सेंपल सर्वे किया था और रिपोर्ट निराषा से कहीं अधिक भरी थी। यह समय कोविड की पहली लहर का था। सर्वे से पता चला कि पूरे देष में 12 फीसद स्टार्टअप्स बंद हो चुके थे और 70 फीसद का लाॅकडाउन के चलते कारोबार प्रभावित हुआ था। उस दौर में केवल 22 फीसद के पास अपनी कम्पनियों के लिये 3 से 6 माह का निष्चित लागत खर्च निकालने हेतु नकद भण्डारण उपलब्ध था। इतना ही नहीं 30 फीसद कंपनियों ने यह भी माना कि लाॅकडाउन अधिक लम्बा चला तो कर्मचारियों की छंटनी भी करनी पड़ेगी और उसी सर्वे से यह भी खुलासा हुआ था कि स्टार्टअप्स का 43 फीसद हिस्सा लाॅकडाउन के तीन महीने के भीतर 20 से 40 प्रतिषत अपने कर्मचारियों की वेतन कटौती कर चुके थे। निवेष की जो मौजूदा हालत 2021 की हालिया रिपोर्ट में दिखती है जुलाई 2020 में यह ठीक इसके उलट थी। निवेष के मामले में तब स्टार्टअप की स्थिति बहुत प्रभावित हुई और ऐसा होना अतार्किक नहीं था। जब देष की अर्थव्यवस्था ही बेपटरी हो चली थी तो स्टार्टअप्स बेअसर कैसे रह सकते थे। वैसे स्टार्टअप्स की व्यापारिक चुनौतियां कोरोना से पहले भी रही हैं। मसलन बाजार संरचना, वित्तीय समस्याएं, विनियामक मुद्दे, कराधान साथ ही साईबर सुरक्षा और सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियां आदि। हालांकि सरकार ने उद्यमषीलता को बढ़ावा देने के हेतु इकोसिस्टम को विकसित करने के लिये स्टार्टअप इण्डिया, स्टैण्डअप इण्डिया व स्टार्टअप एक्सचेंज जैसे कई सक्रिय कदम उठाये। गौरतलब है कि सरकार ने बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनी (एनबीएफसी) के सहयोग से अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना षुरू की थी जो गैर काॅरपोरेट, गैर कृशि, एमएसएमई को उनके प्रारम्भिक या विकास चरण में स्टार्टअप इण्डिया ऋण प्रदान करती है पर बड़ा सवाल यह है कि भारत में अधिकतर स्टार्टअप क्यों फेल हो जाते हैं? वर्तमान की बात करें तो अप्रैल 2021 में एक हफ्ते में भारत में 6 स्टार्टअप को यूनिकाॅर्न का तमगा हासिल हुआ। स्टार्टअप्स के मामले में यह भी एक संदर्भ रहा है कि भारत में स्टार्टअप्स फण्डिंग स्कोर करने पर अधिक ध्यान लगाते हैं जबकि ग्राहक की ओर से उनका ध्यान कमजोर हो जाता है। हालांकि फण्डिंग जुटाने की स्पर्धा में ऐसा करना सही है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कम्पनी को बल हमेषा ग्राहकों से मिलता है। स्टार्टअप्स के फेल होने के कई कारणों में एक बड़ा कारण ग्राहक का फिसलना भी है। पिछले साल आईबीएम इंस्टीट्यूट आॅफ बिजनेस वैल्यू और आॅक्सफोर्ड इकोनोमिक्स के अध्ययन से पता चला कि भारत में करीब 90 फीसद स्टार्टअप 5 सालों के भीतर फेल होकर बंद हो जाते हैं। खास यह भी है कि पिछले एक दषक से अधिक समय के बीच भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में अप्रत्याषित बूम भी देखने को मिला है। 

सरकार का हर नियोजन व क्रियान्वयन तथा उससे मिले परिणाम सुषासन की कसौटी होते हैं। स्टार्टअप को भी ऐसी ही कसौटी पर कसना सुषासन को विस्तार देने के समान है। सरल और सहज नियम प्रक्रिया और ईज़ डूइंग कल्चर को बढ़ावा देकर स्टार्टअप्स को बढ़ोत्तरी दी जा सकती है और व्यापक पैमाने पर देष के युवाओं को इस ओर आकर्शित किया जा सकता है। सुषासन एक ऐसी ताकत है जो सबको षांति और खुषी देती है। लेकिन कोरोना का प्रभाव तो ऐसा कि स्टार्टअप फण्डिंग में गिरावट देखने को मिली। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2020 भी 50 फीसद की गिरावट पहले ही दर्ज की जा चुकी थी। इससे पता चलता है कि निवेषकों का विचार स्टार्टअप्स को लेकर स्थायी नहीं बन पाता है या फिर इसकी संख्या तो बढ़ती है मगर गुणवत्ता का अभाव रहता है। राश्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्टार्टअप्स की स्थिति की पड़ताल करें तो पता चलता है कि यहां 2015 में 1657 स्टार्टअप्स स्थापित किये गये थे। 2018 आते-आते इनकी संख्या महज 420 रह गयी और 2019 की स्थिति तो और खराब रही जहां 142 स्टार्टअप्स को ही फण्डिंग प्राप्त हुई। गौरतलब है कि बंगलुरू जो स्टार्टअप्स राजधानी के रूप में जाना जाता है वहां कोविड के चलते कारोबार चैपट हो गया। इतना ही नहीं भारत के स्टार्टअप हब के रूप में बंगलुरू अपना स्थान भी खो दिया। अब यह तमगा एनसीआर गुड़गांव, दिल्ली, नोएडा को मिल गया। हालांकि बंगलुरू, मुम्बई और एनसीआर ने आधुनिक भारत के चेहरे को पूरी तरह बदल दिया है और इन षहरों को प्रसिद्ध ग्लोबल स्टार्टअप हब के तौर पर जाना जाता है। वहीं पुणे, हैदराबाद, अहमदाबाद और कोलकाता जैसे षहरों को उभरते स्टार्टअप हब के तौर पर गिना जा सकता है। फिलहाल स्टार्टअप क्षेत्र में अब एक नई ऊर्जा आ गयी है और कोरोना जितना दूर होगा सुषासन उतना समीप होगा साथ ही कारोबार का मार्ग भी उतना ही सरपट दौड़ेगा। साल 2021 की पहली छमाही में भारत को 15 और यूनिकाॅर्न मिले जो यह दर्षाता है कि हालात बदले हैं। जनवरी 2021 में प्रधानमंत्री द्वारा एक हजार करोड़ के स्टार्टअप इण्डिया सीड फण्ड की घोशणा भी कमजबूती का काम कर सकती है। जाहिर है स्टार्टअप इण्डिया, नवाचार और रोज़गार दोनों का बड़ा आधार है। ऐसे में आत्मनिर्भर भारत और सुषासन से भरे भारत की संभावना भी इसमें निहित देखी जा सकती है।

(दिनांक : 9 सितम्बर, 2021)



डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर

देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)

मो0: 9456120502

ई-मेल: sushilksingh589@gmail.com

तालिबान और शेष दुनिया

अमेरिका यह बात कई बार दोहरा चुका है कि अफगानिस्तान की षान्ति में पाकिस्तान को सबसे अधिक लाभ होगा। साथ ही यह भी कहता रहा है कि अफगानिस्तान की षान्ति प्रक्रिया में पाकिस्तान की अहम भूमिका रहेगी मगर षायद वह समझ नहीं पाया कि पाकिस्तान दो दषक से तालिबान की वापसी का इंतजार कर रहा था। जाहिर है उसकी मुराद पूरी हो गयी है और इस मामले में चीन का साथ भी जग जाहिर है। पाकिस्तान की तालिबान के साथ गलबहियां करके केवल अपना फायदा ही नहीं चाहता बल्कि भारत के नुकसान को भी अपना फायदा ही समझता है। गौरतलब है कि तालिबान में अंतरिम सरकार की घोशणा के बाद दुनिया के किसी भी देष ने इसका खुलकर स्वागत नहीं किया है। अमेरिका ने नई तालिबानी सरकार के कार्यों को आंकने की बात कही जबकि जर्मनी ने तालिबान सरकार के गठन के बाद चिन्ता व्यक्त की। जापान ने भी कहा है कि इनकी गतिविधियों की निगरानी करेगा। रही बात चीन की तो वह तालिबान से एक समावेषी सरकार की अपील की है और पाकिस्तान तो दुनिया को ही नजरिया बदलने की नसीहत दे रहा है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देष न केवल लोकतंत्र के समर्थक हैं बल्कि षान्ति और सद्भावना की मिसाल हैं। ऐसे में अलोकतांत्रिक तरीके से कदमताल करने वाली तालिबानी सरकार भारत न केवल परखेगा, आंकेगा बल्कि उससे होने वाले नुकसान पर भी नजर गड़ा कर रखेगा। 

तालिबान की इस नई सरकार में 14 सदस्य संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् की काली सूची में हैं जाहिर है इससे अंतर्राश्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ना लाज़मी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि तालिबान की सरकार कहीं से और किसी प्रकार से समावेषी नहीं है। इसमें युवा और महिलाओं समेत कई वर्ग विषेश के नेतृत्व का अभाव है। इसमें षामिल कट्टरपंथी चेहरा भारत के लिये भी किसी चुनौती से कम नहीं है। देखा जाये तो हक्कानी की मौजूदगी भारत के लिये बिल्कुल उचित नहीं है। पाकिस्तान की इमरान सरकार के दोनों पैर आईएसआई और वहां की सेना के बीच उलझे रहते हैं। पाकिस्तान में लोकतंत्र भी आमतौर पर हाषिये पर ही रहता है। तालिबान और आईएसआई के गठजोड़ से भारत बेफिक्र नहीं हो सकता और जिस तरह चीन तालिबान को 228 करोड़ रूपए देने का एलान किया है वह भी उसके किसी खास इरादे का प्रदर्षन ही है। आईएसआई तालिबान षासन पर भारत के खिलाफ मुख्यतः कष्मीर में अपना एजेण्डा बढ़ाने का दबाव बना सकता है। हालांकि तालिबान ऐसा करने से पहले सौ बार सोचेगा जरूर क्योंकि उसे पता है कि दुनिया में भारत की क्या एहमियत है और चीन और पाकिस्तान के मामले में क्या स्थिति है। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर तालिबान ने पुराने कट्टरपंथ को अपनाया तो कष्मीर के लिये चुनौती बन सकता है। इतना ही नहीं पाक अधिकृत कष्मीर में चीन इसी तालिबान के सहारे अपनी महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट, वन रोड़ के विस्तारवादी सोच को भी बड़ा रूप दे सकता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि लष्कर-ए-तैयबा और जैष-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन अफगान और पाकिस्तान की सीमा पर अपना खूठा गाड़े हुए है। 

तालिबानियों का दुनिया भर के आतंकी संगठनों से गहरा सम्बंध रहा है और इसका लाभ पाकिस्तान भी लेता रहा है। आईएसआईएस,  हक्कानी नेटवर्क, लष्कर-ए-तैयबा समेत तमाम आतंकी संजाल को तालिबान प्रषिक्षण सहित तमाम सुविधाएं मुहय्या कराता है। पाकिस्तान 40 सालों से अफगानी मुद्दे पर अपनी रोटी सेंकता रहा है। 

(दिनांक : 9 सितम्बर, 2021)


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

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मोबाइल गवर्नेंस की ताकत

सरकार की क्षमता को बेहतर बनाने हेतु सूचना और संचार तकनीक के उपयोग को ई-गवर्नेंस के नाम से परिभाषित करते हैं। इसी ई-गवर्नेंस का एक उप डोमेन मोबाइल गवर्नेंस (एम-गवर्नेंस) जो समावेशी और सतत विकास का एक महत्वपूर्ण जरिया हो गया है। जिसके चलते सुशासन का मार्ग भी और चैड़ा हो रहा है। समावेशी विकास के लिए किसी कुंजी से कम नहीं मोबाइल गवर्नेंस देश में 136 करोड़ से अधिक की जनसंख्या में 120 करोड़ मोबाइल का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि इस बात में पूरी स्पष्टता नहीं है कि कितनों के पास मोबाइल दो या उससे अधिक है लेकिन यह भारी-भरकम आंकड़ा दर्शाता है कि भारत मोबाइल केंद्रित हुआ है। सरकार की योजनाओं की पहुंच का यह एक अच्छा तकनीक व रास्ता भी बना है। गौरतलब है कि ई-गवर्नमेंट के अंतर्गत ही ई-प्रशासन और ई-सेवाएं आती है। इसके अलावा सरकारी सेवाओं के ऑनलाइन प्रावधान ने भी सेवा क्षमता का विकास किया है। जाहिर है यह पारदर्शिता के साथ खुलेपन का पयार्य है। बावजूद इसके भ्रष्टाचार के प्रवेश द्वार पूरी तरह बंद है ऐसा कहना इसलिए कठिन है क्योंकि समावेशी विकास के इस दौर में सभी का सर्वोदय अभी भी संभव नहीं हुआ है जिसके लिए दशकों से प्रयास जारी है। गौरतलब है कि ई-लोकतंत्र समाज के सभी तबकों द्वारा राज्य के अभिशासन में भाग ले सकने की क्षमता के माध्यम से लोकतंत्र के विकास की दिशा में भी सूचना और संचार तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ई-लोकतंत्र पारदर्शिता, दायित्वशीलता और प्रतिभागिता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करता है। मोबाइल शासन के चलते कार्य तेजी से और आसानी से होने लगे है। समावेशी विकास रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा चिकित्सा, बिजली,पानी, रोजगार समेत कई बुनियादी तत्वों से युक्त है जिसकी पहुंच सभी तक हो, ऐसा सुशासन से भरी किसी भी सरकार की यह पहली ड्यूटी है। गौरतलब है कि भारत में साल 2025 तक 90 से अधिक लोग सीधे इंटरनेट से जुड़े जाएंगे जबकि मौजूदा स्थिति में यह आंकड़ा 65 से 70 करोड़ के आसपास है जाहिर है इंटरनेट कनेक्टिविटी मोबाइल गवर्नेंस को और ताकत भरेगा। जिसके चलते सतत और समावेशी विकास के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त करना तुलनात्मक आसान होगा।

प्रत्येक राष्ट्र अपनी जनता और सरकार के साझा मूल्यों द्वारा निर्देशित होता है। राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, गुटनिरपेक्षता, एवं मिश्रित अर्थव्यवस्था भारत के मूल्यों में निहित है। सभी को ईज आफ लिविंग और गरिमामय जीवन का अधिकार है मगर यह बिना सरकार  के भागीरथ प्रयास के संभव नहीं है। भले ही तकनीक इतनी ही मजबूत क्यों ना हो जाए यदि संसाधन पूरे ना हों उद्देश्य पूरे नहीं हो सकते। समावेशी विकास का एक लक्ष्य 2022 तक दो करोड़ घर देने और किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य है। हालांकि यह लक्ष्य समय पर मिलेगा अभी टेढ़ी खीर लगती है क्योंकि पिछले ढेड साल से देश कोरोना से जूझ रहा है। मार्च 2019 तक सरकार का यह लक्ष्य था कि समावेशी विकास को सुनिश्चित करने हेतु 55 हजार से अधिक गांव में मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना जनधन खाते, डेबिट कार्ड, आधार कार्ड, भीम एप्प आदि को जन-जन तक पहुंचाना भी सरकार का ही लक्ष्य था। ताकि लोगों को डिजिटल लेनदेन से जोड़ा जा सके और सारी योजनाओं का सीधा लाभ मिल सके। मोबाइल गवर्नेंस को बाकायदा यहां प्रभावशाली होते देखा जा सकता है। गौरतलब है कि समय समावेशी इंटरनेट सूचकांक 2020 में भारत 46 वें स्थान पर है जिसमें समय के साथ बड़े सुधार की आवश्यकता है ताकि इन गवर्नेंस को और मजबूत किया जा सके। गौरतलब है कि सुशासन के उद्देश्य की पूर्ति में मोबाइल शासन यहां  मात्र एक तकनीक है। भारत के परिप्रेक्ष्य में सुशासन क्या है इसे भी समझना सही रहेगा। दरअसल सुशासन के समक्ष खड़ी केंद्रीय चुनौती का संबंध सामाजिक विकास से है। सुशासन का अपरिहार्य उद्देश्य सामाजिक अवसरों का विस्तार और गरीबी उन्मूलन होना चाहिए। संक्षेप में कहें तो सुशासन का अभिप्राय न्याय, सशक्तिकरण और रोजगार एवं क्षमता पूर्वक सेवा प्रदान सुनिश्चित करने से है। सुशासन अभी विविध प्रकार की चुनौतियों से जकड़ा है मसलन गरीबी, निरक्षरता, पहचान आधारित संघर्ष, क्षेत्रीयता, नक्सलवाद, आतंकवाद इत्यादि कुछ प्रबल चुनौतियां हैं। जो सुशासन को पूरी तरह सक्षम बनने में बाधा उत्पन्न कर रही हैं। इन चुनौतियों के साथ-साथ राजनीति का अपराधीकरण और भ्रष्टाचार भी इसके पथ को खुरदरा बनाए हुए हैं।


भारत सरकार का लक्ष्य मोबाइल फोन की व्यापक पहुंच का उपयोग करना और सार्वजनिक सेवाओं विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में आसान और 24 घंटे पहुंच को सक्षम बनाने व मोबाइल ढांचा के साथ मोबाइल एप्लीकेशन क्षमता का उपयोग बढ़ाकर एम-गवर्नेंस को बड़ा करना।

गौरतलब है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने साल 2012 में मोबाइल गवर्नेंस के लिए रूपरेखा विकसित और अधिसूचित की थी। फिलहाल भारत सरकार के शासन ढांचे का उद्देश्य मोबाइल फोन की विशाल पहुंच का उपयोग करना। जाहिर है मोबाइल गवर्नेंस के कई लाभ हैं, पैसे की बचत, नागरिकों को बेहतर बेहतर सेवाएं, पारदर्शिता, कार्य में शीघ्रता, आसान पहुंच और बातचीत सहित किसी प्रकार का भुगतान व सरकार की योजनाओं की पूरी जानकारी तीव्रता से पहुंच जाती है।  गौरतलब है कि 15 अगस्त 2015 को लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने सुशासन के लिए आईटी के व्यापक इस्तेमाल पर जोर दिया था तब उन्होंने कहा था कि ई- गवर्नेंस आसान, प्रभावी और आर्थिक गवर्नेंस भी है और इससे सुशासन का मार्ग प्रशस्त होता है। जाहिर है एम-गवर्नमेंट ई-गवर्नेंस का उप-डोमेन है जो समावेशी विकास का एक महत्वपूर्ण जरिया तो है। जिसके चलते सुशासन आगे बढ़ा और आगे भी व्यापक बनाया ही नहीं जा सकता बल्कि बल्कि समावेशी विकास की चुनौती को देखते हुए नव लोक प्रबंधन की प्रणाली भी विकसित करना भी आसान होगा। लोक चयन उपागम का भी यह एक मजबूत रास्ता है। डिजिटल गवर्नेंस जितना तेजी से आगे बढ़ेगा भ्रष्टाचार को कमजोरी मिलेगी। हालांकि पारदर्शिता और प्रासंगिकता जहां पर है यह जरूरी नहीं कि वहां अनियमितता पूरी तरह खत्म है। मोबाइल गवर्नेंस एक ऐसी विधा है जिसे जेब का शासन भी कह सकते हैं जो शासन के लिए ही नहीं बल्कि जनमानस के लिए भी सरल सुगम और सहज पथ है।


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

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चीन और तालिबन का गठजोड़

चीन अफगानिस्तान के लोगों का अपने भाग्य और भविश्य का फैसला करने का सम्मान करता है। चीनी विदेष मंत्रालय की ओर से जारी यह वक्तव्य इस बात को पुख्ता करता है कि दोनों के बीच कितना याराना है। इतना ही नहीं यह भी बात हो चुकी है कि चीन अफगानिस्तान में तालिबानियों के साथ दोस्ताना सहयोग विकसित करना चाहता है। गौरतलब है कि जुलाई में तालिबान का एक प्रतिनिधिमण्डल चीन गया था और इसी प्रतिनिधिमण्डल से चीनी विदेष मंत्री वांग यी ने उत्तरी चीन के तिआनजिन में मुलाकात की थी जबकि इस मुलाकात से पहले पाकिस्तान का विदेष मंत्री भी चीन के दौरे पर गया था। ये दोनों मुलाकाते इस बात का प्रमाण है कि चीन दुनिया के लिए कितना घातक देष है जो न केवल आतंकियों का मनोबल बढ़ाता है बल्कि इन पर धन-बल का निवेष कर औरों के लिए एक हथियार खड़ा करता है। पाकिस्तान तालिबान का समर्थन करने वाला एक ऐसा देष है जिसके यहां आतंक की फैक्ट्रियां दषकों से चलती आ रही हैं और चीन ऐसी फैक्ट्रियों को खाद-पानी देने का काम भी करता रहा है। वैसे दुनिया में चीन पाकिस्तान के आतंकियों को लेकर क्या राय रखता है इसका खुलासा संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् में कई बार हो चुका है और इसका झटका कई बार भारत झेल भी चुका है। अब तो तालिबान के साथ उसका गठजोड़ रही सही कोर-कसर को भी पूरी कर देता है। गौरतलब है कि मुलाकात के दौरान तालिबान ने यह भी भरोसा दिलाया था कि वो अफगानिस्तान की जमीन से चीन को कोई नुकसान नहीं होने देगा और चीन तालिबान युद्ध खत्म करने, षान्तिपूर्ण समझौते तक पहुंचने और अफगानिस्तान के पुर्ननिर्माण में एक अहम भूमिका निभाने की बात कह चुका है। यह इस बात के दस्तावेज हैं कि चीन अफगानिस्तान में तालिबानियों की सत्ता की इच्छा पाले हुए था और जिसका साथ देने में पाकिस्तान भी दो कदम आगे था। विध्वंस से भरी ताकतें ऐसे ही बड़ी नहीं होती बल्कि उसके पीछे चीन जैसी ताकतें खड़ी होती हैं। 

29 फरवरी 2020 को जब कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच षान्ति समझौते पर मोहर लगी थी और यह सुनिष्चित हो गया था कि अमेरिका अगले 14 महीने में अफगानिस्तान से अपने सभी सैनिकों को वापस बुला लेगा तब इस करार के दौरान भारत सहित दुनिया के 30 देषों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। हालांकि उस दौरान भी समझौते को लेकर संदेह गहरा हुआ था कि कहीं नाटो की वापसी के साथ तालिबानी एक बार फिर अपना रौद्र रूप न दिखाये। मगर दूसरी तरफ यह भी भरोसा था कि यदि ऐसी नौबत आती है तो जिन 3 लाख अफगानी सैनिकों को अमेरिका ने प्रषिक्षित किया वे 75 हजार तालिबानियों को उखाड़ फेकेंगे मगर सब कुछ उल्टा हो गया। ऐसा क्यों हुआ इसकी कई वजह हैं मगर चीन की प्रेरणा और उकसावे से युक्त तालिबान ने अफगानिस्तान को एक बार फिर बन्दूक की नोक पर काबिज कर लिया। 1996 के बाद यह दूसरी घटना है जब यहां तालिबान की हुकूमत होगी और दुनिया के तमाम देष अफगानिस्तान की इस दुर्दषा पर अफसोस में होंगे मगर चीन तो इसे अपनी लाटरी मान रहा है। चीन के दो मुंहेपन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक ओर जहां उसकी ओर से यह बयान महीनों पहले आ चुका है कि अफगानिस्तान पर अफगान लोगों का अधिकार है उसके भविश्य पर भी अफगान लोगों का अधिकार होना चाहिए और दूसरी तरफ वही चीन अमेरिका और नाटो सेनाओं का जल्दबाजी में वापसी मान रहा है साथ ही फैसले की आलोचना भी कर रहा है और यहां तक कहा कि यह अमेरिकी नीति की असफलता दर्षाता है। 

जाहिर है अफगानिस्तान में तालिबानियों की उपस्थिति दुनिया की विदेष नीति को एक नये सिरे से बदलने का काम करेगी। भारत का दुष्मन चीन और अमेरिका से भी दुष्मनी रखने वाला चीन दक्षिण चीन सागर में अपना दबदबा चाहता है। इन दिनों यहां भी अमेरिका और चीन के बीच तनातनी देखी जा सकती है। 19वीं सदी के मध्य में जब मध्य एषिया पर नियंत्रण के लिए ब्रिटेन और रूस की दुष्मनी जिसे द ग्रेट गेम कहा जाता है तब भी अफगानिस्तान इसका गवाह रहा है। आज के दौर में भी जिस तरह तालिबानियों के बूते चीन षेश दुनिया के साथ गेम खेल रहा है यह भी किसी द ग्रेट गेम से कम नहीं है। एक तरफ अमेरिका के दो दषक के प्रयास के साथ ढ़ाई हजार सैनिकों का खोना और 61 लाख करोड़ रूपए का सिफर नतीजा हो जाना साथ ही भारत समेत सभी को बेचैन करना तो वहीं दूसरी तरफ चीन इसे अपनी बड़ी सफलता समझ रहा है। गौरतलब है कि भारत अफगानिस्तान के साथ मौजूदा समय में एक अरब डाॅलर का व्यापार करता है और तीन बिलियन डाॅलर बीते एक दषक में निवेष कर चुका है। जिनेवा में भारतीय विदेष मंत्री एस जयषंकर ने कहा था कि अफगानिस्तान में भारत 4 सौ प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। जाहिर है अफगानिस्तान में भारत एक व्यापक उद्देष्य के साथ खूबसूरत रास्ता बना रहा था जो पष्चिम एषिया तक जाता है मगर चीन की उकसावे वाली नीति ने सारे सपने मानो तोड़ दिये हों।

चीन की विस्तारवादी नीति और षेश दुनिया को परेषानी में डालने वाला दृश्टिकोण या फिर उसके आर्थिक हितों से जुड़ी दिलचस्पी भले ही तालिबानियों की सत्ता में आने से परवान चढ़े मगर वह इस चिंता से बेफिक्र नहीं हो सकता कि इस्लामिक गुट देर-सवेर और मजबूती लेंगे जिससे उसका घर भी जल सकता है। गौरतलब है कि षिनजियांग में उसके लिये कुछ मुसीबतें हो सकती हैं। पड़ताल बताती है कि अफगानिस्तान जमाने से विदेषी ताकतों के लिए मैदान का जंग रहा है और जोर-आजमाइष चलती रही है। अब इस बार इसमें चीन षुमार है। जाहिर है अफगानिस्तान की नई सरकार चीन को प्राथमिकता देगी और चीन आने वाले कुछ ही दिनों में पुर्ननिर्माण कार्य में निवेष करता भी दिखेगा फिर धीरे-धीरे अपनी ताकत के बूते अफगानिस्तान को भी आर्थिक गुलाम बनायेगा जैसा कि पाकिस्तान में देखा जा सकता है। दक्षिण एषिया में चीन की दखल, आसियान देषों पर चीन का दबदबा और पष्चिम एषिया में भारत की पहुंच को कमजोर करने वाला चीन एक ऐसा छुपा हुआ जहर है जिसे दुनिया जानती तो है मगर फन कुचला जाना मुष्किल हो रहा है। चीन और तालिबान के गठजोड़ से यह जहर बढ़ेगा नहीं ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता। अन्ततः यह कह सकते हैं कि यह एक गम्भीर वक्त है भारत को अपनी कूटनीतिक दषा और दिषा को नये होमवर्क के साथ आगे बढ़ाने की फिर आवष्यकता पड़ गयी है। 

(21 अगस्त, 2021)


 डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर

देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)

मो0: 9456120502

ई-मेल: sushilksingh589@gmail.com

जीएसटी और सुशासन

यदि सुशासन को नाम बड़े और दर्षन छोटे की हकीकत से आगे बढ़ना है तो जरूरी है कि यह नागरिकों की समस्याओं को सुलझाए। भारतीय राजनीति के सामने सुषासन की दिषा में अभी विविध प्रकार की चुनौतियों की भरमार है। आर्थिक चुनौतियां मौजूदा समय में सबसे अधिक विकराल रूप लिए हुए है और कई को पटरी पर लाने की कवायद जारी है मगर इन सबके बीच सुखद पक्ष यह है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में उगाही दर बढ़त बनाये हुए है। जिससे यह तो पता चलता है कि आर्थिक गतिविधियां तुलनात्मक बेहतर हो रही हैं मगर रिज़र्व बैंक के हालिया समीक्षा रिपोर्ट को ध्यान में रखें तो महंगाई के भार से अभी एक साल पीछा नहीं छूटेगा मगर विकास प्राथमिकता में रहेगा। वित्त बगैर ऊर्जा नहीं और ऊर्जा बगैर कुछ नहीं यह ष्लोगन दषकों पहले कहीं पढ़ने को मिला था जो आज के दौर में कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। सुषासन तभी सम्भव कहा जायेगा जब जनहित की समस्याएं निर्मूल हों। समावेषी विकास की राह हो और षान्ति और खुषहाली का बड़ा वातावरण हो और यह तब हो सकता है जब सुषासन हो और सुषासन तभी होगा जब समुचित वित्त होगा। इसी धारा में एक व्यवस्था अप्रत्यक्ष कर जीएसटी है जो आर्थिक इंजन के तौर पर देष में 1 जुलाई, 2017 को परोसी गयी जिसकी चार साल की यात्रा हो चुकी है। सुषासन की दृश्टि से जीएसटी को देखा जाये तो यह बल इकट्ठा करने का एक आर्थिक परिवर्तन था मगर सफलता कितनी मिली यह पड़ताल से जरूर पता चलेगा। हालांकि 24 जुलाई 1991 को जब उदारीकरण एक बड़ा आर्थिक नीति और परिवर्तन का स्वरूप लेकर प्रकट हुआ था तब उम्मीदें भी बहुत थी और कहना गलत न होगा कि 3 दषक पुरानी इस व्यवस्था ने निराष नहीं किया बल्कि इसी दौर के बीच में सुषासन को 1992 में सांस लेने का अवसर मिला जिसकी धड़कन की आवाज कमोबेष आज सुनी और समझी जा सकती है।  

देष में कई सारे अप्रत्यक्ष करों को समाहित कर आज से ठीक 4 साल पहले 1 जुलाई 2017 को एक नया आर्थिक कानून वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुआ था। इस एकल कर व्यवस्था से राज्यों को होने वाले राजस्व कर की भरपाई हेतु पांच साल तक मुआवजा देने का प्रावधान भी इसमें षामिल था जिसके लिए एक कोश बनाया गया जिसका संग्रह 15 फीसद तक के सेस से होता है। नियमसंगतता की दृश्टि से जीएसटी के उक्त संदर्भ सुषासन के समग्रता को परिभाशित करते हैं मगर वक्त के साथ व्याप्त कठिनाईयों ने इस पर सवाल भी खड़ा किये। गौरतलब है कि जीएसटी लागू होने से पहले ही केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच आपस में इस बात पर सहमति का प्रयास किया गया था कि इसके माध्यम से प्राप्त राजस्व में केन्द्र और राज्यों के बीच राजस्व का बंटवारा किस तरह किया जायेगा। ध्यानतव्य हो कि पहले इस तरह के राजस्व का वितरण वित्त आयोग की सिफारिषों के आधार पर किया जाता था। जीएसटी का एक महत्वपूर्ण संदर्भ यह रहा है कि इस प्रणाली के लागू होने से कई राज्य इस आषंका में षामिल रहे हैं कि इनकी आमदनी इससे कम हो सकती है और यह आषंका सही भी है। हालांकि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए केन्द्र ने राज्यों को यह भरोसा दिलाया था कि साल 2022 तक उनके नुकसान की भरपाई की जायेगी। मगर पड़ताल यह बताती है कि बकाया निपटाने के मामले में केन्द्र सरकार पूरी तरह खरी नहीं उतर पा रही है और यह सुषासन की दृश्टि से उतना समुचित नहीं है। समझने वाली बात यह भी है कि पिछले साल दो लाख 35 हजार करोड़ रूपए की राजस्व कमी पर केन्द्र सरकार ने राज्यों को सुझाव दिया था कि वे इस कमी को पूरा करने के लिए उधार लें जिससे राज्यों में सहमति का अभाव देखा जा सकता है। इसी दौरान सरकार ने दो विकल्प सुझाये थे पहला यह कि राज्य सरकारें राजस्व की भरपाई हेतु कुल राजस्व का आधा उधार उठायेंगी और उसके मूल और ब्याज दोनों की अदायगी भविश्य में विलासिता वाली वस्तुओं और अवगुण वाली वस्तुओं पर लगाये जाने वाली क्षतिपूर्ति सेस से की जायेगी। दूसरा विकल्प यह था कि राज्य सरकारें पूरे नुकसान की राषि को उधार लेंगी लेकिन उस परिस्थिति में मूल की अदायगी को क्षतिपूर्ति सेस से की जायेगी मगर ब्याज के बड़े हिस्से की अदायगी उन्हें स्वयं करनी होगी। पहले विकल्प को बीजेपी षासित और उनके गठबंधन वाली सरकारों ने तो स्वीकार किया लेकिन षेश 10 राज्यों ने इसे खारिज किया। केन्द्र-राज्य सम्बंध की दृश्टि से यदि सुषासन को तराजू के दोनों पलड़ों पर रखा जाये तो यहां संघीय ढांचे पर बराबर उतरता दिखाई नहीं देता।

पड़ताल यह बताती है कि वित्तीय सम्बंध के मामले में संघ और राज्य के बीच समय-समय पर कठिनाईयां आती रही हैं। सहकारी संघवाद के अनुकूल ढंाचा की जब भी बात होती है तो यह भरोसा बढ़ाने का प्रयास होता है कि समरसता का विकास हो। आरबीआई के पूर्व गर्वनर डी0 सुब्बाराव ने कहा था कि जिस प्रकार देष का आर्थिक केन्द्र राज्यों की ओर स्थानांतरित हो रहा है उसे देखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में भारत का आर्थिक विकास सहकारी संघवाद पर टिका देखा जा सकता है। गौरतलब है कि संघवाद अंग्रेजी षब्द फेडरेलिज़्म का हिन्दी अनुवाद है और इस षब्द की उत्पत्ति लैटिन भाशा से हुई है जिसका अर्थ समझौता या अनुबंध है। जीएसटी संघ और राज्य के बीच एक ऐसा अनुबंध है जिसे आर्थिक रूप से सहकारी संघवाद कहा जा सकता है मगर जब अनुबंध पूरे न पड़े तो विवाद का होना लाज़मी है और सुषासन को यहीं पर ठेस पहुंचना भी तय है। वित्तीय लेन-देन के मामले में अभी भी समस्या समाधान पूरी तरह नहीं हुआ। जुलाई 2017 में पहली बार जब जीएसटी आया तब इस माह का राजस्व संग्रह 95 हजार करोड़ के आसपास था। धीरे-धीरे गिरावट के साथ यह 80 हजार करोड़ पर भी पहुंचा था और यह उतार-चढ़ाव चलता रहा। जीएसटी को पूरे 4 साल हो गये मगर इन 48 महीनों में बहुत कम अवसर रहे जब यह 1 लाख करोड़ रूपए के आंकड़े को पार किया। कोविड-19 महामारी के चलते अप्रैल 2020 में इसका संग्रह 32 हजार करोड़ तक आकर सिमट गया जबकि दूसरी लहर के बीच अप्रैल 2021 में यह आंकड़ा एक लाख 41 हजार करोड़ का है जो पूरे 4 साल में सर्वाधिक है। हालांकि बीते 8 महीने से जीएसटी का संग्रह एक लाख करोड़ से अधिक का बना हुआ है। मगर जून 2021 में यह 93 हजार पर सिमट गया जबकि जुलाई में यह एक बार फिर एक लाख करोड़ रूपए से कहीं अधिक उछाल के साथ यह बता दिया कि यह घटाव से परे है। एक दौर ऐसा भी था कि दिसम्बर 2019 तक पूरे 30 महीने के दरमियान सिर्फ 9 बार ही अवसर ऐसा था जब जीएसटी का संग्रह एक लाख करोड़ से अधिक हुआ था। जब जीएसटी षुरू हुआ था तब करदाता 66 लाख से थोड़े अधिक थे और आज यह संख्या सवा करोड़ से अधिक हो गया है। जाहिर है अप्रत्यक्ष कर के साथ कई तकनीकी समस्या हो सकती है पर जीएसटी संग्रह का लगातार बढ़ना और करदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि इसके सुषासनिक पक्ष को मजबूती की ओर ही इंगित करता है।

जीएसटी के इस चार साल के कालखण्ड में जीएसटी काउंसिल की 44 बैठकें और हजार से अधिक संषोधन हो चुके हैं। कुछ पुराने संदर्भ को पीछे छोड़ा जाता है तो कुछ नये को आगे जोड़ने की परम्परा अभी भी जारी है। गौरतलब है कि संविधान स्वयं में एक सुषासन की कुंजी है जहां सभी के अधिकार और स्वायत्ता को पहचान मिलती है और यहीं से सभी का कद-काठी भी बड़ा होता है। संघ और राज्य के वित्तीय मामलों में संवैधानिक प्रावधान को भी संविधान में देखा जा सकता है। समझना यहां ठीक रहेगा। अनुच्छेद 275 संसद को इस बात का अधिकार प्रदान करता है कि वह ऐसे राज्यों को उपयुक्त अनुदान देने का अनुबंध कर सकती है जिन्हें संसद की दृश्टि में सहायता की आवष्यकता है। अनुच्छेद 286, 287, 288 और 289 में केन्द्र तथा राज्य सरकारों को एक दूसरे द्वारा कुछ वस्तुओं पर कर लगाने से मना किया गया है। अनुच्छेद 292 व 293 क्रमषः संघ और राज्य सरकारों से ऋण लेने का प्रावधान भी करते हैं। गौरतलब है कि संघ और राज्य के बीच षक्तियों का बंटवारा है संविधान की 7वीं अनुसूची में संघ, राज्य और समवर्ती सूची के अंतर्गत इसे बाकायदा देखा जा सकता है। जीएसटी वन नेषन, वन टैक्स की थ्योरी पर आधारित है जो एकल अप्रत्यक्ष कर संग्रह व्यवस्था है। जिसमें संघ और राज्य आधी-आधी हिस्सेदारी रखते हैं। 80वें संविधान संषोधन अधिनियम 2000 और 88वें संविधान संषोधन अधिनियम 2003 द्वारा केन्द्र-राज्य के बीच कर राजस्व बंटवारे की योजना पर व्यापक परिवर्तन दषकों पहले किया गया था जिसमें अनुच्छेद 268डी जोड़ा गया जो सेवा कर से सम्बंधित था। बाद में 101वें संविधान संषोधन द्वारा नये अनुच्छेद 246ए, 269ए और 279ए को षामिल किया गया तथा अनुच्छेद 268 को समाप्त कर दिया गया। गौरतलब है राज्य व्यापार के मामले में कर की वसूली अनुच्छेद 269ए के तहत केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है जबकि बाद में इसे राज्यों को बांट दिया जाता है। जीएसटी केन्द्र और राज्य के बीच झगड़े की एक बड़ी वजह उसका एकाधिकार होना भी है। क्षतिपूर्ति न होने के मामले में तो राज्य केन्द्र के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात कह चुके हैं। काफी हद तक इसे जीएसटी को महंगाई का कारण भी राज्य मानते हैं। सवाल यह भी है कि वन नेषन, वन टैक्स वाला जीएसटी जब अभी वायदे राज्यों से किये गये वायदे पर पूरी तरह खरा नहीं उतर रहा है तो 2022 के बाद क्या होगा जब क्षतिपूर्ति देने की जिम्मेदारी से केन्द्र मुक्त हो जायेगा। दो टूक यह भी है कि सुषासन, षान्ति का पर्याय है तो जीएसटी वित्त का। यदि वित्त का संदर्भ उचित होगा तो षान्ति समुचित होगी साथ ही संघ और राज्य संतुलित भी रहेंगे तथा सुषासन का कद तुलनात्मक बढ़ा रहेगा। 



डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

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मानसून सत्र का पूरा सच

जब भी सत्र की शुरुआत होती है तब इस बात की सुगबुगाहट जोर पकड़ती है कि क्या देष के नागरिकों की उम्मीदों पर माननीय खरे उतरेंगे। पिछले साल के मानसून सत्र पर कोरोना की काली छाया थी। बावजूद इसके आंकड़े यह बताते हैं कि 167 फीसद कार्य उत्पादकता के साथ लोकसभा ने इतिहास रच दिया था और माना गया कि लोकसभा के किसी भी सत्र में यह उपजाऊ सत्र रहा है। मगर हालिया मानसून सत्र जो 19 जुलाई से प्रारम्भ होकर 11 अगस्त को समाप्ति लिया है उसके हालात काफी अलग और निराष करने वाले रहे हैं। कुल 96 घण्टे काम-काज के लिये तय थे जिसमें 74 घण्टे से अधिक समय तक हंगामा ही रहा। हालांकि अनुमान के मुताबिक 20 विधेयकों को मंजूरी मिली। इस सत्र में 66 तारांकित प्रष्नों के मौखिक उत्तर दिये गये। गौरतलब है कि तारांकित वे प्रष्न होते हैं जिनका उत्तर तत्काल और मौखिक दिया जाता है। 60 प्रतिवेदन स्थायी समितियों द्वारा प्रस्तुत किये गये और 22 मंत्रियों ने वक्तव्य दिये। राज्यसभा की पड़ताल बताती है कि यहां काम-काज के लिए 98 घण्टे निर्धारित थे मगर यहां भी हंगामा लोकसभा से अधिक बरपा है जिसके चलते 76 घण्टे विरोध में चले गये। हालांकि इस बीच यहां 19 बिल पारित हुए जिसमें अंतिम बिल राज्यों को ओबीसी सूची बनाने से जुड़ा विधेयक था। प्रतिषत की दृश्टि से देखें तो लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 28 फीसद काम हुआ है। पूरे सत्र के दौरान कोई ऐसा दिन नहीं था जब हंगामा न हुआ हो और स्पीकर से लेकर सभापति को व्यवस्था बनाये रखने को अतिरिक्त ऊर्जा न लगानी पड़ी हो। सरकार और विपक्ष दो ऐसे संदर्भ हैं जो साथ न रहकर भी हमेषा साथ रहते हैं। मगर बेहद मजबूत सरकार और पिछले सात दषक में सबसे कमजोर विपक्ष के सामने जिस तरह मोदी सरकार बेबस होती है उसे पचाना कठिन हो जाता है। 

गौरतलब है कि पिछले साल 2020 में 14 सितम्बर से 24 सितम्बर के बीच 10 दिवसीय मानसून सत्र में 25 विधेयक पारित किये गये थे साथ ही कई और नये रिकाॅर्ड बने। 21 सितम्बर को तो लोकसभा की उत्पादक क्षमता 234 फीसद आंकी गयी जो अब तक के किसी भी सत्र के एक दिन की कार्यवाही में सर्वाधिक है। इसके पहले 8वीं लोकसभा के तीसरे सत्र में लोकसभा की कार्य उत्पादकता 163 फीसद रही है। हालांकि कोरोना के उस दौर में सत्र को 1 अक्टूबर तक चलना था मगर इसे बीच में ही खत्म कर दिया गया। हंगामा से उक्त सत्र भी खाली नहीं था मगर इस बार जिस तरह समस्यायें बढ़ी हैं उससे लगता है कि सरकार की ओर से कई अच्छे कदम की कमी रही है। लोकतंत्र में हमेंषा सरकार की वाह-वाही को उचित करार नहीं दिया जा सकता और बार-बार विपक्ष को हाषिये पर रखना भी न्यायोचित नहीं होता। सरकार जनहित को सुनिष्चित करती है तो विपक्ष कमी की ओर ध्यान दिलाता है। मगर जब सरकारें विपक्ष को नजरअंदाज करती हैं या अड़ियल रवैया अपनाती हैं या फिर विपक्ष बेवजह राजनीति की फिराक में हो-हंगामा खड़ा करता है तो हर परिस्थिति में नुकसान में जनता ही होती है। संसद सत्र देष की उम्मीद होता है और उम्मीदों को टूटने न देने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा सरकार की होती है। सरकार यह कहकर नहीं बच सकती कि विपक्ष ने कुछ करने नहीं दिया। लोकतंत्र कोई एक पक्षीय व्यवस्था नहीं है बल्कि यह बहुपक्षीय के साथ बहुधारा लिये होती है और इसी के बीच जनता का हित भी होता है जाहिर है सवाल जितने होंगे सरकार की जवाबदेही उतनी ही बढ़ेगी और इससे न केवल संसद के प्रति जनता का भरोसा बढ़ेगा बल्कि सत्र में बहुत कुछ होता दिखेगा भी। हालांकि इस सत्र में हंगामा बरपा जरूर है मगर काम-काज के लिहाज़ से जो बिल पारित हुए हैं उसे देखते हुए स्थिति संतोशजनक ही कही जायेगी। 

कामकाज के लिहाज से देखा जाय तो पहली लोकसभा (1952 से 1957) में 677 बैठकें हुई थी। 5वीं लोकसभा (1971 से 1977) में 613 जबकि 10वीं लोकसभा (1991 से 1996 ) में यह औसत 423 का था। मोदी षासनकाल से पहले 15वीं लोकसभा (2009 से 2014) में 345 दिन ही सदन की बैठक हो पायी। 16वीं लोकसभा की पड़ताल ये बताती है कि यहां बैठकों की कुल अवधि 1615 घण्टे रही लेकिन अतीत की कई लोकसभा के मुकाबले यह घण्टे काफी कम नजर आते हैं। एक दल के बहुमत वाली अन्य सरकारों के कार्यकाल के दौरान सदन में औसत 2689 घण्टे काम में बिताये हैं लेकिन यहां बताना लाज़मी है कि काम इन घण्टों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हालांकि 16वीं लोकसभा में किस तरह काम किया, किस तरह के कानून बनाये, संसदीय लोकतंत्र में कैसी भूमिका थी, क्या सक्रियता रही और लोकतंत्र के प्रति सरकार का क्या नजरिया रहा इन सवालों पर यदि ठीक से रोषनी डाली जाये तो काम के साथ निराषा भी नजर आती है। लोकसभा के उपलब्ध आंकड़े यह बताते हैं कि मोदी षासन के पहले कार्यकाल के दौरान लोकसभा में कुल 135 विधेयक मंजूर कराये गये। जिसमें कईयों को राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिली। हालांकि जीएसटी, तीन तलाक और सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण समेत कई फलक वाले कानून इसी कार्यकाल की देन है। अब 17वीं लोकसभा का दौर जारी है। रिपोर्ट 2024 में मिलेगा। समाप्त मानसून सत्र के अन्तिम दिन राज्यसभा में ओबीसी आरक्षण से जुड़ा 127वां संविधान संषोधन विधेयक 2021 सभी दलों की सर्वसम्मति से पारित हो गया। यह बिल एक बड़े समुदाय को प्रतिबिम्बित करता है जो षायद आने वाले दिनों में 50 फीसद के आरक्षण की सीमा को भी फेरबदल कर सकता है साथ ही भारतीय राजनीति में वोट की दृश्टि से भारयुक्त हो सकता है हालांकि अभी राश्ट्रपति की अनुमति मिलना बाकी है। फिलहाल सत्र में कामकाज के घटते घण्टे और बरपते हंगामों संसद सत्र को बचाने की जिम्मेदारी भी सरकार और विपक्ष दोनों की है। ऐसे में इस वर्श का षीत सत्र कई बकाया को मुकाम देगा साथ ही जनता के हित में कहीं अधिक कारगर होने की उम्मीद रखने में कोई हर्ज नहीं है।

(12 अगस्त, 2021)


 डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

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सुरक्षा परिषद में भारत का कद

वर्तमान में भारत 8वीं बार संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् में स्थायी सदस्य है मगर स्थायी सदस्यता का मामला दषकों से खटाई में है। अमेरिका और रूस समेत दुनिया के तमाम देष स्थायी सदस्यता को लेकर भारत के पक्षधर हैं सिवाय चीन के। दो टूक यह है कि संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् में भारत भले ही स्थायी सदस्य के तौर पर जगह न बना पाया हो मगर उसका कद लगातार बढ़ा हुआ देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी बीते 9 अगस्त को समुद्री सुरक्षा विशय पर इसी सुरक्षा परिशद् की ओर से आयोजित खुली परिचर्चा की अध्यक्षता की। बीते सात दषकों में यह पहला अवसर है जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने ऐसा किया है। गौरतलब है कि दक्षिण चीन सागर में कई देषों के साथ चीन की तनातनी है। दुनिया के तमाम देष इस सागर से व्यापार करते हैं। आसियान और एषिया पेसिफिक के कई देष यहां तक कि अमेरिका और यूरोप समेत विभिन्न देष दक्षिण चीन सागर पर चीन के आधिपत्य को लेकर आपत्ति करते रहे हैं। भारत भी इसका मुखर विरोधी रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने सम्बोधन में समुद्र को अन्तर्राश्ट्रीय व्यापार की जीवन रेखा बताया और विवादों का निपटारा षान्तिपूर्ण तरीके से अन्तर्राश्ट्रीय कानूनों के अनुरूप करने की बात दोहराई। इसमें कोई दुविधा नहीं कि समुद्र एक साझा धरोहर है और कोई देष आधिपत्य जमाये तो यह षेश दुनिया के लिए ठीक नहीं है।

दुनिया का कोई देष जब कद में बड़ा होता है तो उसकी आवाज भी असर डालती है। भारत 1950-51 में पहली बार सुरक्षा परिशद् का अस्थायी सदस्य बना और सिलसिलेवार तरीके से 2021-22 में 8वीं बार यहां स्थापित देखा जा सकता है। हालांकि सुरक्षा परिशद् में परिवर्तन की मांग भी बरसों पुरानी है। परिवर्तन के साथ भारत के कद में बढ़ोत्तरी होना भी लाज़मी है। कई ऐसी वजह हैं जिसकी वजह से भारत स्थायी सदस्यता नहीं प्राप्त कर पा रहा है। इसके पीछे एक बड़ी वजह चीन भी है। साथ ही सुरक्षा परिशद् में 5 स्थायी सदस्यों की ही जगह है। खास यह भी है कि इन पांच में यूरोप का प्रतिनिधित्व सबसे ज्यादा है जबकि आबादी के लिहाज़ से वह बामुष्किल 5 फीसद स्थान घेरता है, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका का कोई सदस्य इसमें स्थायी नहीं है जबकि संयुक्त राश्ट्र का 50 फीसद कार्य इन्हीं से सम्बंधित है। ढांचे में सुधार इसलिए भी होना चाहिए क्योंकि इसमें अमेरिकी वर्चस्व भी दिखता है जबकि पड़ोसी चीन स्थायी सदस्य के तौर पर भारत के खिलाफ अक्सर वीटो का उपयोग करता है जबकि नैसर्गिक मित्र रूस भारत के पक्ष में यहां खड़ा मिलता है। 

भारत का कद संयुक्त राश्ट्र में तब बढ़ेगा जब स्थायी रूप से सदस्यता मिलेगी और भारत इसका हकदार भी है। जनसंख्या की दृश्टि से दूसरा बड़ा देष, प्रगतिषील अर्थव्यवस्था और जीडीपी की दृश्टि से भी प्रमुखता वाले देषों में षामिल रहा है। हालांकि कोरोना काल में हालत ठीक नहीं है और अर्थव्यवस्था तो बेपटरी हो चली है। भारत को विष्व व्यापार संगठन, ब्रिक्स और जी-20 जैसे आर्थिक संगठनों में प्रभावषाली माना जाता है और अब तो जी-7 के विस्तार पर न केवल चर्चा हो रही है बल्कि भारत को भी षामिल करने की बात उठ रही है। अफ्रीकी समूह में 54 देष हैं जो सुरक्षा परिशद् में सुधारों की वकालत करते रहे हैं। यहां से भी मांग है कि कम से कम दो राश्ट्रों को वीटो की षक्ति के साथ स्थायी सदस्यता दी जाये। यदि भारत स्थायी सदस्य होता है तो चीन के चलते जो व्याप्त असंतुलन है उसको पाटने में भी मदद मिलेगी। वैसे संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् में अस्थायी सदस्य बनना भी बढ़े हुए कद का ही प्रमाण होता है क्योंकि इसके लिए भी दुनिया के देषों को अपने पक्ष में रहना जरूरी होता है। गौरतलब है कि अस्थायी सदस्यों का चयन मतदान के जरिये होता है। संयुक्त राश्ट्र के दो-तिहाई वोट हासिल करने वाले देष ही अस्थायी सदस्य चुने जाते हैं। जब पहली बार भारत अस्थायी सदस्य बना था तब कुल 58 वोट की तुलना में उसे 56 वोट मिले थे जबकि हाल की स्थिति में कुल 192 वोट के मुकाबले उसे 184 वोट मिले। पड़ताल बताती है कि भारत सिलसिलेवार तरीके से दो-तिहाई बहुमत नहीं बल्कि तीन-चैथाई बहुमत के साथ अस्थायी सदस्य चुना जाता रहा है मगर स्थायी सदस्यता के आभाव में यहां कद-काठी का और बेहतर होना बाकी है। 

(दिनांक : 12 अगस्त, 2021)


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

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