Wednesday, June 23, 2021

सरकार को संतुलन भरा कदम उठाना ही चाहिए

देश में कोविड-19 की वर्तमान लहर का संक्रमण पहली लहर की तुलना में काफी तेजी से फैला जिससे शासन के हाथ पांव तो फूले ही स्वास्थ्य सुशासन भी हांफता नजर आया। राज्य सरकारें लॉकडाउन और कर्फ्यू की ओर कदम बढ़ाया और कमोबेश ये अभी जारी है। महामारी ने एक बार फिर जनजीवन को अस्त-व्यस्त किया। कोरोनावायरस की लहर ने देश में स्टार्टअप और एमएसएमई यानी छोटे उद्योगों के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया। वैसे देश में 94 फीसद असंगठित क्षेत्र की हालत रोजगार और अर्थिक दृष्टि से बहुत कमजोर हुई है। सर्वे से यह पता चलता है कि देश के स्टार्ट अप और छोटे उद्योगों के पास पूंजी संकट है जिसमें 59 फीसद अगले एक साल में अपना आकार कम करने के लिए भी मजबूर हो जाएंगे। लॉकडाउन के चलते रोजगार से लोगों को हाथ धोना पड़ा, बचत खत्म हो गई और पाई-पाई के मोहताज हो रहे हैं। परिवार को घर चलाने के लिए कर्ज लेने के लिए भी मजबूर होना पड़ रहा है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट को देखें तो  41 करोड़ से अधिक श्रमिक देश में काम करते हैं जिन पर कोरोना का सबसे बड़ा असर पड़ा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि गरीबी 20 फीसद शहरी तो 15 फीसद ग्रामीण इलाकों में बढ़ गई है। कोरोना की दूसरी लहर को देखते हुए तमाम रेटिंग एजेंसियों नेेेे भारत के विकास अनुमान को भी घटा दिया है। गौरतलब है कि पिछले साल देश व्यापी लॉकडाउन के चलते 12 करोड़ से अधिक लोगों की नौकरी खत्म और 20 करोड़ का काम-धंधा बुरी तरह प्रभावित हुआ था। वैसे एक हकीकत यह भी की केरोना ने रोजगार और काम-धंधे को कहीं अधिक चौपट किया है। मसलन फैक्ट्री पर तालाबंदी,  दफ्तर का बंद होना, स्कूल- कॉलेज मेंं पढ़ाई-लिखाई बंद होना व कोचिंग का कारोबार ठप्प होना आदि। नतीजन करोड़ो का घर बैठ जाना, इसमें कमाई कम और खर्च निरंतरता लिए रहता है और आखिरकार चुनौती आर्थिकी खड़ी हो जाती है। इन सब का सीधा असर बैंक से लिए गए ऋण पर भी पड़ रहा है। गौरतलब हैै कि जिन्होंने बैंकों से मकान, दुकान,गाड़ी या स्टार्टअप या छोटा कोई उद्योग शुरू करने के लिए कर्ज लिया था। अब उन्हे  ईएमआई जमा करना मुश्किल हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि 8 करोड़ 54 लाख कर दाताओं में करीब 3 करोड़  के ऑटोमेशन पेमेंट या चेक  बीते अप्रैल में बाउंस हुए है। जबकि मार्च में इसकी प्रतिशत कम थी। बीते एक साल में ऐसी स्थिति जून 2000 में भी आई थी जब 45 फीसद ईएमआई बाउंस कर रहे थे । अभी स्थिति 34 फीसद की है लेकिन जिस तरीके की स्थितियां बनी है उसे देखते हुए कैसे दिए जाएंगे और बैंक अपने को एनपीए होने से कैसे रोक पाएंगे।  


कोरोना की दूसरी लहर को देखते हुए कंपनियों ने ऑफिस और मैनेजमेंट वाली नौकरियां पर रोक लगा दी। कंपनियों का एक दृष्टिकोण यह भी रहा है कि उनकी पहली प्राथमिकता अपने मौजूदा कर्मियों और कारोबार को कोरोनावायरस से बचाना। यही कारण है कि वह विस्तार वाली योजना को ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं। गौरतलब है कि शहर के अधिकांश वाहन कंपनियों के डीलर ने शोरूम भी बंद कर दिये। रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में 26500 शोरूम है महामारी के चलते 20 से 25 हजार करोड़  नुकसान की आशंका बताई जा रही है।  फैक्ट्रियों के उत्पादन पर भी अच्छा खासा प्रभाव पड़ा है। रोजगार की कमी के चलते शहर से गांव की ओर एक बार फिर पलायन तेज हुआ है और मनरेगा में रोजगार के लिए पंजीकरण की मात्रा तुलनात्मक बड़ी है।  इसके चलते मनरेगा में रोजगार के लिए पंजीयन अप्रैल महीने में लगभग 4 करोड़ हो गया था वही मार्च में 3.6 करोड़ श्रमिक मनरेगा में पंजीकृत थे। इतना ही नहीं करोना संक्रमण रोकने के लिए राज्य सरकारें नए प्रतिबंधों  लेकर घोषणाएं करती रहीं । इससे अर्थव्यवस्था का पहिया रुकना लाजमी था। देश का विकास कोरोना की दूसरी लहर में भी बुरी तरह चपेट में आया। अधिकांश बाजार,मॉल, शॉपिंग कंपलेक्स आदि बंद है। बाजार बंद होने से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की जरूरत ही कम हो गई। इससे बेरोजगारी बढ़ी और मानसिक दबाव भी तेजी से बढ़ने लगा। संक्रामक रोगों का सभी पर एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। उन पर भी जो वायरस से प्रभावित नहीं है। इसके एक नहीं अनेक कारण हो सकते है। 2003 में सार्स के प्रकोप के दौरान शोधकर्ताओं ने बीमारी के साथ-साथ आने वाली कई मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं को भी रेखांकित किया था। जिनमें अवसाद,तनाव, और मनोविकृति और पैनिक अटैक शामिल था।

 कोरोनावायरस महामारी ने विश्व भर के करोड़ों लोगों की पूरी दिनचर्या को बिगाड़ कर रख दिया है। तनाव चिंता और घबराहट की परेशानी से दो-चार होना पड़ रहा है। मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्या केवल भारत के लिए नहीं बल्कि अमेरिका और यूरोपीय देशों समेत दुनिया के तमाम देश इसमें शमिल हैं। भारत में भी कोरोनावायरस ने करोड़ों लोगों को अलग-थलग और बेरोजगार किया है डॉक्टर भी चेतावनी देते रहे हैं कि चिंता,  डिप्रेशन और आत्महत्या के मामले बढ़ सकते हैं और देश में मानसिक स्वास्थ्य नए संकट का रूप ले सकता है। गौरतलब है कि 24 मार्च 2020 को देश भर में पहली बार लॉकडाउन लागू किया गया था। इंडियन साइक्रटी सेंटर के एक सर्वे से पता चला था कि लॉकडाउन लागू होने के बाद से मानसिक बीमारी के मामले 20 फीसद बढ़े और हर पांच में से एक भारतीय में इसमे शामिल हो गया। भारत में हाल के दिनों में कई कारणों से मानसिक संकट का खतरा पैदा हो गया है। रोजी-रोटी का छिन जाना, आर्थिक तंगी बढ़ना, अलग-थलग होना और घरेलू हिंसा बढ़ना भी इसमें शामिल है। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम पेश किया था जिसके अंतर्गत सरकारी स्वास्थ्य देखभाल और इलाज के जरिए लोगों का अच्छा मानसिक स्तर सुनिश्चित करने की बात कही गई थी।  

सवाल है कि अब आगे क्या किया जाए ? रोजगार को कैसे पटरी पर लाया जाए और उत्पादन ईकाई समेत बेपटरी हो चुके छोटे-बड़े कामकाज कैसे रफ्तार दी जाए। पहली लहर के दौरान सरकार ने मई 2020 में 20 लाख करोड़ रुपए का एक आर्थिक पैकेज घोषित किया था। अभी इस बार इसकी मुनादी होना बाकी है। वैसे बेरोजगारी का आंकड़ा 2019 में ही 45 साल का रिकॉर्ड तोड़ चुका है। दो टूक यह भी है कि मोदी सरकार रोजगार मामले में उतनी सफल नहीं रही है। सवाल है कि कोरोना के के चलते जो व्यवस्था बिगड़ी है उसमें सरकार को क्या कदम लेना चाहिए। फिलहाल जरूरत अब ऐसे कदमों की है जिसमें खपत का सहारा मिले और उत्पादन में बढ़त्तरी हो। एक बड़ी जरूरत गरीब तबकों को मदद देने की है। उद्द्योगो को आर्थिक पैकेज और अन्य असंगठित क्षेत्र को भी आर्थिक रूप से एक संतुलन विकसित करते हुए कम ब्याज पर उधार या फिर कोई सब्सिडी व आर्थिक पैकेज का ऐलान सरकार को करना चाहिए। ताकि मानसिक विकृति और टूटन में फंसे लोगों का यह सहारा बन सके। इस बात को भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि लघु और कुटीर उद्योगों को पर्याप्त सुविधा मिले और मझोली किस्म की इकाइयां जिसमें रोजगार की मात्रा अधिक है आर्थिक और मानसिक दोनों रूप से बाहर निकालने के लिए एक नया अवसर दिया जाए। मध्यमवर्ग की भी कमर झुकी हुई है उसके लिए सरकार को रास्ता खोजना चाहिए। ताकि वह भी मानसिक व्याधि से बाहर आ सके। समझने वाली बात तो यह भी है कि नागरिक सुशासन का मतलब ईज आफ लिविंग होता है। मगर जब वही जीवन शांति और खुशहाली की राह से भटक कर आर्थिक बदहाली और  मानसिक दुुष्चक्र मेें फंस जाए तो सरकार को संतुलन भरा कदम उठाना ही चाहिए। 
(31 मई , 2021)


 

 डॉ सुशील कुमार सिंह 
वरिष्ठ स्तम्भकार व प्रशासनिक चिन्तक 

Tuesday, June 22, 2021

असल परीक्षा में तो सुशासन

निर्णायक रूप से सुशासन की अवधारणा की रूपरेखा महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गये स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रची गई। शोषणकारी-साम्राज्यवादी,आधुनिक उपनिवेशवादी शक्तियों से भारत के लोगों का सामना होने से उन्हें शासन के एक बेहतर स्वरूप की तलाश करने का अवसर मिला। आधुनिक भारत में यहीं से सुशासन की एक पटकथा सामने आयी। सर्वोदय इसका सबसे बेहतर उदाहरण है जहां से सभी के उदय की संकल्पना और प्रतिबद्धता दिखाई देती है। जब तक समय के आईने में न देखा जाए तब तक सुशासन का कोई भी सिद्धांत बोधगम्य नहीं हो सकता। कोरोना के इस कालखंड के भीतर जनमानस की अग्नि परीक्षा खूब हुई और यह सिलसिला अभी थमा नहीं है।

गौरतलब है कि लॉकडाउन के चलते रोजगार पर गाज गिरी। आर्थिक गतिविधियों बंद होने से जनजीवन पर असर पड़ना लाजिमी है। बीमारी, भुखमरी  शिक्षा और चिकित्सा से लेकर तमाम बुनियादी विकास के साथ सतत, समावेशी और साधारण विकास व समृद्धि के समस्त आयाम हाशिए पर चले गए। यह इस बात का प्रमाण है कि सुशासन एक नई परीक्षा से जूझ रहा है और आगे कई वर्षों तक उसे सब कुछ पटरी पर लाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से जूझना ही पड़गा। हीगल पहले दार्शनिक थे जिन्होंने राज्य और नागरिक समाज के बीच अंतर स्थापित किया और इसे परिभाषित करते हुए कहा कि यह एक ऐसा समाज है जहां मानवीय खुशियों को बढ़ावा दिया जाता है। गौरतलब है कि सुशासन भी शांति और खुशियों को ही आगे बढ़ाता है। लोक विकास की कुंजी सुशासन कोविड-19 के चलते कई झंझावात में उलझा है। और मौजूदा समय में इसकी वास्तविक उपलब्धि क्या है इसका जवाब आसानी से नहीं मिलेगा। मगर दो टूक यह है कि इसका उत्तर कोरोना से मुक्ति और ईज आफ लिविंग है। 

देश में कोविड-19 की वर्तमान लहर का संक्रमण पहली लहर की तुलना में काफी तेजी से फैला जिससे शासन के हाथ पांव तो फूले ही स्वास्थ्य सुशासन भी हांफता नजर आया। राज्य सरकारें लॉकडाउन और कर्फ्यू की ओर कदम बढ़ाया और कमोबेश ये अभी जारी है। महामारी ने एक बार फिर जनजीवन को अस्त-व्यस्त किया। कोरोना महामारी ने भारत के करोड़ों लोगों को गरीबी में धकेल दिया है। लॉकडाउन के चलते रोजगार से लोगों को हाथ धोना पड़ा, बचत खत्म हो गई और पाई-पाई के मोहताज हो रहे परिवार को घर चलाने के लिए कर्ज लेने के लिए भी मजबूर होना पड़ रहा है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट को देखें तो यह पता चलता है कि कोरोना संकट की सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ी है। वैसे एक हकीकत यह भी है कि कई निम्न व मध्यवर्गीय आय वाले भी अब गरीबी की ओर गमन कर चुके हैं। गौरतलब है कि 1.9 डॉलर से अधिक की प्रतिदिन कमाई करने वाला गरीबी रेखा के ऊपर होता है। 10 डॉलर तक की कमाई करने वाला निम्न आय वर्ग का समझा जाता है। जबकि इसके ऊपर मध्यम आय वर्ग है लेकिन यह 50 डॉलर तक जाता है और 50 डालर से अधिक कमाने वाले उच्च आय वर्ग में गिने जाते हैं। मध्यम वर्ग में जो 10 और 20 डालर के बीच है उनकी हालत बहुत पतली है और वह या तो निम्न आय वर्ग की ओर जा रहे हैं गरीब  हो रहे है। प्यू रिसर्च सेंटर से तो यह भी पता चलता कि साल 2011 से 2019 के बीच करीब 6 करोड़ लोग मध्यम आय वर्ग में चले गए थे। करोना काल में तीन करोड़ लोग फिर निम्न आय वर्ग की ओर वापस आ गए। जाहिर  है 10 साल की कोशिश को  एक साल के कोरोनावायरस ने नष्ट कर दिया। रिसर्च से तो यह भी पता चला है कि कि मार्च 2020 से अक्टूबर 2020 के बीच 23 करोड़ गरीब मजदूरों की कमाई 1 दिन की तय न्यूनतम मजदूरी भी नहीं हो पाती थी। 41 करोड़ से अधिक श्रमिक देश में काम करते हैं जिन पर कोरोना का सबसे बुरा असर पड़ा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि गरीबी 20 फीसद  शहरी तो 15 फीसद ग्रामीण इलाकों में बढ़ गई है। कोरोना की दूसरी लहर को देखते हुए तमाम रेटिंग एजेंसियों नेेेे भारत के विकास अनुमान को भी घटा दिया है। गौरतलब है कि पिछले साल देश व्यापी लॉकडाउन के चलते 12 करोड़ से अधिक लोगों की नौकरी खत्म और 20 करोड़ का काम-धंधा  बुरी तरह प्रभावित हुआ।वैसे एक हकीकत यह भी की केरोना ने रोजगार की तुलना मेें काम-धंधे को कहीं अधिक चौपट किया है। मसलन दफ्त दफ्तरों का बंद होना स्कूल- कॉलेज मेंं पढ़ाई-लिखाई बंद होना। कोचिंग का कारोबार ठप्प होना आदि। नतीजन लाखोंं की घर बैठ जाते हैं, इसमें कमाई कम और खर्च निरंतरता लिए रहता है और आखिरकार चुनौती आर्थिकी खड़ी हो जाती है।  यही अन्य देशों के लिए भी कही जा सकती हैहै ठ  र  व्यवस्था को कोरोनावायरस के भंवर जाल में फिर  उलझी। इतना ही नहीं सतत विकास, समावेशी विकास और साधारण विकास समेत कई विकास और समृद्धि के रास्ते जाहिर अब पहले जैसे नहीं रहे। देखा जाए तो समतल होती व्यवस्था उबड़-खाबड़ मार्ग पर है और हिचकोले सुशासन खा रहा है। गौरतलब है कि सुशासन एक जन केंद्रित, कल्याणकारी और संवेदनशील शासन व्यवस्था है। जहां विधि के शासन की स्थापना के साथ-साथ संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। मगर जब जनता में अजीब सी छटपटाहट हो। बुनियादी विकास को लेकर हाहाकार हो। रोटी, कपड़ा व मकान सताओं पर लगे ऐसे में सुशासन बेचारा सा हो जाता है देखा जाए तो परीक्षा जितना देश के नागरिकों की है उससे कहीं अधिक स्वयं सुशासन की है सुशासन के केंद्र में रहने वाला नागरिक जिस सामाजिक आर्थिक विकास की खोज में अभी वह दूर की कौड़ी नजर आती है!
(27 मई , 2021)

सुशील कुमार सिंह 
वरिष्ठ स्तम्भकार 

आईएएस के तर्ज स्वास्थ सेवा !

बदलती परिस्थितियों और परिमार्जित दृष्टिकोण के अंतर्गत देखा जाए तो समय के साथ ढांचा, प्रक्रिया और व्यवहार को बदल लेना ही अच्छा होता है। वर्तमान दौर स्वास्थ्य व  चिकित्सा की दृष्टि से बहुत कठिन कहा जाएगा। चुनौतियां बता रही हैं कि इसके स्वभाव को बदलने का सही वक्त आ गया है। गौरतलब है कि लोक स्वास्थ्य, संविधान की सातवीं अनुसूची में निहित राज्य सूची का विषय है। जिस पर कानून बनाने का जिम्मा राज्यों का है। बावजूद इसके दायित्व की दृष्टि से केंद्र की भूमिका कमतर नहीं होती। बिगड़े हालात में चिकित्सीय व्यवस्था चरमराई है और अलग-अलग राज्यों की अपनी मजबूरियां जनमानस के लिए कठिनाई भी पैदा कर रही है।

यह बात पहले से ही उठनती रही है कि आईएएस की तर्ज पर स्वास्थ्य सेवा कैडर बने। हाल ही में स्वास्थ्य पर बने एक स्वतंत्र आयोग ने सरकार से सिफारिश की है कि समाज और समुदाय तक स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की तरह स्वास्थ्य सेवा को भी विकसित किया जाए। कुछ दिन पहले ही 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष ने स्वास्थ्य को संविधान की समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने की बात कही थी। जाहिर ऐसा होने से केंद्र का प्रभाव लोक स्वास्थ्य पर सीधे तौर पर बड़े पैमाने देखा जा सकेगा। गौरतलब है कि जब कोई विषय समवर्ती सूची में होता है तो उसमें केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं लेकिन असहमति की स्थिति में केंद्र की ही बात अंतिम सत्य होती है। 

अखिल भारतीय स्वरूप देने में इसकी सघनता और स्पष्टता और बढ़ सकती है। विशेषज्ञता का प्रयोग और स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च में बढ़ोतरी भी संभव है। हालांकि वित्त आयोग ने स्वास्थ्य पर साल 2025 तक जीडीपी का 2.5 फीसद खर्च करने की बात कही है। कोरोना को  देखते हुए साल 2021-22 के स्वास्थ्य बजट में 137 फीसद की बढ़ोत्तरी की गई थी। गौरतलब है यदि स्वास्थ्य को अखिल भारतीय रुप दिया जाता है तो इस सेवा के गठन से अस्पतालों और डॉक्टरों की कमी को दूर करना, स्वास्थ्य सुविधाओं का आधारभूत संरचना व दवाइयों की किल्लत से निपटने में आसानी हो सकती है। कुशल व प्रशिक्षक नर्सिंग स्टाफ एवं अन्य सुविधाओं की भारी कमी का निपटान भी संभव है। ध्यानतव्य हो  विश्व स्वास्थ्य संगठन एक हजार जनसंख्या पर एक डॉक्टर की नियुक्ति की बात करता है। जबकि भारत में 11हजार से अधिक लोगों पर एक चिकित्सक है। अंदाजा लगा सकते हैं कि चिकित्सकों की एक बड़ी तादात की कमी है। हॉस्पिटल की संख्या तो कम है उसमें बेड भी सीमित संख्या के साथ अन्य सुविधाएं भी कठिनाई में है। अखिल भारतीय स्वरूप मिलने से बजट की कमी को दूर करना शायद आसान होगा। हालांकि स्वास्थ्य बजट की हालत को देखते हुए उम्मीद कम ही है। 


पड़ताल बताती है कि स्वतंत्रता के पश्चात सबसे पहले देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कैडर गठित करने का सुझाव मुदलियार समिति ने दिया था। समिति ने यह भी कहा था कि स्वास्थ्य कल्याण की समस्या से संबंधित कर्मियों के पास एक समग्र दृष्टिकोण के साथ प्रशासन का अनुभव होना चाहिए। दो दशक के बाद साल 1973 में गठित करतार सिंह कमेटी ने कहा था कि संक्रामक रोग नियंत्रण, निगरानी प्रणाली  डेटा प्रबंधन समिति आदि मामलों में चिकित्सकों को कोई औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है। स्वास्थ्य कैडर के लिए 1997 में पांचवें वेतन आयोग में भी सिफारिश की थी। साल 2017 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में इस बात की वकालत की गई थी। गौरतलब कोरोना महामारी के बीच  मार्च 2021 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की संसदीय समिति ने अनुदान समिति मांगों पर अपनी 126 भी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि आईएएस आईपीएस और आईएफएस की भांति अखिल भारतीय चिकित्सा सेवा के रूप में एक अलग तरह का कैडर गठित किया जाए। समझने वाली बात यह भी है कि स्वतंत्रता से पहले भारतीय चिकित्सा सेवा एक अखिल भारतीय सेवा का रूप रही है। वैसे यह सेवा 1763 में सबसे पहली बार देखने को मिली और यह उस दौर के तीन प्रेसिडेंसी बंगाल, मद्रास और बाम्बे में स्थापित देखे जा सकते हैं। 

दो टूक यह भी है कि स्वास्थ्य और चिकित्सा  संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है मगर यह सरकारों की दृष्टि में मानो कभी प्राथमिकता में रहा ही न हो।
वर्तमान में देश में तीन अखिल भारतीय सेवाएं हैं, भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा एवं वन सेवा जिनके अधिकारी केंद्र सरकार के नियंत्रण में रहते हुए भारत के प्रत्येक राज्य में अपनी सेवाएं देते हैं। जिन्हें अखिल भारतीय सेवा कहते हैं। इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल से देखा जा सकता है। इसमें दो प्रकार की व्यवस्था पाई जाती है एक का कैडर सिस्टम दूसरा अवधि प्रणाली है। केन्द्र द्वारा भर्ती अधिकारियों को राज्य में आवंटित की जाती है। अखिल भारतीय सेवा के महत्व समझाते हुए एडी गोरवाला ने कहा था कि राष्ट्रीय एकता की स्थापना में सेवाएं एक महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। मगर ऐसी सेवाओं पर यह भी आरोप रहा है कि यह राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर होती है। इन सेवाओं में सभी राज्यों का समान प्रतिनिधित्व नहीं है। बाहरी राज्य का व्यक्ति अपनी भाषा संस्कृति तथा मूल्यों से ग्रस्त रहता है। राज्यों की स्वतंत्रता में केंद्र का सीधे हस्तक्षेप होता है। जैसा कि आईएएस आईपीएस और आईएफएस के माध्यम से मौजूदा समय में देखा जा सकता है।

 गौरतलब हो कि अखिल भारतीय सेवाओं की भर्ती संघ लोक सेवा आयोग और नियुक्ति केंद्र द्वारा होती है। जबकि सेवा राज्यों में देते हैं,  राज्य को ऐसे अधिकारियों को अनियमितता के चलते निलम्बन करने की शक्ति तो है मगर पद से हटाने का काम केंद्र का ही होता है। ऐसे में यह शिकायतें आम रहती हैं कि यह केंद्र के अधिकारी हैं और राज्यों के साथ समन्वय स्थापित करने में कठिनाई पैदा करते हैं। हालांकि अखिल भारतीय स्वरूप राष्ट्रीय एकता और सुशासन के उस निर्धारक तथ्य और तर्क के तौर पर प्रस्तुत किया गया है जहां से जनकेंद्रीय, लोक कल्याणकारी, और संवेदनशील शासन व्यवस्था का उदय होता है। गौरतलब है कि सुशासन का केंद्र बिंदु नागरिक है और नागरिकों को स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवा यदि समय पर ना मिले तो जीवन के अधिकार को खतरा पहुंच सकता है  ऐसे में स्वास्थ्य  सुशासन से जुड़े इस संदर्भ को सूझबूझ के साथ देखने की आवश्यकता है कि क्या वाकई में आईएएस के तर्ज पर कैडर विकसित करना स्वास्थ्य सुशासन को मजबूत और पुख्ता करेगा साथ ही जनता को  चिकित्सा का पूरा अधिकार सुविधा मिलेगी।           
(25  मई, 2021)

डॉ. सुशील कुमार सिंह 
निदेशक,  वाईएस रिसर्च फाउंडेशन आफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन

एक ऐसा इम्तिहान जिसमें उत्तीर्ण होना ही विकल्प

 गौरतलब है कि बीते अप्रैल-मई में लगातार तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के चलते देश की स्वास्थ्य प्रणाली चरमरा गई। अस्पतालों में वेंटिलेटर, जीवन रक्षक दवाएं और ऑक्सीजन की भारी किल्लत इन दिनों बाकायदा देखी गई। हलांकि मामले घट रहे हैं पर समस्या ठीक-ठाक पैमाने अभी भी है। भारत में महामारी के अब तक दो बड़ी लहर देखी गई। लेकिन सर्वाधिक संक्रमित और मौत के आंकडे वाले अमेरिका में शुरुआती तीन लहरों ने काफी कहर बरपाया था और चौथी लहर के बाद मामले में तेजी से गिरावट आई। इतना ही नहीं पर्याप्त टीकाकरण के चलते अमेरिका को मास्क की पाबंदी से भी मुक्ति मिलने लगी है। जबकि भारत में अभी इस महामारी की दूसरी लहर का खौफ भरा चित्र बरकरार है साथ ही तीसरी लहर में नौनिहालों को बचाने की कवायद के पशोपेश में सरकार फंसी है। तीसरी लहर कब आएगी ठीक अंदाजा लगाना शायद मुश्किल है। लेकिन अनुमान है कि यह लहर बच्चों के लिए एक बड़ी मुसीबत हो सकती है। गौरतलब है कि जब देश में कोरोना का आगाज हुआ तब किसी को कोई अंदाजा नहीं था कि इससे निपटने के लिए सबसे उचित तरीका क्या है। देश महीनों तक लॉकडाउन में था और सब कुछ बंदी के रास्ते पर चला गया। धीरे-धीरे करोना का विस्तार पूरे देश में और एक लाख के आसपास संक्रमितो की संख्या प्रतिदिन भी हुई और तुलनात्मक मौत का आंकड़ा भी धीरे-धीरे बढा। समय के साथ इस स्थिति से देश शनै:-शनै: बाहर निकलने लगा लेकिन दूसरी लहर में ऐसा कैद हुआ कि देश मौत के सुनामी चला गया। अब तीसरी लहर का अंदेशा है और बाकायदा इसका खुलासा भी किया गया है। ध्यानतव्य हो कि देश के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के.विजय राघवन ने लोगों को महामारी की तीसरी लहर से चेताया है और ऐसा होना निश्चित रूप से कहा गया है। इतना ही नहीं अन्य विशेषज्ञों व स्वास्थ्य अधिकारी भी अब नियमित रूप से लोगों को कोरोनावायरस की तीसरी लहर की संभावना के बारे में आए दिन चेतावनी देते रहते हैं। आशंका को देखते हुए  केंद्र व राज्य सरकारे संक्रमण के कहर से लोगों को बचाने के लिए तैयारियां तो शुरू कर दी मगर तीसरी लहर की स्थिति कहां और कितनी होगी यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा। मगर इस बार यह एक ऐसा इम्तिहान होगा जिसमें सरकार, सिस्टम और समाज के पास उत्तीर्ण होने के अलावा कोई विकल्प नहीं  होगा क्योंकि इस बार कोरोनावायरस की जद् में देश का नौनिहाल बताया जा रहा है।


पिछले सवा साल से एक अदृश्य दुश्मन से लड़ते-लड़ते देश कई समस्याओं में फंसा। करोड़ो इसकी चपेट में आए, लाखों की जान गई,  अर्थव्यवस्था बेपटरी हुई और बेरोजगारी समेत गरीबी में इजाफा हुआ। आंकड़े बताते हैं  कि पहली लहर के दौरान आरटी-पीसीआर टेस्ट में 4 फीसद बच्चे भी पॉजिटिव पाए गए थे। और दूसरी लहर में यह स्थिति 10 फ़ीसदी तक पहुंच गई। कहने का तात्पर्य भले ही तीसरी लहर नौनिहालों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बताया जा रहा हो लेकिन पहली और दूसरी लहर में भी देश में 14 फीसद बच्चे इसके चपेट में आ चुके हैं। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च अर्थात आईसीएमआर कि फरवरी 2021 रिपोर्ट यह बताती है की 25.3 फीसद बच्चों में एंटीबॉडी मौजूद मौजूद थे। एन्टीबाडी इस बात का भी संकेत है कि इतनी मात्रा में बच्चे कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। गौरतलब है कि देश में 30 करोड़ बच्चों की आबादी को तीसरी लहर से कैसे सुरक्षित रखी जाए इसकी कवायद इन दिनों जोरों पर है। जिस प्रकार के अनुमान बताए जा रहे हैं उसके हिसाब से यदि पहली और दूसरी लहर के दौरान कोरोना संक्रमण के आंकड़े और सीरो सर्वे के आंकड़े को मिलाकर देखें तो यह कहा जा सकता है कि 40 फीसद बच्चे कोरोनावायरस के संपर्क में आ चुके हैं जो अपने आप में एक चौकाने वाला आंकड़ा है। आकड़े के लिहाज से देखें तो यह कुल बच्चों का 40 फीसद है। इस हिसाब से 60 फीसद बच्चों पर कोरोना के संक्रमण का ख़तरा हो सकता है। बच्चों को इस महामारी से बचाने के लिए अभी तक कोई वैक्सीन तैयार नहीं की गई है। हालांकि अमेरिका में यह कोशिश जारी होने की बात कही जा रही है। वैसे भारत में टीकाकरण को लेकर हालत काफी खराब है। देश के तमाम राज्यों में 18 से 44 वर्ष उम्र के बीच लगने वाले टीके के लगभग सभी सेंटर बंद हो गए हैं और 45 से अधिक के वैक्सीन की मात्रा पर्याप्त नहीं है। भारत में  टीकाकरण जिस हिसाब चल रहा है  उसमें अभी साल भी लग सकते हैं। ऐसे में बच्चों के टीकाकरण की बात तो दूर की कौड़ी है। जबकि अगली लहर का कहर बच्चों से जुड़ी है ऐसे में वैक्सीनेशन को बढ़ाने और उसके प्रति संजीदगी दिखाने का यही सही वक्त भी है। हालांकि दावा कुछ महीनों का है पर  टीकाकरण हो जाए तो। अब तक की यह तस्वीर भी साफ नहीं है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कोरोना का टीका कब तक बनेगा। कितने बच्चों को टीका दिया जाएगा अगर यह मान भी लें कि कोरोना की तीसरी लहर इस साल अक्टूबर-नवंबर में आ सकती है जैसा कि कहा जा रहा है तो क्या अगले 4-5 महीने में यह सब कुछ हो जाएगा।

बड़ा सवाल यह है कि तीसरी लहर की चपेट में बच्चे क्यों? असल में मत यह भी है कि की बच्चों के अतिरिक्त 18 साल से अधिक उम्र वालों लोगों को  बड़े पैमाने पर टीका की पहली डोज और अन्य को दूसरी डोज दी जा चुकी होगी। ऐसे में वे तुलनात्मक अधिक सुरक्षित होंगे। गौरतलब है कि कोरोना वैक्सीन केवल 16 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों पर ही टेस्ट किया गया है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इससे कम उम्र के बच्चों को वैक्सीन न देने की सलाह दी है। जाहिर है सावधानी और चिकित्सीय सुविधा ही इससे बचने का अंतिम रास्ता होगा। तीसरी लहर से बच्चों को बचाना  सरकार, सिस्टम व समाज के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी। देश की शीर्ष अदालत ने भी केंद्र सरकार से ऑक्सीजन का बफर स्टॉक बनाकर कोरोना की तीसरी लहर की तैयारी को अभी से शुरू करने की बात कही है। अनुभव यह बताता है कि वायरस से बचने के लिए हमारी इम्यूनिटी मजबूत होना बहुत जरूरी है। यदि शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी अच्छी होती है तो बीमारियां कम होगी। मल्टीविटामिन भी हमें मजबूत करती है ताकि शरीर बीमारियों से लड़ सके। ऐसे में बच्चों को कोरोनावायरस से सुरक्षित रखने हेतु स्वास्थ्यवर्धक भोजन,फल और सब्जियां, जूस व अड्डों आदि का भरपूर मात्रा में सेवन की बात भी है। लेकिन जो कमजोर और कुपोषित हैं और जिनके लिए दो वक्त का भोजन मुश्किल है उनका क्या होगा? करोना एक ऐसी बीमारी है जो सांस भी उखाड़ देता है। ऐसे में ऑक्सीजन की किल्लत दवाई की परेशानी और हॉस्पिटल में भर्ती की गुंजाइश में अगर कोई कोताही हुई जैसा कि दूसरी लहर में देखा गया तो यह सभ्य सरकार और सिस्टम दोनों पर तमाचा है। अनुभव यह सिखाता है कि बच्चों के लिए वेंटीलेटर्स, ऑक्सीजन व दवाई से युक्त हास्पिटल को बढ़ावा देना , डॉक्टर्स व स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या में बढ़ोतरी और समय रहते राज्यों द्वारा बच्चों का डेटाबेस तैयार करना साथ ही क्षेत्रीय स्तर पर व्यापक टेस्टिंग और ट्रीटमेन्ट से सुसज्जित व्यवस्था। स्पष्ट है की नौनिहाल सुरक्षित तो देश का भविष्य सुरक्षित ऐसे में कोर कसर की कोई गुंजाइश नही।                                          (24  मई, 2021)

डॉ. सुशील कुमार सिंह 
(वरिष्ठ स्तम्भकार व प्रशासनिक चिन्तक)

जीवन का अधिकार और संविधान

 यद्यपि देश कोरोना की दूसरी लहर के कहर से बाहर निकलने का भरसक प्रयास कर रहा है, बावजूद इसके बीमारी कब नियंत्रण में आयेगी कहना कठिन है। साथ ही तीसरी की संभावना भी व्यक्त की जा रही है। रोजाना लाखों की तादाद में लोंगो का कोरोनावायरस से संक्रमित होना और चार हजार के आसपास प्रतिदिन मौत का आंकड़ा इसकी भयावह स्थिति को दर्शाता है। जिस पैमाने पर लोगों की जान जा रही है यह जीवन के अधिकार को ही मानो हाशिए पर धकेल दिया है। गौरतलब है कि मानव प्रतिष्ठा हमारे संविधान का एक बहुमूल्य आदर्श है और यह आदर्श लोगों के जीवन को संवारता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में अनुच्छेद 21 को एक नया आयाम दिया था। और इसके क्षेत्र को अत्यंत विशाल बनाया और न्यायालय ने कहा था कि प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाए रखते हुए जीने का अधिकार है।


 जाहिर है संविधान जीवन के अधिकार को एक आदर्श स्वरूप दिया है लेकिन आज वही जीवन हाशिए पर है। हालांकि बचाव और रखरखाव के लिए सरकार और समाज की ओर से प्रयास जारी है लेकिन कुछ और प्रयास की आवश्यकता हो सकती है। मसलन जीवन के अधिकार को संबल देने वाले अनुच्छेद 21 के तहत सभी करोना पीड़ितो का सरकारी व गैर सरकारी हॉस्पिटल्स में हर तरीके से मुक्त इलाज किया जाना। इससे ना केवल सभ्यता का ठीक से रखरखाव हो सकेगा बल्कि मानवता को भी ऊंचाई तथा सरकार को भी एक नया प्रतिमान गढने के लिए जाना जायेगा। भारतीय संविधान के भाग 3 के अंतर्गत मूल अधिकारों में पहला मूल अधिकार समता का अधिकार है। अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष सभी बराबर होते हैं जबकि अनुच्छेद 19 में वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है मगर 21 में जीवन संवारने और  गरिमामय जीवन के अधिकार की अनूठी व्यवस्था देखी जा सकती है। 

 यह बात भी गौर से समझने की आवश्यकता है कि कोरोना एक व्यक्ति की नहीं बल्कि परिवार और समाज  के साथ राष्ट्र की समस्या है। ऐसी बीमारी जहां पीड़ितों की संख्या गुणात्मक बढ़त के साथ सुनामी का रूप लिए हुए है वहीं आर्थिकी के दबाव चलते कई इलाज के लिए पैसे के आभाव से भी जूझ रहे होंगे। इतना ही नहीं मनोवैज्ञानिक टूटन के बीच जीवन इन दिनों कई परीक्षा से भी गुजर रहा है। देखा जाए तो समाज में रहने वाला सामाजिक प्राणी कठिनाइयों से जूझ रहा है। एक अनुमान यह भी रहा है कि कोरोना संक्रमितो में केवल 10 फीसद को ही अस्पताल की आवश्यकता पड़ती है। इस लिहाज से भी देखें तो करोना जब से देश में आया है अब तक पीड़ितों की संख्या पौने तीन करोड़ हो चुकी है। स्पष्ट है कि 27-28 लाख लोगों को अस्पताल की आवश्यकता पड़ी होगी। हालांकि आयुष्मान भारत के तहत देश के 20 हजार हॉस्पिटल में मुफ्त इलाज का भी संदर्भ रहा हैं पर इसकी संख्या मामूली हैं। ऐसे में  कोरोनावायरस से पीड़ितो की एक बड़ा हिस्सा इलाज के लिए स्वयं के पैसों पर निर्भर है। गौरतलब है कि रोजगार और कमाई के ख़ात्मे के चलते इलाज करा पाना सभी के लिए आसान तो कत्तई होगा। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआईई) की ओर से जारी रिपोर्ट को देखें तो 16 मई 2021 को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान ग्रामीण बेरोजगारी बीते 1 हफ्ते में दोगुनी उछाल के साथ 14.34 फीसद हो गई है। पिछले हफ्ते में ग्रामीण बेरोजगारी दर 7.29 फीसद थी। इसी दौरान शहर की बेरोजगारी में भी बढ़ोतरी हुई है जो लगभग 11.72 फीसद थी जो अब बढ़कर 14.71 फीसद हो गई है। जब बेरोजगारी एक हफ्ते में दुगनी होगी तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों के कमाई पर इसका क्या असर पड़ रहा होगा। ऐसे में चाहिए कि सरकार बड़ा दिल दिखाएं और कोरोना पीड़ितो के लिए मुफ्त इलाज वाला रास्ता अपनाने में अब देरी ना करें।
(19  मई, 2021))

डॉ सुशील कुमार सिंह

फिलिस्तीन और इज़राइल के बीच कहाँ खड़ा है भारत

गौरतलब है कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच इन दिनों गोलाबारी जारी है। हालाकि कि यह हमला फिलिस्तीन की सेना नहीं बल्कि हमास कर रही है और हमले के मद्देनजर हमास के कई बड़े नेता भूमिगत हो गए । गौरतलब है कि हमास फिलिस्तीनी क्षेत्र का सबसे प्रमुख इस्लामी चरमपंथी संगठन है। 1987 में एक जन आंदोलन के चलते हमास का उदय हुआ था। जिसे दुनिया  आतंकी संगठन के रूप में देखती है। खास यह भी है कि फिलिस्तीन भी इसे आतंकी संगठन ही मानता है। फिलहाल इजरायल अपनी तेज धार और के साथ गाजा पट्टी में भीषण हमला जारी किए हुए। बीते 16 मई को जहां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक थी उस दिन सबसे भीषण हमला भी किया गया। हमले में सैकड़ो फिलिस्तीनी की मौत हो चुकी है जिसमें बच्चों की संख्या भी बहुतायत में है जबकि हजारों की तादाद में लोग घायल हो गए हैं। कमोबेश मरने और घायल होने वालों की संख्या इजराइल में भी देखी जा सकती है। इजरायल और हमास के बीच एक हफ्ते से जारी संघर्ष में 16 मई का हवाई हमला अबतक का सबसे भीषण हमला था। हालाकि अंतरराष्ट्रीय पक्षकार भी दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन मुश्किले बढ़ी हुई हैं। क्षेत्र विशेष में तनाव कम करने के लिए संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद की 16 मई को बैठक भी हुई। गौरतलब है कि पूर्वी यरूशलम में मई की शुरुआत में तनाव तब शुरू हुआ था जब फिलिस्तीनियों ने शेख जर्रा से उन्हें निकाले जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया और इजरायली पुलिस ने अल अक्सा मस्जिद में कार्रवाई की। गाजा पट्टी की स्थिति को लेकर 57 सदस्यीय इस्लामिक सहयोग संगठन की भी 16 मई को ही आपातकालीन डिजिटल बैठक हुई ताकि इजरायली हमले को रोका जा सके। बावजूद इसके मुश्किलें कम होते दिखाई नहीं दे रही हैं और दुनिया के देश इसे लेकर दो गुटों में बटे जरूर दिखते हैं। जिसमें अमेरिका समेत कई यूरोपीय देश जहां इसराइल की ओर हैं वही अरब देश फिलिस्तीन के पक्ष में खड़े हैं। तुर्की का कहना है कि मुस्लिम वर्ल्ड को इजरायल के खिलाफ स्पष्ट फैसला लेना चाहिए। भारत की मुश्किल यह है कि वह इजरायल और फिलिस्तीन दोनों से द्विपक्षीय संबंध रखता है। ऐसे में उसका दृष्टिकोण एकतरफा तो बिल्कुल नहीं  हो सकता। सिर्फ इजरायल और फिलीस्तीन के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए भी मायने भारत का दृष्टिकोण मायने रखता है।


विदित हो कि पूर्वी देश हो या पश्चिमी भारत समय के साथ विभिन्न देशों से संबंध हो गाढ़ा करता रहा है। इसी क्रम में भारत-इजराइल संबंध को भी देखा जा सकता है। गौरतलब है कि 14 जनवरी 2018 को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत की 6 दिवसीय यात्रा की थी जो कई उम्मीदों की भरपाई करने से युक्त दिखाई था। खास यह भी है कि जिस तर्ज पर प्रधानमंत्री मोदी के इजरायल दौरे के दौरान जो जुलाई 2017 में हुआ था उनके समकक्ष ने उनका स्वागत किया था उसी अंदाज को अपनाते हुए प्रधानमंत्री ने प्रोटोकॉल तोड़ते हुए उन्हें गले लगाया था। गौरतलब है कि 1948 को दुनिया के नक्शे में पनपा इजरायल का भारत के साथ कूटनीतिक संबंध महज तीन दशक पुरानी है। हालांकि कई मामलों में सम्बन्धों का संदर्भ पहले से भी देखा जा सकता हैं। मगर कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री कभी भी इजरायल का दौरा नहीं किया। जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री मोदी इजरायल का दौरा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हुए। तब बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा था कि भारत से मेरा दोस्त आया है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य जिस तरह का है वह सकारात्मकता से ओतप्रोत है। भारत,फिलिस्तीन को लेकर भी उतना ही सकारात्मक है जितना कि इजराइल के मामले में। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की दृष्टि से देखें तो इजरायल और फिलिस्तीन के झगड़े पर कई बार यह कह चुके थे कि उनकी सहानुभूति यहूदियों के साथ है लेकिन फिलिस्तीनी क्षेत्र तो अरब के लोगों का ही है और इस विवाद का कोई सैन्य हल नहीं होना चाहिए। जाहिर है ऐसे विचारों से आज का भारत भी अनभिज्ञ नहीं है। शायद यही कारण है कि इन दिनों भारत की स्थिति काफी कुछ चुनौतीपूर्ण तो है। हालांकि बीते 16 मई के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक भारत की ओर से अपना मत बखूबी स्पष्ट कर दिया गया है। जिसका शायद इजरायल के साथ फिलिस्तीन भी कुछ दिनों से इंतजार कर रहा था।

 गौरतलब हो कि नई दिल्ली ने चुप्पी तोड़ते हुए दोनों देशों से शांति बनाए रखने की अपील की है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में इस मुद्दे पर अपना स्पष्ट कर दिया। ध्यानतव्य हो कि भारत इसी साल जनवरी 2021 से 2 साल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्य के रूप में शामिल है। भारत के स्थाई प्रतिनिधि पीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि हम दोनों पक्षों से यथास्थिति  में एकतरफा बदलाव न करने की अपील करते हैं। दोनों को शांति व्यवस्था बनाए रखना की बात कही गई। साथ ही यह भी कहा कि भारत फिलिस्तीन के जायज मांगों का समर्थन करता है और टू नेशन थ्योरी के तहत मामले में हल के लिए वह वचनबद्ध है। इस बात पर भी दृष्टि डाली गई कि इजरायल का यरूशलम भारत के लिए क्या महत्व रखता है। गौरतलब है कि यहां लाखों भारतीय रहते हैं। जाहिर है इजरायल और फिलिस्तीन में विवाद सुलझाने के लिए प्रत्यक्ष और सार्थक बातचीत होनी चाहिए। खास यह भी है कि भारत ने गाजा पट्टी से इजरायल के रिहायशी इलाकों पर होने वाले हमलों की कड़ी निंदा की है। इसी हमले में केरल की सौम्या संतोष की भी मौत हो गई थी। फिलहाल हालिया संदर्भ यह जताता है कि भारत, इजरायल और फिलिस्तीन के बीच वार्ता बहाल करने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने का हर संभव प्रयास करेगा। और जो भारत को करना भी चाहिए। पड़ताल बताती है कि इजरायल निर्माण से लेकर अब तक भारत का इजरायल और फिलिस्तीन के सम्बन्धों में कई मोड़ आए हैं। जाहिर है भारत की टिप्पणी कहीं अधिक संतुलित और सकारात्मक है। ऐसे में हो सकता है इजराइल को अपेक्षा कुछ ज्यादा की हो लेकिन शांति प्रिय देश भारत संयम और संतुलन को बाकायदा जानता है।

देखा जाए तो इजरायल और फिलिस्तीन क्षेत्र का विवाद भारत के आजादी से भी पुराना है और भारत हमेशा से अरब देशों का हिमायती रहा है। भारत की स्वतंत्रता के बाद प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने इजरायल के प्रति महात्मा गांधी के रूख को आगे बढ़ाया। और बीसवीं सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के अनुरोध के बावजूद भारत ने इजरायल के गठन के प्रस्ताव का विरोध किया था। हलाकि सितंबर 1950 में इजराइल को मान्यता भारत ने दे दी । 1962 में जब भारत और चीन का युद्ध हुआ तब तत्कालीन इजरायली प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन को नेहरू ने हथियारों की आपूर्ति का अनुरोध किया। इजरायल की ओर पेशकश मान भी ली गई। मगर भारत ने यह शर्त रखी कि इजरायल समुद्री जहाज से हथियार भेजे और उसका झण्डा जहाज पर ना लगा हो क्योंकि इससे अरब देश नाराज हो जाएंगे। ऐसे में गुरियन ने मना कर दिया। फिलहाल 1971 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध के दौरान भी इजराइल भारत की मदद के लिए सामने आया था और हथियारों का जहाज भेजा था बदले में शर्त राजनीतिक रिश्ते की थी। 1977 में जनता पार्टी की सरकार के दौरान भी इजराइल से संबंध को आगे बढ़ाने की बात आई तब तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था कि 25 अरब देश नाराज हो जाएंगे।  फिलहाल भारत और इजरायल के बीच राजनयिक संबंधों की शुरुआत 29 जनवरी 1992 मानी जाती। पी वी नरसिंह राव उस समय देश के प्रधानमंत्री थे। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारत और इजराइल का सहयोग बड़ा था और शायद यही वजह थी कि साल 2000 में भारत के तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह इजराइल का दौरा किया था। 2004 में मनमोहन सरकार के समय भारत का इजरायल के प्रति रुख संतुलित था और मोदी शासनकाल में संबंध चरम पर पहुंच गया। उक्त संदर्भ  दर्शाते हैं कि भारत का अरब देशों के साथ प्रगाढ़ संबंध तो था तो था मगर इजरायल के साथ भी उसका ताना-बाना था। हालाकि इसके बावजूद भी भारत की विदेश नीति फिलिस्तीनी लोगों के पक्ष में रही।फिलहाल 2014 के बाद इजरायल और फिलीस्तीन के बीच एक बार फिर लंबे युद्ध के आसार बन रहे हैं। एक ओर जहां अमेरिका ने इजरायल का खुला समर्थन किया वहीं दूसरी ओर अरब देश फिलिस्तीन के साथ खड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने मीडिया संस्थानों की इमारत को ध्वस्त करने और मौत को युद्ध का अपराध करार दिया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी गाजा में मृतकों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंता जताई है। जब-जब फिलिस्तीन और इजराइल के बीच इस तरीके की गतिविधियां हुई है नुकसान हमेशा फिलिस्तीन का हुआ है। देखा जाय तो फिलिस्तीन की जमीन हर युद्ध में सिकुड़ जाती है और इजराइल का क्षेत्रफल बढ़ जाता है।                                                                                                                       
 (17 मई, 2021)

सुशील कुमार सिंह 
वरिष्ठ स्तम्भकार 

आर्थिक दुष्चक्र से गुजरता आम जनमानस

धीमा पड़ चुका कोरोना जिस गति से पैर पसार रहा है। वह आम जनजीवन और सभ्यता के लिए एक बड़े खतरे का सूचक है। देश में कोरोना की दूसरी लहर विकराल रूप लिए हुए है। यह जनता की घोर लापरवाही का नतीजा है या फिर सरकार की नीतियों में कमी। फिलहाल इसकी चपेट में देश हैं और इससे निपटने के लिए कर्फ्यू व लॉकडाउन कमोवेश जारी है। साथ ही चिकित्सीय सुविधा पर भी जोर देखा जा सकता है।

 लेकिन हालात इस कदर बेकाबू हैं कि सारी कोशिशे मानो बौनी होती जा रही हैं। दुनिया के देशों ने भी दिल खोल कर भारत को मदद पहुंचाई है मगर देश अभी राहत नहीं महसूस कर रहा है। कोरोनावायरस का साइड इफेक्ट आम जनमानस पर भी आसानी से देखा जा सकता है।  आंकड़े इशारा करते हैं कि कोरोना ने भारत में करोड़ों लोगों को गरीबी में धकेल दिया है और मध्यम वर्ग की कमर टूट रही है। इसकी दूसरी लहर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर भी अपना कहर ढा रही है। सथ ही आम जनजीवन को भी हाशिए पर धकेल दिया है। भारत के विकास को लेकर जारी तमाम रेटिंगस् भी अनुमान से नीचे दिखाई दे रहे हैं साफ है की एक और भारत की अर्थव्यवस्था बेपटरी हुई है तो दूसरी ओर आम जनमानस गरीबी और मुफलिसी की ओर गमन किया है। गौरतलब है की करोना को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन से लाखों श्रमिकों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। पाई-पाई का मोहताज होना पड़ा है और खर्च चलाने के लिए कर्ज लेने के लिए मजबूर भी होना पड़ा। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट पर नजर डालें तो पता चलता है कि कोरोनावायरस की सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ी है। मार्च 2020 से अक्टूबर 2020 के बीच 23 करोड़ गरीब मजदूरों की कमाई न्यूनतम मजदूरी से भी कम देखी गई। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट कि शहरी इलाकों में गरीबी 20 फीसद जबकि ग्रामीण इलाकों में 15 प्रतिशत तक बढ़ी है। दूसरी लहर के बाद गरीबों की स्थिति जमींदोज होने की आशंका भी है। ध्यानतव्य हो कि 41 करोड़ से अधिक श्रमिक देश में काम करते हैं जिन पर कोरोना का इन दिनों कहर बनकर टूटा है। 

अमेरिकी रिसर्च एजेंसी प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़ों पर विश्वास करें तो करोना महामारी के चलते भारत के मध्यम वर्ग खतरे में है। कोरोना काल में आए वित्तीय संकट ने कितनी परेशानी खड़ी की इसका कुछ हिसाब- किताब अब दिखाई देने लगा है। गौरतलब है कि भारत में मिडिल क्लास की पिछले कुछ सालों में बढ़ोतरी हुई थी मगर कोरोना ने करोड़ों को पटरी कर दिया। कोरोना से पहले देश में मध्यम वर्ग की श्रेणी में करीब 10 करोड़ लोग थे अब संख्या घटकर 7 करोड़ से भी कम हो गई है। गौरतलब है कि जिनकी प्रतिदिन आय 50 डालर या उससे अधिक है वे उच्च श्रेणी में आते हैं जबकि प्रतिदिन 10 डालर से 50 डालर तक की कमाई करने वाला मध्यम वर्ग में आता है। खास यह भी है कि चीन की तुलना में भारत के मध्यम वर्ग में अधिक कमी और गरीबी में भी अधिक वृद्धि होने की संभावना देखी जा रही है। साल 2011 से 2019 के बीच करीब 6 करोड़ लोग मध्यम वर्ग की श्रेणी में शामिल हुए थे मगर कोरोना ने एक दशक की इस कूवत को एक दशक में ही आधा रौद दिया। गौरतलब है कि जनवरी 2020 में विश्व बैंक ने भारत और चीन की विकास दर की तुलना की थी जिसमें अनुमान था कि भारत 5.8 फीसद चीन और 5.9 फीसद के स्तर पर रहेगा लेकिन कुछ ही महीने बाद भारत का विकास दर ऋणात्मक स्थिति से साथ भर-भरा गया।कोरोना से बिगड़े आर्थिक हालात को देखते हुए सरकार द्वारा मई 2020 में 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज भी आवंटित किए गए मगर भीषण आर्थिक तबाही का सिलसिला जारी रहा और और मध्यम वर्ग के आर्थिक दुर्दशा के साथ करोड़ों गरीबी में गुजर-बसर के लिए मजबूर हो गये।

गौरतलब है कि काम-धंधे पहले ही बंद हो गए थे, कल कारखानों के ताले अभी खुले नहीं थे कि दूसरी लहर आ गई। गांव से शहर तक रोजी-रोजगार का संकट बरकरार है जाहिर है आर्थिक दुष्चक्र बना रहेगा। पहली लहर में 14 करोड़ लोगों का एक साथ बेरोजगार होना काफी कुछ बयां कर देता है।  करोड़ों की तादाद में यदि मध्यमवर्ग सूची से बाहर होता है तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है। मगर एक यक्ष प्रश्न यह है कि कोरोनावायरस इतनी बड़ी तबाही मचा दी और देश लगातार मुसीबतों को झेलता रहा बावजूद इसके इससे निपटने के बेजोड़ नीति अभी अधूरी क्यों ? एक साल से अधिक समय करोना को आए हो गया। अब दूसरी लहर उफान पर है, जबकि तीसरी लहर की संभावना भी व्यक्त की जा चुकी है। यदि लहर पर लहर आती रही और इसका निस्तारण समय रहते ना हुआ तो इसमें कोई शक नहीं कि देश में गरीबों की तादाद बढ़ेगी। भुखमरी और मुफलिसी के आगोश में करोड़ों समाएंगे और विकास के धुरी पर घूमने वाला भारत आर्थिक दुष्चक्र में फंस कर उलझ सकता है। सुशासन एक आर्थिक परिभाषा है, जहां से कई सवाल उठते भी हैं और समाधान भी प्राप्त करते हैं। हालांकि दौर सवाल उठाने का नहीं है लेकिन समाधान की चिंता जाहिर है रहेगी। अभिशासन के सिद्धांत में इस बात पर जोर दिया गया है कि सुशासन तब होता है जब सरकार अपने व्यय में मितव्ययिता बरतती है, अपनी शक्तियों को कम करती है, विनम्र भूमिका निभाती है और लोक सशक्तिकरण की ओर झुकी होती है। मौजूदा हालात में यह समय की मांग भी है। अब सरकार इस मामले में कितनी खरी उतरती है यह उसे सोचना है और साथ ही जनता को भी यह विचार करना है कि आखिर कोरोना के इस भंवरजाल से कैसे बाहर निकले। सादगी और संजीदगी यही कहती है कि समय रहते दोनों को होश में आ जाना चाहिए ताकि सभ्यता,संस्कृति और देश सभी को आसानी से पटरी पर लाया जा सके।                                                                                                                                       
 (11 मई, 2021)
 
डॉ. सुशील कुमार सिंह 
निदेशक,  वाईएस रिसर्च फाउंडेशन आफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन,  देहरादून 
मोबाइल: 9456120502