देश में कोविड-19 की वर्तमान लहर का संक्रमण पहली लहर की तुलना में काफी तेजी से फैला जिससे शासन के हाथ पांव तो फूले ही स्वास्थ्य सुशासन भी हांफता नजर आया। राज्य सरकारें लॉकडाउन और कर्फ्यू की ओर कदम बढ़ाया और कमोबेश ये अभी जारी है। महामारी ने एक बार फिर जनजीवन को अस्त-व्यस्त किया। कोरोनावायरस की लहर ने देश में स्टार्टअप और एमएसएमई यानी छोटे उद्योगों के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया। वैसे देश में 94 फीसद असंगठित क्षेत्र की हालत रोजगार और अर्थिक दृष्टि से बहुत कमजोर हुई है। सर्वे से यह पता चलता है कि देश के स्टार्ट अप और छोटे उद्योगों के पास पूंजी संकट है जिसमें 59 फीसद अगले एक साल में अपना आकार कम करने के लिए भी मजबूर हो जाएंगे। लॉकडाउन के चलते रोजगार से लोगों को हाथ धोना पड़ा, बचत खत्म हो गई और पाई-पाई के मोहताज हो रहे हैं। परिवार को घर चलाने के लिए कर्ज लेने के लिए भी मजबूर होना पड़ रहा है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट को देखें तो 41 करोड़ से अधिक श्रमिक देश में काम करते हैं जिन पर कोरोना का सबसे बड़ा असर पड़ा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि गरीबी 20 फीसद शहरी तो 15 फीसद ग्रामीण इलाकों में बढ़ गई है। कोरोना की दूसरी लहर को देखते हुए तमाम रेटिंग एजेंसियों नेेेे भारत के विकास अनुमान को भी घटा दिया है। गौरतलब है कि पिछले साल देश व्यापी लॉकडाउन के चलते 12 करोड़ से अधिक लोगों की नौकरी खत्म और 20 करोड़ का काम-धंधा बुरी तरह प्रभावित हुआ था। वैसे एक हकीकत यह भी की केरोना ने रोजगार और काम-धंधे को कहीं अधिक चौपट किया है। मसलन फैक्ट्री पर तालाबंदी, दफ्तर का बंद होना, स्कूल- कॉलेज मेंं पढ़ाई-लिखाई बंद होना व कोचिंग का कारोबार ठप्प होना आदि। नतीजन करोड़ो का घर बैठ जाना, इसमें कमाई कम और खर्च निरंतरता लिए रहता है और आखिरकार चुनौती आर्थिकी खड़ी हो जाती है। इन सब का सीधा असर बैंक से लिए गए ऋण पर भी पड़ रहा है। गौरतलब हैै कि जिन्होंने बैंकों से मकान, दुकान,गाड़ी या स्टार्टअप या छोटा कोई उद्योग शुरू करने के लिए कर्ज लिया था। अब उन्हे ईएमआई जमा करना मुश्किल हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि 8 करोड़ 54 लाख कर दाताओं में करीब 3 करोड़ के ऑटोमेशन पेमेंट या चेक बीते अप्रैल में बाउंस हुए है। जबकि मार्च में इसकी प्रतिशत कम थी। बीते एक साल में ऐसी स्थिति जून 2000 में भी आई थी जब 45 फीसद ईएमआई बाउंस कर रहे थे । अभी स्थिति 34 फीसद की है लेकिन जिस तरीके की स्थितियां बनी है उसे देखते हुए कैसे दिए जाएंगे और बैंक अपने को एनपीए होने से कैसे रोक पाएंगे।
Wednesday, June 23, 2021
सरकार को संतुलन भरा कदम उठाना ही चाहिए
Tuesday, June 22, 2021
असल परीक्षा में तो सुशासन
निर्णायक रूप से सुशासन की अवधारणा की रूपरेखा महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गये स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रची गई। शोषणकारी-साम्राज्यवादी,आधुनिक उपनिवेशवादी शक्तियों से भारत के लोगों का सामना होने से उन्हें शासन के एक बेहतर स्वरूप की तलाश करने का अवसर मिला। आधुनिक भारत में यहीं से सुशासन की एक पटकथा सामने आयी। सर्वोदय इसका सबसे बेहतर उदाहरण है जहां से सभी के उदय की संकल्पना और प्रतिबद्धता दिखाई देती है। जब तक समय के आईने में न देखा जाए तब तक सुशासन का कोई भी सिद्धांत बोधगम्य नहीं हो सकता। कोरोना के इस कालखंड के भीतर जनमानस की अग्नि परीक्षा खूब हुई और यह सिलसिला अभी थमा नहीं है।
आईएएस के तर्ज स्वास्थ सेवा !
बदलती परिस्थितियों और परिमार्जित दृष्टिकोण के अंतर्गत देखा जाए तो समय के साथ ढांचा, प्रक्रिया और व्यवहार को बदल लेना ही अच्छा होता है। वर्तमान दौर स्वास्थ्य व चिकित्सा की दृष्टि से बहुत कठिन कहा जाएगा। चुनौतियां बता रही हैं कि इसके स्वभाव को बदलने का सही वक्त आ गया है। गौरतलब है कि लोक स्वास्थ्य, संविधान की सातवीं अनुसूची में निहित राज्य सूची का विषय है। जिस पर कानून बनाने का जिम्मा राज्यों का है। बावजूद इसके दायित्व की दृष्टि से केंद्र की भूमिका कमतर नहीं होती। बिगड़े हालात में चिकित्सीय व्यवस्था चरमराई है और अलग-अलग राज्यों की अपनी मजबूरियां जनमानस के लिए कठिनाई भी पैदा कर रही है।
एक ऐसा इम्तिहान जिसमें उत्तीर्ण होना ही विकल्प
गौरतलब है कि बीते अप्रैल-मई में लगातार तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के चलते देश की स्वास्थ्य प्रणाली चरमरा गई। अस्पतालों में वेंटिलेटर, जीवन रक्षक दवाएं और ऑक्सीजन की भारी किल्लत इन दिनों बाकायदा देखी गई। हलांकि मामले घट रहे हैं पर समस्या ठीक-ठाक पैमाने अभी भी है। भारत में महामारी के अब तक दो बड़ी लहर देखी गई। लेकिन सर्वाधिक संक्रमित और मौत के आंकडे वाले अमेरिका में शुरुआती तीन लहरों ने काफी कहर बरपाया था और चौथी लहर के बाद मामले में तेजी से गिरावट आई। इतना ही नहीं पर्याप्त टीकाकरण के चलते अमेरिका को मास्क की पाबंदी से भी मुक्ति मिलने लगी है। जबकि भारत में अभी इस महामारी की दूसरी लहर का खौफ भरा चित्र बरकरार है साथ ही तीसरी लहर में नौनिहालों को बचाने की कवायद के पशोपेश में सरकार फंसी है। तीसरी लहर कब आएगी ठीक अंदाजा लगाना शायद मुश्किल है। लेकिन अनुमान है कि यह लहर बच्चों के लिए एक बड़ी मुसीबत हो सकती है। गौरतलब है कि जब देश में कोरोना का आगाज हुआ तब किसी को कोई अंदाजा नहीं था कि इससे निपटने के लिए सबसे उचित तरीका क्या है। देश महीनों तक लॉकडाउन में था और सब कुछ बंदी के रास्ते पर चला गया। धीरे-धीरे करोना का विस्तार पूरे देश में और एक लाख के आसपास संक्रमितो की संख्या प्रतिदिन भी हुई और तुलनात्मक मौत का आंकड़ा भी धीरे-धीरे बढा। समय के साथ इस स्थिति से देश शनै:-शनै: बाहर निकलने लगा लेकिन दूसरी लहर में ऐसा कैद हुआ कि देश मौत के सुनामी चला गया। अब तीसरी लहर का अंदेशा है और बाकायदा इसका खुलासा भी किया गया है। ध्यानतव्य हो कि देश के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के.विजय राघवन ने लोगों को महामारी की तीसरी लहर से चेताया है और ऐसा होना निश्चित रूप से कहा गया है। इतना ही नहीं अन्य विशेषज्ञों व स्वास्थ्य अधिकारी भी अब नियमित रूप से लोगों को कोरोनावायरस की तीसरी लहर की संभावना के बारे में आए दिन चेतावनी देते रहते हैं। आशंका को देखते हुए केंद्र व राज्य सरकारे संक्रमण के कहर से लोगों को बचाने के लिए तैयारियां तो शुरू कर दी मगर तीसरी लहर की स्थिति कहां और कितनी होगी यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा। मगर इस बार यह एक ऐसा इम्तिहान होगा जिसमें सरकार, सिस्टम और समाज के पास उत्तीर्ण होने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा क्योंकि इस बार कोरोनावायरस की जद् में देश का नौनिहाल बताया जा रहा है।
जीवन का अधिकार और संविधान
यद्यपि देश कोरोना की दूसरी लहर के कहर से बाहर निकलने का भरसक प्रयास कर रहा है, बावजूद इसके बीमारी कब नियंत्रण में आयेगी कहना कठिन है। साथ ही तीसरी की संभावना भी व्यक्त की जा रही है। रोजाना लाखों की तादाद में लोंगो का कोरोनावायरस से संक्रमित होना और चार हजार के आसपास प्रतिदिन मौत का आंकड़ा इसकी भयावह स्थिति को दर्शाता है। जिस पैमाने पर लोगों की जान जा रही है यह जीवन के अधिकार को ही मानो हाशिए पर धकेल दिया है। गौरतलब है कि मानव प्रतिष्ठा हमारे संविधान का एक बहुमूल्य आदर्श है और यह आदर्श लोगों के जीवन को संवारता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में अनुच्छेद 21 को एक नया आयाम दिया था। और इसके क्षेत्र को अत्यंत विशाल बनाया और न्यायालय ने कहा था कि प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाए रखते हुए जीने का अधिकार है।
फिलिस्तीन और इज़राइल के बीच कहाँ खड़ा है भारत
गौरतलब है कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच इन दिनों गोलाबारी जारी है। हालाकि कि यह हमला फिलिस्तीन की सेना नहीं बल्कि हमास कर रही है और हमले के मद्देनजर हमास के कई बड़े नेता भूमिगत हो गए । गौरतलब है कि हमास फिलिस्तीनी क्षेत्र का सबसे प्रमुख इस्लामी चरमपंथी संगठन है। 1987 में एक जन आंदोलन के चलते हमास का उदय हुआ था। जिसे दुनिया आतंकी संगठन के रूप में देखती है। खास यह भी है कि फिलिस्तीन भी इसे आतंकी संगठन ही मानता है। फिलहाल इजरायल अपनी तेज धार और के साथ गाजा पट्टी में भीषण हमला जारी किए हुए। बीते 16 मई को जहां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक थी उस दिन सबसे भीषण हमला भी किया गया। हमले में सैकड़ो फिलिस्तीनी की मौत हो चुकी है जिसमें बच्चों की संख्या भी बहुतायत में है जबकि हजारों की तादाद में लोग घायल हो गए हैं। कमोबेश मरने और घायल होने वालों की संख्या इजराइल में भी देखी जा सकती है। इजरायल और हमास के बीच एक हफ्ते से जारी संघर्ष में 16 मई का हवाई हमला अबतक का सबसे भीषण हमला था। हालाकि अंतरराष्ट्रीय पक्षकार भी दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन मुश्किले बढ़ी हुई हैं। क्षेत्र विशेष में तनाव कम करने के लिए संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद की 16 मई को बैठक भी हुई। गौरतलब है कि पूर्वी यरूशलम में मई की शुरुआत में तनाव तब शुरू हुआ था जब फिलिस्तीनियों ने शेख जर्रा से उन्हें निकाले जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया और इजरायली पुलिस ने अल अक्सा मस्जिद में कार्रवाई की। गाजा पट्टी की स्थिति को लेकर 57 सदस्यीय इस्लामिक सहयोग संगठन की भी 16 मई को ही आपातकालीन डिजिटल बैठक हुई ताकि इजरायली हमले को रोका जा सके। बावजूद इसके मुश्किलें कम होते दिखाई नहीं दे रही हैं और दुनिया के देश इसे लेकर दो गुटों में बटे जरूर दिखते हैं। जिसमें अमेरिका समेत कई यूरोपीय देश जहां इसराइल की ओर हैं वही अरब देश फिलिस्तीन के पक्ष में खड़े हैं। तुर्की का कहना है कि मुस्लिम वर्ल्ड को इजरायल के खिलाफ स्पष्ट फैसला लेना चाहिए। भारत की मुश्किल यह है कि वह इजरायल और फिलिस्तीन दोनों से द्विपक्षीय संबंध रखता है। ऐसे में उसका दृष्टिकोण एकतरफा तो बिल्कुल नहीं हो सकता। सिर्फ इजरायल और फिलीस्तीन के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए भी मायने भारत का दृष्टिकोण मायने रखता है।
आर्थिक दुष्चक्र से गुजरता आम जनमानस
धीमा पड़ चुका कोरोना जिस गति से पैर पसार रहा है। वह आम जनजीवन और सभ्यता के लिए एक बड़े खतरे का सूचक है। देश में कोरोना की दूसरी लहर विकराल रूप लिए हुए है। यह जनता की घोर लापरवाही का नतीजा है या फिर सरकार की नीतियों में कमी। फिलहाल इसकी चपेट में देश हैं और इससे निपटने के लिए कर्फ्यू व लॉकडाउन कमोवेश जारी है। साथ ही चिकित्सीय सुविधा पर भी जोर देखा जा सकता है।