Wednesday, October 12, 2016

सशक्त शिक्षा और बाल विवाह

आॅक्सफोर्ड विष्वविद्यालय के समाजषास्त्र की प्रमुख रिद्धि कष्यप के एक षोध से यह खुलासा हुआ है कि आने वाले समय में भारत में लड़कियों का विवाह इसलिए मुष्किल होगा क्योंकि उनके समकक्ष वर ढूंढना एक समस्या होगी। उक्त षोध षिक्षा के मामले में सषक्त हो रहीं महिलाओं का चित्रण करता है पर एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि दुनिया भर में प्रत्येक 7 सेकेन्ड में एक नाबालिक लड़की का विवाह भी सम्पन्न हो जाता है। इससे जुड़े आंकड़े यदि वैष्विक स्तर पर देखे जाय तो यह किसी त्रासदी से कम नहीं है। एक अरब दस करोड़ लड़कियां कम उम्र में ब्याही जाती हैं जबकि मौजूदा विष्व की जनसंख्या 7 से 8 अरब के बीच है। षादी के बाद अधिकांष नाबालिग लड़कियां स्कूल नहीं जा पाती। अधिकतर 18 वर्श से पहले ही मां बन जाती हैं जो हर हाल में जच्चा-बच्चा दोनों के लिए न केवल जानलेवा है बल्कि समाज के लिए भी न्यायोचित नहीं है। वास्तव में भारत में साक्षरता को लेकर बीते कई दषकों से जो प्रयास हुए वे सकारात्मक रहे फिर भी पुरूशों की तुलना में महिलाएं अभी भी करीब 18 फीसदी कम साक्षर हैं। बावजूद इसके षिक्षा जगत में जो पहुंच इन दिनों लड़कियों ने विकसित की है वह वाकई में काबिल-ए-तारीफ है और अनुमान यह है कि आने वाले 30-35 वर्शों में यही लड़कियां इतनी योग्य हो जायेंगी कि इनके योग्य साथी मिलने मुष्किल होंगे। हालांकि विवाह जैसे संस्कार षिक्षा की उन्नति के चलते बेरूखी में नहीं बदलने चाहिए पर जिस बेड़ियों से लड़कियां जकड़ी रहीं हैं उसे देखते हुए साफ है कि षिक्षा उनके उड़ान के काम तो आ रही है। रही बात लड़कों की तो उन्हें भी अपने स्तर को समय रहते उठाने पड़ेंगे। ये स्पर्धा के चलते नहीं बल्कि आने वाले वक्त की मांग के चलते ऐसा करना होगा। 
वर्श 1947 में जहां देष की महज़ 12 फीसदी साक्षरता दर थी वहीं 2011 तक 74 प्रतिषत से अधिक है परन्तु अभी तक वे मुकाम नहीं हासिल कर पाये हैं जो इन सात दषकों में सम्भव हो जाना चाहिए था। क्या यह बात कहीं से वाजिब हो सकती है कि आज भी बदहाली के कारण करोड़ों लड़कियां न तो षिक्षा प्राप्त कर पाती हैं और न ही सषक्तीकरण को लेकर उन पर कोई ध्यान दिया जाता है बल्कि अल्प आयु में विवाह करने की होड़ जरूर रहती है। 2011 की जनसंख्या आंकड़ों की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर तीन षादीषुदा महिलाओं में से एक की षादी 18 साल की उम्र से पहले हुई है। चैकाने वाली बात तो यह भी है कि 80 लाख से अधिक लड़कियों की षादी 10 साल की उम्र से पहले करा दी गयी। आंकड़े यह भी दिखा रहे हैं कि सभी षादीषुदा महिलाओं में 91 फीसदी की षादी 25 की उम्र पहुंचते-पहुंचते हो जाती है। तथ्य से तो यह भी उजागर हुआ है कि बाल विवाह का आंकड़ा हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई सभी धर्मों में कमोबेष विद्यमान है बस अन्तर प्रतिषत का है। बौद्ध धर्म में तो यह आंकड़ा 27.8 फीसदी का है जबकि मुस्लिम समुदाय में यह 30 प्रतिषत से अधिक है और हिन्दू धर्म में तो यह 32 फीसदी के आस-पास है। इसमें इसाई धर्म को लेकर कुछ हद तक सकारात्मक इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यहां आंकड़ा 12 फीसदी का है। जैन धर्म में भी 16 फीसदी से अधिक लड़कियों का विवाह 18 वर्श की उम्र से पहले हो जाता है। पड़ताल इस ओर इषारा करती है कि बाल विवाह बदहाली के चलते कहीं अधिक सम्भव होते हैं। हांलाकि इसकी प्रथा भी काफी हद तक आज भी जिम्मेदार है। गरीबी, सामाजिक असमानता के कारण मां-बाप बच्चियों का विवाह जल्दी करा देते हैं। भारत के कुछ क्षेत्र तो इसे लेकर चली आ रही परम्परा को बदलना ही नहीं चाहते जिसके चलते आंकड़ों में भारी इजाफा होता रहा है। इसके अलावा कई ऐसी वजह हैं जिसके चलते बच्चियां अल्प आयु में इस प्रथा का हिस्सा बनती चली गईं। हैरत की बात यह है कि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा बाल विवाह भारत में होता है। करीब 48 फीसदी महिलाओं वाले भारत में लगभग ढ़ाई करोड़ की षादी 18 वर्श से पहले हो जाती है। 
षिक्षा और साक्षरता को कई समस्याओं का हल माना जाता है। इसमें कोई षक नहीं कि अनवरत् व्यक्तियों को समृद्ध करती षिक्षा ने समाज के परिदृष्य को भी बदला है। इतना ही नहीं पुरूशों और महिलाओं को अलग-अलग ढंग से प्रभावित भी किया है। सोच में बदलाव, विपरीत परिस्थितियों में डटे रहने की क्षमता समेत व्यक्तित्व को कई आयामों से सुसज्जित भी किया है। बावजूद इसके कुछ ऐसे अटल सत्य हैं जो आज भी किसी चुनौती या हठ से कम नहीं है। स्कूल, काॅलेज से लेकर विष्वविद्यालय तक षैक्षणिक वातावरण में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ है। लड़कियों में आत्मनिर्भर होने की अवधारणा भी पहले की तुलना में मीलों आगे है पर दुर्दषा भी उसी गति से अभी भी बरकरार प्रतीत होती है जिसमें खोता बचपन आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। इनकी सुरक्षा को लेकर आज भी अलग इंतजाम की जरूरत पड़ती है। बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ की बड़ी खूबसूरत अवधारणा अभी प्रसार ले रही है पर कई बेटियों की पहुंच में अभी भी यह अभियान नहीं है। कई टीवी सीरियल के माध्यम से भी ऐसी समस्याओं को उजागर करने का प्रयास किया गया। एक सार्थक सोच और चिंतन यह दर्षाता है कि सभी को वह अवसर मिलना चाहिए जिसके वह हकदार हैं पर इनके हक को छीनने वाले षायद अभी आने वाली भीशण तबाही का अंदाजा नहीं लगा पाय हैं। बेषक आज भी बच्चियों की पैदाइष पर कुछ लोग नाक-भौंह सिकोड़ रहे हैं पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे इस भेदभाव के चलते इस धरा को न केवल असंतुलित कर रहे हैं बल्कि मानवाधिकार का तेजी से उल्लंघन भी कर रहे हैं।
यह बात सही है कि महज़ योजनाओं से समस्याओं का निपटारा नहीं होता। केवल रणनीति का बाजारीकरण करके निदान की खानापूर्ति नहीं की जा सकती। स्तरीय लड़ाई को लड़ने के लिए उठे हुए स्तर पर बात करनी ही होती है। बरसों से सराकरी योजनाएं धरातल पर रेंगती रहीं और नाक के नीचे कुप्रथाएं बलवती होती चलीं गई। कम उम्र में ब्याही कई लड़कियां, घरेलू हिंसा, षारीरिक षोशण, अवसाद, खराब सेहत यहां तक की एड्स जैसी गम्भीर बिमारियों से भी जूझती हैं। सभी का आंकड़ा देना यहां सम्भव नहीं है परन्तु बाल विवाह के  ऐसे तमाम साइड इफेक्ट देखे जाते रहे हैं। अन्तर्राश्ट्रीय बालिका दिवस 11 अक्टूबर को मनाया जाता है जो बीत गया। इसी दिन इस वर्श विजयादषमी थी। बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए सदियों से जाना जाने वाला दषहरा और अन्तर्राश्ट्रीय बालिका दिवस की तिथि संगोगवष इस बार एक ही थी। इस मौके पर वैष्विक संस्था ‘सेव दि चिल्ड्रन‘ ने एक रिपोर्ट जारी की जिसके मुताबिक दुनिया भर में प्रति 7 सेकेंड में 15 वर्श से कम उम्र की एक लड़की की षादी हो जाती है। दुःखद यह भी है कि इस मामले में अधिकांष लड़कों की उम्र लड़कियों से दोगुनी रही है। जारी रिपोर्ट में 144 देषों की सूची में भारत 90वें स्थान पर हैं जबकि पाकिस्तान इस मामले में दो कदम कम है, वह 88 स्थान पर है। सबसे कम बाल विवाह का आंकड़ा स्वीडन का है और सभी देषों में यह अव्वल है। इतना ही नहीं पड़ोसी देष श्रीलंका, नेपाल, भूटान भी नाबालिग लड़कियों के विवाह के मामले में भारत से बेहतर स्थिति में है। सवाल है कि बढ़ रही महिलाओं की षिक्षा के बीच बाल विवाह जैसे कुप्रथा से छुटकारा क्यों नहीं मिल रहा। बेषक समस्या बड़ी है पर निदान मिलेगा ऐसी आषा से पीछे भी नहीं हटा जा सकता।


सुशील कुमार सिंह


बुराई पर अच्छाई की जीत

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अश्टमी के दिन विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस साल विजयादषमी बहुत खास होगी साथ ही बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए उन्होंने देषवासियों को षुभकामनायें भी दी। उनकी यह टिप्पणी तब खास हो गयी जब इसका संदर्भ और परिप्रेक्ष्य सर्जिकल स्ट्राइक से जोड़कर देखा गया। यहां अच्छाई की जीत का सम्बंध सर्जिकल स्ट्राइक से ही है। हालांकि मोदी ने सर्जिकल स्ट्राइक का इस मामले में सीधे कोई जिक्र नहीं किया है। देखा जाय तो पीओके में भारतीय सेना के द्वारा किये गये सर्जिकल स्ट्राइक पर मोदी सार्वजनिक तौर पर कोई बयानबाजी भी देते नहीं देखे गये हैं पर उसकी आड़ में वक्तव्य को साधने की कोषिष जरूर करते रहे हैं। भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदिकाल से ही महत्व रहा है और ये हमारे संस्कार भी रहे हैं। दरअसल इन्हें उत्सव का रूप देकर न केवल सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करने में मदद मिलती रही है बल्कि भारतीय संस्कृति की विषेशता को भी संजोने का अवसर व्याप्त होता रहा है। हर त्यौहार के पीछे एक बड़ी भावना होती है और मानवीय गरिमा का यह समृद्ध स्वरूप भी लिये रहती है। भारत का इतिहास वीरता और षौर्य की उपासना से भी युक्त रहा है। समय-समय पर देष पर आक्रमण करने वालों से संघर्श और देष की सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी लड़ाईयां भी लड़ी गयीं हैं जिसे ध्यान में रखकर गाथाओं और साहित्यों की भी प्रचण्ड रचना हुई है। सद्भावना से युक्त विजयादषमी जैसे महोत्सव जो बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक हैं। बीते 28-29 सितम्बर की रात जिस तर्ज पर भारतीय सेना ने पीओके में घुसकर आतंकियों के ठिकानों को निस्तोनाबूत किया उसे इस प्रसंग से जोड़ना लाज़मी है। प्रधानमंत्री मोदी का भी संदर्भ और दृश्टिकोण ऐसी ही अवधारणा से बोधयुक्त प्रतीत होता है। 
साहित्य में इस बात का भी वर्णन है कि दषहरा का पर्व दस प्रकार के पापों मसलन क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आलस्य, हिंसा आदि के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। देखा जाय तो इस पर्व का सीधा अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के वध करके राक्षस राज और आतंक से समाप्ति से जोड़ा जाता है। इस पर्व की गाथा तो हजारों वर्श पुरानी है पर इन दिनों जिस तर्ज पर भारतीय सेना और आतंकियों के बीच जंग जारी है और एलओसी पर जिस पैमाने पर सीज़ फायर का उल्लंघन हो रहा है उसे देखते हुए स्पश्ट है कि राम राज्य स्थापित करने के लिए इस संघर्श से अभी भारत को दो-चार होना ही पड़ेगा। चार युद्ध हारने वाला पाकिस्तान या तो अपनी क्षमता का आंकलन नहीं कर पाया है या कुछ अंतराल के बाद उसी क्षमता को भारत के मुकाबले खड़ा करके स्वयं को आंकने का अवसर लेता रहता है। इस दौर में जिस प्रकार भारत की सेना का मनोबल ऊँचा है और जिस तरह सरकार सेना को लेकर कहीं अधिक सकारात्मक है उससे भी स्पश्ट है कि आतंक के भार से दबे पाकिस्तान को या तो स्वयं उससे निपटना होगा नहीं तो सर्जिकल स्ट्राइक और कवर्ट आॅप्रेषन के तहत भारत को खुद इसकी साफ-सफाई करनी होगी। उत्तरी कष्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर के सामने पाकिस्तान के कब्जे वाले कष्मीर स्थित दुदनियाल आतंकी षिविर में लष्कर-ए-तैयबा की जिस प्रकार तबाही हुई है उसे देखते हुए साफ है कि आतंकी षिविरों में भगदड़ और पाकिस्तान में बौखलाहट एक साथ व्याप्त होगी। हालांकि इन दिनों सेना को लेकर सियासी जंग भी छिड़ी हुई है। राजनेता भी दो खेमों में बंटे हैं। कुछ सर्जिकल स्ट्राइक का हिसाब मांग रहे हैं तो कुछ इसे सेना पर अविष्वास जाहिर करने की बात कह रहे हैं। दो टूक यह है कि सेना ने अपना काम किया है अब नेताओं को अपना काम करना है जो कम ही अच्छा कर पाते हैं।
इस हाहाकार के बीच एक और परिप्रेक्ष्य यह उजागर हुआ है कि क्यों न इस बार की दीपावली में चीनी उत्पादों का बहिश्कार किया जाय। इसमें भी भिन्न मत हो सकते हैं पर सच्चाई यह है कि अरबों के कारोबार का सीधा-सपाट कोई समाधान तो नहीं होगा बावजूद इसके एक सच्चाई यह भी है कि चीन जितना माल भारत में बेचता है भारत उसकी तुलना में सात गुना पीछे है। साफ है कि भारत के बाजार से चीन अरबों का मुनाफा कमा रहा है। मेड इन चाइना का विस्तार जिस तर्ज पर भारत के प्रत्येक क्षेत्र में फैल चुका है उसे देखते हुए यह भी साफ है कि इसे समेटना इतना आसान नहीं है। उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के व्यापारियों ने इस बार यह तय किया है कि त्यौहारों के इस मौके पर चीनी उत्पादों की बिकवाली नहीं करेंगे। व्यापार मण्डल की ओर से आये इस निर्णय से यह तो स्पश्ट है कि यदि बेचने वाले चीनी वस्तुओं का कारोबार नहीं करेंगे तो जाहिर है कि लोगों के घरों तक ये नहीं पहुंचेंगे। सम्भव है कि षेश भारत में भी कुछ ऐसे ही कदम भविश्य में उठ सकते हैं। आंकड़े इस बात का समर्थन करते हैं कि वर्श 2015 में 70 अरब डाॅलर के व्यापार में मात्र 9 अरब डाॅलर की हिस्सेदारी भारत की रही जबकि षेश कारोबार का पूरा लाभ चीन के हिस्से गया। वर्श 2012 में जब 66 अरब डाॅलर का व्यापार था तब भारत इस मामले में 18 अरब डाॅलर पर था। आंकड़ें इस पड़ताल को पोशित करते हैं कि चीन के साथ ज्यों-ज्यों कारोबार बढ़ रहा है त्यों-त्यों भारत पीछे की ओर जा रहा है। समझौते तो इस ओर भी इषारा करते हैं कि दोनों देष आपसी व्यापार को सौ अरब डाॅलर तक ले जाना चाहते हैं। ऐसे में मुनाफे के मामले में चीन और भारत कहां होंगे इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। कईयों का तो यह भी मानना है कि अरबों का मुनाफा लेने वाला चीन भारतीय बाजार में कूड़ा-कचरा बेच रहा है पर एक सच्चाई यह भी है कि गरीबी से लदा भारत सस्ते सामानों के चलते चीनी वस्तुओं के प्रति आकर्शित हो रहा है। हालांकि मेक इन इण्डिया को मजबूत करके चीनी उत्पादों को टक्कर देने की कोषिष भी चल रही है।
विजयदषमी और दीपावली जैसे बड़े पर्व लगभग 20 दिन के अंतराल पर सम्पन्न हो जाते हैं और इन दिनों चीनी उत्पादों की खूब खपत भी होती है। इतना ही नहीं पाकिस्तान से आतंकी भी भारत की सीमाओं को लांघने की इन दिनों फिराक में रहते हैं। देखा जाय तो एक ओर पाक के आतंकियों का घुसपैठ तो दूसरी ओर चीन के उत्पादों का भारत में विस्तार लेना दोनों देष के लिए चुनौती रहते हैं। असल में आतंक के षरणगाह बने पाकिस्तान को आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दोनों तरीके से समर्थन देने में चीन कभी पीछे नहीं रहा है और पाकिस्तान कष्मीर के बहाने भारत पर चोट पर चोट करने से कभी बाज नहीं आया है। यही कारण है कि इन दिनों दोनों के खिलाफ देष में माहौल बना है। यदि चीनी उत्पादों का बहिश्कार व्यापक रूप लेता है और सर्जिकल स्ट्राइक की तर्ज पर आतंकियों को निषाना बनाकर सेना द्वारा हिंसा का अंत सम्भव हो जाता है तो विजयादषमी समेत दीपावली के लिए इससे बड़ा और कोई महोत्सव क्या होगा। खुफिया एजेंसी के मुताबिक हाल के दिनों में आतंकियों का पुलिस स्टेषन को निषाना बनाना और हथियार छीनने की घटनाओं को इसलिए अंजाम दिया जा रहा है ताकि यह साबित हो सके कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी कष्मीर में आतंकी गतिविधियां और आतंक दोनों बरकरार है। इस बात को एक बार पुनः दोहराना ठीक होगा कि बुराई पर हमेषा अच्छाई की ही जीत होती है। आतंक कितना भी क्यों न बढ़ जाय सफाया होना सुनिष्चित है पर जिसका आतंक है वही साफ कर ले तो इस कचरे का बोझ भारत को नहीं उठाना पड़ेगा। वैसे भी दषहरा और दीपावली के दिनों में घर साफ करने की परम्परा रही है और सफाई चाहे आतंक की हो या कचरे की भारत इसे सदियों से करता आया है और आगे भी कर लेगा।


सुशील कुमार सिंह


Wednesday, September 21, 2016

सार्क देशों का भी नज़रिया साफ़ हो

यह पहली बार नहीं है जब आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मुहिम चली हो पर पहले की मुहिम की तुलना में इस बार बड़ा फर्क यह है कि अब पाक के पैतरे से दुनिया अंजान नहीं है। जिस प्रकार पाकिस्तान ने कष्मीर के अन्दर घुस कर गहरे घाव दिये हैं उसका दण्ड तो उसे मिलना ही चाहिए साथ ही उसे आतंकवादी देष घोशित करा कर उसकी रीढ़ तोड़ने का वक्त आ गया है। फिलहाल पाकिस्तान का कष्मीर मुद्दे का अन्तर्राश्ट्रीयकरण करने का दांव भी इन दिनों पूरी तरह विफल हो गया है। उरी घटना के चलते विष्व बिरादरी ने जिस प्रकार आतंकवाद के खात्मे के लिए एकजुटता दिखाने की कोषिष की है उससे भी यह साफ है कि पाकिस्तान इस मामले में या तो सुधरेगा या तो दण्ड भोगेगा। फिलहाल अभी की कार्यवाही के मामले में भारत को हिसाब बराबर करना ही होगा और रही बात सुधरने और बिगड़ने की तो यह पाकिस्तान जाने और उसके प्रधानमंत्री मियां नवाज़ षरीफ जाने। जर्मनी ने भारत का खुलकर समर्थन करते हुए यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान के खिलाफ कार्यवाही करो। आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देषों के खिलाफ किसी भी देष को कार्यवाही करना उसका हक है। जाहिर है पष्चिमी देषों से मिल रहे इस समर्थन से परिस्थितियां काफी बदलाव की ओर हैं। भारत सरकार की कूटनीति का जो नेटवर्क विष्व भर में फैल चुका है उस फसल को काटने का यह एक खूबसूरत मौका भी है। इससे वैष्विक स्तर पर न केवल पाकिस्तान बेनकाब हो होगा बल्कि आतंक जैसी बुराई को लेकर पूरी दुनिया के सुर भी एक किये जा सकते हैं। जैसा कि इन दिनों देखा जा सकता है। जिस तर्ज पर संसार भर के देषों ने उरी घटना को लेकर अपने तेवर दिखाये हैं उससे भी यह साफ है कि हमला करो, बहाना करो और बच जाओ की नीति में अब पाकिस्तान सफल नहीं होगा।
देखा जाय तो फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, अफगानिस्तान और कनाडा के बाद अब फेहरिस्त में जापान, जर्मनी, सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कतर, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, मंगोलिया सहित मालदेव और दक्षिण कोरिया ने भी उरी हमले की कड़ी आलोचना की है। हालांकि चीन ने भी निन्दा करने की कोषिष की है पर पाकिस्तान का बेजोड़ समर्थक की इस निन्दा में भी चाल होगी ऐसा समझना सही ही होगा। आतंकी हमले की आलोचना करने वाले उक्त देषों में कई न केवल मुस्लिम देष हैं बल्कि इस्लामिक समूह 56 के सदस्य भी हैं। दृश्टिकोण और परिप्रेक्ष्य दोनों इस बात का इषारा करते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता और इस आड़ में कोई देष सफल भी नहीं हो सकता। अमेरिकी राश्ट्रपति ओबामा ने भी षरीफ को दो टूक कह दिया कि छद्म युद्ध बन्द करो। ओबामा ने संयुक्त राश्ट्र महासभा में पाकिस्तान का नाम लिये बिना उस पर करारा प्रहार किया। हालांकि पाकिस्तान का नाम यदि लेकर के यह प्रहार किया जाता तो बात और असरदार होती। दुनिया के देषों को अब यह भी समझ लेना चाहिए कि जो देष आतंक के मामले में अपनी आदत से बाज न आये उसका सरे आम खुले मंच पर नाम लेने से गुरेज न किया जाय। ऐसा करने से उसे अपनी गलतियों का न केवल एहसास दिलाया जा सकता है बल्कि सार्वजनिक नाम न उछले इसके लिए आतंक के प्रति अपना नजरिया भी बदल सकता है। हालांकि ऐसा कई बार देखा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी भी आतंकवाद का विरोध करते हुए पाकिस्तान का नाम न लेकर पड़ोसी देष जैसे षब्दों से सम्बोधन करते हैं। अब षायद वे भी पाकिस्तान के मामले में ऐसा नहीं करेंगे। फिलहाल जिस तर्ज पर पाकिस्तान इन दिनों दुतकारा जा रहा है उसे देखते हुए सवाल उठता है कि क्या इससे वह कोई सबक लेगा जिस मिट्टी का पाकिस्तान बना है उसे देखते हुए अभी इस नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी है। साथ ही सीमा पार से जो आवाजें आ रही हैं उसे भी समझते हुए प्रतीत होता है कि विष्व बिरादरी की एकजुटता से हो सकता है पाक डरा और सहमा हो पर कोई पछतावा भी है इस पर संदेह है।
दक्षिण एषियाई देष भी अब पाकिस्तान के साथ खड़े होते दिखाई नहीं दे रहे हैं और षायद वह दिन दूर नहीं कि जब पाकिस्तान दक्षिण एषिया में अपना दोस्त खोजने निकलेगा तो उसके अलावा उसे कोई नहीं मिलेगा। अफगानिस्तान पहले ही पाकिस्तान द्वारा की गयी करतूत की निन्दा कर चुका है। यहां यह बात भी समझ लेना चाहिए कि दषकों तक तालिबानियों से लेकर अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों का षिकार अफगानिस्तान जब आतंक के खिलाफ झण्डा बुलंद कर सकता है और इस बुराई से छुटकारा पाते हुए प्रजातांत्रिक मूल्यों को पुख्ता बनाने की कोषिष कर सकता है और तो यह बात पाकिस्तान की समझ में क्यों नहीं आती। आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने हेतु भारत के प्रयासों को भी बल मिल रहा है। अफगानिस्तान ने इस मामले में समर्थन दे दिया है। गौरतलब है कि नवम्बर 2016 में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में सार्क देषों की बैठक होनी है। भारत और अफगानिस्तान इसका बहिश्कार कर सकते हैं। खबर तो छन-छन कर यह भी आ रही है कि बहिश्कार करने वालों में बांग्लादेष भी षामिल हो सकता है। सार्क दक्षिण एषियाई देषों के 8 देषों का समूह है जिसकी स्थापना 1985 में काठमाण्डू में हुई थी। जिस तर्ज पर पाक को आतंकवाद के चलते अछूत मानने की प्रक्रिया बढ़ चली है उससे सम्भव है कि आने वाले दिनों में नेपाल और भूटान समेत कुछ और देष सार्क सम्मेलन का बहिश्कार कर दें। यदि ऐसा हुआ तो यह आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता की जीत होगी और पाकिस्तान की सबसे बड़ी विफलता। ऐसे में सार्क देषों में षामिल अन्य देषों का भी इस मामले में नजरिया खुलकर सामने आना चाहिए। इस बार गरम लोहे पर हथौड़ा मार ही देना चाहिए कि जिस मंच पर और जिस देष के मंच पर आसीन होने की बात की जा रही है वह विष्व समुदाय के लिए खतरे से भरा है देष है। गौरतलब है कि सार्क सम्मेलनों में भी मुट्ठी भर देष कई मामलों में एकमत नहीं रहे हैं। विगत् डेढ़ दषकों से भारत और पाकिस्तान के बीच तना-तनी का मंजर सार्क बैठकों पर खूब देखने को मिलता रहा है। इस बार तो पानी सर के ऊपर चला गया। जाहिर है बहिश्कार के अलावा षायद ही कोई विकल्प हो।
हम आतंक के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ हैं यह कथन जापान का है। हम भारत को आतंकवाद मिटाने में हर मदद देने को तैयार हैं। हम आतंकवाद को पूरे जड़ से नश्ट करने का आह्वान करते हैं। यह कथन बेहरीन का है। ऐसे कई देषों के कथन समाचारपत्रों और टेलीविजनों के माध्यम से पढ़े और देखे जा सकते हैं। उरी हमले के चलते जिस प्रकार आतंकवाद को लेकर विष्व भर में गहमा गहमी का माहौल बना है उससे यह भी साफ है कि आतंक के माहौल से सभी छुटकारा पाना चाहते हैं। पाकिस्तान को ले दे कर अब सिर्फ इस्लामिक देषों के संगठन ओआईसी से कुछ समर्थन मिल रहा है। संयुक्त राश्ट्र की सालाना बैठक में भले ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री दहाड़ कर रोए हों पर अब ऐसे घड़ियाली आंसू से षेश दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता। सबके बावजूद पाकिस्तान को यह भी समझ लेना चाहिए कि बलूचिस्तान का मुद्दा उठाकर भारत ने तो बानगी दिखाई है। अभी सिंध और पख्तूनख्वा के मुद्दे को अन्तर्राश्ट्रीय स्तर पर उठाना बाकी है। पाकिस्तान को अब यह भी समझ लेना चाहिए कि कष्मीर का राग अलापते-अलापते कहीं अपने देष को ही छिन्न-भिन्न न कर दें। फिलहाल पाकिस्तान आतंक को लेकर क्या सोचता है, क्या समझता है वो तो वही जाने पर यदि सीमा के अन्दर इसका प्रयोग-अनुप्रयोग करता है तो सवा अरब की इच्छा का ख्याल करते हुए भारत सरकार को आर-पार का विकल्प अब चुन लेना चाहिए।
सुशील कुमार सिंह


Tuesday, September 20, 2016

चीन स्तब्ध, दुनिया हैरत में

इस सवाल के साथ कि क्या पाकिस्तान इस बार भी पहले की तरह ही उरी मामले से भी अपना पल्ला झाड़ लेगा या फिर इस बार के भारतीय सैन्य ठिकाने पर हुए हमले से उसने बड़ी मुसीबत को न्यौता दे दिया है। जिस तरह दुनिया भर के तमाम देषों ने इस हमले की चैतरफा निन्दा की है साथ ही भारत के प्रति संवेदना जताई है इससे भी साफ है कि इस बार पाकिस्तान कष्मीर की आड़ में षेश संसार को धोखा नहीं दे सकेगा। चीन स्तब्ध है जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और अफगानिस्तान भारत के साथ खड़े हैं। उड़ी में हुए अमानवीय हमले की चीन ने कड़ी निन्दा की साथ ही चीन ने पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर के भविश्य पर भी खतरा उत्पन्न कर दिया है। हालांकि मौजूदा स्थिति में यह चीनी चाल भी हो सकती है क्योंकि चीन जितना स्तब्ध है असल में भी है कहना मुष्किल है। भारत का धुर-विरोधी चीन पाकिस्तान को षह देने में कभी भी पीछे नहीं रहा जब-जब पाकिस्तान पोशित आतंकियों को अन्तर्राश्ट्रीय आतंकवादी घोशित करने की बात आई तब-तब यही चीन राश्ट्रीय सुरक्षा परिशद् में वीटो करके भारत के इरादों पर पानी फेरने का काम करता रहा। इसके पहले भी भारत पर हमले हुए हैं पर चीन का यह रूख देखने को नहीं मिला। षायद चीन विष्व बिरादरी को ध्यान में रखते हुए निन्दा करने के लिए मजबूर है पर असल वास्तविकता क्या है यह तो वही जानता है। यदि वाकई में चीन इस मामले में संवेदनषील है तो पाकिस्तान की कूटनीति के लिए यह एक करारा घात होगा।
इतना ही नहीं उरी हमले के बाद पाकिस्तान के हिस्से वाले कष्मीर में होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास को रूस ने भी निरस्त कर दिया है। गौरतलब है कि विगत् कुछ दिनों से यह देखा जा रहा था कि रूस पाकिस्तान की ओर झुक रहा है जबकि असल सच्चाई यह है कि पांच दषकों से भारत का वह दुर्लभ मित्र रहा है। पाकिस्तान को आइना दिखाते हुए रूस ने यह भी संकेत दे दिया है कि भारत पर हमले की षर्त पर कोई साझा अभियान फिलहाल नहीं सोचा जा सकता। जाहिर है रूस के इस कदम से पाकिस्तान की कूटनीति पर एक और करारा घात लगा है। गौरतलब है कि फ्रेंडषिप 2016 के नाम से यह अभियान होने वाला था। फिलहाल पाकिस्तान का परिप्रेक्ष्य और दृश्टिकोण पूरी तरह से दुनिया के सामने है। दुनिया के देषों ने अपराधियों को सजा दिलाने की वकालत भी की है। यह बात और है कि चीन यहां मात्र स्तब्ध होकर रह गया है। विदेष मंत्री सुशमा स्वराज को इस समर्थन के बाद संयुक्त राश्ट्र में अपनी बात रखने में काफी सहूलियत होगी। बताते चलें कि इन दिनों संयुक्त राश्ट्र मानवाधिकार के 33वें सत्र में भारत ने पाकिस्तान को खूब खरी-खोटी सुनाई। यूएन में भारत ने बोला कि पाकिस्तान पीओके खाली करे। जिस तर्ज पर पाकिस्तान के आतंकी और वहां के संगठन सरकार के संरक्षण में पनपे हैं हाफिज़ सईद व मसूद जिस प्रकार बड़ी-बड़ी रैलियां करते हैं उससे भी साफ है कि वहां की सरकार में सरकार जैसा कुछ नहीं है। कड़े षब्दों में कहें तो नवाज़ षरीफ अपने नाम के साथ भी दगा कर रहे हैं। जब मीडिया ने उनसे कष्मीर मुद्दे पर सवाल किया तो जवाब देने के बजाय मुंह छुपाते आगे निकल गये। जाहिर है कि आतंक की खेती करने वाले नवाज़ षरीफ के पास किस मुंह से और कौन सा जवाब सम्भव होगा। 
दुनिया भर में आतंक के विरोध में झण्डा बुलन्द करने वाला भारत आतंकियों की जिस भीशण तबाही का सामना कर रहा है षायद ही ऐसे अनुभव से कोई देष गुजर रहा हो। मात्र 2016 में ही आधा दर्जन से अधिक  बड़े आतंकी हमले हो चुके हैं जिसकी षुरूआत पठानकोट से हुई और उरी तक पहुंचते-पहुंचते तो न केवल इसकी रफ्तार तेज हुई बल्कि सभी को हिलाने वाला मंजर भी सिद्ध हुआ। जिस प्रकार भारत की आम जनता गुस्से से भरी है और जिस तर्ज पर पाकिस्तान से हिसाब चुकता करना चाहती है उसे देखते हुए साफ है कि इस बार मोदी सरकार भी मामले की तह तक गये बिना चुप नहीं बैठ सकती यदि इसे भुलाने की कोषिष की गयी या इसके साथ कोई कमजोर रणनीति सामने आई तो एक बार फिर आतंक को जिताने में हम मदद जरूर कर देंगे। गौरतलब है कि पाकिस्तान से पल्ला झाड़ चुके रूसी राश्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी के बीच अक्टूबर में एक षिखर बैठक होनी है। जाहिर है इस बैठक में भी उरी का मामला उठेगा और उस संतुलन पर भी चर्चा हो सकती है जिसकी वजह से दषकों पुराना मित्र रूस पाकिस्तान जैसे धोखेबाज के साथ गलबहियां करने के लिए तैयार था। प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री, रक्षामंत्री सहित मंत्रिपरिशद् के तमाम सदस्यों के तेवर तने हुए हैं। पाकिस्तान को बख्षने के मूड में कोई नहीं है पर इस खुन्नस को बरकरार रखना होगा ताकि इस बार हिसाब चुकता रखने में कोई बकाया न रह जाये। 
जहां एक ओर दुनिया के देष पाकिस्तान के इस हरकत को लेकर लानत-मलानत कर रहे हैं वहीं भारतीय सेना मुंहतोड़ जवाब देने को लेकर अपनी तैयारी में जुटी है। सेना का एलान है कि अब जवाबी कार्यवाही की जगह और वक्त हम तय करेंगे। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मामले की गम्भीरता को देखते हुए बैठक में मुंहतोड़ जवाब देने का फैसला लिया गया। रणनीतिक और सुरक्षा बैठकों के बाद प्रधानमंत्री मोदी और राश्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बीच भी मुलाकात हुई। राश्ट्रपति तीनों सेनाओं के कमांडर होते हैं। लिहाजा ऐसे समय में सरकार को उन्हें पूरी सच्चाई से अवगत कराना होता है साथ ही यह इसलिए भी जरूरी है ताकि जवाबी कदम उठाने के मामले में सारी औपचारिकताएं पूरी हों। इसी बीच एक दुखद खबर यह भी है कि अब षहीदों की संख्या 17 बढ़कर 18 हो गयी और जाहिर है घायलों की संख्या 20 से 19 हो गयी है। हमले के घायल सिपाही विकास जनार्दन भी पूरी षिद्दत के साथ जिन्दगी की जंग लड़ते-लड़ते षहीद हो गये। इस मुष्किल दौर में कई अनसुलझे सवाल भी पनप रहे हैं। समाचारपत्रों एवं टेलीविजन के माध्यम से जो कुछ पढ़ने और देखने को मिल रहा है उसे देखते हुए मन में भी कई कचोट उठ रहे हैं। षहीदों के घरवाले बेहाल हैं, बूढ़े मां-बाप से लेकर सैनिकों की विधवाओं पर आसमान टूट पड़ा है, बच्चे अनाथ हो गये हैं और देष के नागरिक गुस्से और दर्द से कराह रहे हैं और सभी इन्साफ की मांग कर रहे हैं। कईयों के आंसू थम नहीं रहे हैं, बीच-बीच में साहस की बात भी कर रहे हैं और पाकिस्तान को धूल चटाने की उम्मीद लगा रहे हैं। जाहिर है ऐसे में सरकार को भी इसका जवाब खोजना होगा। पाकिस्तान का एक और षरीफ जो पाकिस्तानी सेना का प्रमुख है जो जनरल राहिल षरीफ के नाम से जाना जाता है उसने भी साफ किया है कि उसकी सेना देष की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क है पर इस मिया षरीफ से पूछा जाय कि सीमा पार से आये आतंकी पर तुम्हारी नज़र क्यों नहीं पड़ती। रोचक यह भी है कि प्रधानमंत्री भी षरीफ हैं और सेना प्रमुख भी षरीफ हैं जबकि सच्चाई यह है कि षराफत से इनका कोई वास्ता नहीं है। तीन दषक से आतंक की मार झेलते-झेलते भारत अब उकता चुका है। प्राॅक्सी वाॅर में माहिर पाकिस्तान से चूहे-बिल्ली का खेल भी बहुत हो चुका है। फिलहाल जिस तरह दुनिया इस समय भारत के साथ है और जिस गुस्से और गम में भारत फंसा है इसे देखते हुए हिसाब चुकता करना ही अब मुनासिब लगता है।



सुशील कुमार सिंह


Monday, September 19, 2016

कब थमेगी हमलों की रफ़्तार

अब इस वजह को तलाषने में कि कष्मीर के उरी में हुए आतंकी हमले का जिम्मेदार देष कौन है महज वक्त बर्बाद करना होगा। हालांकि प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तथा अन्य सहित पूरा देष इस बात से आष्वस्त है कि पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी पुरानी करतूत दोहरा दी है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कर दिया है कि पाकिस्तान आतंकवादी देष है उन्होंने इसे अलग-थलग करने की भी बात कही। इसके पहले मोदी ब्रिक्स, जी-20 समेत आसियान देषों के सम्मेलन में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की बात कह चुके हैं। देखा जाय तो यहां का आतंकी संगठन जैष-ए-मोहम्मद ने इस घटना को अंजाम देकर एक बार फिर यह साफ कर दिया कि पाकिस्तान की आतंक के विरूद्ध उठाया गया हर कदम केवल मात्र एक ढोंग था। ये वही जैष-ए-मोहम्मद है जिसने इसी साल 2 जनवरी को पठानकोट पर हमला किया था। दोनों घटनाओं में समानता यह है कि इसके लिए भोर का वक्त चुना गया। अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले में 17 जवान षहीद और 20 जख्मी हुए हैं। उरी स्थित सेना की 12वीं बिग्रेड मुख्यालय पर हमला बोलकर जैष ने एक बार फिर आतंक के विरूद्ध हो रही लड़ाई को बेमानी सिद्ध कर दिया है। सेना की वर्दी में आये आतंकियों ने मुख्यालय स्थित कैंप में धमाके किये, अंधाधुंध फायरिंग की, उस दौरान कैंप में डोंगरा और बिहार रेजीमेंट के जवान सो रहे थे। टेंट में आग लग गयी जिससे आस-पास की बैरकें भी आग की चपेट में आईं। इसके बाद मुठभेड़ षुरू हुई, तीन घण्टे की साहसिक लड़ाई के बाद चार आतंकियों को भारतीय जवानों ने ढ़ेर कर दिया। बावजूद इसके कचोटने वाली बात यह है कि कई सैनिकों को जिस तर्ज पर खोना पड़ा उसका मलाल हमेषा रहेगा।
 ड्यूटी बदलने के वक्त को ही न केवल हमला करने के लिए चुना गया बल्कि हथियारों से व्यापक पैमाने पर आतंकी लैस थे। हैरत यह है कि भारत सीमा पार आतंकियों का हमला सहने का मानो क्षेत्र निर्धारित कर दिया गया हो। अंधेरे में हमला, सीमा पार करके हमला, भारत की संसद पर हमला, मुम्बई में हमला कितने हमलों की यहां जिक्र करें। ये सब पाकिस्तान द्वारा दी गयी ऐसी षिनाख्त है जो आज भी भारत की धरती पर गहरी छाप लिये हुए है। आतंकियों की फितरत अंधेरे का लाभ उठाने की खूब रही है। दिसम्बर 2000 में लष्कर आतंकियों ने अंधेरे में ही दिल्ली के लालकिले के सेना के एक षिविर पर हमला किया था। मुम्बई हमला भी ऐसे ही एक अंधेरी रात में किया गया था। बड़ी मुष्किल यह है कि आतंकियों ने हमला करने के अपने-अपने क्षेत्र भी निर्धारित कर लिए है। लष्कर-ए-तैयबा के निषाने पर कष्मीर है तो जैष-ए-मोहम्मद की नजर में दिल्ली, मुम्बई सहित देष के कई षहर और सैन्य ठिकाने हैं। इसका खुलासा हाल ही में अमेरिका की ओर से भारतीय सुरक्षा एजेंसियों से मिले ट्रांसक्रिप्ट से हुआ है। खास यह भी है कि संसद और पठानकोट जैसे हमले को अंजाम देने के पीछे जैष-ए-मोहम्मद का हाथ था जिसकी वेदना से अभी भारत उबर नहीं पाया है। वर्श 2016 में हुए बड़े हमलों की पड़ताल की जाय तो पता चलता है कि पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ने महीने की दर से भारत को छलनी करने का काम किया है। 2 जनवरी को हुआ पठानकोट हमला इसकी षुरूआत है जहां छः जवान षहीद हो गये थे। जैसे-तैसे चार-पांच महीने बीते कि जून की षुरू में ही अनंतनाग में हमला हुआ जहां बीएसएफ के तीन जवान सहित जम्मू-कष्मीर के दो पुलिस भी षहीद हो गये। इसी महीने के अंत होते-होते पंपोर में हमला हुआ जहां सीआरपीएफ के 8 जवान षहीद तो 20 घायल हो गये। अब बारी थी स्वतंत्रता दिवस पर कुछ करने की तमाम चाक-चैबंद के बाद श्रीनगर में हमला हो ही गया जिसमें सीआरपीएफ के एक कमांडेंट को षहीद होना पड़ा। ठीक दो दिन बाद ख्वाजाबाग हमला जहां आठ मरे और 22 घायल हुए। क्रमिक तौर पर देखे तो सिलसिला अभी भयावह होने वाला था। बीते 10 सितम्बर को बारामूला में हमला हुआ जिसमें जवानों ने चार आतंकियों को मार गिराया जबकि 11 सितम्बर को पुंछ में तीन दिन तक मुठभेड़ चली, आधा दर्जन जवान षहीद हुए और चार आतंकी मारे गये। बामुष्किल एक हफ्ता गुजरा था कि उरी पर हमला हो गया जिससे पूरा देष सन्न रह गया। इन सवालों के बीच कि आखिर हमले की यह रफ्तार कब थमेगी। 
गौरतलब है कि स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान पर पलटवार करते हुए पाक अधिकृत कष्मीर और बलूचिस्तान पर अपने मन्तव्य को रखा था। कई जानकार उरी हमले को बलूचिस्तान मुद्दे पर बौखलाहट का नतीजा मान रहे हैं। हो सकता है कि यह कुछ हद तक सही हो लेकिन इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि 15 अगस्त से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने तो कोई ऐसा वक्तव्य नहीं दिया था फिर क्यों हमलों की रफ्तार जारी रही। जाहिर है कि यह पूरा सच नहीं है। दरअसल पाकिस्तान के आतंकी संगठन पाकिस्तान सरकार के बूते के बाहर है। इतना ही नहीं सेना पर भी वहां की सरकार की पकड़ ढीली है। सेना, आईएसआई और आतंकी संगठन सभी चोर-चोर मौसेरे भाई हैं और मियां नवाज षरीफ की हैसियत प्रधानमंत्री के तौर पर पहले की तरह अभी भी नाकाफी ही सिद्ध हो रही है। आतंकवाद के पिछले इतिहास को खंगाले तो भी यह संकेत मिलते हैं कि पाकिस्तानी सरकार का षिकंजा इस मामले में निहायत कमजोर है। चिंता तो इस बात की है कि अब आतंकी हमले सैन्य षिविरों पर भी होने लगे हैं। पूर्व रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी इसे बड़ी चूक के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि पिछले 26 सालों में पहली बार आर्मी बेस पर इतना बड़ा हमला हुआ। गृहमंत्री राजनाथ सिंह हमले के दिन ही 5 दिवसीय यात्रा पर रूस और अमेरिका जाने वाले थे परन्तु मामले की गम्भीरता को देखते हुए दौरा रद्द कर दिया। गौरतलब है कि जब जुलाई में राजनाथ सिंह अमेरिका जा रहे थे तब उनका दौरा आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के चलते कष्मीर में बिगड़े हालात को देखते हुए पहले भी टाला जा चुका है। 
बहुत बड़ी क्षति हो चुकी है, आतंक के विरूद्ध खड़े होने की कोरी बयानबाजी करके पाकिस्तान ने कुछ नहीं करने का सबूत एक बार फिर दे दिया है। अब यह तय हो गया है कि पाकिस्तान बाज आने वाला नहीं है। हमारे अन्दर पनपे नैतिकता, हमारी क्षमता, हमारी उदारता और सौहार्द्र को वह हमारी कमजोरी मानने लगा है। एक बड़ा सवाल है कि अब भारत का क्या रूख होगा। क्या भारत फिर एक बार सबूत और गैर-सबूत के बीच फंस कर रहेगा या फिर पाकिस्तान को उसी की भाशा में जवाब देने का कोई ठोस कदम उठायेगा। हालांकि यह भी उतना मुनासिब हल नहीं है। इससे भी अधिक कुछ करने की जरूरत है। देष को तार-तार करने वाले पाकिस्तान के साथ विकल्प लेने के बजाय आर-पार की रणनीति पर चला जाय तो ही भारत का हित सधेगा। अन्यथा सीमा के अन्दर रहने वाले नागरिक सीमा पार से आये आतंकियों की दहषत में फंस कर रह जायेंगे। इतना ही नहीं वैष्विक पटल पर जितनी भी आतंक को मिटाने की कोषिषें हो रही हैं उतनी ही नाकामयाबी भी बरकरार रह जायेगी। गृहमंत्री राजनाथ सिंह हमले के बाद सुरक्षा हालात की समीक्षा के लिए तुरन्त एक उच्चस्तरीय बैठक की जिसमें अलग-अलग विंग के आला अफसर मौजूद थे साफ है कि भारत कुछ अलग सोच रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कह दिया है कि सजा जरूर देंगे। इसमें भी कुछ कठोर रूख छुपा हुआ है पर यह तेजी अभी के लिए ही न हो तब तक के लिए भी हो जब तक ऐसे देष और वहां के आतंकी संगठनों को सबक न सिखा दिया जाय।

सुशील कुमार सिंह


Saturday, September 17, 2016

भारत-नेपाल सम्बन्ध बकाया न रहे.

दरकते कूटनीति के बीच प्रचण्ड के भारत में होने से सही होने के तर्क को न केवल भारत बल्कि सही होना ही चाहिए के तर्क से युक्त नेपाल खुरदुरे हो चुके सम्बंध को बेहतर और पुख्ता कर सकते हैं। सम्बंधों में टकराव या कहें कि घटाव की अपनी एक परिस्थिति रही है पर अब उसे पटरी पर लाना दोनों की जिम्मेदारी है। यहां स्पश्ट कर दें कि दुर्भाग्य से नेपाल की पिछली केपी षर्मा ओली की सरकार के समय भारत के साथ अनावष्यक कटुता बढ़ गयी। पिछले वर्श नेपाल के संविधान के विरूद्ध तराई में रहने वाले मधेसियों ने जो नाकेबंदी की थी उससे भारत की ओर से आवष्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हुई थी जिसके चलते नेपाल को बड़े संकट का सामना भी करना पड़ा था पर इसमें भारत का कोई दोश नहीं था। बावजूद इसके तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री ने भारत पर दोश मढ़ने से बाज नहीं आये। प्रधानमंत्री मोदी की 2014 की नेपाल यात्रा और अप्रैल 2015 में नेपाल में आये भूकम्प से जो भीशण तबाही हुई थी और भारत ने जिस तर्ज पर राहत और बचाव को लेकर तत्परता तथा सक्रियता दिखाई थी बेषक इससे सम्बंध एक नई ऊँचाई पर पहुंच गये थे। उस दौरान सुषील कोइराला के हाथों में नेपाल की बागडोर थी। कूटनीति में यह प्रचलित है कि अभी की राय षुमारी हमेषा के लिए कायम नहीं रहती। ठीक यही भारत-नेपाल रिष्तों पर भी लागू होती है। दोनों देषों के सम्बंधों में टकराव की स्थिति या यूं कहें कि भटकाव की स्थिति नवम्बर, 2015 में तब पहुंचा जब नेपाली संविधान के लागू होने को लेकर मधेसी सड़क पर आ गये। हालांकि यह नेपाल का अंदरूनी मामला था लेकिन तराई में बसे भारतीय मूल के नेपाली जब संविधान में पौने तीन करोड़ के नेपाल में सवा करोड़ की आबादी होने के बावजूद हाषिये पर फेंक दिये गये तो इसकी तिलमिलाहट भारत को होना स्वाभाविक थी फिर भी भारत ने नपे-तुले अंदाज में बात कहते हुए पूरा संयम दिखाया। मधेसियों का आंदोलन अहिंसक नहीं रहा और यह इतना तूल पकड़ा कि संतुलन की चाह रखने वाले भारत पर सारे आरोप नेपाल ने बिना किसी सोच-समझ के मढ़ दिये।
अब नेपाल की स्थिति बदल गयी है, वहां के प्रधानमंत्री बदल गये हैं। दूसरी बार प्रधानमंत्री बने पुश्प कमल दहल उर्फ प्रचण्ड इन दिनों भारत प्रवास पर है। चार दिवसीय इस कार्यक्रम में काफी कुछ किया जाना है। उम्मीद दोनों तरफ से है ऐसे में आषा है कि अब तक के हुए कूटनीतिक डैमेज को मैनेज कर लिया जायेगा। दुनिया भर में कूटनीति में अव्वल होने का डंका बजा चुके प्रधानमंत्री मोदी भी नेपाल से सम्बंध को पटरी पर लाने का कोई अवसर फिलहाल नहीं छोड़ना चाहेंगे। खास यह भी है जब आज से आठ वर्श पहले प्रचण्ड पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने भारत आने की परम्परा को तोड़ते हुए पहली यात्रा के तौर पर चीन को चुना था। जाहिर है कि भारत के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाने की फिराक में उन्होंने यह कदम उठाया था। तब से अब में बहुत कुछ बदल गया है। हिंसक माओवादी विद्रोह का नेतृत्व करने वाले प्रचण्ड  इस पूरे दौरान में व्यवहारिक समझ से भी ओत-प्रोत हो चुके हैं। केपी ओली के समय में बढ़ी दूरियों को प्रचण्ड अपने इस व्यवहारिक समझ के तहत समाधान की ओर ले जा सकते हैं बषर्ते उस हठ को छोड़ना होगा जिसके चलते मधेसी नेपाली होते हुए भी भेदभाव के षिकार हो रहे हैं। हालांकि इस समय भारत और नेपाल के सम्बंध धीरे-धीरे स्वयं सामान्य की ओर जा रहे हैं। भारत आने से पहले ऐसे बयान भी नेपाल की ओर से आये हैं कि दोनों देषों के बीच विष्वास बढ़ता है। यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने नेपाल आकर हम सबको प्रेरित किया। गौर करने वाली बात यह भी है कि चीन के बारे में यह भी बात कही गयी कि वह विचारधारा पर नहीं चलता बल्कि उसका मुख्य लक्ष्य अपने राश्ट्रीय हितों की पूर्ति और मात्र मुनाफा है। उक्त बयानों के दायरे में प्रचण्ड को देखा जाय तो नये प्रधानमंत्री प्रचण्ड पुराने प्रचण्ड से काफी दूर हैं। 
चार दिवसीय यात्रा पर पहुंचे प्रचण्ड नेपाल के नये युग के प्रारम्भकत्र्ता भी सिद्ध हो सकते हैं। भारत और नेपाल संविधान विवाद से ऊपर उठकर सम्बंधों की नई गाथा लिख सकते हैं। प्रधानमंत्री से द्विपक्षीय वार्ता में जो सकारात्मकता का पुट निहित है उसे परवान चढ़ा सकते हैं। इस दौरान दोनों देषों के बीच 6800 मेगाहट्र्ज की तीन विद्युत परियोजनाओं के निर्माण पर समझौता होना है। इसके अलावा भारत-नेपाल के समक्ष सीमावर्ती एवं तराई के इलाके में 1800 किलामीटर लम्बी रेल लाइन बिछाने का भी प्रस्ताव रखेगा। भले ही नेपाल एक विदेषी मुल्क रहा हो पर भारत ने कभी भी नेपाल को लेकर स्वयं के अन्दर कोई दोश नहीं पनपने दिया बल्कि जितना हो सका समय-समय पर उसकी मदद के लिए तैयार रहा। नेपाली प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने भी कहा है कि सभी को विष्वास में लेने के बाद ही संविधान में संषोधन होगा। जब तक थारूओं और मधेसियों को विष्वास में नहीं ले लिया जाता तब तक नये संविधान को लागू करने के लिए माहौल नहीं बनाया जा सकता। प्रचण्ड का यह तौर-तरीका इस ओर इषारा करता है कि नेपाली संविधान के मामले में वे भी बिना मधेसियों को संतुश्ट किये कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। बीते 3 अगस्त को नेपाल की दूसरी बार बागडोर संभालने वाले नेपाली प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि नई व्यवस्था का षीर्श फोकस संविधान लागू होने से पहले सही माहौल बनाना है और जरूरी संषोधनों के लिए पथ भी चिकना करना है। जिस तर्ज पर प्रचण्ड अपना विचार सकारात्मक करने की कोषिष कर रहे हैं उससे भी यह साफ है कि लगभग एक बरस से दोनों देष के बीच बढ़ी कटुता को अब वे आगे नहीं बढ़ाना चाहते। नेपाल जानता है कि भले ही किसी भी परिस्थिति में सारी दुनिया उससे किनारा कर ले पर भारत है कि उसका हर हाल में साथ जरूर देगा। 
नेपाल अपना 60 फीसदी आयात भारत के जरिये पूरा करता है। इन्फ्रास्ट्रक्चर की हालत दयनीय होने के साथ ही दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां भी नेपाल को भारत की ओर बेहतर सम्बंध के लिए उकसाती रही हैं। हालांकि नेपाल इसके पहले चीनी कार्ड खेलकर भारत को झटका देने का काम भी कर चुका है। बीजिंग ने पेट्रोलियम पदार्थों और दूसरी जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति भी नेपाल में पहले की है। यहां बता दें कि कुछ भी हो चीन नेपाल की सभी जरूरतें कभी पूरा नहीं कर सकता जबकि भारत के बगैर नेपाल की जरूरत पूरी ही नहीं हो सकती पर बदलते हालात को देखते हुए चीन ने अपने हावभाव को बदलकर नेपाल को अपने पाले में थोड़े समय के लिए कर लिया था। भारत-नेपाल के रिष्तों में प्रचण्ड का यह दौरा कई मामलों में बेहतर हो सकता है। इनके आने से पहले भारत आये नेपाल के विदेष मंत्री और उप-प्रधानमंत्री ने संविधान विवाद के निपटारे हेतु भारत के पक्ष पर गम्भीरता से विचार करने का संदेष दे चुके हैं। दोनों देष को चाहिए कि तल्खी खत्म करने के लिए नई रणनीति पर काम करें। दोनों देषों का हित एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है एक के विकास से दूसरे की सुगमता बढ़ती है जाहिर है कि मन-मुटाव से कुछ हासिल नहीं होगा। दोनों के आपसी और मजबूत सम्बंध चीनी खतरों को भी कमजोर करेंगे। जिस तर्ज पर प्रचण्ड का राश्ट्रपति भवन के प्रांगण में स्वागत हुआ, सेना के तीनों अंगों की संयुक्त टुकड़ी की प्रचण्ड ने सलामी ली और जिस प्रकार भारत में पहुंचने का उनका स्वाभाविक और सकारात्मक एहसास देखने को मिला। इससे साफ है कि वे सम्बंधों की कटुता को अब बकाया नहीं छोड़ना चाहेंगे।

सुशील कुमार सिंह


Thursday, September 15, 2016

भारत-रूस की दोस्ती के बीच पाकिस्तान

इन दिनों दक्षिण एषिया में नये-नये समीकरण उभर रहे हैं। बीते दिनों यह खबर आई कि रूस और पाकिस्तान इस वर्श के अन्त में एक ज्वाइन्ट वाॅर एक्सरसाइज़ करने वाले हैं जिसे फ्रेन्डषिप 2016 नाम दिया गया है। इसके अलावा जो भी कूटनीतिक घटनाक्रम वैष्विक फलक पर बदलाव की ओर जा रहे हैं उसे देखते हुए यह लगने लगा है कि अमेरिका के साथ भारत के करीबियों के बाद अब रूस, पाकिस्तान और चीन भारत को अलग-थलग करने के चलते एक साथ आने की जद्दोजहद में है। साफ है कि जब चीन और रूस दक्षिणी चीन सागर में साथ होंगे तो अमेरिका और जापान की चिंता बढ़ेगी। इतना ही नहीं भारत की परेषानी के सबब यह है कि उसका दषकों पुराना मित्र रूस पाकिस्तान से मोह पाल रहा है। गौरतलब है कि बीते दिनों भारत, अमेरिका और जापान ने दक्षिण चीन सागर में अभ्यास करके चीन की मुष्किल बढ़ा दी थी। अब वार-पलटवार की बारी चीन की है। चीन और रूस के बीच इस एक्सरसाइज़ को ज्वाइन्ट सी 2016 नाम दिया गया है जो आठ दिनों तक चलेगा। इसके अलावा रूस और पाकिस्तान भी पहली बार संयुक्त अभ्यास करने की तैयारी में है। अमेरिका के साथ रिष्तों में आई खटास के चलते पाकिस्तान नये साझेदार के रूप में रूस की ओर झुका है। यहां स्पश्ट कर दें कि षीत युद्ध के दिनों में जब अमेरिका और सोवियत संघ आमने-सामने थे तब पाकिस्तान और सोवियत संघ भी एक-दूसरे के दुष्मन थे और भारत सोवियत संघ का सबसे बड़ा मित्र परन्तु अब हालात बहुत बदल चुके हैं। वांषिंगटन से रिष्ते में खटास के चलते हथियारों के मामले में पाकिस्तान अब मास्को की तरफ देख रहा है। खबर तो यह भी है कि दोनों देष रक्षा और सैन्य तकनीक सहयोग बढ़ाना चाहते हैं जो किसी भी हाल में भारत के लिए खतरे की घण्टी है। 
जब 1939 से 1945 के बीच हुए द्वितीय विष्वयुद्ध के बाद दुनिया दो ध्रुवों में बंटी थी जिसमें एक ध्रुव अमेरिका तो दूसरा रूस था तब पाकिस्तान अमेरिका के साथ था। भारत वैसे तो किसी गुट में न होने का दावा हमेषा से करता रहा है पर उसका झुकाव रूस की तरफ ही था और आज भी भारत और रूस गहरे मित्र हैं। दोनों देषों के बीच दषकों से जो दोस्ती रही है वह अवसरवादी सम्बंधों की दुनिया में अपने आप में दुर्लभ कही जायेगी। 1979 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में घुसपैठ की तो भारत ने उसके इस कृत्य की आलोचना नहीं की जिसे लेकर पष्चिमी देषों के पेट में खूब दर्द भी हुआ था। इस कदम को लेकर भारत पर यह भी आरोप मढ़ा गया था कि एक ओर तो वह स्वयं स्वतंत्रता का समर्थक बताता है परन्तु जब सोवियत संघ ने दक्षिण एषिया के एक देष पर आक्रमण किया तो वह चुपचाप था। असल सच यह है कि भारत रूस के साथ उस गहरी मित्रता का निर्वहन कर रहा था जो 1971 में सोवियत संघ द्वारा किये गये समर्थन के बदले था। इसी दौर में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जार्डन, इंडोनेषिया और चीन समेत कई पष्चिमी और मुस्लिम देषों ने पाकिस्तान का पक्ष लिया था। आज इन बातों पर पुनः जिक्र करने का अवसर इसलिए बना है क्योंकि यह बातें छन-छनकर आ रही हैं कि रूस का रूख पाकिस्तान की ओर झुक रहा है। यदि यह पूरी तरह सम्भव होता है तो वैष्विक फलक पर जो भारत की कूटनीति इन दिनों विस्तार ले चुकी है उसमें एक सेंधमारी कही जायेगी। गौरतलब है  कि भारत और रूस के बीच का सम्बंध पांच दषक पुराना है और दोनों देष एक-दूसरे के प्रति न केवल आदर भाव रखते हैं बल्कि वैष्विक फलक पर घटी घटनाओं के बीच एक-दूसरे का साथ देने में भी पीछे नहीं रहे हैं।
देखा जाय तो स्वतंत्रता से लेकर अब तक भारत की वैष्विक कूटनीति कभी अधिक उपजाऊ तो कभी कम उपजाऊ रही है। फिलहाल इन दिनों वैष्विक फलक पर भारतीय कूटनीति की बढ़ी हुई मात्रा देखी जा सकती है। पड़ोसी देष चीन और पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध कभी भी चरम पर नहीं पहुंच पाये। इसका कसूरवार भारत तो कतई नहीं है। भारत और चीन के बीच 1954 का पंचषील समझौता बेहतरी की दिषा में उठाया गया मजबूत कदम तो था परन्तु 1962 के चीनी प्रहार के चलते यह भी तार-तार हो गया। पाकिस्तान के साथ युद्ध तो कई हुए पर नतीजे जस के तस रहे। भारत बार-बार जीतता रहा पर पाकिस्तान एक बार भी हार नहीं माना। हालात को देखते हुए उसने प्रत्यक्ष युद्ध की नीति छोड़ छद्म तरीके से प्रहार करने पर उतारू रहा। मौजूदा आतंकी गतिविधियां इसी का नतीजा हैं। 1972 का षिमला समझौता दोनों देषों के बीच आज भी मील का पत्थर साबित नहीं हो पाया। मौजूदा स्थिति यह है कि चीन और पाकिस्तान भारत को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। गौरतलब है कि बीते एक वर्श से पड़ोसी नेपाल के साथ भी भारत की कूटनीति सकारात्मक दिषा में कम ही दिखाई दे रही है। हांलाकि यहां भी कसूरवार भारत नहीं है। असल में नेपाल के नये संविधान के चलते उपजे मधेसी आंदोलन ने भारत और नेपाल के बीच संदेह का एक मौका दे दिया। हमेषा से भारत के प्रति झुकाव रखने वाले नेपाल ने उन दिनों चीन के प्रति झुकने की चेतावनी भी दे थी। गौर करने वाली बात तो यह है कि मौजूदा नेपाली प्रधानमंत्री प्रचण्ड जब पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे तो वे भारत से पहले चीन गये थे। बदले परिप्रेक्ष्य और बदली कूटनीति में सारा तानाबाना तो सही नहीं होगा पर इसे साधने की जिम्मेदारी एक बार फिर बढ़त ले चुकी है। 
मुख्य चिंता इन दिनों रूस का पाकिस्तान की ओर चुकाव है। इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है कि भारत और रूस के लोग निजी तौर पर बेहद जीवंत और भावुक होते हैं। इतना ही नहीं तुरंत दोस्ती कर लेने में यकीन नहीं रखते हैं और ऐसा कहा जाता है कि दोनों के बीच एक बड़ी समानता यह है कि दोनों देषों के लोगों के जीवन में परिवार का बड़ा महत्व है। यूरेषिया की विस्तृत भू-भाग पर स्थिरता बनाये रखने के मामले में भारत और रूस के सामरिक हित बहुत मायने रखते हैं। अफगानिस्तान, सीरिया और यूक्रेन में भी दोनों के हित आपस में गुथे हुए हैं। षायद ही लोगों को पता हो कि यूक्रेन रक्षा उद्योगों का बड़ा केन्द्र है और भारतीय रक्षा उपकरणों की सर्विसिंग के लिए इसका बड़ा महत्व है। रूस पूरी दुनिया में ऊर्जा का सबसे बड़ा उत्पादक देष भी है जबकि अमेरिका और चीन के बाद भारत ऊर्जा का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भी रूस का साथ बड़ा जरूरी है। रक्षा प्रौद्योगिकी के मामले में भी रूस और भारत के बीच दषकों से सौदे होते रहे हैं। भारत पष्चिमी देषों के अनेकों प्रतिबन्ध झेल चुका है बावजूद इसके रूस ने दामन नहीं छोड़ा। एक-दूसरे के लिए खड़े होना और इसकी विष्व में यदि कोई मिसाल है तो वह भारत और रूस की मित्रता है। भारत भी जानता है कि अमेरिका और रूस अब विष्व के दो ध्रुव तो नहीं पर अभी भी आमने-सामने हैं। भले ही अमेरिका से भारत की प्रगाढ़ता तुलनात्मक खूब बढ़ी हो परन्तु भारत यह लगातार स्पश्ट करता रहा कि किसी भी तरह से रूस के साथ उसके दषकों पुराने व मजबूत रिष्ते को कमतर नहीं होने देंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त 2016 की षुरूआत में राश्ट्रपति पुतिन के साथ वीडियो कांफ्रेन्सिंग से हुई बातचीत में रूस की अहमियत भी बताई थी। भले ही रूस का रूझान किसी कारण पाकिस्तानमय इन दिनों हुआ हो पर रूस भी जानता है कि उसका असल मित्र कौन है।


सुशील कुमार सिंह