Monday, February 22, 2016

स्वप्रमाणित हो देशभक्ति

विचारधाराओं का अन्त, वाद-विवाद का जन्म दो परस्पर स्कूलों के बीच 1960 के दषक में प्रारम्भ हुआ तत्कालीन समय में दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं से तात्पर्य है उदारवादी (पूंजीवादी) एवं साम्यवादी। पहली विचारधारा का नेतृत्व अमेरिका जबकि दूसरे का पूर्व सोवियत संघ के हाथों में था लेकिन आधुनिक चिंतकों का एक मत यह भी है कि आज के संदर्भ में कोई भी देष विचारधारा पर चलने का दावा नहीं कर सकता। यहीं से विचारधाराओं का अन्त परिलक्षित होने लगता है। भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ और देष की सम्प्रभुता को कायम रखने के लिए पूरी कूबत भरा संविधान भी साथ लेकर चलता रहा जिसके सात दषक पूरे होने वाले हैं। भारत न तो 1960 के उन देषों की पंक्ति में खड़ा था जहां विचारधाराओं का अंत हो रहा था और न ही ऐसी चाहत से भरा था जहां से देष को ठेस पहुंचाने वाली कोई सुलगती आफत आती हो। दो ध्रुवों में बंटे विष्व के बीच भारत ने एक रास्ता नहीं अपनाया वरन् पूंजीवाद के साथ समाजवाद को लेकर अपना नया मार्ग बनाया जिस पर आज भी उसे कायम होते हुए देखा जा सकता है। औपनिवेषिक काल में भी कई विचारधाराएं अन्दर ही जन्म ले रही थीं जिसका विस्तार आज की भारतीय राजनीति में बाकायदा देखा जा सकता है। जेएनयू प्रकरण ने देष में दो विचारधाराओं को एक बार फिर आनन-फानन में उदय कर दिया है एक वो जो देष और उसकी राश्ट्रभक्ति में सर्वस्व न्यौछावर कर रहे हैं और दूसरे वे जिन्हें देष के अमन-चैन से तकलीफ है। देष भर के समाचारपत्रों और टीवी चैनलों पर भी बहस छिड़ी है। देखा जाए तो देष का चैथा स्तम्भ भी विचारों में बंटा हुआ है। बंटवारा किसके हिस्से में कितना मुनाफे वाला है इसकी पड़ताल आगे होती रहेगी।
एक बड़ी खूबसूरत कहावत है कि ‘जब हम आराम के दिनों में होते हैं तो आराम छोड़कर बाकी सब कुछ करते हैं।‘ भारत स्वतंत्रता से लेकर करीब-करीब 90 के दषक तक कई आधुनिक संदर्भों और नवनूतन विकास में पीछे रहा। तब हमारी विचारधाराएं और संघर्श इतने विचलित नहीं थे। उदारीकरण से लेकर अब तक देष ने और देष के लोगों ने विकास के साथ उत्थान और गति को भी हासिल कर लिया। हैरत यह है कि देष से जो मिला उसके ऋण उतारने के बजाय अब ऊंच-नीच करने पर उतारू हैं। कई लोग इसे खूबसूरत लोकतंत्र की संज्ञा भी दे रहे हैं। मैं यहां 9 फरवरी के जेएनयू प्रकरण को लेकर बात कहने की कोषिष कर रहा हूं। यहां जो हुआ उसे लेकर सियासत तो गरम है ही, देष के नागरिकों में भी अलग-अलग मानकों पर उबाल है और इस बात पर भी जोर है कि किसकी देषभक्ति कितनी बड़ी है। चूंकि मामला विष्वविद्यालय से उभरा था ऐसे में पहले उन्हें ही देषभक्ति सिद्ध करनी थी। इसी के मद्देनजर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने निर्णय लिया कि प्रत्येक केन्द्रीय विष्वविद्यालय जिनकी संख्या देष में 47 है वे रोज 207 फीट ऊंचा तिरंगा फहरायेंगे। कईयों ने सवाल भी उठाया कि तिरंगा तो ठीक है पर इसकी ऊंचाई इतनी क्यों? कुछ ने तो यह भी कहा कि देषभक्ति की परीक्षा केन्द्रीय विष्वविद्यालय ही क्यों दें, बाकी विष्वविद्यालय भी इस परिधि में क्यों नहीं? हालांकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की यह पहल जेएनयू से ही षुरू की जा रही है जहां से देष के टूटने की आवाज आई थी। देखा जाए तो संविधान में निहित अनुच्छेद 19(1)क इन तमाम के बीच में आ गया। यह सही है कि यही अनुच्छेद हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है। समझने की एक बात और यह है कि हमारी अभिव्यक्ति में यह अनुच्छेद जितना मजबूत है उतना ही कमजोर भी प्रतीत होता है इसे समझने की जहमत किसी ने ही षायद उठाई हो। मसलन हम भारत माता की जय कर सकते हैं, वन्दे मातरम् भी कर सकते हैं और वह सब कुछ कर सकते हैं जिसमें राश्ट्रहित के साथ कोई अनहोनी न हो और इसकी आड़ में हम स्वहित भी साध सकते हैं बषर्ते मर्यादा का ख्याल रहे। पर इसकी कमजोरी यह है कि इस प्रावधान की अपनी एक नैतिक सीमा है जिसे समझने में कुछ लोग भूल कर रहे हैं वहीं इसे कमजोर भी बना रहे हैं साथ ही इसकी आड़ में इसे महिमामण्डित भी कर रहे हैं। अफजल की आजादी, कष्मीर की आजादी और भारत तेरे होंगे टुकड़े-टुकड़े आदि की अभिव्यक्ति की इजाजत यह प्रावधान नहीं देता है। यह तो साफ है कि जेएनयू में जो किया गया वह अभिव्यक्ति में तो नहीं आता पर जिस कदर इस प्रकरण को सियासी दलों ने ‘हाइजैक‘ किया उसे भी सही नहीं कहा जा सकता। विचारों में बंटे सियासी दल अपनी-अपनी रोटियां सेंक रहे हैं और सीमा पर सुरक्षा देने वाले बर्फ के रेगिस्तान में जान दे रहे हैं। यहां पर भी विचारधाराओं का कोई मेल नहीं है।
विचारधारा से ही आदर्ष समाज की परिकल्पना की जाती है। विचारधाराएं सामाजिक परिवर्तन पर बल देती हैं। देषभक्ति भी एक विचारधारा ही है। इसके अलावा फांसीवाद, यथास्थितिवाद, साम्राज्यवाद आदि भी विचारधाराएं ही हैं जिनका भारत से कोई लेना-देना नहीं है। मौजूदा स्थिति में देष कई सियासी विचारधाराओं से भी युक्त है जैसे कांग्रेसी विचारधारा, भाजपा की विचारधारा, समाजवादी विचारधारा और वामपंथी समेत कई अन्य विचारधाराएं मौजूद हैं। सवाल तो यह है कि विचारधाराओं का विकास और उसका निश्पादन देष की उन्नति और उत्थान का जरिया बन रहा है या नहीं। यदि विचारधारा उस स्वतंत्रता को हासिल करने की फिराक में हो  जिससे का अस्तित्व खतरे में पड़ता हो तो ऐसी विचारधाराओं का देष में फिलहाल इजाजत नहीं है। भारतीय संविधान भी दो विचारधाराओं से कसा हुआ है एक संघात्मक तो दूसरा एकात्मक। संविधान भी साफ करता है कि सामान्य परिस्थितियों में संघात्मक का निश्पादन जबकि आपात की परिस्थितियों में एकात्मक लक्षण से युक्त होगा। कई यह भी मानते हैं कि देष में इन दिनों अघोशित आपात की स्थिति प्रतीत होती है। इसे भी एक विचारधारा कह सकते हैं पर पूरी सच्चाई पड़ताल का विशय है। जाहिर है संविधान में ऐसे किसी षब्द का उल्लेख नहीं मिलता है। देष में ऐसा भी रहा है कि विचारधाराओं ने अपनी जड़े जमाने के लिए ‘ग्रेषम का नियम‘ भी अपना ली हैं इसका एक आर्थिक है कि ‘बुरी मुद्रा, अच्छी मुद्रा‘ को बाजार से बाहर कर देती है। इसी तर्ज पर देखें तो खराब विचारधाराएं पैठ बनाने के चक्कर में अच्छी विचारधाराओं का दमन और षोशण भी करती हैं। जेएनयू में भारत के खिलाफ जो विचारधारा उठी वह उसी बुरी मुद्रा की तरह है जो अपने हो-हल्ले के चलते और सियासी दलों के समर्थन के चलते अच्छी विचारधारा का लोप करना चाहती है।
लोकतांत्रिक विचारधाराओं का भी कई प्रारूप है मसलन समावेषी लोकतंत्र, विमर्षीय लोकतंत्र आदि। विमर्षीय लोकतंत्र का आभासी परिप्रेक्ष्य यह है कि यह मसले को चर्चे के केन्द्र में लाती है पर इसका नकारात्मक पहलू यह है कि यदि यह अभिजात्य के हाथों में चली गई तो रास्ते से भटक सकती है। जेएनयू में जो चर्चा थी वह न तो विमर्षीय लोकतंत्र में आती है और न ही इसमें कोई अन्य प्रकार की लोकतांत्रिक चीज षामिल थी। मानो यह देष को एक नई समस्या में जकड़ने का एक नियोजित कार्यक्रम था। जेएनयू परिघटना को एक पखवाड़ा बीतने के बाद भी देष इससे मुक्त होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा। इसी से पता चलता है कि ऐसे विमर्ष और वाद-विवाद भारत के लिए कितनी तबाही बन सकते हैं। संदर्भ यह भी है कि देषभक्ति के पैमाने पर किसे क्या करना चाहिए यह कोई नहीं सिखाएगा बल्कि यह स्वयं का एक विशय है।



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

Friday, February 19, 2016

जेएनयू मामले में कांग्रेस का सिद्धांत और व्यवहार

लोकतंत्र केवल षासन का ही रूप नहीं बल्कि व्यक्ति के आत्मविकास का भी साधन है। पर इसी लोकतंत्र की आड़ में ऐसी क्रियाओं का उत्पादन होने लगे जो इसके अस्तित्व के लिए ही चुनौती हो तब क्या होगा? समकालीन लोकतंत्र का एक प्रमुख सिद्धान्त ‘विमर्षीय लोकतंत्र‘ भी है इसका अभिप्राय ‘चर्चा की स्वतंत्रता‘ है। मगर इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमी है कि वह व्यक्ति की तुलना में समूह पर बल देता है। कहीं-कहीं समूह में नेतृत्व की भावना का उदय हो जाता है। इतना ही नहीं इस प्रकार के लोकतंत्र में विषिश्ट वर्ग का प्रभाव किसी न किसी रूप में जुड़ जाता है इन्हीं प्रभावों के चलते यह अपने असल मार्ग से भटक भी सकता है। जेएनयू प्रकरण की वर्तमान वास्तुस्थिति इसी प्रकार के तथाकथित संदर्भों से निहित प्रतीत होती है। बीते 9 फरवरी को जेएनयू में इसी चर्चा की स्वतंत्रता के चक्कर में कब संविधान की मर्यादा तार-तार हो गयी किसी को इसका ध्यान ही नहीं रहा। जितनी भी लानत-मलानत देष को लेकर हो सकती थी वह सब यहां थोक के भाव देखा जा सकता है। पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे से लेकर भारत तेरे होंगे टुकड़े-टुकड़े की गूंज के साथ कष्मीर की आजादी और आतंकी अफज़ल गुरू की हिमायत वाली करतूत भी यहां देखी जा सकती है। समस्या तब और बढ़ जाती है जब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ऐसे वक्तव्यों को अभिव्यक्ति की आजादी कहते हुए सियासी रंग देते हुए जाने-अनजाने इसका समर्थन कर देते हैं साथ ही प्रधानमंत्री मोदी पर यह आरोप मढ़ना कि मोदी सरकार जेएनयू जैसे संस्थान पर अपनी धौंस जमा रही है जो पूरी तरह निंदनीय है।
लोकतंत्र की एक मूल मान्यता और आधार तत्व ‘न्याय‘ है जिसमें राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय पर बल दिया जाता है। इसके अलावा भी कई अच्छे मानकों से लोकतंत्र भरा पड़ा है पर इसके साथ अन्याय करने वालों की भी कमी नहीं है। कई इस बात का दम भरते हैं कि वे करोड़ों की आवाज है जबकि यह पूरा सच नहीं है परन्तु यह तब तक मुगालते में रहते हैं जब तक जनता का सामना नहीं होता। भारत में प्रति पांच वर्श की दर पर चुनाव होते हैं तब पता चलता है कि ये कितनों की आवाज हैं। मई 2014 के 16वीं लोकसभा के नतीजे इस बात का समर्थन करते हैं कि फिलहाल कांग्रेस मात्र मुट्ठी भर लोगों की आवाज बन कर रह गयी है जबकि वामपंथ तो सिर्फ भारतीय राजनीति में सांस लेने का काम कर रहा है परन्तु जो भारी-भरकम आवाज के साथ देष में स्वीकार्य बहुमत की सरकार में है वही लोग उसे आवाज दबाने वाला बता रहे हैं। राजनीति इस बात के लिए भी रोचक कही जायेगी कि विरोधी कमतर होने के बावजूद सरकार को अधिकतम मानने की भूल नहीं करते। हद तो तब हो जाती है जब विरोध करने वाले विरोधी धर्म ही भूल जाते हैं। भारत इन दिनों ‘राइट-लेफ्ट‘ के चक्कर में भी फंस गया है। मोदी सरकार के अलावा सारे राजनीतिक दल विरोध की राजनीति करेंगे इसे सब समझते हैं पर राश्ट्रीय एकता और अखण्डता के सवाल पर भी यह विरोध कायम रहेगा इसे षायद ही कोई उचित ठहराये। कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि औपनिवेषिक काल के उन दिनों में भी वामपंथी विचारधारा का इनसे कोई मेल-मिलाप नहीं था। उस जमाने में भी मामला ‘राइट-लेफ्ट‘ ही था। 70 साल के आजादी के इतिहास के बाद भी अभी यह बात झुठलाई नहीं गई है परन्तु एक बार 2004 में 14वीं लोकसभा के समय वामपंथ के समर्थन से कांग्रेस ने सरकार हांकी थी पर खामियाजा क्या हुआ, न्यूक्लियर मामले में समर्थन वापसी के चलते सरकार मायावती और मुलायम की वजह से पटरी से उतरते-उतरते बची थी। तब से लेकर अब तक कांग्रेस और वामपंथ दो किनारे की तरह ही रहे हैं पर जेएनयू प्रकरण के चलते इनको एक बार फिर एक साथ होने का मौका मिला है।
भारत के वर्तमान सियासी परिप्रेक्ष्य को देखते हुए क्या यह समझा जाना चाहिए कि इन दिनों कांग्रेस और वामपंथ विरोधी धर्म निभा रहे हैं या यह समझना चाहिए कि मोदी सरकार के विरोध के लिए गैर वाजिब को लेकर सुर मिला रहे हैं। इतनी सरल सी बात क्यों समझने में गलती हो रही है और वह गलती कांग्रेस के हिस्से में सर्वाधिक है, यह कि संविधान की प्रस्तावना में लिखित ‘राश्ट्रीय एकता और अखण्डता‘ और मूल अधिकार में निहित अनुच्छेद 19(1)क के तहत मिली ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता‘ की भी अपनी सीमाएं और मर्यादाएं हैं इसका यह कदापि तात्पर्य नहीं है कि कुछ भी बोल कर इन प्रावधानों के तहत स्वयं को सही ठहरा देंगे। जेएनयू में जो हुआ वह संविधान की मर्यादा को तो तार-तार करता ही है, देष की कानून व्यवस्था के लिए भी बहुत बड़ा खतरा है। गुटों में बंटे छात्र जिस कदर आमने-सामने हैं वह भी चिन्ता का विशय है साथ ही देष के अन्य विष्वविद्यालय भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। माना कि षिक्षा हस्तांतरण के साथ विष्वविद्यालय नेतृत्व और कौषल विकास के जरिया भी हैं पर यह कैसा कौषल विकास जो देष के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है। जेएनयू में हुई देष विरोधी घटना को सिरे से नकारना चाहिए और जो न्यायोचित हो उस पर अमल करना चाहिए। कांग्रेस इस मामले में एक अच्छा रास्ता अख्तियार कर सकती थी पर दुर्भाग्य से वह ऐसी चूक कर गई जिसमें उसकी सियासत तो गरम हो गयी पर जो वातावरण बना षायद उसे वो भी नहीं चाहती रही होगी। रही बात सरकार की तो सरकार ने जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके क्या कोई गलत कदम उठाया है, इसका भी खुलासा बाद में हो जायेगा पर जिस प्रकार कांग्रेस देष को कन्फ्यूज़ करने की कोषिष कर रही है उसे कहीं से जायज़ कैसे करार दिया जा सकता है। जेएनयू में दिये बयान के चलते राहुल गांधी पर इलाहाबाद के एक न्यायालय ने कई धाराओं में मुकद्मा दर्ज करने का आदेष भी दिया है।
फिलहाल देखा जाए तो कांग्रेस सर्वाधिक पुरानी पार्टी है पर 65 सालों के लोकतांत्रिक इतिहास में 12 वर्श ही विरोध की भूमिका में रही है और 16वीं लोकसभा में तो विरोध भी मान्यता प्राप्त नहीं है। यह भी देखा गया है कि विगत् 20 महीनों से कांग्रेस मोदी सरकार को हर छोटे-बड़े मसले में संसद से लेकर सड़क तक  घेरती रही है। यही घेरने वाली आदत के चलते जेएनयू जैसे संवेदनषील मुद्दे पर भी राहुल गांधी ने ऐसा वक्तव्य दे दिया जिससे देष दो विचारों में बंटता दिखाई दे रहा है। सिद्धान्त और व्यवहार की दृश्टि से कांग्रेस को समय के साथ रूख बदल लेना चाहिए और देष की एकता और अखण्डता के मामले में बिना किसी पक्ष और प्रतिपक्ष के एक सुर में खड़े होने चाहिए। राहुल गांधी का छात्रों की गिरफ्तारी को गलत बताने का विचार आना समझा जा सकता है पर यह कहना कि ‘सबको अपनी बात कहने का हक‘ है, इसलिए समुचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि देष को तोड़ने वाली बातें किस ढांचे के अन्तर्गत हकदारी में आती हैं। उनके द्वारा यह भी कहना कि ‘आवाज दबाने वाला देषद्रोही‘ है, बेषक आवाज नहीं दबाई जानी चाहिए पर क्या अफज़ल गुरू के समर्थन में और कष्मीर की आजादी की आवाज़ को भी नहीं दबाना चाहिए? फिलहाल देष में विधि व्यवस्था से पूर्ण न्यायपालिका है जो निरपेक्ष है जिस पर सभी का भरोसा है समय आने पर दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
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देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)

Wednesday, February 17, 2016

इस 'किन्तु-परन्तु' के बीच

शिक्षा या शोध तब तक पूर्ण नहीं हो सकता जब तक सामुदायिक सेवा और सामुदायिक जिम्मेदारी से निहित षिक्षा न हो। ठीक उसी भांति षैक्षणिक दुनिया तब तक पूरी नहीं कही जा सकती जब तक स्त्री षिक्षा की भूमिका पुरूश की भांति सुदृढ़ नहीं हो जाती। आज यह सिद्ध हो चुका है कि अर्जित ज्ञान का लाभ कहीं अधिक मूल्य युक्त है। ऐसे में समाज के दोनों हिस्से यदि इसमें बराबरी की षिरकत करते हैं तो लाभ भी चैगुना हो सकता है। देखा जाए तो 19वीं सदी की कोषिषों ने नारी षिक्षा को उत्साहवर्धक बनाया। इस सदी के अन्त तक देष में कुल 12 काॅलेज, 467 स्कूल और 5,628 प्राइमरी स्कूल लड़कियों के लिए थे जबकि छात्राओं की संख्या साढ़े चार लाख के आस-पास थी। औपनिवेषिक काल के उन दिनों में जब बाल विवाह और सती प्रथा जैसी बुराईयां व्याप्त थीं और समाज भी रूढ़िवादी परम्पराओं से जकड़ा था बावजूद इसके राजाराम मोहन राय तथा ईष्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे इतिहास पुरूशों ने नारी उत्थान को लेकर समाज और षिक्षा दोनों हिस्सों में काम किया। नतीजे के तौर पर नारियां उच्च षिक्षा की ओर न केवल अग्रसर हुईं बल्कि देष में षैक्षणिक लिंगभेद व असमानता को भी राहत मिली। हालांकि मुस्लिम छात्राओं का आभाव उन दिनों बाखूबी बरकरार था। वैष्विक स्तर पर 19वीं सदी के उस दौर में इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा जर्मनी में लड़कियों के लिए अनेक काॅलेज खुल चुके थे और कोषिष की जा रही थी कि नारी षिक्षा भी समस्त षाखाओं में दी जाए।
बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में यह आधार बिन्दु तय हो चुका था कि पूर्ववत षैक्षणिक व्यवस्थाओं के चलते यह सदी नारी षिक्षा के क्षेत्र में अतिरिक्त वजनदार सिद्ध होगी। सामाजिक जीवन के लिए यदि रोटी, कपड़ा, मकान के बाद चैथी चीज उपयोगी है तो वह षिक्षा ही हो सकती थी। सदी के दूसरे दषक में स्त्री उच्च षिक्षा के क्षेत्र में लेडी हाॅर्डिंग काॅलेज से लेकर विष्वविद्यालय की स्थापना इस दिषा में उठाया गया बेहतरीन कदम था। आजादी के दिन आते-आते प्राइमरी कक्षाओं से लेकर विष्वविद्यालय आदि में अध्ययन करने वाली छात्राओं की संख्या 42 लाख के आस-पास हो गयी और इतना ही नहीं इनमें तकनीकी और व्यावसायिक षिक्षा का भी मार्ग प्रषस्त हुआ। इस दौर तक संगीत और नृत्य की विषेश प्रगति भी हो चुकी थी। 1948-49 के विष्वविद्यालय षिक्षा आयोग ने नारी षिक्षा के सम्बंध में कहा था कि ‘नारी विचार तथा कार्यक्षेत्र में समानता प्रदर्षित कर चुकी है, अब उसे नारी आदर्षों के अनुकूल पृथक रूप से षिक्षा पर विचार करना चाहिए। स्वतंत्रता के दस बरस के बाद छात्राओं की संख्या कुल 88 लाख के आस-पास हो गयी और इनका प्रभाव प्रत्येक क्षेत्रों में दिखने लगा। वर्तमान में स्त्री षिक्षा सरकार, समाज और संविधान की कोषिषों के चलते कहीं अधिक उत्थान की ओर है। नब्बे के दषक के बाद उदारीकरण के चलते षिक्षा में भी जो अमूल-चूल परिवर्तन हुआ उसमें एक बड़ा हिस्सा नारी क्षेत्र को भी जाता है। वास्तुस्थिति यह भी है कि पुरूश-स्त्री समरूप षिक्षा के अन्तर्गत कई आयामों का जहां रास्ता खुला है वहीं इस डर को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आपसी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है।
आज आर्थिक उदारवाद, ज्ञान के प्रसार और तकनीकी विकास के साथ संचार माध्यमों के चलते अर्थ और लक्ष्य दोनों बदल गये हैं। इसी के अनुपात में षिक्षा और दक्षता का विकास भी बदलाव ले रहा है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि तकनीकी विकास ने परम्परागत षिक्षा को पछाड़ दिया है और इस सच से भी किसी को गुरेज नहीं होगा कि परम्परागत षिक्षा में स्त्रियों की भूमिका अधिक रही है, अब विकट स्थिति यह है कि नारी से भरी आधी दुनिया मुख्यतः भारत को षैक्षणिक मुख्य धारा में पूरी कूबत के साथ कैसे जोड़ा जाए। बदलती हुई स्थितियां यह आगाह कर रही हैं कि पुराने ढर्रे अर्थहीन और अप्रासंगिक हो रहे हैं और इसका सबसे ज्यादा चोट स्त्री षिक्षा पर होगा। यद्यपि विज्ञान के उत्थान और बढ़ोत्तरी के चलते कई चमत्कारी उन्नति भी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि 1947 से 1980 के बीच उच्च षिक्षा में स्त्रियों की संख्या 18 गुना बढ़ी है और अब तो इसमें और तेजी है। कुछ खलने वाली बात यह भी है कि अन्तर्राश्ट्रीय स्तर की जो षिक्षा व्यवस्था है उससे देष पीछे है। विष्वविद्यालय जिस सरोकार के साथ षिक्षा व्यवस्था को अनवरत् बनाये हुए हैं उससे तो कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि संचित सूचना और ज्ञान मात्र को ही यह भविश्य की पीढ़ियों में हस्तांतरित करने में लगे हैं। इससे पूरा काम तो नहीं होगा। कैरियर के विकास में स्त्रियों की छलांग बहुआयामी हुई है पर इसके साथ पति, बच्चों, परिवार के साथ ताल-मेल बिठाना भी चुनौती रही है। काफी हद तक उनकी सुरक्षा को लेकर भी चिन्ता लाज़मी है। बावजूद इसके आज पुत्री षिक्षा को लेकर पिता काफी सकारात्मक महसूस कर रहे हैं।
2011 की जनगणना के अनुसार 65 फीसदी से अधिक महिलाएं षिक्षित हैं पर सषक्तिकरण को लेकर संषय अभी बरकरार है इसके पीछे एक बड़ी वजह नारी षिक्षा ही है परन्तु जिस भांति नारी षिक्षा और रोजगार को लेकर बहुआयामी दृश्टिकोण का विकास हो रहा है अंदाजा है कि भविश्य में ऐसे संदेह से भारत परे होगा। सषक्तिकरण की प्रक्रिया में षिक्षा की भूमिका के साथ साध्य और साधन की मौजूदगी भी जरूरी है साथ ही सामाजिक-आर्थिक विकास को भी नहीं भूला जा सकता है। समाज के विकास में स्त्री भूमिका को आज कहीं से कमतर नहीं आंका जाता मगर यह आज भी पूरी तरह कई किन्तु-परन्तु से परे भी नहीं है। 2011 की जनगणना में निहित धार्मिक आंकड़ों का खुलासा मोदी सरकार द्वारा हाल ही में किया गया था जिसे देखने से पता चलता है कि लिंगानुपात की स्थिति बेहद चिंताजनक है। सर्वाधिक गौर करने वाली बात यह है कि सिक्ख, हिन्दू और मुस्लिम समुदाय को इस स्तर पर बेहद सचेत होने की आवष्यकता है इसमें भी स्थिति सबसे खराब सिक्खों की है जहां 47.44 फीसद महिलाएं हैं जबकि हिन्दू महिलाओं की संख्या 48.42 वहीं मुस्लिम महिलाएं 48.75 फीसदी हैं। केवल इसाई महिलाओं में स्थिति ठीक-ठाक और पक्ष में कही जा सकती है। देखा जाए तो स्त्रियों से जुड़ी दो समस्याओं में एक उनकी पैदाइष के साथ सुरक्षा का है, दूसरे षिक्षा के साथ कैरियर और सषक्तिकरण का है पर रोचक यह है कि यह दोनों तभी पूरा हो सकता है जब पुरूश मानसिकता कहीं अधिक उदार के साथ उन्हें आगे बढ़ाने की है। हालांकि वर्तमान में अब ऐसे आरोपों को खारिज होते हुए भी देखा जा सकता है क्योंकि स्त्री सुरक्षा और षिक्षा को लेकर सामाजिक जागरूकता तुलनात्मक कई गुना बढ़ चुकी है।
मानव विकास सूचकांक को तैयार करने की षुरूआत 1990 से किया जा रहा है। ठीक पांच वर्श बाद 1995 में जेंडर सम्बन्धी सूचकांक का भी उद्भव देखा जा सकता है। जीवन प्रत्याषा, आय और स्कूली नामांकन तथा व्यस्क साक्षरता के आधार पर पुरूशों से तुलना किया जाए तो आंकड़े इस बात का समर्थन करते हैं कि नारियों की स्थिति को लेकर अभी भी बहुत काम करना बाकी है। विकास की राजनीति कितनी भी परवान क्यों न चढ़ जाए पर स्त्री षिक्षा और सुरक्षा आज भी महकमों के लिए यक्ष प्रष्न बने हुए हैं। स्वतंत्र भारत से लेकर अब तक लिंगानुपात काफी हदतक निराषाजनक ही रहा है। हालांकि साक्षरता के मामले में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। वर्तमान मोदी सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ‘ से लेकर कई ऐसे कार्यक्रमों को विकसित करने का प्रयास किया है जिससे कि इस दिषा में और बढ़त मिल सके फिर भी कई असरदार कार्यक्रमों और परियोजनाओं को नवीकरण के साथ लाने की जगह आगे भी बनी रहेगी साथ ही उनका क्रियान्वयन भी समुचित हो जिससे कि षैक्षणिक दुनिया में नारी को और चैड़ा रास्ता मिल सके।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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Tuesday, February 16, 2016

बजट सत्र के मार्ग में कांटे

वह सवाल जो हम सबके सामने मुंह बाये खड़ा है, यह कि उत्पन्य नये प्रकरणों के चलते 23 फरवरी से षुरू होने वाले बजट सत्र का क्या होगा? प्रधानमंत्री मोदी समेत पूरी मंत्रीपरिशद् इसे लेकर घोर चिंता में जरूर होगी। षायद इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने मंगलवार को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमें बजट सत्र संसद में ठीक-ठाक ढंग से चल सके इसे लेकर चर्चा की जानी थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि जेएनयू का मुद्दा इस बैठक में उठाया गया। फिलहाल मोदी ने दोनों सदन को सुचारू रूप से चलाने के लिए विपक्षी दलों से खुलकर सहयोग मांगा है। देखा जाए तो सत्र से पहले ऐसी बैठकों का चलन रहा है। फिलहाल वर्तमान में कई समस्याओं से घिरी सरकार की इस बजट सत्र में एक बार फिर परीक्षा होनी है। बीते वर्श के तीनों सत्रों मसलन बजट सत्र, मानसून सत्र और षीत सत्र के हाल को देखकर अनुमान लगाना सहज है कि विरोधी षायद ही इस सत्र में षांत बैठें। देखा जाये तो वर्श की षुरूआत से ही सरकार कई समस्याओं से घिरती चली गयी। 2016 के दूसरे दिन ही पठानकोट में हुए आतंकी हमले से जहां देष कई दिनों तक असुरक्षित रहा वहीं पाकिस्तान के साथ सरकार को काफी कसरत करनी पड़ी जो अभी भी जारी है। दूसरा पखवाड़ा समाप्त नहीं हुआ था कि हैदराबाद के केन्द्रीय विष्वविद्यालय में रोहित वेमुला नामक षोध छात्र की आत्महत्या ने देष भर में सिरे से एक बार फिर नई समस्या का आगाज कर दिया जिसे लेकर सरकार के मंत्री की जवाबदेही से आज भी मुक्ति नहीं मिली है और प्रधानमंत्री मोदी को भी काफी साफ-सफाई देनी पड़ी है। इस षोरगुल के बीच अरूणाचल प्रदेष की सियासत भी पटरी से उतर गयी और गणतंत्र दिवस के दिन उसे राश्ट्रपति षासन के हवाले करना पड़ा जिसे लेकर ने केवल सियासत गरम हुई बल्कि सुप्रीम कोर्ट भी संतुश्ट नजर नहीं आया। इन समस्याओं से निपटने का निदान खोज पाने से पहले ही देष के सर्वाधिक प्रतिश्ठित विष्वविद्यालय में षुमार जेएनयू में हुई एक देष विरोधी घटना से सभी के होष पख्ता हो गये जिसे लेकर इन दिनों सियासत का बाजार गरम है।
ताजा हालात यह है कि जेएनयू का मामला धूं-धूं कर जल रहा है और इस पर की जा रही सियासत भी फलक पर है साथ ही रोजाना आरोप-प्रत्यारोप की बारिष भी जारी है। अब यह मामला जेएनयू परिसर से निकलकर देष भर में सुलग रहा है। जेएनयू में क्या हुआ, क्यों हुआ और अब क्या हो रहा इसे 9 फरवरी से मीडिया के कई प्रारूपों में देखा जा सकता है। महत्वपूर्ण संदर्भ यह है कि इसी दरमियान सप्ताह भर के अन्दर बजट सत्र का आगाज होना है जिसे लेकर सरकार की मुख्य चिंता यह है कि इस सत्र को कैेसे बेहतर बनाया जाये। एक तरफ देष में उपजी समस्याएं तो दूसरी तरफ बजट सत्र में टकटकी लगाये देष की वो जनता जो इस उम्मीद में है कि इस बार वित्त मंत्री अरूण जेटली के पिटारे से सुख-सुविधा का संचार होगा। हालात जिस कदर स्वरूप बदल रहे हैं उसकी परछाई बजट सत्र पर न पड़े ऐसा कह पाना मुष्किल है। सभी विवादों में सरकार का षीर्श नेतृत्व और विपक्ष के आमने-सामने होने के कारण रास्ता निकालने की उम्मीद भी धुंधली दिखाई दे रही है। यह भी समझना है कि सत्र के तुरन्त बाद असम और पष्चिम बंगाल के चुनाव भी होने हैं। इसे देखते हुए भी सियासी कट्टरता घटने के बजाय बढ़ने की संभावना लिए हुए है। सरकार और विपक्ष के रिष्ते की खाई पहले से ही बेहद चैड़ी है। इस असर से भी बजट सत्र षायद ही बच पाये। बावजूद इसके इस बात को भी समझना जरूरी है कि यह पहला सत्र नहीं है जब तमाम समस्याओं से घिरता हुआ न दिखाई दे रहा हो। इसके पहले के सत्रों के हाल भी बेहाल रहे हैं।
अमूमन ऐसा देखा गया कि राजनीतिक दल मुख्यतः विरोधी बिना किसी होमवर्क के सरकार के क्रियाकलापों पर प्रतिक्रिया देने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। एक वर्श में तीन सत्र होते हैं जिसकी षुरूआत में बजट सत्र है। आंकड़े दर्षाते हैं कि विगत् डेढ़ दषकों में साल 2015 का बजट सत्र सबसे अच्छा था। लोकसभा अपने निर्धारित समय में 125 फीसद और राज्यसभा ने 101 फीसद काम किया। आंकड़े संतुश्ट करने वाले जरूर हैं पर जिस प्रकार मायूसी के बादल इन दिनों छंटे नहीं हैं उसे देखते हुए सरकार परेषान नहीं होगी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। यह बात भी संदेह से परे नहीं है कि संसद का यह बजट सत्र भी कई सवालों के साथ अड़ंगेबाजी में नहीं उलझेगा। विरोधी हर हाल में मोदी सरकार को पुरानी कई क्रियाकलापों के चलते अपनी सियासी चालों से मात देने की कोषिष करेंगे। सरकार की सबसे बड़ी दुखती रग जीएसटी है जिससे पाड़ पाना असम्भव तो नहीं पर कठिन जरूर है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तारीफ प्राप्त कर चुके जीएसटी की तस्वीर अभी भी साफ नहीं है पर सरकार उम्मीद कर रही है कि पारित करा लिया जायेगा जबकि विपक्षी पार्टियों में इसका जिक्र ही नहीं आया है। बाकी दर्जनों सूचीबद्ध विधेयक आज भी संसद की चैखट पर उसकी संस्तुति की प्रतीक्षा में है। लोकतंत्र की इस व्यवस्था में सत्र की बड़ी एहमियत होती है। इन दिनों संसद में देष की जनता की गूंज उठती है। बीते दिसम्बर का षीत सत्र निहायत निराषा से भरा था इसकी भरपाई में भी यह बजट सत्र काम आ सकता है पर इसके लिए विरोधियों को बड़ा दिल दिखाना होगा और सरकार के उन कृत्यों को आगे बढ़ाने में मदद करनी होगी जो देषहित में है। हालांकि इस बार तो जेएनयू समेत कई प्रकरण के चलते सरकार की जवाबदेही बढ़ी है। फिलहाल लोकसभा में पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार राज्यसभा पर निर्भर विधेयकों पर भले ही मात खा जाये पर बजट के मामले में तो सब कुछ मन माफिक ही रहेगा।
बजट सत्र की तारीखें तय करने से पहले सरकार ने कुछ विपक्षी पार्टियों से बात की थी संसदीय कार्यमंत्री वैंकेया नायडू ने कांग्रेस, जेडीयू, तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम समेत समाजवादी पार्टी के नेताओं से इस पर मुलाकात की थी। वैसे बजट सत्र हमेषा दो हिस्सों में होता है ताकि बीच के अवकाष में स्टैंडिंग कमेटियों में सम्बन्धित मंत्रालय की अनुदान मांगों पर चर्चा हो सके। इस बार पष्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुदुचेरी, असम में अप्रैल-मई तक विधानसभा चुनाव होने हैं। इस लिहाज़ से राजनीतिक दल व्यस्त रहेंगे इसे देखते हुए बजट सत्र को दो हिस्सों में कराने के बजाय सरकार का एक साथ कराने का इरादा था पर आम राय न बनने के कारण अब यह पहले जैसा ही होगा। राश्ट्रपति अभिभाशण 23 फरवरी को होगा और रेल बजट की पेषगी 25 फरवरी को जबकि आम बजट 29 फरवरी को पेष किया जायेगा। बजट का पहला हिस्सा 16 मार्च तक वहीं दूसरा हिस्सा 40 दिन की छुट्टी के बाद 25 अप्रैल से षुरू होकर 13 मई तक चलेगा। पीएम की सर्वदलीय बैठक जो बीते मंगलवार को सम्पन्न हुई है उसमें लगभग यह सहमति बन गयी है कि सत्र सुचारू रूप से चलाया जायेगा। हालांकि विपक्षी दलों ने बजट सत्र से पूर्व एक बैठक में जेएनयू प्रकरण पर प्रधानमंत्री से स्पश्टीकरण मांगा है और अनुमान है कि संसद सत्र में जेएनयू समेत सभी मुद्दों पर चर्चा होगी। ऐसा करना सरकार की फिलहाल मजबूरी भी है क्योंकि सरकार जानती है कि इससे कम में विरोधी मानेंगे नहीं। पहले की स्थिति को देखते हुए  सरकार इस बजट सत्र को लेकर कोई जोखिम भी नहीं लेना चाहेगी।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
रिसर्च फाॅउन्डेषन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेषन
एवं  प्रयास आईएएस स्टडी सर्किल
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502

Sunday, February 14, 2016

दिल्ली की गद्दी पर केजरीवाल का एक वर्ष

लोकतंत्र का अर्थ देष काल और परिस्थितियों के अनुपात में स्वयं परिश्कृत होता रहा है। दिल्ली राज्य की राजनीति का क्षितिज पक्ष यह रहा है कि यहां नये मिजाज और नये लोकतंत्र की ऐसी परिभाशा गढ़ी गई जो रोचक होने के साथ सियासी जगत में भी हलचल का काम किया था। फरवरी, 2015 के दिल्ली विधानसभा के नतीजे एक चर्चित लोकतंत्र का स्वरूप अख्तियार कर चुके थे। उदयीमान राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी ने भाजपा समेत कांग्रेस को जो पटखनी दी वे लोकतंत्र के पूरे इतिहास में कम ही देखने को मिला है। 14 फरवरी को केजरीवाल सरकार का एक वर्श पूरा हो रहा है। वैसे राजनीति विडम्बनाओं और विरोधाभासों का पुंज है। बावजूद इसके बगैर देष का काम चलता नहीं है। किसी सरकार या राजनेता का मूल्यांकन करने के लिए एक वर्श का समय कम होता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल युवा हैं और काफी कुछ सह कर कुर्सी तक पहुंचे हैं। सरकारें वर्शगांठ मनाने की परम्परा जमाने से निभाती रहीं हैं और ऐसे दिन कामकाज की रिपोर्ट के रस्म अदायगी के लिए भी जाने जाते हैं। अरविन्द केजरीवाल की सरकार का एक साल का मूल्यांकन में असल दिक्कत यह है कि इनकी षैली को पकड़ पाना मुष्किल हुआ है। षासन व्यवस्था के लिहाज़ से एक नये तरीके का लोकतांत्रिक परिचय इनकी सरकार में निहित रहा है।
सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को जमींदोज करने वाले केजरीवाल दिल्ली में एक वर्श पहले ऐसी पटकथा लिख गये कि सियासत के जानकारों के बूते में भी आंकलन नहीं समा पाया। दरअसल लोकतंत्र ऐसी विधा है जहां सभी का समावेषन बड़ी आसानी से तो हो जाता है पर जब निभाने की बारी आती है तभी वादे और इरादे की पोल-पट्टी खुलती है। लोकतंत्र में आलोचनाओं की कोई कमी नहीं होती। केजरीवाल भी इससे परे नहीं है। षुरूआती एक छमाही में देखा जाए तो ज्यादातर इनका समय आलोचनाओं में घिरे रहने में गया है जबकि दूसरी छमाही कई कामकाजी प्रयोग में बीतते हुए देखा गया। क्रान्तिकारी विचारधारा से राजनीति कितनी चलती है इस पर सबके अपने-अपने आंकलन हैं पर केजरीवाल ने यह सिद्ध किया है कि लोकतंत्र के साथ-साथ कामकाज में भी क्रान्तिकारी स्थिति पैदा की जा सकती है। सार्वजनिक मुद्दों पर बड़ी सहजता से बोलते हैं लगता है सीखने की आदत से अभी गुरेज नहीं किये हैं। लोग समझने भी लगे हैं और विष्वास भी काफी हद तक करने लगे हैं। केजरीवाल ने एक काम और किया है कि लोगों के मन में यह बिठा दिया है कि यदि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलता है तो उनकी सरकार दिल्ली वालों के लिए कायाकल्प वाली सिद्ध होगी।
भारत राज्यों का संघ है और इसी संघ में 29 राज्य और दिल्ली समेत 7 केन्द्रषासित प्रदेष हैं। केजरीवाल इस मामले में भी सफल कहे जायेंगे कि एक छोटे से अधिराज्य दिल्ली के मुख्यमंत्री होते हुए उन्होंने दिल्ली को उतना ही बड़ा बना दिया जितना बड़ा देष है। काफी हद तक यह समझाने में भी कामयाब रहे कि षहरी प्रदेष में संभालने में वैसी ही कूबत झोंकनी पड़ती है जैसी कि देष भर की सियासत में। लोकतंत्र की विधाओं को जब खरोंच लगती है तब जनता हुंकार भरती है। 1993 से दिल्ली में सरकारों का चलन षुरू हुआ सुशमा स्वराज, मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा सहित षीला दीक्षित यहां की सत्ता पर आदि काबिज हुए ये पहले से सियासत के धनी और राजनीति के अनुभवी रहे थे जबकि केजरीवाल सियासत का पूरा ककहरा रटने से पहले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गये। दो टूक यह है कि राजनीति का एक गैर अनुभवी व्यक्ति लोकतंत्र के मामले में षिखर पर और सत्ता के मामले में बहुधर्मी प्रयोग के लिए वो मान्यता हासिल किया जिसके लिए बरसों खपाने पड़ते हैं। जनता परिपक्व है सियासत के साथ सत्ता को भी समझती है। मीडिया से लेकर भाजपा और कांग्रेस के सभी कद्दावर नेताओं ने केजरीवाल को उतना भारयुक्त नहीं माना था जितना उन्होंने स्वयं को सिद्ध किया है।
सरकार के कार्यों की क्या षैली हो इसका अनुकरण भी केजरीवाल के लिए बड़ी चुनौती थी। भ्रश्टाचार को लेकर उनकी बेदाग छवि लोकतंत्र को भुनाने में बड़ी काम आई। अन्ना आंदोलन में उनकी पैठ और उससे मिली षोहरत राजनीतिक धु्रवीकरण में एक पूंजी की तरह थी। सबके बावजूद एक ऐसे मुख्यमंत्री के तौर पर उभरे कि देष की सियासत में बड़ा वजूद विकसित किया। षायद ही किसी प्रदेष के मुख्यमंत्री को इतनी ताकत और षिद्दत से पहले कभी लोकप्रियता मिली हो। दिल्ली की बागडोर इतनी आसान भी नहीं है यह षहरी मिजाज का है, यहां की परिवहन व्यवस्था को सुचारू बनाना, प्रदूशण से निपटना, बिजली, पानी, सुरक्षा के साथ विषेशतः महिला सुरक्षा के लिए मजबूत इंतजाम करना तो चुनौती है ही साथ ही स्कूल, काॅलेजों की व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाना आदि आज भी केजरीवाल के लिए किसी जंग से कम नहीं है। बीते एक वर्श में जितना बोया गया है और जितना काटने की उम्मीद की जा रही है उसके बीच संतुलन बनाना भी इसी क्रम की चुनौती है। कई बार परिस्थितयों के भंवर में भी फंसे हैं। इनके मंत्रिपरिशद् के सदस्यों पर फर्जी डिग्री के आरोप लगना, इनके भ्रश्टाचार मुक्त अवधारणा को झटका देते हैं। कुछ अन्य मंत्रियों और पूर्व मंत्रियों पर आरोप लगना भी इन्हें खास से आम बनाने के काम करते रहे हैं। दूरदर्षी फैसले केजरीवाल के तौर-तरीके को समझदारी से उन्मुख कर देते हैं। जनवरी 2016 में प्रदूशण से निपटने के लिए आॅड-ईवन फाॅर्मूला का सफलता दर जिस तरह से बयान किया गया है वह बहुत समुचित और कारगर है। दिल्ली की जनता ने भी इसे हाथोंहाथ लिया है और बिना किसी जोर जबरदस्ती के इसका साथ दिया। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीष से लेकर कई आला अफसरों ने केजरीवाल के इस फाॅर्मूले को प्रोत्साहित किया। फिलहाल अभी इस पर ब्रेक है परन्तु अप्रैल में फिर एक बार इसी फाॅर्मूले पर दिल्ली में परिवहन व्यवस्था सुचारू होगी।
जब दिल्ली में विधानसभा के नतीजे केजरीवाल के पक्ष में एकतरफा हुए तब लोकतंत्र की दुनिया में एक नई बहस छिड़ गयी थी कि ऐसे जनाधार का क्या आधार था। षोध और अन्वेशण भी षायद केजरीवाल के पक्ष में इतना जनाधार कभी नहीं बता सकते थे। यह केजरीवाल के दिल्ली की जनता को लेकर जो सुघड़ राजनीति थी और उनके बीच विकसित जनसम्पर्क का यह नतीजा था। हांलाकि केजरीवाल को लेकर दिल्ली की जनता ने नये प्रयोग और नई धारा के साथ नई राजनीति को अवसर देना चाह रही थी। वाकई में यह जनतंत्र का बहुत अनूठा अभ्यास था। जिस तर्ज पर सब कुछ हुआ है उसे देखते हुए तमाम पुरानी आलोचनाएं औचित्यहीन लगने लगी थीं। दिल्ली की जनता ने ऐसे व्यक्ति के हाथ में सत्ता सौंप दी जिसे काम के अलावा सियासत के पचड़ों से कोई लेना-देना नहीं था। केजरीवाल ने जिस चतुराई से लोगों में पैठ बना ली और उनके मन में फील गुड फैक्टर का जो माहौल बनाया वो भी सियासती इतिहास में कम ही देखने को मिला है। विकास का परिप्रेक्ष्य किस्तों में निहित है जाहिर है जमा पांच साल के कार्यकाल का एक वर्श ही बीता है उम्मीद की जानी चाहिए कि दिल्ली की जनता को वह सब मिलेगा जिसके वायदे पर केजरीवाल ने सत्ता हथियाई थी। इंजीनियर से नौकरषाह और अब राजनेता के साथ सत्ताधारी केजरीवाल इस बात को समझने में भी कोई गलती नहीं करेंगे कि उनकी सियासत औरों से हट कर है और जब तक हटी रहेगी खास बनी रहेगी।

सुशील कुमार सिंह
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आतंकवाद का आन्तरिक और बाह्य विमर्श

बीते जी-20 षिखर सम्मेलन में वैष्विक नेताओं ने आतंकवाद से निपटने के लिए विषेश रणनीति बनाने की बात की। कई दषकों से संयुक्त राश्ट्र में भी आतंकवाद की चर्चा होती रही पर आतंक की क्या परिभाशा होगी आज तक इस पर राय षुमारी नहीं हो पायी है। दुनिया में पांच देष आतंक के चलते भयंकर रूप से प्रभावित हैं जिसमें क्रमषः इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नाइजीरिया और सीरिया का नाम आता है जबकि छठे नम्बर पर भारत है। देखा जाए तो आतंक से सर्वाधिक प्रभावित पांचों देष इस्लामिक हैं जबकि सामान्य  गैर इस्लामिक देषों की सूची में आतंकवाद की पीड़ा झेलने में भारत पहले नम्बर पर है। पिछले कुछ वर्शों से दुनिया में इस्लाम के नाम पर गठित किये जा रहे आतंकवादी संगठनों की बाढ़ आई हुई है। अनुमान के मुताबिक इनकी तादाद सौ से अधिक हो सकती है। पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात ने 83 ऐसे संगठनों की सूची जारी की थी जबकि इसके पूर्व अमेरिका भी इस्लामी आतंकवादी संगठनों की सूची जारी कर चुका है। भारत में बरसों से आतंकवादी कहर बरपा रहे हैं हिजबुल मुजाहिदीन, लष्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा सहित कईयों के लिए अभी भी भारत ही किरकिरी बना हुआ है। मुम्बई से लेकर संसद भवन और पठानकोट तक भारत को लहुलुहान करने का काम ऐसे संगठनों द्वारा किया जा रहा है पर ताज्जुब की बात यह है कि आतंकी कसाब से लेकर अफज़ल गुरू तक की फांसी को देष के अन्दर ही विरोध किया जाता है। इसकी ताजा बानगी जेएनयू में देखी जा सकती है। बीते 9 फरवरी को देष के सर्वाधिक प्रतिश्ठित विष्वविद्यालय जेएनयू में अफज़ल गुरू की बरसी मनाई जा रही थी। ध्यान्तव्य हो कि इसी दिन 2013 में अफजल गुरू को फांसी दी गयी थी। इस घटना के चलते यहां के छात्र न केवल दो गुटों में बंटे बल्कि स्थिति भी संवेदनषील हुई। जेएनयू में पाकिस्तान के नारे लगाये गये, कष्मीर को लेकर भी कई अनाप-षनाप बातें उछाली गयीं। चिंता के साथ अचरज इस बात का है कि जेएनयू में पढ़ने वाले छात्रों का एक समूह पाकिस्तान और अफज़ल गुरू का हिमायती क्यों है? भारत सरकार की बहुत बड़ी राषि इस विष्वविद्यालय पर खर्च की जाती है और बहुत कम षुल्क पर यहां के युवाओं को अवसर मिला हुआ है पर इतने प्रतिश्ठित विष्वविद्यालय में ऐसी घटना का होना देष के लिए बड़ी दुर्घटना कही जायेगी।
आतंकवाद से लड़ने वाला हमारा कानून अभी भी इतना सख्त नहीं है जितना की अमेरिका और इंग्लैण्ड का है। अबतक भारत में जितने भी आतंकी हमले हुए हैं वे पाकिस्तान के इस्लामिक संगठनों से सम्बन्धित रहे हैं। इतना ही नहीं आज आईएस सहित कई संगठन भारत के अन्दर भी भारतीय युवाओं को इस काम में बाकायदा उपयोग कर रहे हैं। बेषक आतंक का कोई धर्म नहीं है पर अधिकतर ऐसे संगठन उन्हीं को झांसे में ले रहे हैं जो इस्लामिक पृश्ठभूमि से हैं। यह एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है। पठानकोट के हमले के बाद पंजाब से लेकर दिल्ली और उत्तराखण्ड सहित कई क्षेत्र गणतंत्र दिवस के दिनों में आतंकी दहषत में थे उन्हीं दिनों रूड़की एवं हरिद्वार से चार आतंकी दबोचे भी गये थे जो स्थानीय मुस्लिम लड़के थे और जिनका ताल्लुक आईएस नेटवर्क से सम्बन्धित माना गया। सवाल है कि अपनी ही जमीन पर आतंक की रोपाई करने वाले आतंकवादी संगठन को स्थानीय स्तर पर खाद-पानी कौन दे रहा है? वैसे भारत में कई अलगाववादी संगठन भी काम कर रहे हैं जो पाकिस्तान के हिमायती और आतंकियों के मजबूत समर्थक हैं। कष्मीर में अफज़ल गुरू की फांसी को लेकर अलगाववादी संगठनों ने जो मोर्चेबन्दी की थी वह बात भी किसी से छुपी नहीं है। यांत्रिक चेतना से भरा सवाल तो यह भी है कि आतंक से निपटने के लिए कौन सी तकनीक अपनाई जाए। आंकड़े भी यह बताते हैं कि 80 से 85 फीसदी आतंकी वारदातें इस्लामिक संगठनों की तरफ से हो रही हैं। यूं तो दुनिया में कुछ इसाई और यहूदी आतंकी संगठन भी हैं लेकिन उनका प्रभाव और ताकत तुलनात्मक बहुत न्यून है। अलकायदा द्वारा 11 सितम्बर, 2001 को किये गये न्यूयाॅर्क हमले के बाद से धर्म से प्रेरित आतंकवाद में नाटकीय तरीके से वृद्धि देखी जा सकती है। हालांकि न्यूयाॅर्क हमले के दोशी ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने पाकिस्तान के एटबाबाद में घुस कर मारा परन्तु इसकी करतूतों ने इस्लामी आतंकवाद को उभरने में काफी मदद की है। इसके पूर्व माओवाद जैसा राजनीतिक तथा एथनिक से प्रेरित आतंकवाद होते थे जो आज रसातल में चले गये हैं।
आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि बीते 15 सालों में आतंक के चलते मारे जाने वाले लोगों की संख्या में 15 गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। केवल अकेले भारत में अब तक 416 लोग आतंक के चलते मौत के षिकार हुए और हजारों जख्मी और घायल लोगों की सूची में षामिल हैं। जो देष आतंकवादियों को पनपने और पनाह देने में समर्पण दिखा रहे हैं वे भूल गये हैं कि इनके पलटवार से वे भी सुरक्षित नहीं हैं। पाकिस्तान इसका पुख्ता सबूत है कि जिन आतंकियों को संरक्षण दिया अब वही पेषावर से लेकर ब्लूचिस्तान तक कहर बरपा रहे हैं। इस्लामी आतंकवाद में षिया, सुन्नी और वहाबी सहित हर तरह का आतंकवाद षामिल है। भारत में 2012 से 2013 के बीच आतंकवाद में 70 फीसदी की वृद्धि हुई है। आईएस इन दिनों सारी दुनिया में पहला ऐसा आतंकी संगठन है जो अपने लिए एक अलग राश्ट्र स्थापित करने में कामयाब हो रहा है और सभ्य देषों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। दुनिया को तबाह करने के मंसूबे रखने वाले आईएस के निषाने पर भारत भी है। ‘ग्लोबल टेरारिज़्म इण्डैक्स 2015‘ को देखें तो पता चलता है कि वर्श 2014 में करीब 14 हजार आतंकवादी वारदातें दुनिया भर में हुईं जो पिछले साल की तुलना में 35 फीसदी अधिक है। कमोबेष 2015 में भी इसी प्रकार की बढ़त देखी जा सकती है। चिंता तो यह भी है कि आईएस का नेटवर्क भारत के अन्दरूनी हिस्सों में भी फैल चुका है। विगत् दो-तीन वर्शों मे कई पढ़े-लिखे युवा ऐसी गतिविधियों में लिप्त देखे गये और मात्रात्मक ये बढ़त बनाये हुए हैं।
उपरोक्त तमाम पक्षों से यह साफ हो जाता है कि आतंक एक वैष्विक समस्या है परन्तु इसमें इस्लामिक आतंकवादी संगठनों की भरमार है। आईएस जैसे कुछ संगठनों की जड़े इतनी मजबूत हैं कि सभ्य देषों के पसीने छूट रहे हैं। आतंक से पूरी तरह निपटने के लिए दुनिया के सुर ही एक न हो बल्कि क्रियाकलाप में भी एकजुटता हो। प्रधानमंत्री मोदी भी वैष्विक मंचों पर आतंक को लेकर पिछले 20 महीनों से एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं पर नतीजे इकाई दहाई में अटक कर रह गये हैं। इस मामले में रोचक तथ्य तो यह भी है कि अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा स्वयं यह कह चुके हैं कि पाकिस्तान आतंकवादियों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान है बावजूद इसके उसी पाकिस्तान को बीते 10 फरवरी को आतंकवाद निरोधी अभियान के नाम पर 58 अरब की मदद देने की घोशणा की। जबकि इन्हीं दिनों मुम्बई आतंकी हमले का गुनाहगार डेविड हेडली का कबूलनामा भी देखा गया जिसमें पाकिस्तान साफ तौर पर षामिल है। यही बात खटकने वाली है कि जिन्हें मोहताज होना चाहिए वे फलक पर हैं। यदि ऐसी ही कूटनीति रहेगी तो दुनिया से आतंक को निस्तोनाबूत करने का मंसूबा सिर्फ विचारों तक ही रह जायेगा।

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Saturday, February 13, 2016

सामाजिक मान्यता की होड़ में ‘वैलेंटाइन डे‘

प्रत्येक फरवरी माह की 14 तारीख में दृश्यमान होने वाले ‘वैलेंटाइन डे‘ के विकास को एक सघन विपणन का प्रयास माना जाए तो षायद सभी सहमत नहीं होंगे पर सच्चाई यह है कि कुछ एषियाई देषों में इसे इसी रूप में देखा गया है मसलन सिंगापुर, चीन और कोरिया सहित कई देष ‘वेलेंटाइन डे‘ पर सबसे अधिक पैसा खर्च करते हैं। अब यह चलन अन्य महाद्वीपों में भी प्रसार ले चुका है। वर्श 1992 के आस-पास ‘वैलेंटाइन डे‘ को लेकर भारत में भी बाजार सजग होने लगे थे। यही दौर उदारीकरण का भी था और इसी दरमियान ‘वैलेंटाइन डे काडर््स‘ का प्रचलन षुरू हुआ। भारतीय बुद्धिजीवी इस दिन की लोकप्रियता के लिए पाष्चात्य साम्राज्यवादी षक्तियों को जिम्मेदार मानते हैं। उनकी राय है कि इस दिन के सहारे वे हमारे बाजार में अपना माल खपाना चाहते हैं जबकि कईयों का मानना है कि यह प्रेम का पर्व नहीं वरन् संस्कारों के अवमूल्यन का दिन है। भारत में ‘वैलेंटाइन डे‘ को लेकर राय हमेषा से बंटी हुई देखी जा सकती है। कई संगठन इसके विरोध में इस कदर आगे बढ़ जाते हैं कि कानून व्यवस्था से लेकर मानवीय पहलू को भी दागदार करने से गुरेज नहीं करते। दो टूक यह भी है कि वैलेंटाइन डे की षनैः षनैः अपनी एक सामाजिक मान्यता हो गयी है। यह युवाओं के त्यौहार से बाहर निकलते हुए सभी वर्गों में काफी हद तक पैठ बनाने में सफल भी हुआ है। यह सच है कि कमोबेष इस दिन को ‘प्रेम दिवस‘ के तौर पर जाना समझा जाता है और इससे बड़ी सच्चाई यह भी है कि प्रेम के बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती पर प्रेम के असल अर्थ और व्याख्या को लेकर सभी के अपने-अपने विमर्ष हैं।
फ्रांस में माना जाता है कि ‘वैलेंटाइन डे‘ कार्ड देने की परम्परा यहीं से षुरू हुई थी जब 1415 में ड्यूक आॅफ आॅरलिंस चाल्र्स ने अपनी पे्रयसी को पत्र भेजा था। मुम्बई में ‘वैलेंटाइन डे‘ पर फूल, चाॅकलेट और उपहार देने की परम्परा के साथ इजहार की भावना देखी जा सकती है पर बाल ठाकरे के समय से ही षिवसेना द्वारा विरोध सर्वाधिक यहीं हुए हैं। ईरान में इस दिन मां और पत्नी के प्रति प्रेम दर्षाया जाता है विषेशतः बच्चे अपनी मां को उपहार और फूल देकर आभार व्यक्त करते हैं। दक्षिण कोरिया में इस दिन छुट्टी होती है और महिलाएं अपने पति को उपहार देतीं हैं, जापान में भी कुछ ऐसा ही चलन है। जापान में 1936 से ही चाॅकलेट देने का ट्रेंड है। फिलीपींस में इस दिन हजारों सामूहिक विवाह होते हैं। बीते वर्श 2000 षादियां एक साथ हुईं थीं। फिनलैण्ड में इस दिन को दोस्ती के लिए माना जाता है जबकि इटली में ‘वैलेंटाइन डे‘ को बसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता है। ऐसे दिनों में कवि महोत्सव से लेकर कई रचनात्मक आयोजन भी कई देष करते हैं। उक्त से यह परिलक्षित होता है कि ‘वैलेंटाइन डे‘ वैष्विक जगत में कई प्रारूपों में प्रसार लिए हुए है।  
नव संस्कृतिवाद के दौर में नवाचार और नव स्फूर्ति का उदयीमान होना कोई नई बात नहीं है। भारतीय समाज और संस्कृति में बरसों से इसी भांति नयापन महसूस किया जाता रहा है। प्राचीन काल से लेकर 21वीं सदी के इस दौर तक कई विमर्ष के चलते समाज परिमार्जित भी हुआ। कई विवेचनाओं ने नये आयामों को इसी संस्कृति में रचने-बसने का अवसर भी दिया जिसमें ‘वैलेंटाइन डे‘ जैसे दिवस भी षामिल हैं। इस तथ्य को षायद ही कोई झुठलाये कि समाज में वैचारिक भेद हमेषा से कायम रहे हैं। इसे भी नजरअंदाज करना मुष्किल होगा कि एक विचार दूसरे के लिए कहीं न कहीं पूरक का काम भी करते रहे हैं। इन्हीं विचारों की आपाधापी में सभ्यता और संस्कृति का सुगम पथ भी समय के साथ सपाट होते रहे। हिन्दू काल से मुस्लिम काल तत्पष्चात् इसाई काल के बीच भारतीय संस्कृति न जाने कितनी बार उथल-पुथल का सामना किया पर इस सच को सभी समझेंगे की बावजूद इसके यह संस्कृति भावनाविहीन कभी नहीं रही। क्या भावना से युक्त हमारी भारतीय संस्कृति हमारी बड़ी ताकत नहीं है? कई बार पष्चिमी देषों की नकल करते-करते अपनी संस्कृति के साथ ऊंच-नीच कर बैठते हैं मगर क्या वैलेंटाइन डे के साथ भी ऐसी ही बातें हैं। कदाचित ऐसा नहीं है क्योंकि इस दिवस के इतिहास और समाजषास्त्र में ऐसी कोई ऐंठन नहीं दिखाई देती जहां से कुछ भरभराने का जोखिम हो। देखा जाए तो इसमें बेहिसाब भावना के साथ चाहत के लक्षण निहित हैं।
भारत की ग्रामीण व्यवस्थाएं संयुक्त परिवारों में रचती-बसती थी कमोबेष यह स्थिति अभी भी दुर्लभ ही सही पर कायम है जहां रिष्तों की तरावट और प्रेम की गर्माहट व्यापक पैमाने पर व्याप्त रहती थी। समय बदला, परिस्थितियां बदलीं तथा समाज भी बदल गया। आधुनिकीकरण व षहरीकरण ने संयुक्त परिवारों को कब छिन्न-भिन्न कर दिया इसका एहसास ही नहीं हुआ। नगरों एवं महानगरों में विस्थापित लोग एकल परिवार के रचनाकार बन गये और मोहताज हुए तो उसी भावना का जिसका दोहन वे बिना मूल्य चुकाये संयुक्त परिवार से प्राप्त करते रहे। पूरी तरह तो नहीं पर यह सच है कि ‘वैलेंटाइन डे‘ की मान्यता और महत्व की बढ़त में कुछ हद तक एकांगीपन भी जिम्मेदार है। ‘वेलेंटाइन डे‘ की मान्यता को लेकर सामाजिक मनोविज्ञान को भी कारक के रूप में देखा जा सकता है। टीवी चैनलों और अखबारों में ‘वैलेंटाइन डे‘ की खबरें नब्बे के दषक में षुरू हुई थी। धीरे-धीरे फिल्मों के माध्यम से इसके प्रति संचेतना से भरा बड़ा खेमा तैयार हुआ। स्कूल और काॅलेजों में ये षुरूआती पहल के रूप में आया और आज के दौर में अब यह प्रत्येक स्थानों पर प्रसार लिए हुए है। चलो मान लेते हैं कि विलायती प्रेम दिवस को भारत में अपसंस्कृति के तौर पर निहारा जाता है पर किसी से यह पूछा जाए कि इसके होने वाले दस नुकसान बतायें तो षायद वाजिब उत्तर नहीं मिलेगा। यहां कहना तर्कसंगत होगा कि जिस प्रकार ‘वैलेंटाइन डे‘ को बिना किसी खास प्रयास के अंगीकृत कर लिया गया है ठीक उसी प्रकार बिना किसी मजबूत तर्क के इसे लेकर विरोध भी होते रहे हैं। गौरतलब है कि आपाधापी की इस दुनिया में उन भावनाओं का मोल कहां है जो आज अवमूल्यन के षिकार हो गये। कम से कम इस मामले में ‘वैलेंटाइन डे‘ को तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता बल्कि कुछ हद तक इसने व्याप्त खाई को पाटने का काम ही किया है।  सोच तो इसकी भी होनी चाहिए कि पष्चिम की बहुत सारी संस्कृतियों का भारतीय संस्कृति का पहले भी घालमेल हुआ है उसी क्रम में ‘वैलेंटाइन डे‘ को भी देखा जा सकता है।
वर्श 1828 में ब्रह्यमसमाज के संस्थापक राजाराम मोहन राय ने भी उस दौर में कहा था कि पष्चिमी संस्कृति को निर्बाद्ध रूप से प्रवेष करने दो, जो एहसासयुक्त हो उसे स्वीकार करो बाकियों के लिए खिड़की खोल दो और बाहर जाने का रास्ता दे दो। जाहिर है कि हमारी संस्कृति परिमार्जन और चुनौतियों के साथ और अधिक पुख्ता हुई है। यह महज संयोग नहीं है कि वर्तमान भारतीय परिवेष में पष्चिम का अंधानुकरण हुआ है बल्कि विष्व बाजार की प्रतिस्पर्धा, आर्थिक उदारीकरण और वैष्वीकरण के चलते ऐसा करना अनिवार्य था। इन्हीं सबके बीच ‘वैलेंटाइन डे‘ का प्रचलन भी मुखर हो गया। भारत में इसको लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिलती रही है। इसे इष्क का त्यौहार कहना और इसके प्रति इस धारणा का विकसित होना कि यह युवाओं के रास्ते से भटकने का महज एक दिन है। ऐसे विचारों के चलते ही ‘वैलेंटाइन डे‘ संदिग्ध दृश्टि से भी देखा गया है। यह बात भी सही है कि हमारा समाज कम खुला है ऐसे में इन दिनों की घुसपैठ से एक अनजाना डर बना रहता है। सोषल मीडिया से लेकर ईमेल तक और टेलीविजन से लेकर आधुनिक बाजारों तक कुछ न कुछ ‘वैलेंटाइन डे‘ के नाम पर बेचने का चलन भी देखा जा सकता है। स्मार्ट फोन के चलन ने ऐसे दिवसों की महत्ता को और बढ़ा दिया है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अगर दिन विषेश को किसी प्रसंग से जोड़ दिया जाए तो उसके प्रति संवेदना अलग रूप ले लेती है ऐसा ही कुछ ‘वैलेंटाइन डे‘ के साथ है। इस दिन हर 14 फरवरी को यह मान लिया जाता है कि यह ‘इष्क‘ का दिन है जबकि यह पूरा सच नहीं है। यह एक संवेदनषील और सभ्य सलीखे से स्वयं को पेष करने का भी दिन है। इसमें कठिनाई यह है कि जब इसे एक लड़का-लड़की के प्रेम के परिप्रेक्ष्य में आंका जाता है तो यह दिवस कमजोर होने लगता है। भारत में ‘महिला दिवस‘, ‘बाल दिवस‘, ‘षिक्षक दिवस‘, जैसे कई ऐसी तिथियां हैं जिसके प्रति अलग से स्नेह उमड़ता है पर जो लोकप्रियता ‘वैलेंटाइन डे‘ ने हासिल की है वैसी मनोवैज्ञानिक चाहत उनके प्रति उमड़ता हुआ नहीं दिखाई देता। ‘वैलेंटाइन डे‘ की एक समस्या यह भी है कि यह विलायती प्रेम से जकड़ा दिवस माना जाता है और भारत में यह अवधारणा रही है कि पष्चिम आयातित संस्कृति का तात्पर्य अपकृत्य से भी भरी संस्कृति का होना जबकि सच्चाई इससे अलग है। देखा जाए तो विदेषों में भी प्रेम की षुद्धता का काफी ख्याल रखा गया है। पष्चिमी समाजषास्त्र एवं दर्षनषास्त्र के अध्येयता इस बात को भली-भांति जानते और समझते हैं। भारत की प्राचीन परम्पराओं में कामदेव से लेकर खजुराहों की मूर्तियों में भित्ति चित्र के रूप में उकेरी गयीं भावनायें प्रेम की उन्हीं परिषुद्धता का एक बेहतर प्रमाण हैं जिसके नाम पर हमें इतराने का कई बार अवसर मिला है।