Friday, June 5, 2020

वैश्विक समूहों की बदलती प्रासंगिकता

इन दिनों पूरी दुनिया एक षत्रु से लड़ रही है जो लाइलाज है साथ ही इसकी तबाही के स्वाद से सभी देष वाकिफ हैं। चीन से निकला दुष्मन कोरोना वायरस इन दिनों सभी की सांसों पर भारी पड़ा है और इससे सुरक्षित होने के लिए दुनिया दो-चार हो रही है। विष्व स्वास्थ संगठन से नाता तोड़ चुका अमेरिका यह संकेत दे दिया है कि ऐसे संगठनों की प्रासंगिकता अब खटाई में है। कई अन्तर्राश्ट्रीय संगठन दौर के अनुपात में अप्रासंगिक होते रहे हैं और कुछ नये स्वरूप लेते भी रहे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में इन दिनों जी-7 की चर्चा है। जिसमें दुनिया के 7 सबसे बड़ी अन्तर्राश्ट्रीय मुद्रा कोश द्वारा बतायी गयी विकसित अर्थव्यवस्थाएं षामिल हैं। 1975 में 6 विकसित देष फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, इंग्लैण्ड और अमेरिका बाद में कानाडा को जोड़ते हुए पथगामी हुआ जी-7 आज विस्तार की एक नई राह पर खड़ा दिखाई देता है। हालांकि दो दषक पहले आठवें देष के रूप में रूस भी इसका हिस्सा था पर अब मौजूदा समय में वह बाहर है। अमेरिकी राश्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का इरादा है कि जी-7 को जी-10 या जी-11 में तब्दील किया जाये जिसमें भारत, आॅस्ट्रेलिया, रूस और दक्षिण कोरिया को षामिल करने की बात की जा रही है। गौरतलब है कि यह समूह आर्थिक विकास एवं संकट प्रबंधन, वैष्विक सुरक्षा, ऊर्जा एवं आतंकवाद जैसे वैष्विक मुद्दों पर आम सहमती को बढ़ावा देने हेतु सालाना बैठक आयोजित करता है। यह दुनिया का एक ऐसा धनी देषों का समूह है जो औद्योगिक और विकसित है जिनका वैष्विक निर्यात में 49 फीसद और विष्व की जीडीपी का 46 प्रतिषत है। इतना ही नहीं दुनिया का आधे से अधिक धन अर्थात् 58 फीसदी की मालिक यही समूह है। औद्योगिक आउटपुट में 51 प्रतिषत जबकि अन्तर्राश्ट्रीय मुद्रा कोश की परिसम्पत्तियों में 49 फीसद हिस्सेदारी है। उक्त से यह साफ है कि यह समूह दुनिया को अपने आगे पीछे घुमाने की कूबत रखता है मगर कोरोना महामारी के बीच जापान और कुछ हद तक कानाडा को छोड़ दें तो बाकियों की आर्थिक उच्चस्थता और मजबूत सुरक्षा ढांचा स्वयं के नागरिकों के बचाने के काम न आ सका।
वैसे भारत को इस समूह में षामिल होने का अवसर मिलना हर लिहाज़ से बड़ी बात है मगर तुलनात्मक तौर पर देखें तो भारत की अर्थव्यवस्था न्यून है। अमेरिका जहां 19 ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था रखता है वहीं भारत में यह तीन ट्रिलियन डाॅलर से भी कम है। हालांकि 2024 तक 5 ट्रिलियन डाॅलर होने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। मगर कोरोना ने इसे भी रोक दिया है। सवाल है कि जी-7 अभी तक कितना प्रभावी रहा है। वैसे देखा जाय तो इसकी आलोचना इस बात के लिए होती रही है कि यह कभी भी एक प्रभावी संगठन सिद्ध नहीं हुआ। हालांकि समूह कई सफलताओं का दावा करता है जिनमें एड्स, टीबी और मलेरिया से लड़ने के लिए वैष्विक फण्ड की षुरूआत करना भी है। जी-7 का दावा है कि बीते दो दषकों में करीब 3 करोड़ लोगों की उसने जान बचाई है। दावा तो यह भी है कि 2015 के पेरिस जलवायु समझौते को लागू कराने के पीछे इसी की भूमिका है जबकि सच्चाई यह है कि इसी समझौते से अमेरिका अपने को अलग कर लिया है। ऐसे में समूह की प्रासंगिकता तो हो सकती है पर उसमें षामिल अमेरिका पेरिस जलवायु के मामले में अप्रासंगिक सिद्ध हुआ। देखा जाये तो 45 बरस पुरानी यह संस्था और इतनी बार ही षिखर सम्मेलन आयोजित करने वाला यह समूह अब नूतनता की तलाष में है। भारत सहित अन्य देषों को इसमें षामिल करने का दृश्टिकोण दो इषारा करते हैं। पहला यह कि चीन अमेरिका का इस समय सबसे बड़ा दुष्मन है और दक्षिण चीन सागर पर अपना एकाधिकार रखना चाहता है। दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया, जापान सहित भारत और अमेरिका आदि को यह बहुत अखरता है। जापान पहले से ही जी-7 का सदस्य है जबकि दक्षिण कोरिया आॅस्ट्रेलिया और भारत तीनों यदि इस समूह में होते हैं तो जी-7 की ताकत एषिया के साथ आॅस्ट्रेलिया महाद्वीप में भी मजबूत होगी और चीन दक्षिण चीन सागर को लेकर हाषिये पर धकेला जा सकता है। दूसरा यह कि भारत को जी-7 में षामिल करने की वकालत करके अमेरिका एषियाई देषों में एक बड़ा संतुलन साधने की फिराक में है जो चीन को काउंटर करने के काम आ सकता है। हालांकि अर्थव्यवस्था को थोड़ी देर के लिए पीछे छोड़ दिया जाय तो भारत वैष्विक फलक पर यह सिद्ध कर चुका है कि वह किसी भी समूह का सदस्य बनने की योग्यता रखता है। रही बात रूस की तो रूस 1997 में इसका सदस्य बना था और 2014 में यूक्रेन, क्रीमिया हड़पने के बाद इसे जी-7 से निलम्बित कर दिया गया।
जब बात जी-7 के विस्तार की है और उसमें भारत को षामिल करने की है तो एक सवाल यह मन में आता है कि इस समूह का हिस्सा चीन क्यों नहीं है जबकि वह अमेरिका के बाद दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। गौरतलब है कि लगभग 13 ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था चीन रखता है मगर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी भी चीन के पास है। ऐसे में प्रति व्यक्ति आय के लिहाज़ से इसकी सम्पत्ति जी-7 समूह देषों के मुकाबले बहुत कम ठहरती है। यही कारण है कि चीन को उन्नत या विकसित अर्थव्यवस्था नहीं माना जा सकता। हालांकि जनसंख्या और प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत की स्थिति और खराब है। विकासषील देष भारत अल्पविकसित के हाषिये पर भी रहा है। ऐसे में विकसित देषों के साथ कंधे से कंधा मिलाना जितना सहज लगता है व्यावहारिक तौर पर उतना आसान नहीं है। अगर चीन उन्नत या विकसित अर्थव्यवस्था के चलते समूह में षामिल नहीं है लेकिन इसी स्थिति के बावजूद भारत को यदि आमंत्रण मिला है तो साफ है वैष्विक पटल पर भारत की साख केवल सम्पत्ति से नहीं सदाचार से भी आंकी जा रही है। जिस मामले में चीन निहायत फिसड्डी है। देखा जाये तो भारत और चीन जी-20 के देषों का हिस्सा हैं दोनों ब्रिक्स के सदस्य भी हैं जो विकसित और विकासषील देषों का पुल कहा जाने वाला समूह है। जी-20 में षामिल चीन षंघाई जैसे आधुनिकता षहरों की जनसंख्या बढ़ाने में इन दिनों लगा हुआ है। भारत और चीन द्विपक्षीय सम्बंधों के साथ कई अन्तर्राश्ट्रीय समूहों में षिरकत करते हैं मगर सीमा विवाद और पड़ोसी देषों को भारत के विरूद्ध भड़काने में चीन हमेषा मषगूल रहता है। मौजूदा समय में लद्दाख समस्या इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
ऐसा नहीं है कि जी-7 दुनिया का कायाकल्प कर देगा। पहले से षामिल देषों के बीच भी कई असहमतियां हैं। कनाडा और अमेरिका के बीच पिछले सम्मेलन में बड़ा मतभेद उभरा था जिसमें आयात षुल्क के साथ पर्यावरणीय मुद्दे मतभेद के कारणों में रहे हैं। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका सहित दक्षिणी गोलार्द्ध के कोई देषा जी-7 में नहीं है। ऐसे में यह उत्तरी गोलार्द्ध के यूरोप और अमेरिका महाद्वीप और एषिया के जापान तक ही यह सीमित है। फलस्वरूप यह एक घिसा-पिटा और पुराना माॅडल बन कर रह गया है। अन्यों के इसमें षामिल होने से नये विचार और ताकत ही नहीं बल्कि दक्षिणी गोलार्द्ध में भी इसकी पहुंच बढ़ेगी। भारत आसियान में अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहता है साथ ही प्रषान्त महासागरीय देष एपेक समूह तक पहुंचना चाहता है। जी-7 का सदस्य बनना इन रास्तों को आसान कर सकता है। इसके साथ दक्षिण एषिया में भारत की साख भी बढ़ेगी और चीन की तुलना में वैष्विक कद ऊँचा होगा जिसे दक्षिण एषियाई देष सार्क समेत आसियान में संतुलन के काम आयेगा। गौरतलब है कि आसियान के बाजारों पर भी चीन का कब्जा है। हांलाकि कोरोना महामारी का जन्मदाता चीन इन दिनों दुनिया के निषाने पर है जिसे देखते हुए कई देष समूह और देष की दृश्टि से बदलाव लेंगे। ऐसी बीमारी या परेषानी फिर न घटित हो और चीन जैसे देष संकट के सबब न बनें इसके लिए भी समीकरण वैष्विक स्तर पर बदलेंगे। जी-7 को जी-11 बनाने का दृश्टिकोण इस बात को पुख्ता करते हैं। फिलहाल भारत का इसमें सदस्य होने का कितना लाभ होगा यह आने वाली परिस्थितियां निर्धारित करेंगी।


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज ऑफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502
ई-मेल: sushilksingh589@gmail.com

नस्लभेद के पुराने जीन से फिर जूझता अमेरिका

अमेरिका की सड़कों पर इन दिनों रंगभेद के चलते जो ताण्डव देखा जा रहा है। उसका कारण केवल पुलिस की एक मात्र हैवानियत नहीं बल्कि इसके पीछे सैकड़ों वर्शों से यहां विद्यमान गोरे और काले का भेदभाव है। गौरतलब है कि इस रंगभेद के चलते समय-समय पर अमेरिका के कल-पुर्जे ढ़ीले होते रहे हैं और दुनिया में इस बदनामी के दाग को ढ़ोने से वह मुक्त नहीं हो पा रहा है। ऐतिहासिक पड़ताल यह दर्षाती है कि जब संयुक्त राज्य अमेरिका 240 साल पहले स्वतंत्र हुआ था तब उसकी अर्थव्यवस्था अपने षैषव काल में थी उसका स्वरूप कुछ आदिम अर्थव्यवस्था जैसा था। तब अमेरिका निर्मित माल और पूंजीगत सहायता के लिए यूरोप पर आश्रित था। मगर एक षताब्दी के भीतर उसकी अर्थव्यवस्था की गाड़ी अपनी पटरियों पर तेजी से दौड़ने लगी। यही नहीं आर्थिक सर्वोच्चता की दौड़ में उसने कई देषों को पीछे छोड़ दिया। यह बात और है कि गोरे और कालों के भेद के साथ यह दौड़ निरंतरता लिए हुए थी। 20वीं षताब्दी के आरम्भिक वर्शों में अन्य देषों की तुलना में अमेरिका का जीडीपी सबसे अधिक हो गयी और समय के साथ इस सर्वोच्चता को बनाये रखने में वो सफल भी रहा। मौजूदा समय में जिस नस्लवाद से अमेरिका गुजर रहा है उससे एक बार यह विष्वास करना मुष्किल होता है कि यह दुनिया का सबसे षक्तिषाली देष है। हालांकि कोरोना वायरस के चलते भी इसकी बुनियादी विकास और जन सुरक्षा के मामले में कितना निपुण और दक्ष है इसकी भी पोल खुल चुकी है। हैरत यह है कि एक अष्वेत को एक ष्वेत पुलिस वाला गर्दन को तब तक दबा कर रखता है जब तक उसके प्राण निकल नहीं जाते। वैसे भी सभ्य समाज में सजा देने का ऐसा कोई प्रावधान षायद ही किसी को स्वीकार है। बस यहीं से एक बार फिर नस्लभेद की भेंट अमेरिका चढ़ गया। इस घटना ने कोरोना से व्यापक पैमाने पर जूझ रहे अमेरिका को एक नई आग में झोंक दिया जिसकी लपटें 150 षहरों तक देखी जा सकती है। आग इतनी तेजी से विस्तार ले चुकी है कि व्हाइट हाउस की सुरक्षा भी दांव पर लगी हुई है। स्थिति तो यह हो गयी कि राश्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को बंकर में छिपना पड़ा। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अष्वेतों का गुस्सा कोई एकाएक न होकर सैकड़ों वर्शों का परिणाम है।
अमेरिकी राश्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के प्रमुख षहरों में हो रहे हिंसक प्रदर्षनों को रोकने का आह्वान कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए यह भी कहा है कि यदि राज्यों के गवर्नर नेषनल गार्ड को लगाने से मना किया तो वह सेना की तैनाती करेंगे। गौरतलब है कि ट्रम्प समस्या से निकलने के लिए नई समस्या को विकसित करने में माहिर हैं। जो उनके लिए मुसीबत का सबब भी बनता रहा है। इन दिनों चैतरफा घिरे ट्रम्प एक बार फिर कईयों के निषाने पर हैं। माइक्रोसाॅफ्ट कम्पनी के सीईओ सत्या नडेला, गूगल के सुन्दर पिचई और पेप्सिको कम्पनी की पूर्व सीईओ इन्दिरा नूई समेत पूर्व अमेरिका राश्ट्रपति बराक ओबामा ट्रम्प के रवैये पर प्रष्न उठा रहे हैं। समस्या को जिस तरह ट्रम्प दबाव के साथ हल करने का प्रयास करते हैं षायद यही कारण है कि उनकी चैतरफा आलोचना होती रही है। कोरोना महामारी के बीच विष्व स्वास्थ संगठन से नाराजगी के चलते उससे नाता तोड़ने वाले ट्रम्प के इस कृत्य पर भी अमेरिका के भीतर और बाहर कई सवाल उठे हैं। गौरतलब है कि इसी साल नवम्बर में अमेरिकी राश्ट्रपति का चुनाव होना है और ट्रम्प इस चुनाव में एक बार फिर व्हाइट हाउस का रास्ता तलाषना चाहेंगे मगर कोरोना और बाद में नस्लभेद की आग ने उनके रास्ते को एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। विषेशज्ञ की राय यह बताती है कि जो आग इन दिनों अमेरिका में सुलगी है उसमें ट्रम्प झुलस सकते हैं। इस समय पूरी दुनिया की निगाह अमेरिका पर बनी हुई है। पहले महामारी की वजह से और अब नस्लीय हिंसा के कारण ऐसा है। करीब एक सप्ताह से अमेरिका जल रहा है। लोग सड़कों पर हैं और ट्रम्प सेना का सहारा लेने की बात कह रहे हैं। नस्लवाद अमेरिका की सबसे बड़ी महामारी है जिसका टीका अब तक नहीं खोजा जा सका है। नई-नई बीमारियों से निजात पाने वाला अमेरिका नस्लवाद को मानो असाध्य बीमारी मान लिया हो। 13 फीसदी अष्वेत जिस भेदभाव से गुजरते हैं और इससे जुड़ी घटनायें आये दिन सुर्खियों में रहती हैं लेकिन ऐसा अवसर कभी-कभी ही आता है जब रंगभेद का रंग सड़कों पर सैलाब बन कर उतरता है। गौरतलब है यह पहली बार नहीं है। अमेरिका में रंगभेद का इतिहास बहुत पुराना है। 1619 में जब पहली बार अमेरिका ने अफ्रीकी मूल के लोगों को गुलाम बनाकर लाया गया था तब से इसकी कड़ी जुड़ती है। इस घटना को हुए 400 साल हो गये पर यह जिन्न आज भी सभ्य अमेरिका में जिन्दा है। 
संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की उद्देषिका में कहा गया है कि यह संविधान संयुक्त राज्य की जनता ने तैयार किया है मगर संविधान तैयार करने वाली जनता ने समतामूलक बातें मानो यहां कोई मायने नहीं रखती हैं। इतिहास की पड़ताल करें तो कहानी षीषे की तरह साफ हो जाती है। अमेरिका बरसों तक उपनिवेषवाद में रहा है और इसी उपनिवेषवाद के पहले चरण के दौरान 1619 में कुछ अष्वेत लोगों को लाकर जेन्सटाउन में बसाया गया था। षुरू-षुरू में तो ये लोग वेस्ट इंडीज़ से लाये गये किन्तु बाद में सन् 1674 में राॅयल अफ्रीकन कम्पनी ने काले लोगों को अफ्रीका से जहाजों में भर-भरकर लाना षुरू कर दिया। आरम्भ के वर्शों में सारे अष्वेत मज़दूर, दास बनाकर लाये गये मगर ज्यों-ज्यों विकासषील आर्थिक कारणों से मजदूरों की मांग बढ़ती गयी त्यों-त्यों अष्वेत लोगों की स्थिति बद् से बद्त्तर होती गयी। 17वीं षताब्दी के उत्तरार्ध में वर्जीनिया में एक दास नियमावली बन चुकी थी जिसके चलते दासों को उस व्यक्तिगत सम्पत्ति की तरह माना जाने लगा जिसे बाजार में खरीदा और बेचा जा सकता है। अष्वेत लोगों की इस दयनीय स्थिति के दुश्परिणाम तो निकलने ही थे। इसी वजह से अष्वेत और गोरे अमेरिकियों में विभाजन की रेखा अस्तित्व में आयी और जिसमें अमेरिका में नस्लवादी और रंगभेदी इतिहास को जन्म दिया। जिसका कच्चा चिट्ठा आज भी अमेरिका की सड़कों पर एक दस्तावेज के रूप में उभरा हुआ है। हैरत तो यह भी है कि सैकड़ों साल बीतने के बाद अमेरिकी स्वतंत्रता के घोशणापत्र में गुलामों के व्यापार के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया। उसमें स्वतंत्रता और समानता के सिद्धान्त पर जो बल दिया गया था वो गुलामों के लिए नहीं था। अमेरिका के संविधान में भी उनको नागरिकता के अधिकार नहीं मिले। बस इतना उल्लेख किया गया कि प्रतिनिधित्व के मामले में नीग्रो की गणना वास्तविक संख्या यदि 500 होगी तो 300 मानी जायेगी जो हर लिहाज़ से बड़े भेद को दर्षाता है। अमेरिकी राज्य में नये-नये राज्य षामिल होते गये और राज्य दास प्रथा के पक्ष में या विरोध में बंटते गये और यहां यह इतिहास बन गया कि कभी एक पक्ष का जोर रहता था तो कभी दूसरे पक्ष की षक्ति बढ़ जाती थी। अमेरिका के उत्तरी भाग में अप्रवासियों का आगमन अधिक था। हालांकि 1808 में अष्वेतों को लाने में रोक लगायी गयी। पहले राश्ट्रपति जाॅर्ज वांषिंगटन से लेकर ट्रम्प तक सत्ता यदा-कदा छोड़कर ष्वेतों के हाथ में रही। राश्ट्रपति अब्राहम लिंकन की 1865 में गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद हत्या कर दी गयी थी जिन्हें दासों को आजाद करने के लिए जाना जाता है। ट्रम्प से पहले बराक ओबामा अष्वेत राश्ट्रपति थे। फिलहाल सुलग रहे अमेरिका की दासतां नई नहीं है और न ही षीघ्र समाधान की ओर जाते दिखती है। 
अमेरिका के इतिहास में आंदोलन का बड़ा चेहरा रहे मार्टिन लूथर किंग जूनियर जो राश्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपना आदर्ष मानते हैं उन्होंने कहा था कि आने वाले दिनों में क्या इसकी सम्भावना पूरी तरह होगी कि जब मेरे चारों बच्चे नस्लभेद से मुक्त अमेरिका में सांस लेंगे। मार्टिन लूथर किंग का यह भी दृश्टिकोण था कि आंदोलनों में हिंसा की कोई जगह नहीं है और एक बार उन्होंने यह भी कहा था कि दंगे वे लोग करते हैं जिनकी आवाज नहीं सुनी जाती है। उक्त कथन के आलोक में घटे प्रकरण को देखें तो मार्टिन लूथर किंग के कथन सत्यता की पुश्टि करते हैं। एक पुलिसवाला एक अष्वेत के गर्दन को अपने घुटने से 8 मिनट तक दबाये रखता है और तिल-तिल कर उसकी सांस उखड़ रही है, आवाज़ बंद हो रही है पर षायद वह पुलिसवालायह इंतजार कर रहा है कि इसका षरीर षिथिल पड़े, स्थिर हो और यह प्राण से हाथ धो ले तब वह उसकी दबोची हुई गर्दन छोड़ेगा। यदि यह हकीकत है तो मार्टिन लूथर किंग की बातें अमेरिका की फिजा की हिसाब से कहीं अधिक पुख्ता सबूत की तरह है। अमेरिका में हो रहे दंगे और प्रदर्षन यही बताते हैं कि अष्वेतों को वह न्याय और वह स्थान नहीं मिला जो असल में मिलनी चाहिए। गौरतलब है कि जिस अमेरिका के संविधान से भारत ने मूल अधिकार का अनुसरण करते हुए अपने संविधान का हिस्सा बनाया अभी भी उसी अमेरिका में रंगभेद सर चढ़ कर बोल रहा है जबकि उसके संविधान को बने 230 साल से अधिक हो चुके हैं। हालांकि अमेरिका ने मूल अधिकार को पहले से 10वें संविधान संषोधन के भीतर समावेष किया था। फिलहाल अमेरिका में 50-60 के दषक में बड़े पैमाने पर दंगे हुए थे। गौरतलब है कि अष्वेत नागरिकों को यहां तरक्की के अवसर किसी छोर पर छूट गये हैं मगर यहां रंगभेद इतनी मजबूती से खड़ा है कि अधिकतर अष्वेत नागरिक आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्श कर रहे हैं। 
अमेरिका में जो दंगे चल रहे हैं उसमें अमेरिका और चीन के बीच की तल्खी को भी एक वजह समझा जा रहा है। बात छन-छन कर यह भी आ रही है कि चीन के प्रति अमेरिका का कड़ा रूख ट्रम्प के लिए एक मुसीबत बन गया। व्हाइट हाउस के घेराव और हमले के दौरान कुछ विरोधियों को चीनी भाशा में बात करते हुए सुने जाने की बात कही गयी। सम्भव है कि चीन ने ट्रम्प विरोधी गुट को हवा देने का काम किया होगा। फिलहाल नस्लभेद की इस लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान में अमेरिका रहेगा और दुनिया में इसका संदेष बिल्कुल गलत जायेगा जो ट्रम्प के व्यक्तित्व के लिहाज़ से कहीं अधिक नकारात्मक है। अमेरिका और चीन कोरोना के चलते जिस तरह आमने-सामने हैं उसे देखते हुए कुछ भी घटित हो सकता है। इतना ही नहीं जब दुनिया इस महामारी से जूझ रही है तब चीन लद्दाख में भारत के लिए मुसीबत का सबब बन गया है और एक बार फिर द्विपक्षीय सम्बंध रसातल में चले गये हैं। चीन अपनी आन्तरिक समस्याओं से जूझने का रास्ता फिलहाल भारत से उलझने के मार्ग से निकाल रहा है। जबकि अमेरिका नासूर बनी समस्या से इन दिनों दो-चार हो रहा है। अगस्त 1965, जुलाई 1967 और अप्रैल 1968 के दौर को देखें तो यहां रंगभेद की लड़ाई जिस उठान पर थी उसमें अमेरिका नस्लभेद की स्याही को कहीं अधिक गाढ़ी कर रहा था। जिस तर्ज पर हाल में अमेरिका में घटना घटी है उसी तर्ज पर दिसम्बर 1979 में चार ष्वेत पुलिस अधिकारियों ने अष्वेत मोटरसाइकिल सवार को पीट-पीटकर मार दिया था। हालांकि सुनवाई के बाद पुलिसकर्मी को बरी कर दिया गया तब भी अष्वेतों द्वारा हिंसा की गयी थी पर इसका साइज़ छोटा था। 1992 में अष्वेत रंगभेद की हिंसा ने 59 लोगों की जान ली थी और ठीक इसके 19 साल बाद ऐसी घटना के चलते सिन सिनेटी षहर में कफ्र्यू लगाना पड़ा था। अगस्त 2014 में भी एक पुलिसवाले निहत्थे अष्वेत किषोर को मौत के घाट उतार दिया। इसके कारण भी हिंसा और तनाव का कारण बना था। पड़ताल बताती है कि ष्वेत पुलिसकर्मियों के निषाने पर अष्वेत अक्सर रहे हैं और हजारों की तादाद में मौत इसी तरह हुई है। जिसके चलते अमेरिका हिंसा की चपेट में और रंगभेद के षिकार होने से स्वयं को कभी बचा नहीं पाया। 

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
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सीमा पर घटना रचित करता है चीन

इतिहास के पन्नों में इस बात के कई सबूत मिल जायेंगे कि भारत और चीन के बीच सम्बंध भी पुराना है और रार भी पुरानी है। कूटनीति में अक्सर यह देखा गया है कि मुलाकातों के साथ संघर्शों का भी दौर जारी रहता है। भारत और चीन के मामले में यह बात सटीक है पर यह बात और है कि चीन इसका रणनीतिक फायदा उठाता है और भारत भावनाओं में बह जाता है। षीषे में उतारने वाली बात तो यह भी है कि चीन एक ऐसा पड़ोसी देष है जो सिर्फ अपने तरीके से ही परेषान नहीं करता बल्कि अन्य पड़ोसियों के सहारे भी भारत के लिए नासूर बनता है। मसलन पाकिस्तान और नेपाल इतना ही नहीं श्रीलंका और मालदीव यहां तक कि बांग्लादेष से भी ऐसी ही अपेक्षा रखता है। गौरतलब है जब पाकिस्तान और भारत के बीच की दुष्मनी प्रकट होती है तब यह बात सभी को आसानी से पच जाती है कि भारत के आगे पाकिस्तान बिल्कुल नहीं टिक पायेगा मगर जब चीन आंख दिखाता है तब भारत की मीडिया से लेकर तमाम जानकार चीन की षक्ति का बखान करते हुए भारत का हौसला बढ़ाते हैं। सवाल यह है कि क्या हमेषा के लिए यह तय हो गया है कि समस्या सदैव चीन ही बढ़ायेगा। डोकलाम विवाद से लेकर लद्दाख तक तीन साल के दरमियान में देखें तो चीन ने हमें बेवजह कई तकलीफें दी हैं और भारत सिर्फ संयम दिखाता रहा। यह बात उचित है कि युद्ध समस्या का सम्पूर्ण हल कभी हो नहीं सकता पर चीन की दबंगाई हमेषा के लिए क्यों स्वीकारी जाये। अरूणाचल से लेकर लद्दाख तक जमीन हड़पने का पक्षधर चीन जब-तब भारत के लिए मुसीबत का सबब बनता है तब-तब भारत संयम और षान्ति के साथ उसके षान्त होने का इंतजार करता है। दुविधा यह है कि इस तरीके से भारत-चीन सीमा विवाद का कोई हल क्या निकल पायेगा। 
लद्दाख पर चीन की नई करतूत ने द्विपक्षीय सम्बंध को रसातल में धकेल दिया है और कोरोना महामारी के बीच बेवजह वह एक मुसीबत बन गया है। सीमा पर अच्छी खासी संख्या में चीनी सैनिक मौजूद है उसके मुकाबले में भारतीय सेना भी वहां बहुतायत में उपस्थित है। रक्षा मंत्री की मानें तो लद्दाख में लड़ाकू विमान सुखोई तथा तेजस मिराज उड़ान भर रहे हैं। गौरतलब है कि भारत सीमा पर सड़क बना रहा है और चीन को यह अखर रहा है। चीन की आपत्ति के बावजूद काम नहीं रोकने बल्कि काम तेज करने की बात कही गयी है। मई में दो समस्याएं उपजी पहला नेपाल ने अपने नक्षे में काला पानी और लिपुलेख को दिखाकर मानो भारत को एक मौन चुनौती दे दी हो जाहिर है यह चीन की कुटिल चाल का हिस्सा है। दूसरी समस्या स्वयं चीन है जो लद्दाख में भारत से भिड़ने के लिए तैयार बैठा है। चीन को यह कौन समझाये यह 1962 का नहीं यह 2020 का भारत है। सभी जानते हैं कि साल 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके वर्श 1954 के पंचषील समझौते की धज्जियां उड़ाई थी। इतना ही नहीं पाकिस्तान का लगातार साथ देकर भारत की कूटनीति को बौना करना इसकी फितरत रही है। संयुक्त राश्ट्र संघ की सुरक्षा परिशद् में पाक आतंकियों का पक्ष लेकर वीटो को रोकने वाला चीन कई बात अपनी संकीर्णता का परिचय कई बार दे चुका है।
देखा जाय तो सीमा विवाद के मामले में चीन का रवैया कभी उदार नहीं रहा है। भारत सहित दर्जन भर से अधिक पड़ोसी देषों का दुष्मन चीन कोरोना महामारी का जन्मदाता है। हांगकांग में स्वतंत्रता की आवाज इन दिनों दबा रहा है। अमेरिका से चलने वाला ट्रेड वाॅर अब कोरोना वाॅर में तब्दील हो गया है। दुनिया को कोरोना वायरस बांट कर चीन अब अपनी अर्थव्यवस्था के गुणा-भाग में न केवल षामिल है बल्कि सीमा विवाद खड़ा करके अपनी भीतरी समस्या को सुलझाने की राह को भारत के धमकाने से खोज रहा है। गौरतलब है कि चीनी राश्ट्रपति जिनपिंग ताउम्र के लिए राश्ट्रपति हैं और वहां लोकतंत्र का तो नामोनिषान नहीं है। ताकत और दबंगाई के बल पर चीनी नागरिकों को हांका जाता है पर कईयों ने जिनपिंग के खिलाफ आवाज उठाई। जिनपिंग को डर है कि यह आवाज अगर चीन की गूंज और क्रान्ति बन गयी तो उनकी सत्ता का तख्त पलटा जा सकता है। ऐसे में सीमा विवाद खड़ा करके चीनियों का ध्यान ही पलट दिया जाये। जिनपिंग जो नाटक कर रहे हैं वह द्विपक्षीय सम्बंध के लिहाज से कतई उचित नहीं है। यूरोप के कई देष चीन पर जुर्माने की बात कह रहे हैं। अमेरिकी राश्ट्रपति ट्रम्प विष्व स्वास्थ संगठन से इस बात के लिए नाता तोड़ लिया कि यह चीन परस्त है। ट्रम्प तो कोरोना को चीनी वायरस की संज्ञा दे रहे हैं। जिस राह पर दुनिया खड़ी है चीन फिलहाल उसके केन्द्र में है।
संयोग से चीन भारत की तुलना में आर्थिक और सामरिक दृश्टि से षक्तिषाली देष है जो जब चाहे भारत-चीन सीमा पर धमक जाता है और मुसीबत को स्वयं अपने मन-माफिक बढ़ा लेता है। वैसे चीन इन दिनों कई चीजों से उलझ रहा है। हांगकांग से लेकर ताइवान तक और यूरोप से लेकर अमेरिका तक। विवाद हर जगह भिन्न-भिन्न प्रकृति का है। ताजा-तरीन मामला भारत के साथ है। लद्दाख की समस्या डोकलाम की याद ताजा कर देती है। जब 16 जून 2017 को चीन डोकलाम की चुम्बी घाटी पर दावा करना चाह रहा था। करीब ढ़ाई महीने तक चली इस तनातनी के बीच दोनों सेनाएं वापस हुई। इसके पीछे एक बड़ा कारण भारत का संयम से उठाया गया कदम और सितम्बर 2017 के प्रथम सप्ताह में चीन में होने वाले ब्रिक्स देषों की बैठक मानी जा सकती है। अब सवाल यह है कि क्या भारत और चीन के बीच युद्ध की स्थिति बन रही है और यदि ऐसा है तो क्या यह विष्व युद्ध का संकेत दे रहा है। इन दिनों सभी की अर्थव्यवस्था उखड़ी है ऐसे में सद्भाव की आवष्यकता सभी को है। यह बात ठीक है कि भारत पहले जैसा नहीं है पर चीन से मजबूत भी तो नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कहा था कि पड़ोसी नहीं बदल सकते। चीन और भारत की 4 हजार किलोमीटर की सीमा जब-तब विवाद को उत्पन्न करती है। जाहिर है समाधान बातचीत ही है मगर औजारों और हथियारों के इस युग में संयम खो चुके देष इस रास्ते से भटक गये हैं जिसमें चीन पहले नम्बर पर है। जबकि संयम के मामले में यही स्थान भारत का है। 

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज ऑफिस  के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502
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Wednesday, May 20, 2020

आसान नहीं आर्थिक त्रासदी से आर्थिक सुशासन की राह

विश्व  बैंक की हालिया रिपोर्ट यह बता चुकी है कि कोरोना वायरस के चलते भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ने वाला है और आर्थिक वृद्धि दर में भी भारी गिरावट दर्ज होगी। मूडीज़ की रिपोर्ट ने भी भारत की वृद्धि अनुमान को घटाकर 0.2 फीसद कर दिया है। बीते मार्च में उसने यही 2.5 फीसद की उम्मीद जताई थी। हालांकि मूडीज 2021 में भारत की वृद्धि दर 6.2 प्रतिषत रहने की बात कह रहा है जो आर्थिक त्रासदी के इस दौर को देखते हुए बात पूरी तरह पचती नहीं है। मूडीज ने चीन की आर्थिक वृद्धि दर को भी एक प्रतिषत रहने की बात कही है। फिलहाल यह किसी से नहीं छुपा है कि कोरोना महामारी ने दुनिया समेत भारत की अर्थव्यवस्था को त्रासदी की ओर धकेल दिया है। एक ओर जहां कल-कारखाने से लेकर सभी प्रकार के कार्यों में व्यापक बंदी है वहीं सरकार को मिलने वाले आर्थिक लाभ मसलन जीएसटी व आयकर आदि भी हाषिये पर है। इतना ही नहीं लोकतंत्र की खूबियों से जकड़ी सरकार लोगों की स्वास्थ की रक्षा और जीवन के मोल को देखते हुए 20 लाख करोड़ रूपए का एक आर्थिक पैकेज का एलान कर चुकी है। हालांकि एक विषेशज्ञ के तौर पर इस आर्थिक पैकेज की पड़ताल से पता चलता है कि यह राहत से ज्यादा बिना आय वाला योजनागत व्यय का ब्यौरा है। देखा जाय तो  सरकार सारे इंतजाम कर रही है पर समस्या इतनी बड़ी है कि सब नाकाफी है। देष में 94 फीसदी गैर संगठित कामगार हैं जिनके हाथ इन दिनों पूरी तरह खाली हैं और लगातार उखड़ रही अर्थव्यवस्था के चलते उनकी राह में भूख और जीवन की समस्या भी स्थान घेर रही है। षहरों से मजदूर व्यापक पैमाने पर गांव की ओर हैं। बरसों बाद यह भी पता चला कि भारत वाकई में गांव का ही देष है और जब सभ्यता और षहर पर गाज गिरती है तब जीवन का रूख गांव की ओर ही होता है। सरकार के सामने दुविधायें एक नहीं अनेकों हैं पहला कोरोना से निपटना, दूसरा आर्थिक त्रासदी से मुक्ति, तीसरा ठप्प पड़ी व्यवस्था को सुचारू करना। इसमें कृशि, उद्योग व सेवा सम्बंधित सभी इकाईयां षामिल हैं। कहा जाय तो लोक विकास के लिए नीतियां बनाने वाली सरकारें आज कोरोना महामारी के चलते चैतरफा समस्याओं से घिरी हुई हैं। नागरिकों पर भी गरीबी की गाज लगातार गिर रही है। सवाल यह है कि आर्थिक त्रासदी से आर्थिक सुषासन की राह पर गाड़ी कब आयेगी। 
सुषासन एक ऐसा लोक सषक्तिकरण का उपकरण है जिसमें सबसे पहले आर्थिक न्याय ही आता है। यह एक ऐसी विधा है जहां षासन को अधिक खुला, पारदर्षी तथा उत्तरदायी बनने का अवसर मिलता है। मानवाधिकार, भूख से मुक्ति और सहभागी विकास के साथ लोकतंत्र को ऊंचाई देना सुषासन की सीमाएं हैं। गौरतलब है कि 1991 के उदारीकरण के दौर में आर्थिक मापदण्ड नये सिरे से विकसित करने के प्रयास हुये थे। सरकार और षासन ने इस तब्दीली से जनता को जो लाभ दिया जिसे आज भी महसूस किया जा सकता है। इस महामारी ने मानो सृश्टि और पृथ्वी को पुर्नसंरचना में डाल दिया हो। ऐसे में सरकार को भी नई राह पर चलना अपरिहार्य होंगा। सूचना का अधिकार, नागरिक घोशणापत्र और ई-सुविधा का दौर यदि उदारीकरण के पष्चात् आया तो इन महामारी के बाद एक नये भारत का खाका खींचने और सुषासन की राह पर ले चलने के लिए नये थिंक टैंक की आवष्यकता पड़ेगी। संयुक्त राश्ट्र ने हाल ही में वल्र्ड इकोनाॅमी सिचुयेषन एण्ड प्रोस्पेक्टस रिपोर्ट 2020 15 मई को जारी किया। रिपोर्ट से यह पता चलता है कि वैष्विक अर्थव्यवस्था 3.2 फीसद सिकुड़ जायेगी। विकसित देषों में जीडीपी की वृद्धि मौजूदा वर्श में घटकर -0.5 फीसद रह जायेगी। अगर इस रिपोर्ट को भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो 2018 में जहां विकास दर 6.8 कहा गया था, 2019 में 4.1 कही गयी थी जबकि 2020 में 1.2 कहा जा रहा है। बावजूद इसके 2021 में 5.5 की बात कहना मूडीज रिपोर्ट के इर्द-गिर्द प्रतीत होता है। दुविधा यह है कि राजकोश से विनियोजन की मात्रा बढ़ना और आय का जरिया सिकुड़ना यह कठिन स्थिति पैदा करेगा। भविश्य में राजकोशीय घाटे का होना तत्पष्चात् बजटीय घाटे का निष्चित तौर पर होना साथ ही लोगों के जीवन स्तर में गिरावट दिखेगी। सुषासन जिस आर्थिक न्याय की बात करता है उससे उपरोक्त बिन्दु से कोई वास्ता नहीं है। 
हालांकि सरकार ने नाबार्ड समेत कई अन्य एजेन्सियों के माध्यम से किसानों को सुविधा एमएसएमई की परिभाशा बदलने के साथ निवेष आदि के लिए नये फाॅर्मूले तय करना साथ ही उत्पादन के लगभग सभी क्षेत्रों में नये ढंग से नियोजन की बात करके आर्थिक त्रासदी से निकलने की बात सोच रही है। लगातार गांव में बढ़ती लोगों की आबादी काम की कमी का सीधा समीकरण बनाता है। 40 हजार करोड़ रूपए की अतिरिक्त व्यवस्था करके मनरेगा के माध्यम से सुचिता लाने का एक प्रयास तो यहां दिखता है मगर रोजगार सृजन के नये पहलू खोजना सरकार के लिए चुनौती रहेंगी। बेषक देष की सत्ता को पुराने डिजाइन से बाहर निकलना होगा लेकिन बाहर भूख और भीड़ है सभी को रोजगार और रोटी देना न पहले सम्भव था न अब दिखाई देता है। मोदी सरकार पर यह आरोप रहा है कि उसके कार्यकाल में बेरोज़गारी सबसे निचले स्तर पर पहुंच गयी थी और अब तो कोरोना महामारी ने कमर ही तोड़ दी है। प्रधानमंत्री न्यू इण्डिया की बात कह रहे हैं जबकि पुराना भारत इन दिनों सड़कों पर है जब तक कृशि क्षेत्र और इससे जुड़ा मानव संसाधन भूखा प्यासा और षोशित महसूस करेगा तब तक देष सुषासन की राह पर होगा ही नहीं। यह गांधी के चिंतन का अंष है। विष्व बैंक ने 1989 की एक रिपोर्ट फ्राॅम स्टेट टू मार्केट प्रकाषित किया था। इसका सीधा तात्पर्य था कि राज्य को न्यून होना चाहिए और बाजार को अवसर देना चाहिए। आज स्थिति यह है कि बाजार भी न्यूनतम की ओर चले गये हैं। रोजगार छिन गये हैं, मानव संसाधन से षहर खाली हो गया है और आर्थिकी सबसे बड़े संकुचन की ओर है। लाॅकडाउन के कारण कई साईड इफेक्ट और डिफेक्ट देखने को मिल रहे हैं। जानकारों का तो यह भी कहना है कि कोरोना वायरस से अर्थव्यवस्था को मिली चुनौती एक-दो बरस में तो हल नहीं होगी। 
भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए भारत सरकार को सभी राज्यों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक का आंकलन भी अर्थव्यवस्था की दुर्दषा ही बताता है। गौरतलब है कि 1930 की मन्दी के बाद यह सबसे बड़ी भयावह स्थिति है। मगर भारत के लिए यह एक ऐसा मौका भी है जो अपने घरेलू वस्तुओं को बाजार तक पहुंचा कर सही कीमत के साथ जीडीपी को कुछ बढ़त दे सकते है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी लोकल से वोकल व ग्लोबल की बात कह रहे हैं। जाहिर है विष्व के बाजार भी उखड़े हैं ऐसे में भारत को आत्मनिर्भरता की राह लेनी ही पड़ेगी। अन्तर्राश्ट्रीय मुद्रा कोश भारत के हित में दिखाई देता है। इसमें कोई दुविधा नहीं कि गांवों के देष भारत अन्य देषों की तुलना में आत्मनिर्भर की सम्भावना अधिक रखता है। बस नियोजन और क्रियान्वयन दुरूस्त कर लिया जाय तो। आर्थिक सुषासन की गाड़ी अब स्थानीय उत्पादों पर कहीं अधिक टिकी दिखाई देती है। लाॅकडाउन के चलते भारत को 9 लाख करोड़ रूपए का नुकसान उठाना पड़ सकता है जो आर्थिक त्रासदी से कम नहीं है। पहले कोरोना से निपटना है या उसी के साथ आर्थिक सुषासन की राह को भी समतल बनाना अब सरकार की जिम्मेदारी है। जाहिर है षिथिलता जितनी देर रहेगी आर्थिक त्रासदी उतना ही विस्तार लेगी।



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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Saturday, May 16, 2020

आखिर मज़दूर को मज़बूर समझने की गलती क्यों !

मजदूरों की गांव वापसी की होड़ और सड़क पर मचा मौत का तांडव संवेदनाओं को इन दिनों झकजोर कर रख दिया है। सैकड़ों हजारों मील की यात्रा बूढ़े से लेकर बच्चे एवं महिलाओं का जो हुजूम सड़कों पर इन दिनों पैदल जाने का दिख रहा है वह लोकतंत्र की मर्यादा में निहित सरकारों के लिए न केवल चुनौती है बल्कि उनके काम-काज पर भी सवालिया निषान लगाता है। जिस प्रकार सड़कों पर हादसों की तादाद बढ़ी है और मौत के आंकड़े गगनचुम्बी हो रहे हैं वो किसी भी सभ्य समाज को हिला सकते हैं। हादसे यह इषारा करते हैं कि कोरोना वायरस से भी बड़ी समस्या इन दिनों मजदूरों की घर वापसी है। लाॅकडाउन के कारण करोड़ों की तादाद में लोग बेरोज़गार हो गये। 50 दिनों के इस लाॅकडाउन में भूख और प्यास में भी इजाफा हो गया। सरकारी संस्था हो या गैर सरकारी सभी को इस वायरस ने हाषिये पर खड़ा कर दिया है। कुछ स्वयं सेवी संस्थाएं आज भी सेवा में अपनी तत्परता दिखा रही हैं मगर वो भी असीमित संसाधन से युक्त नहीं है। सवाल यह है कि क्या लाॅकडाउन से पहले सरकार इस बात का अंदाजा नहीं लगा पायी कि जो दिहाड़ी मजदूर या कल-कारखानों में छोटी-मोटी नौकरी करते हैं, रिक्षा, आॅटो, टैक्सी चलाते हैं, घरों में झाड़ू-पोछा का काम करते हैं, दफ्तरों में आउटसोर्सिंग के तौर पर सेवाएं देते हैं इतना ही नहीं मूंगफली बेचने से लेकर चप्पल-जूते बनाने वाले मोची सहित करोड़ों कामगार का जब काम तमाम होगा तो उनका रूख क्या होगा। 25 मार्च से लागू लाॅकडाउन के तीसरे दिन ही दिल्ली में घर जाने की जो लाखों का जो जमावड़ा दिखा वह इस बात को तस्तीक करती है।
कोरोना का मीटर रोजाना की गति से बढ़ने लगा लेकिन समस्या कहीं और भी बढ़ रही थी वह थी बेरोजगार हो चुके कामगारों के लिए ठिकाना और भूख जिसने इन्हें जीवन से दर-बदर कर दिया। सिलसिला पहले बहुत मामूली था पर इन दिनों बाढ़ ले चुका है। पूरे देष से चैतरफा घर वापसी के कदम-ताल देखे जा सकते हैं और पूरे देष में मौत के हादसे भी आंकड़ाबद्ध हो रहे हैं और अब तो दिन भर में कई हादसे देखे जा सकते हैं। 16 मई के एक आंकड़े का उदाहरण दें तो उत्तर प्रदेष के औरेय्या में 24 मजदूर काल के ग्रास में चले गये। ये हरियाणा और राजस्थान से अपने गांव जा रहे थे। जिसमें ज्यादातर मजदूर पष्चिम बंगाल, झारखण्ड और बिहार के थे।  ज्यों-ज्यों दिन बीतते गये कोरोना का डर लोगों में बढ़ता गया और लोग पूरी तरह घरों में कैद हो गये पर यह बात मानो मजदूरों पर लागू ही नहीं होती। जाहिर है भूख और प्यास क्या न करवा दे। अपने ही बच्चों और परिवार के सदस्यों की भूख से बिलबिलाहट आखिर कौन देख सकता है। ऐसे में जब उम्मीदों में षहर खरा नहीं उतरता है तो गांव की याद आना लाज़मी है और मजदूरों ने यही किया। भले ही उन्हें हजार किलोमीटर की यात्रा पैदल करनी पड़ रही है पर उनके मन में गांव जाने का सुकून किसी-न-किसी कोने में तो है। लोकतंत्र में कहा जाता है कि सरकारें जनता के दर्द को अपना बना लेती हैं। लेकिन यहां स्पश्ट रूप से दिख रहा है कि सरकारें इनके दर्द से मानो कट गयी हों। वैसे अनुभव भी यही कहते हैं कि दुःख-दर्द में गांव और जब कहीं से कुछ न हो तो भी गांव ही षरण देता है। इतनी छोटी सी बात समझने में षासन-प्रषासन ने कैसे त्रुटि कर दी। रेल मंत्रालय का आंकड़ा है कि 10 लाख लोगों को उनके घर वापस पहुंचाने का काम किया है। हो सकता है कि यह आंकड़ा अब बढ़ गया हो पर यह नाकाफी है। उत्तर प्रदेष सहित कुछ राज्य सरकारों ने मजदूरों और विद्यार्थियों समेत कुछ फसे लोगों को बस द्वारा वापसी करायी है यह एक अच्छी पहल थी पर इसे समय से पहले कर लिया जाता तो निर्णय और चोखा कहलाता। 
पैदल अपने-अपने गांव पहुंचने का क्या आंकड़ा है इसकी जानकारी सरकार को है या नहीं कहना मुष्किल है। एक नकारात्मक परिप्रेक्ष्य यह भी है कि मजदूरों की लगातार वापसी पूरे भारत में कोरोना मीटर को गति दे दिया है। गौरतलब है कि इन दिनों अर्थव्यवस्था ठप्प है। 12 मई से कुछ रेले चलाई गयी हैं धीरे-धीरे सम्भावनाएं और क्षेत्रों में खोजी जा रही हैं। लाॅकड़ाउन का चरण भले ही ढ़िलाई के साथ रहे पर कोरोना से मुक्ति कब मिलेगी किसी को नहीं पता। समाधान कितना और कहां कह पाना कठिन है जबकि अभी तो समस्या ही उफान पर है। महामारी के नाम पर करोड़ों मजदूरों की जिन्दगियों में जोखिम आया मध्यम वर्ग भी आर्थिक चोट से लहुलुहान है। श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर भी इन दिनों चर्चा आम है। सरकार ने 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज घोशित करके सभी को राहत देने का काम कर रही है पर तात्कालिक परिस्थितियों में यह पैकेज कितना खरा उतरेगा यह अभी षोध का विशय है। आर्थिक पैकेज पारखी नजर यह बताती है कि सरकार अभी भी दिल खोलकर नहीं दे रही है। हालांकि देने के लिए बड़ा दिल दिखा रही है। देष में खाद्य की कोई समस्या नहीं है ऐसा खाद्य मंत्री की तरफ से बयान है। 5 किलो राषन दिया गया। अब यह कितना भरपाई किया यह भी पड़ताल का विशय है। सवाल है कि जब खाद्य वितरण में सुचिता है तो मजदूरों ने घर वापसी का मन क्यों बनाया। कहीं ऐसा तो नहीं कि स्याह कागज पर गुलाबी अक्षर लिखकर कहानी कुछ और बतायी जा रही है। राम विलास पासवान ने यह बात स्वीकार किया है कि कितने मजदूर गरीब है यह पता लगाना मुष्किल है ऐसे में 5 किलो राषन को मुफ्त देने की घोशणा में देरी स्वाभाविक है। 
प्रदेष की सरकारों ने सुषासन का जिम्मा तो खूब उठाया मगर मजदूरों के काम यह भी पूरी तरह नहीं आयी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीष कुमार को सुषासन बाबू के रूप में माना जाता है पर वे अपने ही प्रदेष के निवासियों को वापस लेने से बहुत दिनों तक कतराते रहे। उन्हें डर था कि बिहार में उनके आने से कोरोना फैल जायेगा। केन्द्र सरकार ने कई आर्थिक कदम उठाई है जाहिर है सबको राहत पूरी तरह नहीं मिलेगी परन्तु सरकार के इरादे को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ईएमआई की भरपाई में तीन महीने की छूट सम्भव है कि यह और आगे बढ़ेगा से लेकर रिटर्न दाखिल करने तक पर कई कदम पहले ही उठाये जा चुके है और अब एक मिनी बजट के माध्यम से सरकार दरियादिली दिखा रही है। किसान, मजदूर, मध्यम वर्ग से लेकर रेहड़ी और पटरी वाले इनकी सौगात की जद्द में हैं मगर लाभ कितना होगा यह समय ही बतायेगा। फिलहाल इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि मजदूर भी मोदी सरकार को 300 के पार ले जाने में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी ली है। वह केवल एक मतदाता नहीं है बल्कि देष के इज्जतदार नागरिक हैं। एक-एक मजदूर की समस्या देष की समस्या है। सरकार को इस पर अपनी आंखें पूरी तरह खोलनी चाहिए। हो सकता है कि इस कठिन दौर में सरकार के सारे इंतजाम कम पड़ रहे हों बावजूद इसके जिम्मेदारी तो उन्हीं की है। गौरतलब है कि आगामी दिनों में जब कल-कारखाने खुलेंगे, सड़कों पर वाहन दौड़ेगें, विमान भी हवा में उड़ान लेंगे तो इन्हीं कामगारों की कमी के चलते कठिनाईयां भी बादस्तूर दिखाई देंगी। गांव जाने वाले मजदूर षहर का अब रूख कब करेंगे कहना मुष्किल है। स्थिति यह भी बताती है कि सरकार पर उनका भरोसा भी कमजोर हुआ है जिसकी कीमत सरकारों को चुकानी पड़ेगी। फिलहाल कोरोना से निपटना प्राथमिकता है परन्तु देष के नागरिकों के साथ हो रहे हादसों पर भी लगाम और उनके घर पहुंचने का इंतजाम भी जरूरी है।

सुशील कुमार सिंह
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Monday, March 16, 2020

अर्थव्यवस्था की भी सांस उखड़ता कोविड-19

चीन के हुबेई प्रान्त से कोरोना का उठा बवंडर अन्तर्राश्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी बाकायदा चपेट में ले लिया है। एक ओर जहां दुनिया में इसके विकराल रूप के चलते संक्रमित लोगों की संख्या डेढ़ लाख से ऊपर पहुंच गयी है वहीं मरने वालों का भी आंकड़ा 6 हजार पार कर चुका है। चीन से निकला यह वायरस सबसे ज्यादा चीन में ही तबाही मचाई। अब इसकी जद्द में दुनिया के 150 से अधिक देष हैं जिसमें भारत बीते कुछ दिनों से तेजी से प्रभावित हो रहा है। हालांकि भारत की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उसने समय रहते कई प्रकार के कदम उठाये नतीजन पड़ोसी चीन की यह बीमारी भारत को उस तरह प्रभावित नहीं कर पायी जैसा कि इन दिनों यूरोप और अमेरिका प्रभावित है। कोरोना वायरस का असर भारतीय बाजार पर किस तरह पड़ेगा सवाल छोटा है पर इसके जवाब पूरी तरह मिल पाना अभी मुष्किल है। मगर अनुमान के आसपास पहुंचा जा सकता है। भारत अभी नागरिकों को बचाने के लिए हर वो कदम उठा रहा है जो कहीं अधिक जरूरी है चाहे भले ही व्यापक आर्थिक नुकसान क्यों न हो रहा हो। संयुक्त राश्ट्र की कांफ्रेंस आॅन ट्रेड एण्ड डवलेपमेंट की खबर है कि कोरोना वायरस से प्रभावित दुनिया की 15 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत भी है। चीन में उत्पादन में आयी कमी का असर भारत पर साफ-साफ देखा जा सकता है और अंदाजा है कि भारत की अर्थव्यवस्था को लगभग 35 करोड़ डाॅलर तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है। यूरोप के आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने भी साल 2020-21 में भारत की अर्थव्यवस्था के विकास की गति 1.1 प्रतिषत घटने का संकेत दिया है। साथ ही यह भी अनुमान लगाया है कि विकास दर 5.1 प्रतिषत रहेगी जबकि पहले यह अनुमान था कि यह आंकड़ा 6.2 फीसद रहेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना वायरस की विस्तार ले चुकी यात्रा दुनिया की जान और माल को हिला कर रख दिया है। 
भारत सरकार ने आगामी 15 अप्रैल तक के लिए सभी देषों के वीजा रद्द कर दिये हैं। गौरतलब है कि इससे पर्यटन उद्योग चरमरा जायेगा। इस क्षेत्र से 2 लाख करोड़ से अधिक की कमाई प्रति वर्श होती है। जिस पर नुकसान साफ-साफ दिख रहा है। इंटरनेषनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएषन का अनुमान है कि विमानन उद्योग को यात्रियों से होने वाले कारोबार में कम से कम 63 अरब डाॅलर का नुकसान हो सकता है। इसमें माल ढ़ुलाई के व्यापार को हाने वाला नुकसान षामिल नहीं है। आॅटोमोबाइल उद्योग पर भी इसका खतरा बाकायदा देखा जा सकता है। भारत में इस क्षेत्र में लगभग पौने चार करोड़ लोग काम करते हैं। आॅटो उद्योग में पहले से ही सुस्ती देखी गयी है। चीन में आयी मन्दी के प्रभाव से इस उद्योग की रीढ़ पहले से और कमजोर हो गयी। गौरतलब है कि कोरोना वायरस ने भारत के आॅटो उद्योग को भी कल-पुर्जों की किल्लत पैदा कर दी। यहां बेरोज़गारी का खतरा तुलनात्मक बढ़ गया है। विष्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया चेतावनी को देखें जिसमें कहा गया है कि अन्टार्कटिका को छोड़ दिया जाये तो यह वायरस सभी महाद्वीपों में फैल चुका है। इसके भयावह स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 6 करोड़ की आबादी वाली इटली में मरने वालों की तादाद रिकाॅर्ड तोड़ रही है। 24 घण्टे में यहां 368 लोग के मरने की सूचना है जबकि पहले यह रिकाॅर्ड इतने ही समय में 250 का था और वो भी इटली का ही। इतनी तेजी से मौत तो चीन में भी नहीं हुई। भारत में यह संक्रमित होने वालों का आंकड़ा बामुष्किल सौ के पार है। जाहिर है सरकार की चेतना और जागरूकता और जनता के इसमें पूरी तरह साथ देने के चलते कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या भयावह होने से रोका जा सकता है। इस वायरस ने षेयर मार्केट में भी बड़ी चिन्ता पैदा की है यहां एक दिन के भीतर 11 लाख करोड़ रूपए का नुकसान हुआ है। जो 2008 के वित्तीय संकट के बाद सबसे बुरा दौर कहा जायेगा। 
वैष्विक स्तर पर चीन एक तिहाई औद्योगिक विनिर्माण करता है और यह दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है। वायरस के चलते अर्थव्यवस्था की सांस उखड़ रही है। जिसके चलते अमेरिका और चीन में रफ्तार सुस्त हुई है। इस सुस्ती से भारत भी अछूता नहीं है। जीएसटी काउंसिल की बीते 14 मार्च की हुई बैठक में कोरोना वायरस महामारी की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव को लेकर चर्चा की गयी। वित्त मंत्री ने कहा है कि इस वायरस के अर्थव्यवस्था पर प्रभाव का आंकलन करने का प्रयास कर रहे हैं। कोरोना वायरस महामारी और वैष्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ी मार है। हवाई यात्रा, षेयर बाजार, वैष्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं सहित लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं। यह समस्या न केवल आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करेगी बल्कि भारत के फार्मासिस्टिकल, इलैक्ट्राॅनिकल, आॅटोमोबाइल उद्योग को भी चपेट में बाकायदा ले सकती है। वैष्विक मन्दी की स्थिति में गिरावट आने से निवेष में भी गिरावट सम्भव है। इससे विदेषी मुद्रा पर भी प्रभाव पड़ेगा। हालांकि कुछ सकारात्मक पहलू पर भी नजर डालें तो भारतीय कम्पनियां चीन आधारित वैष्विक आपूर्ति श्रृंखला में षामिल प्रमुख भागीदार नहीं है। फलस्वरूप भारतीय कम्पनी इससे अधिक प्रभावित नहीं होगी। इन दिनों कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज हो रही है जिससे भारत सरकार का मुनाफा दर बढ़ेगा। गौरतलब है कि कच्चा तेल सस्ते होने के बावजूद सरकार ने बहुत मामूली अन्तर के साथ बिकवाली कर रही है। इसका सीधा फायदा सरकार के खजाने को होगा। हालंाकि जीएसटी की प्राप्ति दर तुलनात्मक गिर सकती है। 
कोविड-19 के फैलने की चिन्ता आरबीआई की भी है। उसकी सलाह है कि अर्थव्यवस्था पर इस संक्रामक बीमारी के प्रसार के आर्थिक प्रभावों से निपटने के लिए आकस्मिक योजना तैयार रखी जानी चाहिए। आरबीआई भी मानता है कि दुनिया के विभिन्न देषों तक इसके फैलने का वैष्विक पर्यटन और व्यापार पर प्रभाव पड़ेगा। गौरतलब है कि अमेरिका, ईरान के तनाव के चलते जनवरी के षुरूआत में कच्चे तेल और सोने के दाम चढ़ गये थे और अब कोरोना वायरस के चलते इनमें गिरावट आयी है। जबकि स्वास्थ्य की चिन्ता में इंसान और बाजार दोनों को बचाने का संघर्श जारी है। कोरोना वायरस का वैष्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव 2003 में फैले सार्स के मुकाबले अधिक है। सार्स के समय चीन छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देष था और उसका वैष्विक जीडीपी में योगदान 4.2 प्रतिषत था जबकि कोरोना के समय में वह दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वैष्विक जीडीपी में 16.3 का योगदान रखता है। ऐसे में यह वायरस केवल नरमी वाला झटका नहीं देगा बल्कि व्यापक प्रभाव छोड़ेगा। जिसके चलते दुनिया की अर्थव्यवस्था की सांस उखड़ेगी। अनुमान है कि वैष्विक जीडीपी में पहली तिमाही में 0.8 फीसद और दूसरी में 0.5 फीसद की कमी आयेगी। इसमें कोई दुविधा नहीं कि इस वायरस से दुनिया सहित भारत की अर्थव्यवस्था की सांस उखड़ेगी। भारत तो पहले ही आर्थिक मन्दी में फंसा था अब हालात और खराब हो सकते हैं। वैष्विक अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस का प्रभाव 2.7 ट्रिलियन डाॅलर का माना जा रहा है जो भारत की कुल अर्थव्यवस्था के बराबर है। गौरतलब है कि अमेरिका 19 ट्रिलियन डाॅलर और चीन 13 ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था वाला देष है। दवाईयों की खपत और वाहनों की बिक्री में कटौती तथा पर्यटन से लेकर होटल उद्योग आदि सभी इसकी चपेट में रहेंगे। भारत में कोरोना के साथ-साथ अपनी आर्थिक स्थितियों से भी निपटना है। गिरी हुई विकास दर को थामना भी है और अन्तर्राश्ट्रीय बाजार से मुकाबला भी करना है। जैसा कि कहा जा रहा है कि चीन का विकास दर एक फीसदी गिर सकता है। इसका मतलब है 136 अरब डाॅलर के नुकसान में चीन रहेगा और जैसा कि स्पश्ट है कि 35 करोड़ डाॅलर के नुकसान में भारत भी आ सकता है। ऐसे में कोविड-19 षीघ्र समाप्त करना जरूरी है इसी में जनमानस से लेकर अर्थव्यवस्था की भलाई है।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज ऑफिस  के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502
ई-मेल: sushilksingh589!@gmail.com

संसद भवन में भी हो सुशासन

वह प्रक्रिया जो राजनीतिक व्यवस्था को लोकतांत्रिक स्वरूप देती है उसे लोकतांत्रिकरण कहा जाता है। अरस्तू के अनुसार लोकतंत्र जनता द्वारा षासित व्यवस्था है पर क्या वर्तमान भारतीय लोकतंत्र इसी के इर्द-गिर्द है, कहने में थोड़ा संकोच हो रहा है। दरअसल भारत के लोकतंत्र के मामले में इन दिनों नये उप-विचारों का इस कदर उद्विकास हुआ कि प्रजातंत्र हाषिये पर और कमजोरतंत्र फलक पर है। लोकतंत्र की धारा जनता के हितों से पोशित होती है मगर यदि लोकतंत्र के भीतर भेदभाव की लकीरें खींची जायेंगी तो संकट देष पर ही आयेगा। 31 जनवरी से षुरू बजट सत्र का दूसरा पक्ष बीते 2 मार्च से जारी है पर काम कितना हो रहा है यह पड़ताल का विशय है। कहा जाये तो संसद राजनीतिक आजमाइष का मंच बना हुआ है। कूबत और कद की लड़ाई में बजट सत्र भी मानो आर्थिक मन्दी से जूझ रहा है। बजट सत्र के दरमियान ही दिल्ली में हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया गया दर्जनों मौत के घाट उतारे गये अब उस पर सियासत जारी है। इसी कड़ी में सरकार ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए बीते 11 मार्च को लोकसभा में गृहमंत्री ने दिल्ली घटना को सुनियोजित साजिष करार दिया। साथ ही विपक्ष की भी लानत-मलानत की गयी। दुविधा यह है कि सरकार चलाने वाले जब चाबुक अपने हाथ में रखे हुए है तो गलतियां विरोधी कैसे कर रहे हैं। फिलहाल सड़क की सियासत किसे रास आ रही है यह कहना मुष्किल है पर इन दिनों संसद से जो उम्मीद जनता लगाकर बैठी है वह अपेक्षा के अनुरूप खरी उतरेगी या नहीं, यह तीन अप्रैल सत्र की समाप्ति तक पता चलेगा। 
बीते 6 सालों की पड़ताल करके देखें तो सत्र में हंगामे का इतिहास बाकायदा पसरा हुआ मिल जायेगा। इसके पीछे केवल विरोधी ही नहीं बल्कि सरकार भी जिम्मेदार रही है। सरकार का पक्ष मामले को तूल देने के बजाये समाधान का होना चाहिए जो कम ही दिखाई देता है। दुर्भाग्य यह है कि सरकार भी आरोप लगाने में ही सारी कूबत झोंक देती है और प्रचण्ड बहुमत के चलते कुछ हद तक बड़बोलेपन की षिकार भी है। मसलन जब नागरिकता संषोधन विधेयक संसद में 9 दिसम्बर को अधिनियमित हो रहा था तब विपक्ष के एक सांसद ने सवाल उठाया कि इसके बाद आप एनआरसी लायेंगे तब गृहमंत्री अमित षाह ने बड़े मिजाज से कहा था कि वो तो हमारा एजेण्डा है ही। जबकि एनआरसी तो छोड़िए सीएए के चलते इतना विरोध हुआ कि सरकार बैकफुट पर गयी और प्रधानमंत्री को 22 दिसम्बर को कहना पड़ा कि एनआरसी लागू करने का अभी कोई विचार नहीं है। षाहीन बाग से लेकर कई स्थानों पर सीएए के विरोधी देखे गये। बजट सत्र के दौरान भी यही सब कुछ चलता रहा और यह मामला अभी भी थमा नहीं है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में सियासतदानों ने वोट की खातिर नफरत की लहलहाती फसले भी तैयार की। इतना ही नहीं दामन बचाने की होड़ में पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे की कमजोरी उभारने में लगे रहते हैं और करदाताओं का पैसा सत्र के दौरान बेहिसाब बहा दिया जाता है। करीब डेढ़ करोड़ रूपया संसद की एक घण्टे की कार्यवाही में खर्च हो जाता है और बारीकी से देखा जाये तो ढ़ाई लाख खपाने पर एक मिनट की संसद चलती है। हालत यह है कि वर्श भर चलने वाली 3 सत्रों में विभाजित संसद का काफी कीमती वक्त हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। जबकि टैक्स देने वाले अपने प्रतिनिधि से उम्मीद लगाकर बैठे होते हैं कि लोकतंत्र की संस्था में जाकर वे उनके लिए कुछ बेहतर करेंगे।
कामकाज के लिहाज से देखा जाय तो पहली लोकसभा (1952 से 1957) में 677 बैठकें हुई थी। 5वीं लोकसभा (1971 से 1977) में 613 जबकि 10वीं लोकसभा (1991 से 1996 ) में यह औसत 423 का था। मोदी षासनकाल से पहले 15वीं लोकसभा (2009 से 2014) में 345 दिन ही सदन की बैठक हो पायी। 16वीं लोकसभा की पड़ताल ये बताती है कि यहां बैठकों की कुल अवधि 1615 घण्टे रही लेकिन अतीत की कई लोकसभा के मुकाबले यह घण्टे काफी कम नजर आते हैं। एक दल के बहुमत वाली अन्य सरकारों के कार्यकाल के दौरान सदन में औसत 2689 घण्टे काम में बिताये हैं लेकिन यहां बताना लाज़मी है कि काम इन घण्टों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हालांकि 16वीं लोकसभा में किस तरह काम किया, किस तरह के कानून बनाये, संसदीय लोकतंत्र में कैसी भूमिका थी, क्या सक्रियता रही और लोकतंत्र के प्रति सरकार का क्या नजरिया रहा इन सवालों पर यदि ठीके से रोषनी डाली जाये तो काम के साथ निराषा भी नजर आती है। लोकसभा के उपलब्ध आंकड़े यह बताते हैं कि मोदी षासन के पहले कार्यकाल के दौरान लोकसभा में कुल 135 विधेयक मंजूर कराये गये। जिसमें कईयों को राज्यसभा में मंजूरी नहीं मिली। हालांकि जीएसटी, तीन तलाक और सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण समेत कई फलक वाले कानून इसी कार्यकाल की देन है। अब 17वीं लोकसभा का दौर जारी है। रिपोर्ट 2024 में मिलेगा। यह दौर आर्थिक मन्दी का है साथ ही बेरोजगारी भी सारे रिकाॅर्ड तोड़ चुकी है। 1 फरवरी को पेष किये गये बजट अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण बजट माना जाता है। विकास दर धूल चाट रही है और समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है। सबके बावजूद सियासी गुणा-भाग की चिंता से सरकार उबर नहीं पा रही है। मिला-जुलाकर देखा जाय तो संसद में जहां आरोपों की झड़ी लगती है वहीं भावनात्मक स्थितियां उभार कर जनता के मानसपटल को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया जाता है। जबकि हकीकत में सरकार माई-बाप होती है उसे हर मिनट का हिसाब जनता के हित में खर्च करना चाहिए। 
प्रधानमंत्री मोदी कहते रहे हैं कि अच्छे दिन आने वाले हैं पर संसद के बुरे दिन न आये इसकी भी चिंता करने का वक्त आ गया है। संसद भवन में भी सुषासन हो, सुचिता हो और गरीबी, निरक्षरता, षिक्षा और चिकित्सा सहित बेरोजगारी की समस्या से मुक्ति वाली गूंज उठे इसकी फिक्र पक्ष हो या विपक्ष सभी को होनी चाहिए। वास्तव में यह सरकार और विपक्ष के लिए यक्ष प्रष्न बन चुका है कि सामाजिक-आर्थिक नियोजन की कमजोर दषा के लिए उत्तरदायी कौन है। लड़ाई सियासत की है पर सरेआम मत कीजिए। लोकतंत्र को कश्ट होता है और जनता में अविष्वास पनपता है। संसद निजीपन की षिकार नहीं होनी चाहिए। 16वीं लोकसभा में कांग्रेस 44 पर थी और अब 52 में सिमट कर रह गयी है जबकि मौजूदा सरकार पहले भी गठबंधन समेत 300 के पार थी और अब तो भाजपा अकेले ही इस आंकड़े को छुआ है जाहिर है ताकत के साथ और मजबूती आयी  है। फिलहाल संसद को पक्ष और विपक्ष दोनों चाहिए। देष को सीख देने वाले सियासतदान भटकाव से बचते हुए उन कृत्यों को अंगीकृत करें जहां से देष की भलाई की गंगा बहती हो न कि भ्रम। 



सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
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