Friday, November 30, 2018

पूरा सच नहीं बोलता है पाकिस्तान

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक बार फिर दोहराया है कि वे भारत के साथ षान्ति बहाल करना चाहते है और प्रधानमंत्री मोदी से बात करने के लिए तैयार भी है। साथ ही यह भी कहा कि कष्मीर मसले का फौजी हल मुमकिन नहीं है पर कुछ असम्भव भी नहीं है। सफाई देते हुए इमरान ने आतंकी दाऊद और हाफिज सईद को विरासत में मिला बताया और जिसके लिए वे जिम्मेदार भी नहीं हैं। गौरतलब है कि बीते 28 नवम्बर को पाकिस्तान में स्थित करतारपुर में गुरूद्वारा दरबार साहिब को भारत के गुरदासपुर जिले में स्थित डेरा बाबा नानक गुरूद्वारा से जोड़ने वाली बहुप्रतीक्षित गलियारे की आधारषिला रखी। उक्त बातें पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने इसी दौरान कही। सिक्ख तीर्थ यात्रियों के लिए करतारपुर साहिब गुरूद्वारा जाने के लिए करतारपुर कोरिडोर को खोलने को लेकर पाकिस्तान का यह कदम बहुत अच्छा माना जा सकता है पर सावधानियों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। हालांकि इसे खोलने की मांग तीन दषक पुरानी है। भारत ने 1988 में इसे लेकर पहली बार प्रस्ताव रखा था जिस पर बीते 22 नवम्बर को प्रधानमंत्री की अगुवाई में कैबिनेट की बैठक हुई जहां करतारपुर कोरिडोर के निर्माण को मंजूरी दी गयी। उपराश्ट्रपति वैंकेया नायडू व पंजाब के मुख्यमंत्री ने संयुक्त रूप से इसकी आधारषिला रखी थी। कार्यक्रम में भारत के केन्द्रीय मंत्री हरसिमरन कौर और पंजाब राज्य के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू मौजूद थे। वैसे जब भी पाकिस्तान के किसी कार्यक्रम में सिद्धू की मौजूदगी होती है तो विवाद उनके साथ चल पड़ता है। इमरान के षपथ समारोह में अकेले भारतीय रहे सिद्धू उस समय तब विवाद में आ गये जब वहां के सेना प्रमुख बाजवा से गले मिलने के चित्र सामने आये और अब आतंकी के साथ फोटो खिंचवाने का उन पर आरोप है। 
करतारपुर कोरिडोर की आधारषिला रखने के इस ऐतिहासिक क्षण पर भारत को अमन-षान्ति का पाठ पढ़ाने वाले इमरान ने कष्मीर का जिक्र भी छेड़ा जो यह दर्षाता है कि वे या तो आधा सच बोलते हैं या फिर पूरा सच बोल ही नहीं सकते। इस कोरिडोर के पीछे उनकी स्पश्ट मंषा को भी समझा जाना जरूरी है। गौरतलब है कि इमरान की पहल पर षान्ति प्रक्रिया यदि भारत स्थापित करना भी चाहे तो आतंकी और वहां की सेना भारत के लिए मुसीबत बन सकती है क्योंकि ऐसा दषकों से देखा जा रहा है कि जब-जब ऐसा हुआ भारत के भीतर आतंकी हमले हुए हैं। खास यह भी है कि पाकिस्तान और भारत के बीच मधुर सम्बंध हों यह वहां की आईएसआई, सेना औेर आतंकी संगठन कतई नहीं चाहते और इमरान इस बात से षायद ही अनभिज्ञ हों। जबकि उनकी सरकार को पूर्व तानाषाह मुर्षरफ, पाकिस्तानी सेना और कुछ हद तक आतंकियों का भी समर्थन है। प्रधानमंत्री मोदी ने करतारपुर कोरिडोर की तुलना बर्लिन की दीवार के टूटने से की। पाकिस्तान ने कोरिडोर किस आधार पर खोला है इस बात की भी बारीकी से पड़ताल जरूरी है। संकेत यह है कि गलियारा बनाने का इरादा पाकिस्तानी सरकार का नहीं बल्कि सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने दिया था। कार्यक्रम में पाकिस्तानी सेना प्रमुख की उपस्थिति इस बात को और पुख्ता करती है। कोरिडोर खोलने के पीछे जो इरादा जताया जा रहा है उसके पीछे सब कुछ नेक है ऐसा नहीं है। गौरतलब है आॅपरेषन आॅल आउट के तहत कष्मीर घाटी में सैकड़ों की तादाद में आतंकी मौत के घाट उतारे जा चुके हैं। सेना की चैकसी और जम्मू-कष्मीर पुलिस की सक्रियता ने पाक प्रायोजित आतंकियों को अब कोई अवसर नहीं दे रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सिक्खों के प्रति सहानुभूति की आड़ में खालिस्तान के पक्षधर को उकसाकर पंजाब में अषान्ति का माहौल पैदा करने का इरादा पाकिस्तान का हो। कोरिडोर खुलने से खालिस्तान समर्थक समूहों के अलावा अन्तर्राश्ट्रीय स्तर पर सिक्ख समुदाय का भरोसा पाकिस्तान जीत सकता है। इसी के माध्यम से भारतीय सिक्ख युवाओं का भी भरोसा जीतने का काम पाक कर सकता है और समय और परिस्थिति को देख कर उन्हें उकसाकर भारत विरोधी गतिविधियों में प्रयोग कर सकता है। गुरूद्वारे के बहाने ऐसे युवाओं को उन्हें खालिस्तान का पाठ पढ़ाना आसान हो जायेगा जो पंजाब और भारत दोनों के लिए एक नई चुनौती हो सकता है। गौरतलब है कि कुछ समय पहले जब भारतीय तीर्थयात्री पाकिस्तान के गुरूद्वारे में गये थे तब इस्लामाबाद स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के सदस्यों को गुरूद्वारे में प्रवेष करने से रोका गया था और रोकने का यह काम सुरक्षाकर्मियों का नहीं बल्कि खालिस्तान समर्थक गोपाल सिंह चावला और उनके सहयोगियों का था।
समझने वाली बात यह भी है कि अस्सी और नब्बे के दषक में खालिस्तानी आतंकियों के खात्मे के बाद पंजाब भारी विकास की ओर जा चुका है। ऐसा भी नहीं है कि पंजाब में खालिस्तान समर्थक बिल्कुल नहीं है बस इषारे की आवष्यकता है। कनाडा के प्रधानमंत्री का जब भारत में दौरा हुआ था तब उन्हें षायद इसलिए अधिक तवज्जो नहीं दिया गया क्योंकि उन्होंने कनाडा में खालिस्तान समर्थकों के सुर में कुछ सुर मिला दिया था। दो टूक यह है कि कोरिडोर स्वागत योग्य है पर इसकी आड़ में खालिस्तानी आंदोलन को पुनर्जीवित करने वालों को यदि मौका मिलता है तो समस्या बड़ी हो जायेगी। अमेरिका के खालिस्तान समर्थक जिसे आंदोलन सिक्ख फाॅर जस्टिस के नाम से जाना जाता है उन्होंने एक सर्कुलर जारी किया है जिसमें स्पश्ट है कि गुरूनानक देव जी के 550वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में पाकिस्तान में करतारपुर साहिब सम्मेलन का 2019 में आयोजन किया जायेगा। इसी सम्मेलन में इसकी भी योजना है कि मतदाता पंजीकरण भी किया जायेगा साथ ही जनमत संग्रह पर भी जानकारी उपलब्ध करायी जायेगी। उक्त से स्पश्ट है कि कोरिडोर के पीछे सब कुछ सकारात्मक नहीं है बल्कि कष्मीर से घटते आतंक को देखते हुए पाकिस्तान पंजाब में आतंक को पुनर्जीवित करने के लिए कहीं बेताब न हो इसे लेकर चिंता बढ़ जाती है। करतारपुर साहिब सबसे पवित्र स्थलों में से एक है इसे पहला गुरूद्वारा भी माना जाता है। गुरूनानक ने जीवन के आखरी 18 साल यहीं बिताये थे और 1539 में यही आखरी सांस ली थी। भारत की सीमा से 3 किमी. भीतर रावी नदी के किनारे बसे इस गुरूद्वारे के भारत के सिक्ख श्रृद्धालु दूरबीन से दर्षन करते हैं। जब यह कोरिडोर संचालित हो जायेगा तब श्रृद्धालुओं की आवाजाही सुगम होगी और इसके लिए वीजा की भी आवष्यकता नहीं पड़ेगी। खास यह भी है कि इस कोरिडोर के लिए भारत सरकार फंड देगी। इमरान खान ने करतारपुर कोरिडोर की आधारिषला रखते हुए पूरी दुनिया के सामने स्वयं को युद्ध विरोधी नेता के रूप में पेष करने की कोषिष किया और कहा कि दोनों देषों के पास एटमी हथियार हैं इसलिए युद्ध की बात करना बेवकूफी है और दोस्ती एक मात्र विकल्प है। आदर्ष से भरी पाकिस्तान की ये बातें किसी के मन को छू सकती हैं पर इतिहास खंगाल के देखा जाय तो अविष्वास गहरा जाता है। 1972 के षिमला समझौते को आज भी पाकिस्तान रौंदने से बाज नहीं आता। 19 फरवरी 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय दिल्ली से लाहौर तक बस चली थी। दोनों देषों के बीच ट्रेन भी चली पर सम्बंध न सड़क पर दौड़ पाये और न ही पटरी पर। तानाषाह परवेज मुषर्रफ के समय तो आगरा षिखर वार्ता खराब सम्बंधों को और पुख्ता करता है। सार्क में षामिल जमा 8 देषों में पाकिस्तान ऐसा है जिससे भारत की दुष्मनी है। पठानकोट हमले के बाद साल 2016 का इस्लामाबाद सार्क बैठक इसकी भेंट चढ़ चुका है और 2020 में इस्लामाबाद में होने वाली सार्क बैठक को लेकर पाकिस्तान के उस इरादे को भी विदेष मंत्री सुशमा स्वराज ने खारिज कर दिया जिसमें वह मोदी को आमंत्रित कर रहा है। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी अपने समकक्ष नवाज षरीफ के साथ षपथ ग्रहण समारोह से लेकर 2 साल तक सम्बंधों के लिए प्रयासरत् रहे पर नतीजे ढाक के तीन पात ही रहे।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
फोन: 0135-2668933, मो0: 9456120502
ई-मेल: sushilksingh589@gmail.com

Monday, November 19, 2018

एपेक को मिला ट्रेड वॉर का दण्ड

पिछले कई महीनों से अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वाॅर जारी है जिसका साइड इफेक्ट बीते 18 नवम्बर को एपेक सम्मेलन में देखने को मिला। इतना ही नहीं जुबानी जंग के चलते एषिया-प्रषान्त आर्थिक सहयोग संगठन यानी एपेक सम्मेलन इस तनातनी के बीच असफल भी हो गया। गौरतलब है कि पाॅपुआ न्यू गिनी में चल रहे एपेक के सम्मेलन में 21 देषों के नेता भी मतभेद को दूर करने में सफल नहीं रहे बल्कि इन दोनों देषों के चलते आपसी तनातनी भी इनके बीच में भी देखी जा सकती है। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अमेरिका और चीन के चलते सम्मेलन में प्रस्तावित औपचारिक घोशणा भी नहीं हो पायी और खबर तो यह भी है कि चीन के अधिकारियों ने बीते 17 नवम्बर को पापुआ न्यू गिनी के विदेष मंत्री के कार्यालय में घुसने का प्रयास किया इसके बाद पुलिस बल को भी बुलाया गया। उक्त घटना ने इस बात को और पुख्ता कर दिया कि निजी हितों के चलते वैष्विक संगठन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। खास यह भी है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि क्षेत्रीय बैठक में चीन के अधिकारी हंगामा न किये हों। इससे पहले इसी साल के सितम्बर में एक सम्मेलन के दौरान चीन से माफी मांगने को कहा गया था उस समय चीन के अधिकारी इस बात पर बैठक छोड़ कर चले गये थे कि मेजबान ने उनके दूत को अपनी बारी से पहले बोलने की इजाजत नहीं दी। एपेक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि सदस्य देषों के नेता व्यापार नीति पर गहरे मतभेद के कारण औपचारिक लिखित घोशणा पर भी सहमत नहीं हो पाये और आयोजक पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री को सम्मेलन असफल करार देना पड़ा। आयोजक प्रधानमंत्री ने तो यह भी कहा कि आप जानते हैं दो बड़े दिग्गज कमरे में हैं मैं क्या कर सकता हूं? 
अन्तर्राश्ट्रीय संगठनों पर अमेरिकी दबाव व प्रभुत्व को नकारा नहीं जा सकता पर चीन से उपजी समस्या के चलते यहां उसकी हेकड़ी भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। पहली बार पापुआ न्यू गिनी में हुए इस वार्शिक सम्मेलन में मामला ढाक-के-तीन पात रहा। तो क्या चीन को एपेक की सदस्यता से बाहर कर देना चाहिए। जो अपने स्वार्थ और अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए कहीं भी अनाप-षनाप के लिए उतारू हो जाता है। हालांकि ताली एक हाथ से नहीं बजती यहां अमेरिका को पूरी तरह क्लीन चिट नहीं दिया जा सकता। वैसे चीन एक बुरी आदत से भी जूझ रहा है वह यह कि पड़ोसी देषों को न चुकाये जा सकने वाले कर्ज भी खूब थोप रहा है। एपेक के इतिहास को देखें तो यह एषिया-पेसिफिक इकोनाॅमिक कारपोरेषन मुख्य व्यापार में विष्व की कुछ सबसे षक्तिषाली अर्थव्यवस्थाओं को संयुक्त करता है। आॅस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री बाॅबहाॅक की पहल पर 1989 में इसका गठन हुआ था जिसमें आॅस्ट्रेलिया, पापुआ न्यू गिनी, पेरू, फिलिपीन्स, रूस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ताइवान, चीन, अमेरिका तथा वियतनाम सहित 21 देष हैं। इसका मूल उद्देष्य अमेरिका को दक्षिण पूर्व एषियाई देषों विषेशकर एसोसिएषन आॅफ साउथ ईस्ट एषियन नेषन (आसियान) देषों से जोड़ना था। गौरतलब है आसियान 1967 में गठित दक्षिण पूर्व एषियाई देषों का संगठन हैं जिसमें 10 सदस्य हैं। वैष्विक परिप्रेक्ष्य में चीजें बहुत बदलती हुई दिखती हैं पर वे कितनी प्रासंगिक है यह विचार का विशय है। आसियान देषों से जोड़ने के फिराक में गठित एपेक अपने निजी महत्वाकांक्षा के चलते कठिन दौर से गुजर रहा है। दक्षिण एषिया का सार्क, यूरोप का यूरोपीय संघ तथा अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको को मिलाकर बने नाफ्टा के अलावा कई ऐसे क्षेत्रीय संगठन मिल जायेंगे जो आज अपने उद्देष्यों को लेकर कुछ हद तक संघर्श कर रहे हैं। एपेक से बिगड़ी बात कहां जाकर ठहरेगी इसे अभी कह पाना कठिन है पर ऐसी बातों का वैष्विक पटल पर बड़े नुकसान होते हैं। आपसी एकजुटता के लिए बने देष जब बिखरते हैं तो कई दूसरे देषों पर भी प्रभाव छोड़ते हैं। अमेरिका और चीन ने जहां एक-दूसरे पर सीधा निषाना साधा है वहीं अन्य देष इससे बंटे दिखते हैं जो कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता। 
खास यह भी है कि आज एपेक विष्व के सर्वाधिक आर्थिक षाक्तिषाली देषों में से एक है और षायद हाल की घटना को देखते हुए कमजोर भी। इस संगठन का हिस्सा फिलहाल भारत नहीं है मगर रूस समेत कई देष जिसमें अमेरिका की भी यह कोषिष है कि भारत इसका सदस्य बने। इसके संगठन की स्थापना के लक्ष्यों में अमेरिका जैसे देष सफल तो हुए पर उत्पन्न मतभेद को रोक पाने में असफल भी हुए। हालांकि एकमात्र घटना से एपेक को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि यह आसियान व नाफ्टा के बीच सम्पर्क सूत्र का काम कर रहा है। भारत का एपेक का सदस्य बनना भारत एवं एपेक दोनों के हित में है। एपेक के अधिकांष सदस्यों के साथ भारत के सम्बंध मजबूत हैं हालांकि चीन के बारे में ऐसा कहना पूरी तरह तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। भारत आसियान के साथ षिखर बैठक 2002 से ‘आसियान$1‘ प्रारूप के तहत काम कर रहा है। साथ में औरों के साथ मजबूत सम्बंध कायम किये हुए हैं। साल 2007 में जापानी प्रधानमंत्री षिंजो एबे के चतुश्कोण नीति भारत, जापान, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका इसके पुख्ता प्रमाण हैं। इसी को देखते हुए 2010 में ही लगा था कि यदि कोई नया सदस्य एपेक में आयेगा तो भारत पहले नम्बर पर होगा पर यह अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। गौरतलब है कि पापुआ न्यू गिनी में जो हुआ वह आगे के सम्मेलनों के लिए एक मंथन का विशय होगा।
वैष्विक फलक पर चीन स्वयं को एक ध्रुव के रूप में उभारने की फिराक में है जबकि अमेरिका इससे अनभिज्ञ नहीं है। अमेरिका और चीन के बीच रंजिष केवल ट्रेड वाॅर ही नहीं है बल्कि दक्षिण-चीन सागर में चीन के प्रभुत्व को लेकर अमेरिका से चल रही अनबन भी है। गौरतलब है कि भारत का 40 फीसदी व्यापार दक्षिण-चीन सागर से होकर गुजरता है और इस सागर में चीन की प्रभुत्व से भारत भी काफी हद तक चिंतित रहता है। भारत, जापान और अमेरिका मिलकर दक्षिण-चीन सागन में पहले युद्धाभ्यास कर चुके हैं जिसका मलाल आज भी चीन को रहता है। फिलहाल भारत एपेक में षामिल होकर एक ओर इस संगठन से सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करेगा तो दूसरी ओर एपेक के माध्यम से उत्तर-दक्षिण संवाद को बढ़ावा देकर न्याय एवं समानता पर आधारित नई अन्तर्राश्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना कर पायेगा। वैसे भी भारत पूरब की ओर देखों नीति पर तेजी से अमल कर रहा है जो 1990 से लगातार जारी है। फिलहाल बेनतीजा रही एपेक की इस बैठक ने कई सवालों को अपने पीछे छोड़ दिया है। षक्तिषाली देष के तौर पर जब कई एक साथ होते हैं तो संरक्षणवाद से लेकर व्यक्तिवाद की स्थिति भी व्याप्त हो सकती है। हालांकि चेक बुक कूटनीति की राह पर भी कई हैं। कई छुपे एजेण्डे के तहत ऐसे मंचों पर काम करते हैं। अमेरिका पर भी यह आरोप है कि वह लगातार संकीर्ण होता जा रहा है और ऐसे संगठनों पर ऐसे विचारों का दृश्प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ेगा ही। ऐसे में बड़ा सवाल यह रहेगा कि आगे जब भी बड़े उद्देष्यों से जुड़े अन्तर्राश्ट्रीय सम्मेलन हों तो देष निजी महत्वाकांक्षा के बजाय बड़े मन के साथ व्यवहार करें पर षायद यह आदर्ष रूप न ले पाये। फिलहाल यूएस और चीन के बीच तनातनी से पापुआ न्यू गिनी में जो हुआ वह सभी के लिए सबक है और सही सोच के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी। 

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
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Tuesday, November 13, 2018

बहुत ज़रूरी है नई राह का खुलना

यह एक बड़ा सच है कि पिछले कई वर्शों से नदियों पर कोई ध्यान नहीं जा रहा है यदि जा भी रहा है तो सिर्फ इसलिए कि नदी प्रदूशित हो रही है पर उसे रोक पाना भी सम्भव नहीं हो पा रहा है। जबकि इन्हीं नदियों के माध्यम से सदियों से परिवहन होता रहा, पीने का जल लिया जाता रहा, षहरों की बसावट इनके किनारे होती रही और सभ्यताओं की मुखर इतिहास की ये गवाह रही हैं पर अब यह हांफ रही हैं। गंगा हो या यमुना या अन्य सहायक नदियां सभी का हाल आमतौर पर बेहाल ही है। सदियों पुराने जल मार्गों के इतिहास को समेटे इन नदियों में समय-समय पर नई राह खोजी जाती रही है। इसी तर्ज पर वाराणसी-हल्दिया के बीच एक बार फिर यह प्रयास हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में गंगा तट पर बने देष के पहले मल्टी माॅडल टर्मिनल अर्थात् बंदरगाह को बीते सोमवार देष को समर्पित किया जो वाराणसी से हल्दिया के बीच ऐसा पहला राश्ट्रीय जलमार्ग है जिसमें माल वाहक जहाजों का आवागमन होगा। गौरतलब है कि इस मौके पर कोलकाता से वाराणसी पहुंचे जहाज की अगवानी भी मोदी ने की। उत्साह से भरे प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि केन्द्र सरकार देष में 100 से ज्यादा राश्ट्रीय जलमार्गों पर काम कर रही हैं जिसमें वाराणसी-हल्दिया जलमार्ग भी षुमार है। गौरतलब है कि इस जलमार्ग के प्रकाष में आने से बिहार, झारखण्ड और पष्चिम बंगाल के बड़े हिस्से को बड़ा फायदा मिल सकता है। इससे मोदी का न्यू इण्डिया और न्यू विजन भी समझा जा सकता है। खास यह भी है कि पष्चिम बंगाल के हल्दिया से खाद्य सामग्री लाद कर जो जलयान वाराणसी पहुंचा वह उम्मदों का एक पिटारा भी था। नदियां हमेषा से जीवनदायनी रही हैं और यातायात का प्रमुख साधन भी रही है। बस दौर के साथ इनके साथ नाइंसाफी हुई है। यदि वाकई में नदियों की वेदना को समझा जाय तो सबसे पहले इन्हें प्रदूशण मुक्त करना होगा फिर इनसे लाभ के अम्बार को इकट्ठा करना और आसान हो जायेगा।
फिलहाल 2400 करोड़ परियोजन की यह सौगात देष को मिल गयी है और आने वाले भविश्य में इससे होने वाले कई लाभ देखने को मिलेंगे। समझने वाली बात यह भी है कि आंतरिक जल परिवहन के मामले में भारत का आंकड़ा कुल परिवहन का आधा फीसदी भी नहीं है जबकि चीन में 8 प्रतिषत परिवहन नदियों के माध्यम से होता है। यही आंकड़ा अमेरिका पर भी लागू होता है। नीदरलैण्ड जैसे देषों में यह 42 फीसदी है। खास यह भी है कि भारत का उत्तर का हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली नदियां हों या प्रायद्वीपीय क्षेत्र की नदियां हो परिवहन के मामले में बहुत बेहतर राय नहीं बन पायी है जबकि जल मार्गों का सदियों पुराना इतिहास भारत में ही रहा है। 305 ई.पू. में भारत आये यूनानी राजदूत मैगस्थनीज़ ने गंगा की बड़ी षिद्दत से चर्चा की है और 17 अन्य सहायक नदियों को अपनी पुस्तक इण्डिका में लिखा है। इतना ही नहीं सिन्धु एवं इसकी 13 उपनदियों से जल यात्रा की जा सकती थी इसका चित्रण भी इतिहास में मिलता है। नवीं षताब्दी के षिलालेखों से पता चलता है कि तत्कालीन राजा के पास उन दिनों नौकाओं के बेड़े हुआ करते थे। इतिहास के जैसे-जैसे आगे बढ़ने का सिलसिला आता गया जलमार्गों को लेकर अभिरूचि भी कम-ज्यादा होती रही मगर 15वीं और 16वीं सदी में जल परिवहन चरम पर था। मुगल षासनकाल में ऐसे मार्गों का सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाता था। इतिहास के पन्ने इस बात के गवाह हैं कि नदियां जलमार्गों के मामले में सुगम, सुलभ और कहीं अधिक सुरक्षित मार्ग सिद्ध हुई हैं साथ ही बिना किसी खास निवेष के इसमें रास्ता ढ़ूंढ़ना भी आसान रहा है और मंजिल तक पहुंचना भी सुगम रहा है। 
परिवहन के लिए सड़क मार्गों और वायु मार्गों के विकास की होड़ में कहीं न कहीं भारत में जलमार्गों को नजरअंदाज किया गया था। षायद नदियों के प्रदूशित होने की वजह में एक यह भी है। निहित परिप्रेक्ष्य यह है कि यदि नदियों में जलमार्गों को लेकर मात्रात्मक बढ़ोत्तरी की गयी होती तो आबाध रूप से उसकी प्रवाहषीलता और बढ़ रहे प्रदूशण को लेकर चिंता कहीं अधिक होती। इससे नदियों का जल न केवल साफ होता बल्कि अधिक भी होता। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जल मार्ग में 1 किमी की यात्रा में मात्र 50 पैसे का खर्च आ रहा है जो अन्य किसी भी मार्ग से यात्रा करने में सबसे सस्ता है। करीब 5 करोड़ टन सालाना ढ़ुलाई इन जलमार्गों से की जा सकती है जो सस्ते दामों में यहां से वहां पहुंचायी जा सकती है। भारत में जल परिवहन का फैलाव अभी कहीं अधिक करने की आवष्यकता है। 20 हजार किमी से थोड़े ही अधिक क्षेत्रों में इनका विस्तार देखा जा सकता है। राश्ट्रीय जलमार्ग एक्ट-2016 में इसी स्थिति को देखते हुए 106 नये जलमार्ग का प्रस्ताव देखने को मिलता है। फिलहाल तीन जलमार्ग यात्री और मालवाहक जहाजों की परिवहन के लिए खुल चुके हैं। समय के साथ औरों की सम्भावना बनी रहेगी। इन जलमार्गों पर सुचारू रूप से परिवहन हो सके इसके लिए फिर वही बात कि नदियों की सूरत बदलनी पड़ेगी और इस पर बार-बार ध्यान देना होगा। इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि नदियां समय के साथ उथली होती जा रही हैं, जल संचय निरंतर घटता जा रहा है और प्रदूशण की प्रलय से मरती जा रही हैं। गर्मियों में ये नदी नहीं बल्कि पानी की लकीरें मात्र बन कर रह जाती हैं जिसका खामयाजा सभी को उठाना पड़ता है। गौरतलब है कि हिमालय से निकलने वाली गंगा जिसकी कुल लम्बाई 2510 किमी है बंगाल की खाड़ी पहुंचते-पहुंचते स्वयं मृतप्राय हो जाती है। प्रवाह के मामले में हांफने लगती है। ऐसे 1400 किमी लम्बी यमुना समेत कई भारतीय नदियों का हाल है।
राश्ट्रीय जल मार्ग का आगाज एक अच्छा संकेत है कुछ नयापन का भी है और कुछ नये विजन का भी। अगर ठीक ढंग से इसे विकसित किया गया और आने वाले जलमार्गों को निर्मित कर सुचारू कर लिया गया तो देष की सूरत भी बदल सकती है। वैसे भारत में कुल करीब 15 हजार किमी. तक नौवाहन हो सकता है। माल ढ़ुलाई से लेकर आवागमन को भी सुखद बनाया जा सकता है। ब्रह्यपुत्र नदी में भी ऐसी ही बड़ी सम्भावना दिखती है। यदि परिवहन के मामले में नदी जलमार्गों को मजबूती से इस्तेमाल में ला लिया गया तो सड़कों से दबाव घट सकता है। जाम के झंझटों से भी कुछ मुक्ति मिल सकती है और देष प्रदूशण के मार से भी कुछ हद तक बच सकता है। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है। यह तभी सम्भव है जब नदियां जीवित रहेंगी। नदियां बाढ़ में प्रलयकारी बनती हैं और गर्मी में सूखे की चपेट में होती है तो फिर जल परिवहन का क्या होगा सम्भव है कि इन दोनों पक्षों पर भी गौर करना होगा। इतना अधिकतम दोहन कैसे हो इसके लिए नियमित तौर पर गाद की न केवल सफाई हो बल्कि छोटे-बड़े षहरों के कारोबार से पनपे मलबे को इनमें जाने से रोका जाय। अविरल नदी परिवहन के लिए कभी विरल नहीं होगी बल्कि पानी के मामले में सघन रहेगी। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सड़क और परिवहन देष की संरचना है यह जितना अधिक विस्तार लेंगे सुगमता और सरलता सभी के हिस्से में आयेगी। नदियों के मामले में यह इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारी निवेष की आवष्यकता के बजाय बड़ी सोच की आवष्यकता है। सम्भव है जो पहल बीते 12 नवम्बर को वाराणसी में देखने को मिला है वह आने वाले दिनों में दोहराया जायेगा साथ ही परिवहन के मामले में नदियों की प्रमुखता को बढ़ावा मिलेगा।
सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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समुचित नहीं शोध पर विश्वविद्यालयी सोच !

भारत में बरसों से उच्च षिक्षा, षोध और इनोवेषन को लेकर चिंता जतायी जाती रही है पर गुणवत्ता के मामले में अभी भी यह नाकाफी बना हुआ है। वास्तविकता यह है कि तमाम विष्वविद्यालय षोध के मसले में न केवल खाना पूर्ति करने में लगे हैं बल्कि इसके प्रति वे काफी बेरूखी भी दिखा रहे हैं। षायद इसी को ध्यान में रखते हुए यूजीसी ने षोध को लेकर नित नये नियम निर्मित करती रही पर नतीजे मन माफिक नहीं मिल रहे हैं। हालांकि यूजीसी जैसी संस्था पर भी कई सवाल उठते रहे हैं। फिलहाल षोध और इनोवेषन को बढ़ावा देने में जुटी सरकार की मुहिम में विष्वविद्यालय की बेरूखी सामने आयी है। इस बात का अंदाजा लगाना आसान है कि देष भर में सभी प्रारूपों के 800 से ज्यादा विष्वविद्यालय हैं जबकि केवल 100 विष्वविद्यालयों ने ही इनोवेषन काउंसिल गठित करने के सरकार की पहल को आगे बढ़ाने का मन बनाया है। गौरतलब है कि उच्च षिक्षण संस्थानों में सरकार द्वारा इनोवेषन काउंसिल गठित करने की पहल की गयी है। विष्वविद्यालयों की बेरूखी से विष्वविद्यालय अनुदान आयोग इन दिनों ना खुष है। जब भी षोध पर सोच जाती है तब उच्च षिक्षा को लेकर दो प्रष्न मानस पटल पर उभरते हैं प्रथम यह कि क्या विष्व परिदृष्य में तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच उच्चतर षिक्षा, षोध और ज्ञान के विभिन्न संस्थान स्थिति के अनुसार बदल रहे हैं। दूसरा क्या अर्थव्यवस्था, दक्षता और प्रतिस्पर्धा के प्रभाव में षिक्षा के हाइटेक होने का कोई बड़ा लाभ मिल रहा है। यदि हां तो सवाल यह भी है कि क्या परम्परागत मूल्यों और उद्देष्यों का संतुलन इसमें बरकरार है। तमाम ऐसे और कयास हैं जो उच्च षिक्षा को लेकर उभारे जा सकते हैं। विभिन्न विष्वविद्यालयों में षुरू में ज्ञान के सृजन का हस्तांतरण भूमण्डलीय सीख और भूमण्डलीय हिस्सेदारी के आधार पर हुआ था। षनैः षनैः बाजारवाद के चलते षिक्षा मात्रात्मक बढ़ी पर गुणवत्ता के मामले में फिसड्डी होती चली गयी।
वर्तमान में तो इसे बाजारवाद और व्यक्तिवाद के संदर्भ में परखा और जांचा जा रहा है। तमाम ऐसे कारकों के चलते उच्च षिक्षा सवालों में घिरती चली गयी। यूजीसी द्वारा जारी विष्वविद्यालयों की सूची में 319 निजी विष्वविद्यालय पूरे देष में फिलहाल विद्यमान हैं जो आधारभूत संरचना के निर्माण में ही पूरी ताकत झोंके हुए हैं। यहां की षिक्षा व्यवस्था अत्यंत चिंताजनक है जबकि फीस उगाही में ये अव्वल है। भारत में उच्च षिक्षा की स्थिति चिंताजनक क्यों हुई ऐसा इसलिए कि इस क्षेत्र में उन मानकों को कहीं अधिक ढीला छोड़ दिया गया जिसे लेकर एक निष्चित नियोजन होना चाहिए था। विष्वविद्यालय के कई प्रारूप हैं जहां से उच्च षिक्षा को संचालित किया जाता है। सेन्ट्रल एवं स्टेट यूनिवर्सिटी के अतिरिक्त प्राईवेट तथा डीम्ड यूनिवर्सिटी के प्रारूप फिलहाल देखे जा सकते हैं। पड़ताल बताती है कि अन्तिम दोनों विष्वविद्यालयों में मानकों की खूब धज्जियां उड़ाई जाती हैं। 3 नवम्बर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में डीम्ड विष्वविद्यालयों के दूरस्थ षिक्षा पाठ्यक्रमों को लेकर चाबुक चलाया था। सुप्रीम कोर्ट ने यहां से संचालित होने वाले ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगा दी। गौरतलब है कि उड़ीसा हाईकोर्ट के इस फैसले को कि पत्राचार के जरिये तकनीकी षिक्षा सही है। जिसे खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पश्ट कर दिया है कि किसी भी प्रकार की तकनीकी षिक्षा दूरस्थ पाठ्यक्रम के माध्यम से उपलब्ध नहीं करायी जा सकती। देष की षीर्श अदालत के इस फैसले से मेडिकल, इंजीनियरिंग और फार्मेसी समेत कई अन्य पाठ्यक्रम जो तकनीकी पाठ्यक्रम की श्रेणी में आते हैं इसे लेकर विष्वविद्यालय मनमानी नहीं कर पायेंगे। इतना ही नहीं इस फैसले से पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस निर्णय को भी समर्थन मिला था जिसमें कम्प्यूटर विज्ञान पत्राचार के माध्यम से ली गयी डिग्री को नियमित तरीके से हासिल डिग्री की तरह मानने से इंकार कर दिया गया था। हर पढ़ा-लिखा तबका यह जानता है कि दूरस्थ षिक्षा के माध्यम से डिग्री कितनी सहज तरीके से घर बैठे उपलब्ध हो जाती है। हालांकि इग्नू जैसे विष्वविद्यालय इसके अपवाद हैं। कचोटने वाला संदर्भ यह भी है कि उच्च षिक्षा के नाम पर जिस कदर चैतरफा अव्यवस्था फैली हुई है वह षिक्षा व्यवस्था को ही मुंह चिढ़ा रहा है। बीते डेढ़ दषक में दूरस्थ षिक्षा को लेकर गली-मौहल्लों में व्यापक दुकान खुलने का सिलसिला जारी हुआ। तमाम कोषिषों के बावजूद कमोबेष यह प्रथा आज भी काफी हद तक कायम है।
उक्त के परिप्रेक्ष्य में यह सुनिष्चित है कि उच्च षिक्षा को लेकर हमारी षिक्षण संस्थाओं ने व्यवसाय अधिक किया जबकि नैतिक धर्म का पालन करने में कोताही बरती है। जब देष की आईआईटी और आईआईएम निहायत खास होने के बावजूद दुनिया भर के विष्वविद्यालयों एवं षैक्षणिक संस्थाओं की रैंकिंग में ये सभी 200 के भीतर नहीं आ पाते हैं तो जरा सोचिए कि मनमानी करने वाली संस्थाओं का क्या हाल होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय के माध्यम से यह जता दिया कि उसे षिक्षा को लेकर कितनी चिंता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस लिहाज़ से भी अहम है कि दूरस्थ षिक्षा के माध्यम से विद्यार्थी व्यावहारिक ज्ञान से या तो विमुख होता है या तो बहुत कम होता है। खास यह भी है कि तकनीकी षिक्षा के लिए आॅल इण्डिया काउंसिल आॅफ टेक्निकल एजुकेषन (एआईसीटीई) को मानक तय करने के लिए 1987 में बनाया गया था जिसकी खूब अवहेलना हुई है और समय के साथ विष्वविद्यालय अनुदान आयोग भी नकेल कसने में कम ही कामयाब रहा है। अब एक बार फिर षोध पर यूजीसी की बड़ी चिंता सामने देखने को मिल रही है। जब देष में मौजूदा समय में 47 केन्द्रीय विष्वविद्यालय 385 राज्य विष्वविद्यालय, 319 निजी विष्वविद्यालय, 131 डीम्ड यूनिवर्सिटी मौजूद हैं जो कहीं न कहीं बड़ी संख्या कही जा सकती है तब भी उच्च षिक्षा मुख्यतः षोध का हाल बेहाल क्यों है। यूजीसी ने विष्वविद्यालयों को साफ कह दिया है कि 20 नवम्बर तक काउंसिल गठित करें। इस सम्बंध में विष्वविद्यालय को पत्र भी लिखा जा चुका है। गौरतलब है कि 1 अक्टूबर से षुरू की गई सरकार की इस मुहिम में अब तक देष के करीब 800 उच्च षिक्षण संस्थान ही जुड़े हैं जिसमें ज्यादातर इंजीनियरिंग मैनेजमेंट और दूसरे उच्च षिक्षण संस्थान है। सवाल उठता है कि विष्वविद्यालय उद्योग की तरह क्यों चलाये जा रहे हैं जबकि भारत विकास की धारा और विचारधारा के ये निर्माण केन्द्र हैं। बाजारवाद के इस युग मे सबका मोल है पर यह समझना होगा कि षिक्षा अनमोन है बावजूद इसके बोली इसी क्षेत्र में ज्यादा लगायी जाती है।
षोध की कमी के कारण ही देष का विकासात्मक विन्यास भी गड़बड़ाता है। भारत में उच्च षिक्षा ग्रहण करने वाले अभ्यर्थी षोध के प्रति उतना झुकाव नहीं रखते जितना पष्चिमी देषों में है। भारत की उच्च षिक्षा व्यवस्था उदारीकरण के बाद जिस मात्रा में बढ़ी उसी औसत में गुणवत्ता विकसित नहीं हो पायी और षोध के मामले में ये और निराष करता है। अक्सर अन्तर्राश्ट्रीय और वैष्वीकरण उच्च षिक्षा के संदर्भ में समानांतर सिद्धान्त माने जाते हैं पर देषों की स्थिति के अनुसार देखें तो व्यावहारिक तौर पर ये विफल दिखाई देते हैं। भारत में विगत् दो दषकों से इसमें काफी नरमी बरती जा रही है और इसकी गिरावट की मुख्य वजह भी यही है। दुनिया में चीन के बाद सर्वाधिक जनसंख्या भारत की है जबकि युवाओं के मामले में संसार की सबसे बड़ी आबादी वाला देष भारत ही है। जिस गति से षिक्षा लेने वालों की संख्या यहां बढ़ी षिक्षण संस्थायें उसी गति से तालमेल नहीं बिठा पायीं। इतना ही नहीं कुछ क्षेत्रों में बिना किसी नीति के कमाने की फिराक में बेतरजीब तरीके से षिक्षण संस्थाओं की बाढ़ भी आयी। अब यूजीसी और सरकार बदलाव के साथ कुछ कर पाने में कितना सफल होगी यह बाद में देखा जाने वाला विशय रहेगा।

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
सेन्ट्रल एक्साइज आॅफिस के सामने,
देहरादून-248001 (उत्तराखण्ड)
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Wednesday, October 31, 2018

भारत और जापान दोनों संतुलन की खोज में

किसी भी देश की विदेश नीति का मुख्य आधार उस देश को वैष्विक स्तर पर न केवल उपस्थिति दर्ज कराना बल्कि अपनी नीतियों के माध्यम से नई ऊँचाई हासिल करना भी होता है। अक्टूबर के आखिर में प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा को सरसरी तौर पर देखा जाय तो सम्बंधों को नई ऊँचाई और संतुलनवादी सिद्धांत में बढ़त मिली है। जापानी प्रधानमंत्री षिंजो एबे से मोदी की यह बारहवीं मुलाकात थी जिसमें दोस्ती और भरोसा दोनों का समावेष था। हाल के वर्शों में दोनों देषों के बीच सम्बंधों के लिहाज से गुणात्मक बदलाव फिलहाल देखने को मिल रहा है। गौरतलब है कि जापान के प्रधानमंत्री एबे की पिछले साल सितम्बर यात्रा वैसे तो बुलट ट्रेन के चलते कहीं अधिक सुर्खियों में रही मगर गुजरात के गांधीनगर में मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक में जो कुछ हुआ था उससे यह स्पश्ट था कि रणनीति और सुरक्षा सम्बंधी मापदण्डों पर भारत और जापान कहीं अधिक स्पीड से आगे बढ़ना चाहते हैं। इसी समय षिंजो एबे ने जय जापान, जय इण्डिया का नारा दिया था। भारत के साथ जापान के बढ़ते रिष्तों को लेकर फिलहाल चीन भी हरकत में है। जापान के सहयोग से भारत चीन से लगी सीमा पर आधारभूत ढांचे का विकास कर रहा है और इसी इलाके पर चीन अपना दावा करता है। भारत और जापान की द्विपक्षीय वार्ता के दौरान पीएम मोदी और जापान के पीएम षिंजो एबे के बीच हाईस्पीड ट्रेन और नेवी काॅरपोरेष समेत कई समझौते हुए इस दौरान दोनों देषों के रक्षा मंत्रियों और विदेष मंत्रियों के बीच टू प्लस टू वार्ता को लेकर भी सहमति बनी। इतना ही नहीं दोनों डिजिटल पार्टनर्स से साइबर स्पेस, स्वास्थ, रक्षा, समुद्र से अंतरिक्ष में सहयोग बढ़ाने को लेकर सहमत हुए। खास यह भी है कि जापान के निवेषकों ने ढ़ाई मिलियन डाॅलर निवेष करने का भी एलान किया। बीते कुछ वर्शों से नैसर्गिक मित्रता की ओर बढ़ रहे भारत और जापान आपस में पहले भी दोस्ती के अच्छे संकेत दे चुके हैं। गौरतलब है कि अहमदाबाद से मुम्बई के बीच बुलेट ट्रेन की परियोजना के कुल खर्च 110 हजार करोड़ के निवेष में 88 हजार करोड़ निवेष जापान द्वारा किया जाना तय है साथ ही तकनीक की उपलब्धता भी वह करा रहा है। 
भारत का उत्कृश्ट नेता बताते हुए एबे ने मोदी को सबसे भरोसेमंद दोस्त कहा है। भारत और जापान के सम्बंध दुनिया को बहुत कुछ दे सकने की क्षमता रखता है। सुरक्षा, निवेष, सूचना प्रौद्योगिकी समेत कृशि, पर्यावरण और पर्यटन जैसे क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा। वैसे मोदी और एबे के चलते दोनों देषों के सम्बंध कहीं अधिक बेहतर तो हुए हैं। हालांकि इसके पीछे विष्व की बदलती परिस्थिति भी जिम्मेदार है। बरसों से जापान उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर परेषानी महसूस कर रहा था और यह परेषानी तब और बढ़ जाती है जब चीन उत्तर कोरिया के समर्थन में खड़ा दिखता है। हालांकि दक्षिण कोरिया भी जापान की तरह ही मुसीबत महसूस कर रहा है। इतना ही नहीं उत्तर कोरिया के चलते अमेरिका भी काफी जिल्लते झेली। फिलहाल उत्तर कोरियाई तानाषाह किम जोंग और अमेरिकी राश्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच सिंगापुर में द्विपक्षीय वार्ता के चलते परेषानी घटी है। उत्तर और दक्षिण कोरिया के आपसी मुलाकात से ही समस्याएं कम होते दिख रही हैं। डोकलाम पर बीते वर्श चीन का मजबूती से काबिज होने वाला विचार तब थोड़ा दबाव में गया था जब जापान ने भारत का समर्थन किया। हालांकि अमेरिका समेत कई देष चीन के इस रूख के खिलाफ थे। इसमें कोई दुविधा नहीं कि भारत और जापान दोनों एक-दूसरे को समय-समय पर मनोवैज्ञानिक लाभ देते रहे हैं। इतिहास को खंगाला जाय तो दोनों देष सदियों से सम्बंध से अभिभूत रहे हैं। छठी षताब्दी में बौद्ध धर्म के उदय तथा जापान में इसके प्रचार-प्रसार के समय से ही यह मधुरता देखी जा सकती है। भारत और जापान के बीच अप्रैल 1952 से राजनयिक सम्बंधों की स्थापना हुई जो अब नैसर्गिक मित्रता की ओर बढ़ते दिख रही है। अनेक संयुक्त उपक्रमों की स्थापना सम्बंधों की गहराई का एहसास करा रहे हैं। दोनों देष 21वीं सदी में वैष्विक साझेदारी की स्थापना करने हेतु आपसी समझ पहले ही दिखा चुके हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भी इस दिषा में प्रयास सराहनीय रहा है। साल 2005 में तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और जापानी प्रधानमंत्री ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया जिसका षीर्शक नये एषियाई युग में जापान-भारत साझेदारी था। गौरतलब है कि दिसम्बर 2006 में मनमोहन सिंह और यही षिंजो एबे ने सामरिक उन्मुखता को ध्यान में रखते हुए कई मसौदों को आगे बढ़ाया था। 
विष्व नई करवट ले रहा है और अमेरिका जैसे देष समझौतों और मसौदों से बाहर निकलते हुए अपनी ताकत को एकजुट करने की कोषिष में लगे हुए हैं। भारत-ईरान परमाणु समझौता, एषिया पेसिफिक पार्टनरषिप और पेरिस जलवायु समझौता समेत रूस से षीत युद्ध के दौरान 1987 में हुए आईएनएफ समझौते से हटकर अमेरिका ने इसका पुख्ता सबूत दिया है। अमेरिका रूस और चीन को सबक सिखाना चाहता है। चीन तमाम समझौतों के बावजूद सीमा विवाद के मामले में भारत को हमेषा आंख दिखाता रहता है। इतना ही नहीं पाकिस्तान को मनोवैज्ञानिक और आर्थिक ताकत देकर अपनी भड़ास भी यदा-कदा निकालता रहता है। न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप के 48 देषों में चीन भी षामिल है। जिसके चलते भारत की एंट्री कठिन हुई है क्योंकि बिना चीन की रजामंदी के भारत का प्रवेष सम्भव नहीं है। संयुक्त राश्ट्र की सुरक्षा परिशद् में पाक आतंकियों को अंतरराश्ट्रीय आतंकी घोशित कराने को लेकर भारत के प्रयासों को वह कुंद करता रहा है। पिछले साल जून में उपजे डोकलाम विवाद से यह भी स्पश्ट हो गया था कि मोदी और चीनी राश्ट्रपति जिनपिंग कितनी बार एक-दूसरे के देष आये-गये हों पर स्वार्थ के मामले में चीन ही अव्वल रहेगा। खास यह भी है कि भारत और चीनियों की दुष्मनी की तुलना में चीनियों और जापानियों की दुष्मनी कहीं आगे है। जापानी मीडिया भी मानता है कि एबे मोदी से करीबी बढ़ाकर जापान बड़ी ताकतों के बीच जापान संतुलनवादी नीति से आगे बढ़ना चाहता है। इतिहास गवाह है कि भारत और जापान की साझेदारी का कोई विकल्प नहीं है। धुंधली तस्वीर यह भी है कि ट्रम्प ने जापान से दूरी बनायी है इसलिए जापान भारत और कुछ हद तक चीन से करीबी बढ़ाना चाहता है। कुछ दिन पहले एबे चीन के दौरे पर गये थे यह किसी भी जापानी प्रधानमंत्री का 7 साल बाद हुआ दौरा था। हालांकि जापान और भारत दोनों के रिष्ते चीन से करवाहट भरे है लेकिन दोनों इससे षत्रुता नहीं चाहते। जाहिर है कहीं न कहीं चीन से भी हित जुड़ता है। गौरतलब है कि चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट, वन रोड़ का विरोध भारत और जापान कर चुके हैं। भारत का चीन के साथ सीमा विवाद है जबकि जापान का उससे समुद्री विवाद है। जापान अमेरिका और भारत दक्षिण चीन सागर में युद्धाभ्यास करके चीन को पहले उथल-पुथल में ला चुके हैं। सवाल यह है कि जिससे दुष्मनी है उसी से दोस्ती भी करनी है। परस्पर हित न टकरायें इसे लेकर सभी अपनी-अपनी चिंता में फंसे हैं पर एक बात तय है कि भारत जापान के जरिये चीन को चुनौती देने में बेहतर महसूस कर सकता है। मोदी अब तक 3 बार जापान जा चुके हैं जबकि षिंजो एबे भी 3 बार भारत आ चुके हैं। 2005 से दोनों देष के प्रमुख लगभग हर वर्श एक-दूसरे से मिल रहे हैं। यह अभी के वैष्विक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर बात कही जा रही है यदि आगे कुछ बदलाव होता है तो भी भारत और जापान एक-दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं और फायदा ले सकते हैं अन्ततः मोदी का जापान दौरा भारत को न केवल आर्थिक बल्कि मनोवैज्ञानिक फायदा भी दे रहा है।



सुशील कुमार सिंह
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Monday, October 29, 2018

स्टिक एंड कैरेट थ्योरी की राह पर जीएसटी

इंग्लैण्ड के दार्षनिक जेरेमी बेंथम ने अभिप्रेरणा के अन्तर्गत स्टिक एण्ड कैरेट थ्योरी को प्रतिबिम्बित किया जिसका एक अर्थ सख्त तरीका तो दूसरा पुचकारना है। इसी सिद्धांत का डगलस मैकग्रेगर ने आगे चलकर एक्स और वाई के रूप में प्रयोग किया। अब इसी तर्ज पर मोदी सरकार जीएसटी कर संग्रह बढ़ाने का मन बना रही है। हालांकि इसके लिए उन्होंने चार श्रेणियां बनाई हैं जिसमें सख्त तरीका से लेकर नरम रूख तक षामिल है। जीएसटी को लेकर समय-समय पर सरकार रणनीति बदलती रही पर ऐसा अभी तक नहीं हुआ कि खजाना भरने में वह खरा उतरा हो। गौरतलब है कि जब से गुड्स एण्ड सर्विसेज़ टैक्स (जीएसटी) आया है तब से जीएसटी परिशद् की 30 बैठकें हई हैं जिसमें 918 फैसले किये गये। यह इस बात की तस्तीक है कि यह कानून इतने सपाट रास्ते पर नहीं है जितना षायद सरकार समझती थी। जीएसटी परिशद् की बैठेकों में नई कर व्यवस्था से जुड़े कानूनी, नियम और कर दरों सम्बन्धित कई निर्णय समय-समय पर लिये जाते रहे और ऐसा करने के पीछे बड़ी वजह सरकारी खजाना भरने की ही रही है। ध्यानतव्य हो कि जीएसटी के तहत राज्यों को 5 साल तक मुआवजे देने की गारण्टी, राजकोशीय जैसे घाटों के बढ़ने के चलते सरकार की चिंता इन दिनों बढ़ी है। इतना ही नहीं राजनीतिक लाभ और चुनावी सोच के चलते कई ऐसे कदम भी सरकार ने उठाए हैं जिससे उन्हें पीछे भी हटना पड़ा। जीएसटी परिशद् ने 300 से ज्यादा बड़े उत्पादों पर बीते महीनों में कर भी घटाया है इससे भी कर संग्रह घटा है लिहाजा टैक्स वसूली बढ़ाने के नये तरीके खोजे जा रहे हैं। लगभग दो माह के आस-पास इस बात को भी हो चुके हैं कि 20 लाख रूपए से कम के व्यवसायी जीएसटी की अनिवार्यता और उसके कर से बाहर होंगे। जाहिर है टैक्स वसूली का स्तर अभी और गिरेगा। मजे की बात यह है कि जीएसटी काउंसिल ने इसका निर्णय ले लिया है जबकि राज्य सरकारों के पास इसकी औपचारिक सूचना नहीं है जिसके कारण जो उद्यमी जीएसटी की इस व्यवस्था में राहत पा सकते हैं वे अभी भी मजबूरन इसमें बने हुए हैं जबकि सरकारें अखबारों में यह विज्ञापन छाप कर कि लोगों को राहत दी गयी की वाहवही लूट रही हैं। 
जीएसटी को लागू हुए सवा साल हो गये हैं पर संषोधनों का सिलसिला रूका नहीं है। प्रति माह कर जमा करने की प्रथा जब अगस्त 2017 में षुरू हुई तो जुलाई माह की जीएसटी की राषि खजाने में 95 हजार करोड़ थी। सिलसिलेवार तरीके से देखें तो अगस्त में यह राषि 91 हजार करोड़ के आसपास रही लगातार गिरावट के साथ दिसम्बर आते-आते यह 80 हजार करोड़ पर सिमट गई। हालांकि इसी दौरान 10 नवम्बर 2017 को जीएसटी काउंसिल की गोवा में हुए बैठक के दौरान 28 फीसदी वाले कर में कुछ संषोधन किया था और डेढ़ करोड़ की राषि वालों के लिए रिटर्न त्रिमासिक किया था। गुजरात चुनाव को देखते हुए लेट फीस को भी वापस करने का काम भी इस दौरान हुआ था। सरकार का आंकलन था कि एक साल में जीएसटी से 13 लाख करोड़ रूपए खजाने में आयेगा जो हर माह एक लाख करोड़ से अधिक होता है पर अब तक के आंकलन में यह 90 से 92 हजार करोड़ रूपए के औसत पर जाकर ठहरता है। हालांकि अप्रैल 2018 में जीएसटी का कलेक्षन एक लाख करोड़ से अधिक बताया जाता है। गौरतलब है कि 52 हजार करोड़ रूपए से अधिक का मुआवजा राज्यों को जीएसटी के तहत देना पड़ता है जाहिर है सरकार लगातार घाटे का सामना कर रही है जिससे राजकोशीय घाटा भी बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है। वर्तमान में यह घाटा 3.3 फीसदी तक है। जिस तरह फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य को डेढ़ गुना और किसानों की आय को दोगुना किये जाने की कसम सरकार ने खाई और निभाने की कोषिष कर रही हैं उसे लेकर भी कर वसूली बढ़ाने की रणनीति में बदलाव लाना उसकी मजबूरी है। मौजूदा स्थिति में रणनीति बहुत सफल नहीं दिखाई दे रही फलस्वरूप राजकोशीय घाटा बढ़ने का  डर सरकार में है यदि ऐसा हुआ तो बजटीय घाटा बढ़ना लाज़मी है। ऐसे में बोझ आखिरकार करदाताओं पर ही पड़ना है जिसे लेकर सरकार सख्त तरीका अख्तियार कर सकती है। मगर 2019 के लोकसभा के चुनाव को देखते हुए करदाताओं को निराष और नाराज करने से भी सरकार बाज आयेगी। 
टैक्स की वसूली बढ़ाने के मामले में सरकार आये दिन नये रास्ते खोजती है। अब सरकार ने इसकी चार श्रेणियां बनाने की बात कह रही है जिसमें उदासीन (डिसइंगेज्ड), अवरोधी (रिसिस्टर्स), उद्यमी (ट्रायर्स) और समर्थक (सपोर्टर्स) की संज्ञा दी जा रही है। वे जो कानून की अवहेलना कर जानबूझकर टैक्स नहीं चुकाते उन्हें उदासीन की श्रेणी में रखने की कवायद है जो कर व्यवस्था को दमनकारी मानते हैं लेकिन उन्हें कर चुकाने के लिए मनाया जा सकता है उन्हें अवरोधी की श्रेणी में रखा जायेगा तथा उन करदाताओं को जो कर चुकाना चाहते हैं पर कई कारणों से टैक्स नहीं चुका पाते उन्हें उद्यमी की श्रेणी में रखते हुए किस्तों मे कर चुकाने जैसे सहूलियते मुहैया करायी जायेंगी। अन्ततः ऐसे करदाता जो कानून का पूरी तरह पालन करते हुए समय पर कर चुकाते हैं और कर व्यवस्था से संतुश्ट भी हैं उनके प्रति सरकार नरमी बरतेगी और उनके सुझावों को भी प्राथमिकता देगी इन्हें सपोटर्स अर्थात् समर्थक की संज्ञा दी गयी है। कर चोरों से निपटने के लिए विषेश प्रकेाश्ठ व्यव्सथा की बात भी की जा रही है। गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने जीएसटी इंटेलिजेंस डायरेक्टरेट जनरल नाम का विषेश प्रकोश्ठ भी गठित किया है जो जीएसटी कानून के तहत कर चोरी के मामले की जांच करने के अलावा छोपमारी और जब्ती की कार्यवाही करेगा। सरकार के इस प्रकार के निर्धारण से यह स्पश्ट है कि खजाने में आने वाले धन संग्रह हर हाल में होना है। इसके लिए कठोर कदम भी उठाने पड़े तो उठाये जायेंगे। गोरतलब है कि करदाताओं के टैक्स चुकाने के रूख के आधार पर उनके साथ अलग-अलग तरीका अपनाये जाने वाली भारत सरकार की यह नई नीति विदेषों में पुरानी है। ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया और मैक्सिको जैसे देषों में ऐसे ही तरीके अपनाये जाते हैं और इससे कर वसूली बढ़ाने में कामयाबी भी मिली है। 
इसमें काई दुविधा नहीं कि 70 साल के इतिहास में जीएसटी कर की एक नई व्यवस्था ही नहीं एक नई अर्थव्यवस्था है। दुनिया के सैकड़ों देष अब तक जीएसटी को अपना चुके हैं। इस सूची में सवा साल से भारत भी षामिल हैं। आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि बहुतायत की स्थिति षुरूआती दिनों में सुखद नहीं रही। यही बात भारत के लिए भी कहना सही होगा। एषिया के 19 देष इसी प्रकार के कर के प्रावधान में हैं जबकि यूरोप में 53 देष इसमें सूचीबद्ध हैं जबकि अफ्रीका में 44 और दक्षिण अमेरिका में 11 देषों में जीएसटी लागू है। भारत में लागू जीएसटी के 4 स्लैब है और 5 से लेकर 28 फीसदी तक कर अधिरोपिण है। हालांकि कर लागू करने के षुरूआत में 32 फीसदी का स्लैब भी था जिसे 28 फीसदी तक सीमित कर दिया गया। अन्य देषों में कर के एक ही स्लैब हैं जबकि भारत में इसके चार स्लैब देखे जा सकते हैं। हालांकि यहां के आर्थिक वातावरण में भी भिन्नता है पर सरकार को यह भी गम्भीरता से समझना चाहिए कि यहां बहुतायत में किसान जो बेकार हैं, युवा हैं जो बेरोजगार हैं जिससे गैर उत्पादकों की संख्या अधिक हो जाती है पर जिम्मेदारी सभी की सरकार को लेनी होती है। कर चुकाने वाले दस फीसदी भी नहीं हैं ऐसे में कड़े कानून औपनिवेषिक सत्ता की याद दिलाते हैं ऐसे में स्टिक एण्ड कैरेट थ्योरी में कैरेट का प्रयोग अधिक हो तो अच्छा रहेगा।


सुशील कुमार सिंह
निदेशक
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Wednesday, October 24, 2018

पुरानी है "अमेरिका फ़र्स्ट" की पॉलिसी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल को अभी दो साल नहीं हुए हैं जबकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चैथी बार इस पद के लिए इसी वर्श फिर चुने गये। डोनाल्ड ट्रम्प ने जनवरी 2017 में जब व्ह्ाइट हाउस में प्रवेष किया था तब उन्होंने यह विष्वास जगाया था कि रूस के साथ भी उनका रवैया उदार रहेगा। तब उन दिनों कईयों को यह बात गले नहीं उतरी थी क्योंकि सभी अमेरिका और रूस के बीच दषकों के षीत युद्ध को अच्छी तरह जानते और पहचानते थे। फिलहाल अब उसका साइड इफेक्ट भी दिखने लगा है। ईरान-अमेरिका परमाणु संधि, ट्रांस पेसिफिक पार्टनरषिप और पेरिस जलवायु समझौता जैसे से पहले ही डील तोड़ चुके इस मामले के माहिर अमेरिका ने एक और कदम उठाते हुए रूस के साथ षीत युद्ध के समय हुए 1987 के षस्त्र नियंत्रण संधि (आईएनएफ) से भी कदम पीछे खींच लिया है। स्पश्ट है अमेरिका अपनी पुरानी नीति ‘अमेरिका फस्र्ट‘ का कड़ाई से पालन कर रहा है। षीत युद्ध में तत्कालीन अमेरिकी राश्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत संघ के मिखाइल गोर्बाचोव के बीच आईएनएफ सन्धि हुई थी जिससे अमेरिका पीछे हट रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प ने खुल्लमखुल्ला चेतावनी दी है कि जब तक रूस और चीन को होष नहीं आ जाता तब तक अमेरिका भी परमाणु हथियारों को बढ़ाता रहेगा। पड़ताल बताती है कि पहली बार 2008 में अमेरिका ने रूस पर इस संधि के उल्लंघन का आरोप लगाया था तब रूस ने एसएससी-8 मिसाइल का परीक्षण किया था। साल 2014 और 2017 में भी एसएस-24 और आरएस-26 जैसी मिसाइलों के परीक्षण के लिए अमेरिका की ओर से रूस पर इस संधि के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था जिसके जवाब में रूस ने अमेरिका को पोलैंड और रोमानिया में मध्यम रेंज की मिसाइल टाॅमहाॅक के बेस बनाने का आरोप लगाया। फिलहाल इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच अमेरिका बीते 20 अक्टूबर को इस संधि से स्वयं को अलग कर लिया है। गौरतलब है कि साल 2002 में भी एक रक्षा संधि से वह अलग हुआ था।
देखा जाय तो अमेरिका दुनिया के बदलते आयाम को समझते हुए एक बार फिर ‘अमेरिका फस्र्ट‘ की पाॅलिसी पर काम कर रहा है। दो टूक यह भी है कि दुनिया में बदलते षक्ति समीकरण और उभरती आर्थिक ताकतों के बीच वह कमजोर नहीं पड़ना चाहता। यही कारण है कि जो सन्धियां या समझौते उसे आगे बढ़ने में रोक रहे हैं उसे वो कुचलना चाहता है। हालांकि वह उसकी आंतरिक कूटनीति है मगर अमेरिका दुनिया में कुछ करे और बाकी देष प्रभावित न हो ऐसा षायद ही हुआ हो। गौरतलब है कि व्यापार और सियासी कटुता के बीच इन दिनों अमेरिका और चीन के रिष्ते भी सबसे खराब दौर में है जबकि रूस से लगातार खराब हो रहे रिष्ते इस मोड़ पर आकर खड़े हो गये हैं कि दोनों के बीच की सन्धि ध्वस्त हो गयी। वाजिब सवाल यह रहेगा कि अमेरिका ने जो चेतावनी इन्हें चेताने के लिए दिया है क्या उसका असर पूरी दुनिया पर नहीं होगा। हथियारों की होड़ में अमेरिका जाने की बात कह रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका दुनिया में एकाधिकार के लिए जाना जाता रहा है। द्वितीय विष्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ का एक ध्रुव के रूप में उभरने से दुनिया दो ध्रुवीय हो गयी। समय के साथ आर्थिक विकास में बढ़ोत्तरी के चलते कई देष न केवल कई मामलों में साधन-सम्पन्न हुए बल्कि परमाणु सम्पन्न भी होते चले गये जिसमें भारत, चीन, जापान इंग्लैण्ड व फ्रांस समेत कई षामिल हैं। हालांकि इसकी फहरिस्त में ईरान, पाकिस्तान व उत्तर कोरिया जैसे देष भी देखे जा सकते हैं। स्पश्ट है ज्यों-ज्यों सम्पन्नता बढ़ी देषों के बीच हथियारों की होड़ भी बढ़ी। सभी जानते हैं कि अमेरिका और रूस हथियारों की बिक्री में सबसे आगे हैं और इनका दबदबा भी बाकायदा बरकरार है लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि दुनिया पर एकाधिकार रखने और धौंस जमाने वाला अमेरिका को अब कई देष चुनौती भी दे रहे हैं। षायद इसमें से एक वजह ये भी है कि अमेरिका अपनी पुरानी व्यवस्था को पाने के लिए संधि और समझौतों को ठोकर मार रहा है साथ ही सबक सिखाने की बात भी कह रहा है।
अब तक अमेरिका द्वारा तोड़ी गयी सभी सन्धियां खासा महत्व रखती हैं। रोचक यह भी है कि तमाम समझौतों की ट्रम्प ने पहले की सरकारों और राश्ट्रपतियों को सीधे तौर पर दोशी ठहराया। मात्र दो साल के कार्यकाल के भीतर ताबड़तोड़ समझौतों को तोड़ना, उनसे पीछे हटना कहीं न कहीं ट्रम्प की छवि को कुछ और ही दर्षा रहा है। द्विपक्षीय समझौते के तहत 1987 में यह सन्धि अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों की सुरक्षा सुनिष्चित करती है। इसमें यह निहित है कि दोनों देष सतह से दागी जाने वाली 500 से 5500 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलों का निर्माण या परीक्षण नहीं कर सकते मगर कुछ साल पहले रूस ने नोवाटर मिसाइल लाॅन्च की थी जिसे लेकर अमेरिका खफा है कि उसने प्रतिबंधित रेंज की मिसाइल लाॅन्च की है। हालंाकि रूस ने इसका खण्डन किया पर बात नहीं बनी। अमेरिका रूस की एसएस-20 की यूरोप में तैनाती से भी नाराज़ है। अमेरिका को डर है कि इस मिसाइल के जरिये नाटो देषों पर वह तत्काल परमाणु हमला कर सकता है। संधि लागू होने के बाद 1991 तक करीब 27 सौ मिसाइलों को नश्ट किया चुका था। खास यह भी है कि दोनों देष एक-दूसरे के मिसाइलों के परीक्षण और तैनाती पर नजर रखने की अनुमति भी देते हैं। गौरतलब है कि इस संधि से रूस और अमेरिका षायद दोनों घुटन महसूस कर रहे थे। साल 2007 में रूसी राश्ट्रपति पुतिन ने कहा था कि इस संधि से उसके हितों को कोई फायदा नहीं हो रहा है। वैसे रूस के उपविदेष मंत्री ने संधि से हटने को खतरनाक माना है। माना तो यह भी जा रहा है कि अमेरिका पष्चिमी प्रषान्त में चीन की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए इस सन्धि से बाहर निकलने का विचार कर रहा था जिसका मौका उसे मिल गया है। ट्रम्प ने कहा है कि जब तक रूस और चीन एक नये समझौते पर सहमत नहीं होते तब तक हम समझौते को खत्म कर रहे हैं और फिर हथियार विकसित करने जा रहे हैं। 
वैसे 2014 में तत्कालीन राश्ट्रपति बराक ओबामा के समय एक क्रूज मिसाइल के परीक्षण के बाद आईएनएफ संधि का उल्लंघन हुआ था तब ओबामा ने यूरोपीय नेताओं के दबाव में इस संधि केा नहीं तोड़ने का फैसला किया था। यूरोप का मानना है कि इस संधि के खत्म होने से परमाणु हथियारों की होड़ षुरू हो जायेगी। आईएनएफ समझौते के चलते रूस और अमेरिका मिसाइल परीक्षण के मामले में बंधे थे जबकि चीन इंटरमीडिएट रेंज की परमाणु मिसाइल बनाने और उसकी तैनती को लेकर स्वतंत्र है। ट्रंप को लगता है कि आईएनएफ संधि उसका हाथ बांधे हुए है जबकि चीन वह सारा काम कर रहा है जो अमेरिका संधि के कारण नहीं कर पा रहा है। अमेरिका का संधि से हटने के पीछे रूस एक कारण है पर उससे बड़ा कारण चीन है। चीन की बढ़ती परमाणु और आर्थिक षक्ति अमेरिका को रास नहीं आ रहा। दो टूक यह भी है कि भारत के लिए भी चीन की यह ताकत कहीं न कहीं घातक है क्योंकि प्रत्यक्ष एवं परोक्ष उसकी ताकत का फायदा न केवल पाकिस्तान को मिलेगा बल्कि उसका बेजा इस्तेमाल चीन तमाम पड़ोसी समेत भारत पर कर सकता है। अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच भले ही बातचीत हो गयी हो पर अभी भरोसा बढ़ा नहीं है। चीन, उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा षुभ चिंतक है इसे देखते हुए भी अमेरिका को काफी कुछ समझना, सोचना पड़ रहा है। ऐसे में अमेरिका की चिंता लाज़मी प्रतीत होती है पर यदि वह दुनिया पर प्रभुत्व जमाने की फिराक में यह सब कर रहा है तो उसे भी सही करार नहीं दिया जा सकता। 

सुशील कुमार सिंह
निदेशक
वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 
डी-25, नेहरू काॅलोनी,
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