Monday, March 22, 2021

कोरोना की नई लहर का कहर

पूरी दुनिया में इन दिनों कोरोना का टीकाकरण जारी है। हालांकि इसी दुनिया में कई ऐसे देष हैं जिन्हें यहे टीका मयस्सर होने में अभी साल लग जायेंगे। पिछले साल इन्हीं दिनों दुनिया के आसमान में कोविड-19 की गूंज थी। वक्त तेजी से आगे बढ़ गया मगर कोरोना को पीछे नहीं धकेल पाया। एक बार फिर कोरोना की नई लहर कहर बनकर टूटी है। कोरोना की उफनती लहर के पीछे बड़ा कारण क्या हैं यह पड़ताल का विशय है मगर प्रतिबंध घटने और लोगों की लापरवाही ने मामले में इजाफा जरूर किया है। दुनिया पहले भी कोरोना को लेकर तैयार नहीं थी और अब इसके प्रति उदासीनता के चलते भंवर जाल में उलझती जा रही है। भारत में लगभग तीन महीने बाद बीते 24 घण्टे में 25 हजार से अधिक नये मामले सामने आये और 161 मौत दर्ज की गयी जिसमें सर्वाधिक महाराश्ट्र में देखी जा सकती है। ऐसे में अतिरिक्त एहतियाती कदम उठाना जरूरी हो गया है। स्वास्थ मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 24 घण्टे में जो नये मामले आये हैं उनमें 77 फीसदी तो केवल महाराश्ट्र, केरल और पंजाब से हैं। इसके अलावा आधा दर्जन ऐसे राज्य हैं जहां कोरोना लक्ष्मण रेखा पार कर चुका है। कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु, मध्य प्रदेष, दिल्ली और हरियाणा इसमें षामिल हैं। मौजूदा समय में दुनिया में 12 करोड़ से अधिक लोग कोविड-19 से संक्रमित हैं और लाखों की तादाद में मौतें हो चुकी हैं। एक बार फिर कोरोना कदम ताल कर चुका है। खास यह भी है जिन राज्यों में कोरोना के मामले सर्वाधिक हैं उनमें अधिकतर ऐसे हैं जो पहली और दूसरी लहर का सामना कर चुके हैं जाहिर है वे तीसरी लहर में उलझ रहे हैं। गौरतलब है कि इस समय देष में आवाजाही को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं है ऐसे में एक बार फिर कोरोना बढ़ सकता है क्योंकि कोरोना क्षेत्र विषेश से दूसरे क्षेत्र में आसानी से लाया जा सकता है। 

पिछले साल देष में दिवाली के बाद कोरोना एक बार तेजी से बड़ा था अब इस साल होली से पहले फिर तेजी लिए हुए है हालांकि स्थिति को देखते हुए कुछ राज्य पाबंदी लगा रहे हैं मगर मुष्किलें कम नहीं हो रही हैं। भारत इन दिनों यूरोप की भांति दूसरी लहर से घिरा है ऐसे में केन्द्र सरकार कभी भी ठोस कदम भी उठा सकती है। गौरतलब है कि सितम्बर 2020 में संक्रमण चरम पर था उसके बाद कई राज्यों में हार्ड इम्यूनिटी पैदा हो गयी थी अब यह षायद खत्म हो रही है तो कोरोना बढ़ रहा है। ताजा आंकड़े यह बता रहे हैं कि भारत के 11 राज्य में कुल 93 प्रतिषत केस हैं। पहले की तुलना में स्वस्थ होने की दर में मामूली ही सही पर गिरावट दर्ज हुई है। उक्त तमाम बातें चिंता को बढ़ा रही हैं। सवाल यह भी है कि कोरोना वैक्सीनेषन का काम जोरों पर है और भारत में भी ढ़ाई करोड़ से अधिक लोगों का टीकाकरण हो चुका है मगर हालत फिर एक बार बेकाबू हो रहे हैं। आखिरकार इसका हल कहां है और किस पैमाने पर है। मुंह पर मास्क और दो गज की दूरी का यह फाॅर्मूला कब का टूट चुका है। एक खास बात यह भी है कि टीका लगवाते समय भी इस फाॅर्मूले का निर्वहन नहीं होते देखा जा रहा है। देखा जाये तो टीकाकरण मानो एक सैल्फी का खूबसूरत लम्हा बन गया है। वैसे सच यह भी है कि कोरोना जब से आया है वापस नहीं गया है। इसकी दर में गिरावट जरूर आयी पर इसका उन्मूलन बिल्कुल नहीं हुआ था। पिछले वर्श इसी माह देष लाॅकडाउन में चला गया था उस दौर में चुनौतियां अनेकों खड़ी हो गयीं। कोरोना से बचने के अलावा जीवन संघर्श भी कदमताल कर रहा था। तमाम कोषिषों के बावजूद देष ने भी कोरोना की भीशण लपटों को देखा जिसमें अर्थव्यवस्था से लेकर जीवन व्यवस्था जमींदोज हो गयी। अब यह दूसरी लहर किस राह पर खड़ा करेगी इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।

ब्राजील में एक बार फिर कोरोना वायरास के मामले में तेजी से इजाफा हो रहा है। यहां तो रोजाना 70 हजार से अधिक मरीज और 2 हजार से अधिक मौतें हो रही हैं। पहले अमेरिका के बाद सर्वाधिक संक्रमित लोगों की संख्या भारत में थी अब यह रिकाॅर्ड ब्राजील में दर्ज हो गया है। वहीं कोरोना संक्रमितों के मरीजों के आंकड़ों में अमेरिका अब भी पहले स्थान पर है। यहां लगभग 3 करोड़ इसकी चपेट में आ चुके हैं जबकि तीसरे नम्बर पर खड़ा भारत में यह आंकड़ा एक करोड़ 14 लाख के आसपास है। इन दिनों 3 देषों में दुनिया के आधे से ज्यादा कोरोना मरीज हैं। इसके बाद रूस, इंग्लैण्ड आते हैं। फ्रांस, स्पेन, इटली, तुर्की, जर्मनी आदि में भी ज्यादा केस मिल चुके हैं। कोविड-19 के टीकाकरण को लेकर 12 मार्च 2021 को हुए क्वाॅड सम्मेलन में भी एकजुटता दिखाई गयी। गौरतलब है कि क्वाॅड मतलब क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलाॅग अभी हाल ही में उभरा एक अन्तर्राश्ट्रीय संगठन है जिसमें भारत के अलावा अमेरिका जापान और आॅस्ट्रेलिया हैं जिसे चतुश्कोणीय संगठन के तौर पर भी देखा जा रहा है। यह संगठन कोविड-19 से न केवल निपटने बल्कि जलवायु परिवर्तन से लेकर आतंकवाद एवं साइबर आतंक आदि पर भी एकजुट है। क्वाॅड के चलते भारत चीन को संतुलित करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है। हालांकि चीन हाल ही में हुई बैठक से काफी चिंतित है क्योंकि यह दक्षिण चीन सागर में चीन के एकाधिकार को तोड़ने के लिए ही बनाया गया है। हालांकि कोरोना के लिए चीन ही जिम्मेदार रहा है। मगर यहां मुख्य वजह इण्डो-पेसिफिक से है। 

भारत दो वैक्सीनों का निर्माण किया जिसमें एक कोविडषील्ड तो दूसरी कोवैक्सीन है। जिसका असर भी 80 फीसद से अधिक माना जा रहा है। मगर 130 करोड़ से अधिक की जनसंख्या में सभी तक पहुंच में अच्छा खासा वक्त लग रहा है। फिलहाल ढ़ाई करोड़ से अधिक टीकाकरण हो चुका है। यही अमेरिका में आंकड़ा 6 करोड़ से अधिक का है। अफ्रीकी महाद्वीप के 45 देषों में 17 देष रेड जोन में हैं और यहां भी कोरोना की दूसरी लहर चपेट में लिए हुए है। भारत पड़ोसी समेत दुनिया के तमाम देषों को वैक्सीन बांट भी रहा है और बेच भी रहा है। सम्भव है कि क्वाॅड के चलते इसमें और तेजी आयेगी। जिस राह पर मानव सभ्यता खड़ी है अब वहां से सिर्फ स्वास्थ का ही रास्ता होना चाहिए। यदि समय रहते कोविड-19 पर काबू नहीं पाया गया तो मानव सभ्यता को बचाना न केवल चुनौती होगी बल्कि अबूझ पहेली हो सकती है। पहले कहा जाता था कि टीका आने पर सब ठीक हो जायेगा अब तो टीका भी आ गया। यह बात और है कि टीकाकरण सभी तक नहीं पहुंचा। जिस तरह कोरोना अपना स्वरूप बदल रहा है और नया स्ट्रेन जो पहले से ज्यादा खतरनाक है ऐसे में सजगता का बढ़ाना जरूरी हो जाता है। फिलहाल देष में नये मामलों की बाढ़ तो आ गयी है कोई भी मौसम हो वायरस पर असर तो नहीं है। सारे मौसम को धता बताने वाला कोविड-19 मानव सभ्यता के लिए एक ऐसी चुनौती बन गया है जिससे पार पाना इतना आसान नहीं लगता। फिलहाल यह उम्मीद लाज़मी है कि एक दिन तो इससे निपट लेंगे पर इस सच्चाई से तो इंकार नहीं कर सकते कि मौका भी हम लोग ही दे रहे हैं। 


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर

देहरादून-248005 (उत्तराखण्ड)

मो0: 9456120502

ई-मेल: sushilksingh589@gmail.com

वैश्विक फलक पर क्वाड का उभरना

विदेष नीति एक निरंतरषील प्रक्रिया है और प्रगतिषील भी जहां विभिन्न कारक भिन्न-भिन्न स्थितियों में अलग-अलग प्रकार से देष दुनिया को प्रभावित करते रहते हैं। इसी को ध्यान में रखकर नये मंच की न केवल खोज होती है बल्कि व्याप्त समस्याओं से निपटने के लिए एकजुटता को भी ऊँचाई देनी होती है। क्वाॅड का इन दिनों वैष्विक फलक पर उभरना इस बात को पुख्ता करता है। क्वाॅड का मतलब क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलाॅग जो भारत समेत जापान, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका समेत एक चतुश्कोणीय एवं बहुपक्षीय समझौता है। इसके मूल स्वभाव में इंडो-पेसिफिक स्तर पर काम करना ताकि समुद्री रास्तों में होने वाले व्यापार को आसान किया जा सके मगर एक सच यह भी है कि अब यह व्यापार के साथ-साथ सैनिक बेस को मजबूती देने की ओर भी है। ऐसा इसलिए ताकि षक्ति संतुलन को कायम किया जा सके। फिलहाल 12 मार्च 2021 को क्वाॅड देषों की वर्चुअल बैठक हो चुकी है। जिसमें जलवायु परिवर्तन और काविड-19 जैसे मुद्दे के अलावा आतंकवाद, साइबर सुरक्षा समेत सामरिक सम्बंध का इनपुट भी इसमें देखा जा सकता है। हालांकि चारों देषों की अपनी प्राथमिकताएं हैं और आपसी सहयोग की सीमाएं भी। राजनयिकों की दुनिया में यह सम्मेलन एक परिघटना के रूप में दर्ज हो गयी है। गौरतलब है कि क्वाॅड हिन्द प्रषान्त क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने को तैयार है। यह चीन के लिए खासा परेषानी का विशय है। हालांकि परेषानी तो रूस को भी है। गौरतलब है क्वाॅड कोई सैन्य संधि नहीं है बल्कि षक्ति संतुलन है। 

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमेरिकी राश्ट्रपति जो बाइडेन, जापानी प्रधानमंत्री योषीहीदे सुगा समेत आॅस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्काॅट माॅरिसन वर्चुअल बैठक में साथ थे। सभी षीर्श नेता कोरोना वैक्सीन के हिन्द प्रषान्त क्षेत्र में उत्पादन और वितरण में सहयोग करने को सहमत हुए हैं। इसके अलावा अगले साल तक चारों देष कोरोना वैक्सीन की एक अरब डोज तैयार पर भी सहमत हुए हैं। क्वाॅड के प्लेटफाॅर्म पर इन चारों देषों के नेताओं का एकमंचीय (वर्चुअल) होना स्वयं में एक ऐतिहासिक संदर्भ है और भविश्य में इसकी प्रभावषीलता व्यापक पैमाने पर उजागर होगी। भारत के क्वाॅड में होने से जहां पड़ोसी चीन की मुष्किलें बढ़ी हैं वहीं रूस भी थोड़ा असहज महसूस कर रहा है पर दिलचस्प यह है कि ब्रिक्स में भारत इन्हीं के साथ एक मंचीय भी होता है। गौरतलब है कि ब्रिक्स 5 देषों का समूह है जिसमें भारत के अलावा रूस, चीन, ब्राजील और साउथ अफ्रीका षामिल है जिन्हें विकसित और विकासषील देषों के पुल के तौर पर देखा जा सकता है। रूस भारत का नैसर्गिक मित्र है और चीन नैसर्गिक दुष्मन। जाहिर है क्वाॅड चीन के विरूद्ध एक गोलाबंदी है ऐसे में हिन्द प्रषान्त क्षेत्र में भारत की भूमिका बढ़ेगी और जिस मनसूबे के साथ ये सभी देष आगे बढ़ने का इरादा रखते हैं उसमें चीन को संतुलित करने में भी यह काम भी आयेगा मगर भारत के सामने रूस को साधने की भी चुनौती कमोबेष रहेगी। हालांकि रूस यह जानता है कि भारत कूटनीतिक तौर पर एक खुली नीति रखता है वह दुनिया के तमाम देषों के साथ बेहतर सम्बंध का हिमायती रहा है। भारत पाकिस्तान और चीन से भी अच्छे सम्बंध चाहता है। वह जितना अमेरिका से सम्बंध बनाये रखने का इरादा दिखाता है उससे कहीं अधिक वह रूस के साथ नाता जोड़े हुए है। इसके अलावा सार्क, आसियान, एपेक व पष्चिम के देष समेत अफ्रीकन और लैटिन अमेरिका के देषों के साथ उसके रिष्ते कहीं अधिक मधुर हैं। कोरोना काल में भारत ने दुनिया को पहले दवाई बांटी अब टीका बांट रहा है और टीका पहल के साथ क्वाॅड अन्य मुद्दों की ओर बेहतर मोड़ पर है। 

चीन की चिंता का नया आसमान क्वाॅड

चीन द्वारा क्वाॅड समूह को दक्षिण एषिया के नाटो के रूप में सम्बोधित किया जाना उसकी चिंता का अंदाजा लगाया जा सकता है। उसका आरोप है कि उसे घेरने के लिए यह एक चतुश्पक्षीय सैन्य गठबंधन है जो क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक चुनौती उत्पन्न कर सकता है। गौरतलब है कि चीन क्वाॅड के षीर्श नेतृत्व की बैठक और व्यापक सहयोग को लेकर बन रही समझ से कहीं अधिक चिंतित है। हालांकि इसकी जड़ में चीन ही है। दरअसल क्वाॅड समूह का प्रस्ताव सबसे पहले साल 2007 में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री षिंजो आबे ने पहली बार रखा जिसे लेकर भारत, अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया ने समर्थन किया। दरअसल उस दौरान दक्षिण चीन सागर में चीन ने अपना प्रभुत्व दिखाना षुरू किया। दुनिया के नियमों को ताख पर रख कर चीन इस सागर पर अपनी मर्जी चलाने लगा। गौरतलब है कि भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया का समुद्रिक व्यापार इसी रास्ते से होता है। इतना ही नहीं यहां से प्रतिवर्श 5 लाख ट्रिलियन डाॅलर का व्यापार होता है। हालांकि इस दौरान क्वाॅड का रवैया आक्रामक नहीं था। साल 2017 में इसे पुर्नगठित किया गया। कोरोना के चलते 2020 में नेताओं की मुलाकात बाधित हुई। 12 मार्च 2021 को वर्चुअल षिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया। चीन की चिंता यह भी है कि क्वाॅड एक नियमित सम्मेलन स्तर का मंच बनने जा रहा है। जैसा कि चारों षीर्श नेतृत्व आपसी सहयोग को विस्तार देने में सहमत हैं। चीन जिस तर्ज पर हिन्द महासागर में एकाधिकार जमाने का प्रयास करता रहा है इससे भी दुनिया अनभिज्ञ नहीं है और दक्षिण चीन सागर को तो वह अपनी बपौती मानता है। आसियान के देष भी दबी जुबान चीन का विरोध करते हैं पर खुलकर सामने नहीं आ पाते। दक्षिण कोरिया भी दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागिरी से काफी खफा रहा है हालांकि चीन से कोई खुष नहीं है। अमेरिका के साथ ट्रेड वाॅर का सिलसिला अभी थमा नहीं है और कोरोना काल में भारत के साथ वह लद्दाख की सीमा पर पूरी ताकत दिखा चुका है और अन्ततः उसे ही पीछे हटना पड़ा। इसके अलावा दर्जनों देष उसकी विस्तारवादी नीति से खासे परेषान हैं। इतना ही नहीं कोरोना वायरस के चलते भी चीन दुनिया के तमाम देषों के निषाने पर रहा है। ऐसे में क्वाॅड का फलक पर आना चीन की चिंता को नया आसमान देने जैसा है। जाहिर है क्वाॅड के चलते एक ओर भारत जहां हिन्द महासागर में उसके एकाधिकार को कमजोर कर सकता है वहीं दूसरी ओर हिन्द प्रषान्त क्षेत्र में भूमिका बढ़ा सकता है। यही चीन की बौखलाहट का प्रमुख कारण है। 

क्वाॅड और रूस

रूस की दृश्टि में भारत का इस समूह में षामिल होना अनैतिक है। दरअसल रूस को लगता है कि आगे चलकर क्वाॅड रूस के लिए भी हिन्द प्रषान्त क्षेत्र में खतरा साबित हो सकता है। गौरतलब है कि अमेरिका और रूस एक-दूसरे के धुर-विरोधी हैं। चूंकि क्वाॅड पर नियंत्रण अमेरिका का भी रहेगा और समय के साथ उसका प्रभुत्व बढ़ भी सकता है। ऐसे में भारत यदि रूस विपरीत खेमे का हिस्सा बनता है तो इण्डो-पेसिफिक में जो रूसी फ्लीट है उसके लिए भी खतरा हो सकता है। हालांकि यहां रूस की षंका वाजिब नहीं है क्योंकि भारत कभी भी रूस विरोधी गतिविधि में षामिल होने को सोच भी नहीं सकता। दरअसल क्वाॅड केवल चीन को ध्यान में रखकर बनाया गया एक औपचारिक संगठन है और षायद भारत इसके अलावा कोई और रूप में क्वाॅड को देखता भी नहीं है पर षंका समाप्त करने के लिए इस मामले में भारत को रूस से खुलकर बात करनी चाहिए और संदेह समाप्त करने में देरी भी नहीं करनी चाहिए। दुनिया में सम्बंध कूटनीतिक फलक पर कब गुटों में बंट जाते हैं यह हैरत भरी बात नहीं है। द्वितीय विष्वयुद्ध के बाद 20वीं सदी किस दौर से गुजरी है इससे सभी वाकिफ हैं और भारत और रूस का सम्बंध किस पैमाने पर है इससे भी अमेरिका समेत तमाम देष अनभिज्ञ नहीं हैं। खास यह है कि भारत अमेरिका से नज़दीकी बढ़ाने के बावजूद रूस से सम्बंधों के मामले में रत्ती भर फर्क नहीं आने दिया। हालांकि रूस पर यह भी आरोप है कि भारत की विदेष नीति को वह डिक्टेट करने की कोषिष तो नहीं कर रहा। फिलहाल यह पड़ताल का विशय है पर दो टूक यह है कि भारत को यह लगता रहा है कि चीन रूस की बात सुन लेगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में एक ऐसा समय आया था जब चीन और भारत के बीच तनाव में रूस ने ऐसी भूमिका निभाई थी। प्रधानंमत्री नरेन्द्र मोदी जब वुहान गये थे उस वक्त भी दोनों देषों के बीच सीमा पर तनाव था रूस ने उस दौरे में भी अहम भूमिका निभाई थी। रूस जानता है कि भारत उसके लिए कितना जरूरी है और भारत भी यह समझने में भूल नहीं करता कि उसे रूस की कितनी आवष्यकता है। 

क्वाॅड के विस्तार की सम्भावना

फिलहाल क्वाॅड के मंच में नये देषों को षामिल कर विस्तार की सम्भावना नहीं है बावजूद इसके हिन्द प्रषान्त क्षेत्र में साझा हितों के मुद्दे पर जर्मनी और फ्रांस जैसे देषों का सहयोग भी क्वाॅड के साथ भविश्य में जुड़ सकते हैं। क्वाॅड के नेताओं की अभी आमने-सामने कोई बातचीत नहीं हुई है पर उम्मीद की जा रही है कि आगामी 11 से 13 जून को ब्रिटेन में जी-7 की प्रस्तावित बैठक के दौरान मुलाकात हो सकती है। हालांकि अमेरिका इस मामले में पहली बैठक की मेजबानी की इच्छा जता चुका है। जाहिर है जिस तर्ज पर क्वाॅड एक अच्छी समझ को लेकर चला है उसे देखते हुए इसके विस्तार की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल स्वास्थ का समावेषी दृश्टिकोण और आतंकवाद और साइबर आतंकवाद समेत सामरिक सम्बंध क्वाॅड का हिस्सा हैं और दुनिया तो इन दिनों कोरोना से त्रस्त है। ऐसे में क्वाॅड की प्रासंगिकता और उपादेयता पहले इसी से देखा जा सकता है। 

हिन्द प्रषान्त में भारत की भूमिका

भारत दक्षिण एषिया में एक बड़ा बाजार होने के साथ बीते कुछ वर्शों में स्वास्थ, रक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में एक बड़ी षक्ति बनकर उभरा है। अमेरिका क्वाॅड की सम्भावनाओं को रक्षा सहयोग से आगे भी देख रहा है। फाइव आइज़ नामक सूचना गठबंधन में भारत को षामिल करने के प्रस्ताव इसका एक उदाहरण हैं। भारत का जोर अपनी निर्भरता को चीन से घटाकर जापान और आॅस्ट्रेलिया के साथ मजबूत आपूर्ति श्रृंखला बनाने पर है। चीन और पाकिस्तान से सीमा विवादों की अनिष्चितता के विपरीत हिन्द महासागर में क्वाॅड देषों के साथ एक नई व्यवस्था स्थापित करने का इरादा भी भारत रखता है और ऐसा हो भी सकता है। गौरतलब है कि वैष्विक व्यापार के हिसाब से हिन्द महासागर का समुद्री मार्ग चीन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत को यहां रणनीतिक बढ़त मिल सकता है। गौरतलब है विगत् वर्शों में हिन्द प्रषान्त के संदर्भ में विष्व के अनेक देषों की सक्रियता बढ़ी। फ्रांस और जर्मनी आदि देषों ने तो अपनी हिन्द प्रषान्त रणनीति भी जारी की है। भारत के हिन्द प्रषान्त में पहुंच कईयों को और भी लाभ दे सकती है मसलन आपदा प्रबंधन, समुद्री निगरानी और मानवीय सहायता इसमें प्रमुख हैं। इस क्षेत्र में भारत की कई अन्य देषों के साथ मजबूत साझेदारी है ऐसे में समान विचारधारा वाले अन्य देषों को इस समूह में षामिल करने की पहल हो सकती है। वर्तमान वैष्विक व्यवस्था यह इषारा कर रही है कि दुनिया में ताकत किसी की कितनी भी बढ़ जाये अकेले उपयोग में नहीं आयेगी। वैष्विक व्यवस्था में बदलाव के लिए उठी अब मांग सिर्फ रक्षा क्षेत्र के लिए ही नहीं है। कोरोना संकट ने इस बात को पुख्ता किया है कि भारत की दुनिया के लिए दी गयी मानवीय सहायता मसलन पहले दवाई बाद में वैक्सीन और कोरोना से निपटने के उपाय कहीं अधिक प्रभावी हैं। क्वाॅड में भारत की वैक्सीन को लेकर भूमिका कहीं अधिक मूल्यवान सिद्ध होने वाली है साथ ही आतंकी मसलों में भी भारत सबसे अधिक पीड़ा भोगा है और इसे लेकर दुनिया को जगाया भी है। क्वाॅड देषों को क्षेत्र की षान्ति और स्थिरता के संदर्भ में भी समूह के दृश्टिकोण को बेहतर रूप देने में भारत आम भूमिका निभा सकता है। 


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

लेन नं.12, इन्द्रप्रस्थ एन्क्लेव, अपर नत्थनपुर

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सरकार 21 की नज़र 22 पर

हालिया स्थिति यह है कि 18 मार्च 2017 से चल रही भाजपा की सरकार में एक बड़ा फेरबदल हुआ और आनन-फानन में मुखिया बदल दिया गया। कहा जाये तो उत्तराखण्ड में एक ही कार्यकाल के भीतर षासन की दूसरी लहर आयी है और वह भी तब जब यहां 70 के मुकाबले 57 का आंकड़ा भाजपा के पक्ष में रहा है। इतनी बड़ी जीत और 5 साल की स्थायी सरकार वाला व्यक्तित्व न दे पाना विकास के साथ थोड़ा अविष्वास तो गहराता है। जबकि सबका साथ और सबका विकास और सबका विष्वास मौजूदा सरकार का ष्लोगन है। हालांकि यह एक राजनीतिक प्रकरण करार दिया जा सकता है मगर यह एक सियासी पैंतरा है इससे गुरेज भी नहीं किया जा सकता और 2022 के चुनाव को नजर में रखकर यह सब किया गया है इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। जाहिर है इस नये परिवर्तन से लोक प्रबंधन और सुषासन के भी नये दृश्टिकोण फलक पर आयेंगे और जनता में भी यह उम्मीद परवान चढ़ेगी कि उनके हिस्से का बकाया विकास अब नया नेतृत्व दे देगा। उत्तराखण्ड की सरकारें दूरगामी नीति के अंतर्गत जरूरतमंदों के बुनियादी समस्या के निदान के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाती रहीं मगर सड़क, बिजली, पानी, षिक्षा, स्वास्थ, रोज़गार समेत अनेकों समस्याओं से पीछा नहीं छूटा। यहां कई ऐसे विभाग भी हैं जो षिकायतों के लिए जाने जाते हैं उनसे निपटना नये मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि चुनौती और कई रूप लिये हुए है ऐसे में कई पसीने से तर-बतर होना लाज़मी है। वैसे जब नेतृत्व बदलता है तो दृश्टिकोण बदल जाते हैं ऐसे में कार्य अच्छे भी हो सकते हैं और पहले से जारी क्रियाकलाप प्रभावित भी हो सकते हैं। कुंभ मेला, चारधाम यात्रा, भ्रश्टाचार पर लगाम, आपदा से निपटना और जनता में पैठ जैसे कार्यक्रम एक बार फिर नये सिरे से गतिषीलता को प्राप्त करेंगे ऐसी उम्मीद लाज़मी है।

फिलहाल इन दिनों देष के 4 राज्य पष्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु व केरल समेत केन्द्रषासित पुदुचेरी चुनावी समर में है मगर इसी बीच हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में भी कुर्सी के उथल-पुथल ने सियासी माहौल गरमा दिया है। उत्तराखण्ड में जो राजनीतिक घटना घटी उसका कयास तो कई बार पहले भी लगाया गया था पर ऐसा एकाएक होगा इसका अंदाजा किसी को नहीं था। वो भी तब जब ग्रीश्मकालीन राजधानी गैरसैंण में बजट सत्र जारी था और बजट पेषगी के समय ही मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने गढ़वाल और कुमायूँ दो-दो जिलों को मिलाकर गैरसैंण को मण्डल घोशित कर दिया। इस कदम का सियासी हलके में तो चर्चा बढ़ी ही जनमानस में भी विरोध के सुर उफान मारने लगे। सत्ता के एक साल रहते कुर्सी क्यों गयी यह कोई यक्ष प्रष्न नहीं है साफ है 22 पर काबिज होना था। हालांकि इसके पीछे और बड़ी वजह क्या रही इसका सियासी फलक में अलग-अलग मायने हैं मगर दो टूक यह है कि स्थायी सरकार और विकास का गहरा नाता तो होता है। देष में कई ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जहां स्थायी सरकार के आभाव में विकास चोटिल हुआ है। यह तथ्य हमेषा सामने उभरा है कि पहले स्थिर सरकार फिर सुषासन। झारखण्ड, उत्तराखण्ड का हम उम्र है और वहां बीते दो चुनाव को छोड़ दें तो एक लम्बा वक्त अस्थायी सरकारों का ही रहा है। जाहिर है उसके पिछड़ने का एक बड़ा कारण यह भी है जबकि छत्तीसगढ़ में स्थायी सरकार मिलने से कमोबेष दृष्य अलग देखा जा सकता है। 20 बरस के उत्तराखण्ड में 10 मुख्यमंत्री आ चुके हैं जाहिर है यहां भी विकास चुनौती के साथ दूर की कौड़ी बनी हुई है। हालांकि सभी ने अपने-अपने हिस्से का प्रयास किया है मगर जब बात सुषासन की हो तो प्रयास भी अनुपात में बड़ा करना होता है और यह अस्थिरता से नहीं बल्कि स्थिर नीति और मजबूत सोच से ही सम्भव है। गौरतलब है कि सुषासन एक लोक सषक्तिकरण की अवधारणा है जहां जनता की मजबूती के लिए सबल नेतृत्व की आवष्यकता होती है। 

गौरतलब है कि उत्तराखण्ड में केन्द्रीय योजनाओं की भरमार है आॅल वेदर रोड़ इसमें कहीं अधिक भारी-भरकम और विस्तार वाला है। राज्य की योजनाएं भी कमोबेष धरातल पर हैं मगर बीच में सरकार का हेरफेर इन सभी के साथ एक नवाचार की दक्षता के साथ नूतन कार्यषैली की राह भी लेगा। इन मामलों में सरकार कितना प्रभावषाली है इस पर भी दृश्टि रखना स्वाभाविक है। सरकार बदलने के क्या साइड इफेक्ट होते हैं इसे समझें तो पता चलता है कि नये नेतृत्व पर पुराने की तुलना में दबाव अधिक रहता है। जनता का दिल जीतने और सुषासन की बयार को उम्दा करने का जोखिम रहता है। कम समय में बहुत कुछ हासिल करने का जोड़-तोड़ भी षामिल रहता है। हालांकि सियासत में किन्तु-परन्तु, अच्छा-खराब और दबाव व जोखिम का सिलसिला अक्सर रहता है। जाहिर है प्रदेष में अब तक चल रही योजनाओं की गति बढ़ाने के अलावा नई योजनाओं के चयन को लेकर नये मुखिया के नेतृत्व पर केन्द्र की भी नजर बाकायदा रहेगी। खास यह भी है कि नये नेतृत्व को प्रदेष में प्रसार ले चुकी गतिविधियों को समझने में वक्त लगता है। मंत्रिपरिशद् के सदस्यों के साथ एक बेहतर समन्वय और विधायकों के साथ सामंजस्य की दरकार रहती है। इतना ही नहीं नौकरषाही के साथ तालमेल बिठाने को लेकर भी समय खपत करना पड़ता है। विपक्ष को भी साधने की नये सिरे से आवष्यकता रहेगी। व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसमें व्याप्त नेतृत्व कार्यसंचालन को एक सषक्त आयाम देता है। बदले निजाम में ऐसी कोई खामी नहीं है कि उन्हें कमतर आंका जाये मगर सुषासन की कसौटी पर जब सरकारें कसी जाती हैं तब केवल परिणाम ही काम का होता है। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व और पर्यवेक्षक बड़े भरोसे से प्रदेष की बागडोर त्रिवेन्द्र सिंह रावत से लेकर तीरथ सिंह रावत को अर्थात् एक टीएसआर से दूसरे टीएसआर को सौंपी है। इसके पीछे राजनीतिक इच्छा षक्ति भी है जो इस उम्मीद से युक्त है 2022 की षुरूआत में होने वाले उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में बाजी उनके पक्ष में रहेगी। हालांकि सियासत समय के साथ अलग पैंतरा लेती रहती है। आगे क्या होगा कयास लगाना कठिन है मगर यह उम्मीद करना अतार्किक न होगा कि उत्तराखण्ड की जनता जो कई समस्याओं में है उसे यह दूसरी लहर किनारे लगा देगी। 


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

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उत्तराखंड में सुशासन की दूसरी लहर

इन दिनों देष के 4 राज्य पष्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु व केरल समेत केन्द्रषासित पुदुचेरी चुनावी समर में है मगर इसी बीच हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में भी कुर्सी को लेकर उथल-पुथल देखा जा सकता है। उत्तराखण्ड में जो राजनीतिक घटना घटी उसका कयास तो कई बार पहले भी लगाया गया था पर ऐसा एकाएक होगा इसका अंदाजा किसी को नहीं था। वो भी तब जब ग्रीश्मकालीन राजधानी गैरसैंण में बजट सत्र जारी था। हालांकि इसके पीछे बड़ी वजह क्या रही इसका सियासी फलक में अलग-अलग मायने हैं मगर दो टूक यह है कि स्थायी सरकार और विकास का गहरा नाता तो होता है। देष में कई ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जहां स्थायी सरकार के आभाव में विकास चोटिल हुआ है। यह तथ्य हमेषा सामने उभरा है कि पहले स्थिर सरकार फिर सुषासन। झारखण्ड, उत्तराखण्ड का हम उम्र है और वहां बीते दो चुनाव को छोड़ दें तो एक लम्बा वक्त अस्थायी सरकारों का ही रहा है। जाहिर है उसके पिछड़ने का एक बड़ा कारण यह भी है जबकि छत्तीसगढ़ में स्थायी सरकार मिलने से कमोबेष दृष्य अलग देखा जा सकता है। 20 बरस के उत्तराखण्ड में 10 मुख्यमंत्री आ चुके हैं जाहिर है यहां भी विकास चुनौती के साथ दूर की कौड़ी बनी हुई है। हालांकि सभी ने अपने-अपने हिस्से का प्रयास किया है मगर जब बात सुषासन की हो तो प्रयास भी अनुपात में बड़ा करना होता है और यह अस्थिरता से नहीं बल्कि स्थिर नीति और मजबूत सोच से ही सम्भव है। गौरतलब है कि सुषासन एक लोक सषक्तिकरण की अवधारणा है जहां जनता की मजबूती के लिए सबल नेतृत्व की आवष्यकता होती है। 

हालिया स्थिति यह है कि 18 मार्च 2017 से चल रही भाजपा की सरकार में एक बड़ा फेरबदल हुआ और आनन-फानन में मुखिया बदल दिया गया। कहा जाये तो उत्तराखण्ड में एक ही कार्यकाल के भीतर षासन की दूसरी लहर आयी है और वह भी तब जब यहां 70 के मुकाबले 57 का आंकड़ा भाजपा के पक्ष में रहा है। इतनी बड़ी जीत और 5 साल की स्थायी सरकार वाला व्यक्तित्व न दे पाना विकास के साथ थोड़ा अविष्वास तो गहराता है। जबकि सबका साथ और सबका विकास और सबका विष्वास मौजूदा सरकार का ष्लोगन है। हालांकि यह एक राजनीतिक प्रकरण करार दिया जा सकता है मगर यह एक सियासी पैंतरा है इससे गुरेज भी नहीं किया जा सकता और 2022 के चुनाव को नजर में रखकर यह सब किया गया है इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। जाहिर है इस नये परिवर्तन से लोक प्रबंधन और सुषासन के भी नये दृश्टिकोण फलक पर आयेंगे और जनता में भी यह उम्मीद परवान चढ़ेगी कि उनके हिस्से का बकाया विकास अब नया नेतृत्व दे देगा। उत्तराखण्ड की सरकारें दूरगामी नीति के अंतर्गत जरूरतमंदों के बुनियादी समस्या के निदान के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाती रहीं मगर सड़क, बिजली, पानी, षिक्षा, स्वास्थ, रोज़गार समेत अनेकों समस्याओं से पीछा नहीं छूटा। यहां कई ऐसे विभाग भी हैं जो षिकायतों के लिए जाने जाते हैं उनसे निपटना नये मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि चुनौती और कई रूप लिये हुए है ऐसे में कई पसीने से तर-बतर होना लाज़मी है। वैसे जब नेतृत्व बदलता है तो दृश्टिकोण बदल जाते हैं ऐसे में कार्य अच्छे भी हो सकते हैं और पहले से जारी क्रियाकलाप प्रभावित भी हो सकते हैं। कुंभ मेला, चारधाम यात्रा, भ्रश्टाचार पर लगाम, आपदा से निपटना और जनता में पैठ जैसे कार्यक्रम एक बार फिर नये सिरे से गतिषीलता को प्राप्त करेंगे ऐसी उम्मीद लाज़मी है।

गौरतलब है कि उत्तराखण्ड में केन्द्रीय योजनाओं की भरमार है आॅल वेदर रोड़ इसमें कहीं अधिक भारी-भरकम और विस्तार वाला है। राज्य की योजनाएं भी कमोबेष धरातल पर हैं मगर बीच में सरकार का हेरफेर इन सभी के साथ एक नवाचार की दक्षता के साथ नूतन कार्यषैली की राह भी लेगा। इन मामलों में सरकार कितना प्रभावषाली है इस पर भी दृश्टि रखना स्वाभाविक है। सरकार बदलने के क्या साइड इफेक्ट होते हैं इसे समझें तो पता चलता है कि नये नेतृत्व पर पुराने की तुलना में दबाव अधिक रहता है। जनता का दिल जीतने और सुषासन की बयार को उम्दा करने का जोखिम रहता है। कम समय में बहुत कुछ हासिल करने का जोड़-तोड़ भी षामिल रहता है। हालांकि सियासत में किन्तु-परन्तु, अच्छा-खराब और दबाव व जोखिम का सिलसिला अक्सर रहता है। जाहिर है प्रदेष में अब तक चल रही योजनाओं की गति बढ़ाने के अलावा नई योजनाओं के चयन को लेकर नये मुखिया के नेतृत्व पर केन्द्र की भी नजर बाकायदा रहेगी। खास यह भी है कि नये नेतृत्व को प्रदेष में प्रसार ले चुकी गतिविधियों को समझने में वक्त लगता है। मंत्रिपरिशद् के सदस्यों के साथ एक बेहतर समन्वय और विधायकों के साथ सामंजस्य की दरकार रहती है। इतना ही नहीं नौकरषाही के साथ तालमेल बिठाने को लेकर भी समय खपत करना पड़ता है। विपक्ष को भी साधने की नये सिरे से आवष्यकता रहेगी। व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसमें व्याप्त नेतृत्व कार्यसंचालन को एक सषक्त आयाम देता है। बदले निजाम में ऐसी कोई खामी नहीं है कि उन्हें कमतर आंका जाये मगर सुषासन की कसौटी पर जब सरकारें कसी जाती हैं तब केवल परिणाम ही काम का होता है। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व और पर्यवेक्षक बड़े भरोसे से प्रदेष की बागडोर त्रिवेन्द्र सिंह रावत से लेकर तीरथ सिंह रावत को अर्थात् एक टीएसआर से दूसरे टीएसआर को सौंपी है। इसके पीछे राजनीतिक इच्छा षक्ति भी है जो इस उम्मीद से युक्त है 2022 की षुरूआत में होने वाले उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में बाजी उनके पक्ष में रहेगी। हालांकि सियासत समय के साथ अलग पैंतरा लेती रहती है। आगे क्या होगा कयास लगाना कठिन है मगर यह उम्मीद करना अतार्किक न होगा कि उत्तराखण्ड की जनता जो कई समस्याओं में है उसे यह दूसरी लहर किनारे लगा देगी। 


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

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Wednesday, March 10, 2021

कौन लाएगा बंगाल में सुशासन !

जब षक्ति को वैधानिक मिलती है तो वह सत्ता में बदल जाती है। यही एक बड़ी वजह रही है कि राजनीतिक दल षक्ति प्रदर्षन के मामले में न पीछे हटते हैं और न ही किसी अन्य के डटे रहने को बर्दाष्त करते हैं। मौजूदा समय में यह बात पष्चिम बंगाल में पुख्ता होते हुए देखी जा सकती है। दरअसल राजनीति के अपने स्कूल होते हैं जिसका अभिप्राय विचारधारा से है और इन्हीं के चलते राजनीतिक संगठनों का अस्तित्व कायम रहता है। हालांकि राजनीतिक दलों के विचार भले ही टिकाऊ हों मगर कई राजनेता इसे लेकर अस्थिर ही रहते हैं क्योंकि राजनेता कपड़े की तरह विचार भी रातों-रात बदल लेते हैं जिसे आम तौर पर दल-बदल कहते हैं। भारतीय राजनीति में वैचारिक संक्रमण भी खूब आते रहे। वैसे इन दिनों पूर्वोत्तर के असम और दक्षिण के तमिलनाडु, पुदुचेरी और केरल के साथ पष्चिम बंगाल में भी चुनावी जंग जारी है। देखा जाय तो भारत में चुनावी मौसम अक्सर रहते हैं बस क्षेत्र और स्थान में बदलाव रहता है और हर चुनाव में सुषासन स्थापित करने के कसीदे गढ़े जाते हैं। इसके पीछे मात्र एक वजह जनमत का मुंह अपनी ओर मोड़ना रहा है। बाद में सुषासन कितना मिला, मिला या नहीं मिला यह सिर्फ चर्चे में रह जाता है। इन दिनों बंगाल चुनावी तपिष में कुछ ज्यादा ही गरम हो रहा है। भाजपा सत्ता हथियाने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए है और सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस भी कुर्सी बचाने की होड़ में लगी हुई है। मगर जिस तरह सियासी पैंतरे के बीच नेता कूद-फांद कर रहे हैं उससे हवा का रूख नया रास्ता अख्तियार कर सकती है। हालांकि चुनाव परिणाम आने पर कुछ भी कहना कठिन है पर यह कहना सहज है कि बंगाल में वादों और इरादों की झड़ी लगी हुई है और सुषासन देने की होड़ भी। 

प्रधानमंत्री मोदी की कोलकाता रैली जो 7 मार्च को आयोजित हुई में यह हुंकार देखी गयी कि जल्द आ जायेगा बंगाल में सुषासन। भाजपा का षीर्शस्थ नेतृत्व बंगाल के लोगों को सुषासन देने के लिए मानो प्रतिबद्ध है। इसके पहले दल के अध्यक्ष नड्डा भी कह चुके हैं कि ममता ने तानाषाही से केवल तुश्टिकरण किया है हम बंगाल में सुषासन लायेंगे। गौरतलब सुषासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है जो जन सषक्तिकरण के लिए जाना जाता है। सरकारें आती हैं और जाती हैं जबकि जनता विकास की बाट जोहती रहती है। ऐसा नहीं है कि सुषासन देने का राजनीतिक दलों का यह पहला प्रकरण है। चुनाव दर चुनाव फिजा में यह षब्द गूंजता रहा है पर हकीकत यह है कि देष में हर चैथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे और इतने ही अषिक्षित हैं। बेरोज़गारी सारे रिकाॅर्ड चकनाचूर कर चुकी है और पढ़ा-लिखा वर्ग ठगा महसूस कर रहा है। नौकरी देने के वायदे भी बंगाल की फिजा में गूंज रहे हैं पर सत्ता प्राप्ति के बाद सुर ऐसे बदल जाते हैं मानो यह बात उन्होंने कही ही न हो। जिस सुषासन के दम पर राजनीतिक दल सत्ता हथियाने की फिराक में है उसके लिए क्या होना चाहिए यह भी समझना सही रहेगा। गौरतलब है कि देष में सुषासन सूचकांक जारी होते हैं जिसमें षासन के विभिन्न मापदण्डों के आधार पर कई सेक्टर कसौटी पर होते हैं। कृशि और सम्बद्ध क्षेत्र, खाद्यान्न उत्पादन की वृद्धि दर, बागवानी उपज, दूध उत्पादन व मांस उत्पादन समेत फसल बीमा आदि की स्थिति का आंकलन षामिल है। बेहतर षासन व्यवस्था के मामले में दिसम्बर, 2019 में जारी सुषासन की यह सूची से यह पता चलता है कि तमिलनाडु देष का अव्वल राज्य है जबकि महाराश्ट्र और कर्नाटक दूसरे और तीसरे पर है। चैथे स्थान पर छत्तीसगढ़ आता है। पष्चिम बंगाल यहां दसवें स्थान पर है जिसकी स्थिति भाजपा षासित बिहार, उत्तर प्रदेष, गोवा आदि से कहीं बेहतर है। स्पश्ट है कि गुड गवर्नेंस इंडेक्स पष्चिम बंगाल को इतना खराब नहीं दिखा रहा है जितना कि विरोधी वहां बखेड़ा खड़ा किये हुए हैं। यहां सुषासन अव्वल नहीं है मगर कमजोर भी नहीं है। कहा जाये तो ममता सरकार को निर्ममता नहीं करार दी जा सकती। 

पष्चिम बंगाल से वामपंथ को राजनीतिक क्षितिज से ओझल हुए एक दषक हो गया तब से ममता बनर्जी की सरकार है। यहां वर्गों में बंटी राजनीति भी खूब विस्तार लिए हुए है। भाजपा किस आधार पर बंगाल की सत्ता पर काबिज होना चाहती है इस गुणा-भाग को भी समझना ठीक रहेगा। दरअसल भारतीय जनता पार्टी 2016 के विधानसभा चुनाव में कुल 294 सीटों के मुकाबले मात्र 3 पर सिमट गयी थी मगर 2019 के लोकसभा चुनाव में वह 18 सीटें जीती थी जबकि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल 22 पर थी। यहां भाजपा की बड़ी जीत मानी गयी। इसी को देखते हुए भाजपा को यह विष्वास है कि बंगाल के मतदाता उसे निराष नहीं करेंगे और यही कारण है कि बंगाल को अपने पक्ष में करने के लिए पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है। तुणमूल कांग्रेस के कई जिताऊ और मजबूत चेहरे अब भाजपा के तारणहार बन गये हैं जिसमें अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती भी षामिल हैं। ममता बनर्जी पहले जैसी मजबूत नहीं है पर टक्कर में कोई कमी नहीं है। फिलहाल बंगाल के विधानसभा चुनाव में सीधी लड़ाई भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की ही दिखती है मगर ओवैसी फैक्टर ममता बनर्जी का खेल बिगाड़ सकता है। पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में भी ओवैसी फैक्टर प्रभावी रहा और राजद बड़ी जीत के बावजूद सत्ता हासिल नहीं कर पायी। हालांकि सियासत में अंदाजा पूरी तरह सच हो नहीं पाता और अन्तिम समय तक रूख में उतार-चढ़ाव बना रहता है। 

गौरतलब है कि पष्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट सियासी हथियार के तौर पर देखे जाते हैं साल 2006 तक राज्य के मुस्लिम वोट बैंक पर वाममोर्चा का कब्जा था उसके बाद ये वोटर धीरे-धीरे ममता की तृणमूल कांग्रेस की ओर आकर्शित हुए और 2011 तथा 2016 के विधानसभा चुनाव में इसी वोट बैंक की बदोलत ममता सत्ता में आई भी और पुनः काबिज  हुई। ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुश्टीकरण का आरोप भी लगता रहा। दरअसल पहली बार सत्ता में आने के साल भर बाद भी ममला सरकार ने इमामों को ढ़ाई हजार रूपए मासिक भत्ता देने का एलान किया था जिसकी जमकर आलोचना हुई और कलकत्ता हाईकोर्ट की आलोचना के बाद इस भत्ते को अब वक्फ बोर्ड के जरिये दिया जाता है। चुनाव में स्थानीय और बाहरी का भी नारा गूंज रहा है। बीजेपी हिन्दू वोटरों को अपनी ओर आकशित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही और यह संकल्प कई बार दोहरा चुकी है कि प्रदेष को अमार सोनार बांग्ला का खिताब पुनः वापस करायेगी। चुनाव के विगुल के साथ फिलहाल ताकत झोंकी जा रही है। हालांकि बाकी चुनावी राज्यों में भाजपा ऐसी ही ताकत लगा रही है। यह तो मतदाताओं को तय करना है कि वे किसे सत्तासीन करेंगे। दो टूक यह भी है कि सियासती लोग अपने भाशण से जनता को मंत्रमुग्ध करके वोटो पर कब्जा तो कर लेते हैं मगर वास्तव में उतना नहीं करते जितना बोलते हैं। इसकी भी मापतौल जनता को करनी चाहिए। वैसे सरकारें खरी तब उतरती हैं जब जनता चैकन्नी होती है। सुषासन प्रत्येक नागरिक का अधिकार और इसे पूरा करना सरकार का दायित्व मगर चुनावी फिजा में जो फलक पर गूंजता है वह जमीन पर कितना उतरता है यह अक्सर पड़ताल में निराष ही करता रहा है।



 डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

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वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

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एक सिक्के के दो पहलू हैं अभिव्यक्ति और सुशासन

दो टूक यह कि संविधान एक रास्ता है और नागरिकों के अधिकार इसी मार्ग से गुजरते हैं और इसी में एक है वाक् एवं अभिव्यक्ति का अधिकार जिसका उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अन्तर्गत देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी जून 2014 में कहा था कि अगर हम बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी नहीं देंगे तो हमारा लोकतंत्र नहीं चलेगा। हालांकि तब इन्हें प्रधानमंत्री बने बामुष्किल एक महीना हुआ था। गौरतलब है कि वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न केवल मूल अधिकार है बल्कि संविधान का मूल ढांचा भी है और इससे जनता को न वंचित किया जा सकता है और न ही रोका जा सकता है। मगर इस बात से गुरेज़ नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बेजा होने से न केवल परिणाम खराब होंगे बल्कि लोग भी अनुत्पादक कहे जायेंगे। कहा जाये तो षालीनता और संविधान की भावना के अन्तर्गत की गयी अभिव्यक्ति मर्यादित और सर्वमान्य है। फिलहाल 3 मार्च 2021 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर यह स्पश्ट कर दिया कि सरकार से अलग विचार रखना देषद्रोह नहीं है। गौरतलब है कि जम्मू-कष्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला पर देषद्रोह का मुकदमा इसलिए किया गया था कि उन्होंने अनुच्छेद 370 को लेकर टिप्पणी की थी। ध्यानतव्य हो कि 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कष्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए को समाप्त कर दिया गया था साथ ही केन्द्रषासित प्रदेष बनाते हुए लद्दाख को इससे अलग कर दिया गया। इसे देखते हुए फारूख अब्दुल्ला की तिलमिलाहट सामने आयी जिसके चलते उन पर देषद्रोह का मुकदमा किया गया था। षीर्श अदालत ने न केवल इस मामले में फारूख अब्दुल्ला के खिलाफ दायर याचिका को खारिज किया बल्कि याचिकाकत्र्ताओं पर 50 हजार रूपए का जुर्माना भी लगाया। 

बीते कुछ वर्शों से यह देखने को मिल रहा है कि कई प्रारूपों में वाक् एवं अभिव्यक्ति को लेकर देष का वातावरण गरम हो जाता है। जिसके चलते देषद्रोह के मुकदमों में भी बाढ़ आयी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी अधिकारों की जननी है इसी के चलते सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे जनमत को तैयार करते हैं। सभी सरकारें यह जानती हैं कि कई काम और बड़े काम करते समय नागरिकों के विचारों से संघर्श रहेगा और आलोचना भी होगी और ये आलोचनाएं सुधार की राह भी बतायेंगी। बावजूद इसके सरकारों के मन के कोने में यह जरूर रहा है कि उनकी आलोचना न हो तो अच्छा है पर लोकतंत्र में इसकी गुंजाइष हो ही नहीं सकती। ये तो इस पर निर्भर है कि अपने मतदाताओं और नागरिकों की आलोचना को कौन कितना बर्दाष्त कर सकता है। लोकतंत्र और अभिव्यक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक पर आंच आती है तो दूसरे पर इसकी तपिष का असर पड़ता ही है। इसके आभाव में अंकुष वाली सत्ता का लोप होने का खतरा रहता है। पड़ताल बताती है कि आंदोलनकारियों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, किसानों, मजदूरों, लेखकों, पत्रकारों, कवियों, राजनीतिज्ञों और कई एक्टिविस्टों पर राजद्रोह के आरोप वाले गाज गिरते रहे हैं और इसे लेकर षायद ही कोई सरकार दूध से धुली हो। 2011 में तमिलनाडु के कुंडलकुलम में एटमी संयंत्र का विरोध कर रहे किसान प्रदर्षनकारियों के खिलाफ राजद्रोह के 8856 मामले लगाये गये थे जो अपने आप में एक भीशण स्वरूप है। राश्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2014 से 2018 के बीच 233 राजद्रोह के मुकदमा किये गये। गौरतलब है कि एनसीआरबी ने भी 2014 से राजद्रोह के मामले जुटाना षुरू किया था। हालांकि ऐसे आरोपों में दोशसिद्ध लोगों की संख्या मामूली ही है। 

देष में परम्रागत मीडिया के अलावा सोषल मीडिया और न्यू मीडिया समेत कई संचार उपक्रम देखे जा सकते हैं। इससे अभिव्यक्ति न केवल मुखर हुई है बल्कि वैष्विक स्वरूप लिए हुए है। सोषल मीडिया मानो आवेष से भरा एक ऐसा प्लेटफाॅर्म है जहां सच्चाई के साथ झूठ की अभिव्यक्ति स्थान घेरे हुए है। हालांकि इसकी कटाई-छटाई के मामले में भी सतर्कता बरतने का प्रयास किया जा रहा है। बीते फरवरी में सरकार ने इस पर कुछ कठोर कदम उठाने का संकेत दे दिया है। देष में अभिव्यक्ति बहुत मुखर और आक्रामक होने की बड़ी वजह भौतिक स्पर्धा के अलावा लोकतंत्र के प्रति सचेतता भी है। लेकिन यह कहीं अधिक आक्रामक रूप लेती जा रही है। ऐसे में सरकारों को भी यह सोचने-समझने की आवष्यकता है कि देष को कैसे आगे बढ़ाये और जनता को लोकतंत्र की सीमा में रहते हुए कैसे मर्यादित बनाये। किसी भी सभ्य देष के नागरिक समाज को ही नहीं बल्कि सरकारों को भी विपरीत विचार, आलोचना या समालोचना को लेकर संवेदनषील होना चाहिए। हालांकि आक्रामकता भी लोकतंत्र की षालीनता ही है बषर्ते इसकी अभिव्यक्ति देषहित में हो। सरकारें भी गलतियां करती हैं इसके पीछे भले ही परिस्थितियां जवाबदेह हो पर इतिहास गलतियों को याद रखता है परिस्थितियों को नहीं। राहुल गांधी का यह कहना कि आपातकाल एक गलती थी इस बात को पुख्ता करता है। सरकार के फैसले भी कई प्रयोगों से गुजरते हैं ऐसे में जनहित को सुनिष्चित कर पाना बड़ी चुनौती रहती है। लोकनीतियों को लोगों तक पहुंचा कर उनके अंदर षान्ति और खुषियां बांटना सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही है। यदि ऐसा नहीं होता है तो आलोचना स्वाभाविक है। फारूख अब्दुल्ला के मामले में षीर्श न्यायालय ने यह बता दिया है कि अनुच्छेद 370 और 35ए हटाना सरकार के क्रियाकलाप का हिस्सा है मगर इसे लेकर कोई टिप्पणी न करे इस पर प्रतिबंध सम्भव नहीं है। वैसे एक सच्चाई यह भी है कि व्यक्ति जब बड़ा हो तो अभिव्यक्ति जरा नापतौल कर करना चाहिए क्योंकि उनके बोलने से देष का वातावरण और माहौल खतरे में जा सकता है।

देषद्रोह भारतीय कानून में एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है। आईपीसी की धारा 124ए के अन्तर्गत उस पर केस दर्ज किया जाता है। वैसे किसी भी देष में सबसे बड़ा अपराध देषद्रोह ही होता है। आईपीसी में इसकी परिभाशा को देखें तो पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति देष विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, उसका प्रचार करता है इतना ही नहीं राश्ट्रीय चिन्ह् का अपमान करता है साथ ही संविधान को नीचा दिखाने की कोषिष करता है तो यह देषद्रोह है। उच्चत्तम न्यायालय ने सरकार से अलग विचार रखने को देषद्रोह नहीं माना है। ऐसा देखा गया है कि नागरिक जिस सरकार को चुनता है लोकहित के सुनिष्चित न होने की स्थिति में वही उससे अलग विचार रखने लगता है और ऐसा होता रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार में आस्था रखने वाले मतदाता किसी भी परिस्थिति में उसी के साथ रहते पर ऐसा होता नहीं है। फिलहाल वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान की धरोहर है और इसका संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय है। ऐसे में कोई भी विचार जो संविधान की मर्यादा के साथ मेल खाते हों उसे बनाये रखना सब की जिम्मेदारी है। हालांकि इसकी रोकथाम भी संविधान के अनुच्छेद 19(2) में है। महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह एक मूल अधिकार है और इस मामले में अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चत्तम न्यायालय जाया जा सकता है। फिलहाल सियासत और सरकार में मौकापरस्ती का खेल खूब चलता है और ऐसे कानून की आड़ में उपयोग के साथ दुरूपयोग का चलन भी रहा है। ऐसे में चाहिए कि सरकार देष आगे बढ़ाने की सोचे और नागरिक वाक् एवं अभिव्यक्ति की मर्यादा को बनाये रखे।


डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

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कोरोना वैक्सीन का अंतर्राष्ट्रीय फलक

दौर ने दो फलक देखे एक कोविड-19 के चलते जमींदोज होती मानव सभ्यता तो दूसरा इससे बचाव के लिए वैक्सीन की खोज और इसका विस्तार। कोरोना ने दुनिया के लगभग हर कोने को स्पर्ष किया पर अभी वैक्सीन की पहुंच सभी जगह नहीं है। मौजूदा वक्त में जब धरती के कई हिस्सों से कोरोना वापसी कर रहा है तो कई हिस्से इसके नये प्रारूप से ग्रस्त भी हो रहे हैं। भारत में भी कोरोना अभी पूरी तरह गया नहीं है बल्कि महाराश्ट्र, केरल और पंजाब समेत कई राज्यों में यह बढ़त बनाये हुए है। इतना ही नहीं इसके नये स्ट्रेन का पर्दापण ब्रिटेन, साउथ अफ्रीका, ब्राजील, जापान, फिनलैंड व भारत समेत कई देषों में लगातार देखा जा सकता है। मानव सभ्यता को कई आयामों में छिन्न-भिन्न करने वाले कोविड-19 को लेकर अभी भी भय और डर का माहौल व्याप्त है। टीकाकरण के बावजूद सावधानी इसका अनिवार्य पक्ष है। देष चाहे पूर्वी हो या पष्चिमी सभी अभी भी इस अदृष्य बीमारी के खौफ से भरे हैं। इससे पूरी तरह निजात कब मिलेगी यह कह पाने की स्थिति में कोई देष नहीं है। सभी इसके बचाव की कोषिष में हैं पर मुक्ति की तारीख किसी के पास नहीं है। इसी दिषा में भारत ने भी अपने हिस्से की सफलता अर्जित की और वैक्सीन का निर्माण किया और इस वैक्सीन से भारत अपने साथ दुनिया को भी सुरक्षा दे रहा है। कोविडषील्ड को सीरम इंस्टीट्यूट आॅफ इण्डिया ने बनाया है जबकि कोवैक्सीन को हैदराबाद स्थित भारत बायोटैक कम्पनी न इण्डियन काउंसिल आॅफ मेडिकल रिसर्च के साथ मिलकर बनाया। भारत में वैक्सीन का दूसरा चरण 1 मार्च, 2021 को षुरू हो चुका है जिसमें 60 वर्श से अधिक उम्र के लोग और गम्भीर रूप से बीमार 45 वर्श से अधिक आयु के लोग षामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी को भी इसी चरण में वैक्सीन की पहली डोज़ दी गयी उन्हें इसकी दूसरी डोज़ 28 दिन बाद लगेगी। गौरतलब है कि 16 जनवरी 2021 को टीकाकरण का पहला अभियान देष में षुरू हुआ था जिसमें स्वास्थकर्मी समेत विषिश्ट वर्ग षामिल थे। 

पूरी दुनिया में 87 देषों में कोरोना वैक्सीनेषन का काम जोरों पर है और अब तक 20 करोड़ लोगों को इसकी डोज दी जा चुकी है। स्पश्ट है कि 7.5 अरब से अधिक की दुनिया में यह मामूली है मगर प्रयास सराहनीय है। एक सच यह भी है कि अभी वैक्सीन की पहुंच से कई देष दूर हैं। 130 से अधिक देष ऐसे हैं जहां वैक्सीन की एक भी डोज नहीं पहुंची है। इतना ही नहीं टीकाकरण के लिए मंजूर वैक्सीन की 75 फीसद डोज पर मात्र 10 देषों का कब्जा है। जिसमें सबसे अधिक अमेरिका है जहां लगभग 6 करोड़ से अधिक लोगों को यह डोज़ दिया जा चुका है। इसके बाद चीन तत्पष्चात् यूरोपीय संघ के देष षामिल हैं। देखा जाय तो पूरी दुनिया में कोविड-19 के संक्रमण के 11 करोड़ से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और करीब 200 देषों में 24 लाख से अधिक लोग इसके चलते मर चुके हैं। अमेरिका, भारत और ब्राजील में संक्रमण के मामले सर्वाधिक देखे गये चैथे पर ब्रिटेन और पाचवें नम्बर पर रूस आता है। इसके बाद कई यूरोपीय देष हैं। जिन देषों में वैक्सीन का कार्यक्रम चल रहा है उसमें दो-तिहाई उच्च आय वाले देष हैं जबकि बचे हुए देष मध्यम आय के हैं। जाहिर है इनमें से कोई भी निम्न आय वाला देष नहीं है। गरीब देषों को वैक्सीन कब और कैसे मिलेगी इसमें भी पेंच कम नहीं है। आबादी और आर्थिक हालत पर काम करने वाली संस्था वन के अनुसार अमीर देषों ने अपनी आबादी की जरूरतों से भी कई गुना अधिक वैक्सीन बुक करा रखा है। ऐसे में पहले उनकी पूर्ति फिर इनकी खोज-खबर ली जायेगी। गौरतलब है कि अफ्रीकी महाद्वीप के 45 देषों में 17 देष रेड जोन में है और कोरोना की दूसरी लहर को लेकर दुनिया चिंता में है। ऐसे में वैक्सीन तक पहुंच नहीं होना दूसरे देषों के लिए भी खतरा साबित हो सकती है। लेकिन किसी दूसरे देष के लिए वैक्सीन की आपूर्ति में अभी कई महीनों का फासला है। लेकिन यह इंतजार संकट को बढ़ा सकता है। 

भारत में भी 1 करोड़ से अधिक आबादी को कोरोना वैक्सीन की डोज़ लग चुकी है बावजूद इसके केस एक बार फिर बढ़ते दिख रहे हैं। महाराश्ट्र, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेष, कर्नाटक आदि कई स्थानों में कोरोना कहर बनकर फिर वापसी किया है। सब कुछ सकारात्मक सोच और क्रियाकलाप के बावजूद अभी भी दुनिया में 2 करोड़ एक्टिव केस हैं और 4 लाख रोज़ाना की दर से नये केस आ रहे हैं और मौत का आंकड़ा भी हजारों की तादाद में है। जाहिर है अन्तर्राश्ट्रीय फलक पर कोरोना का काला बादल छंटा नहीं है जबकि कोरोना वैक्सीन भी अन्तर्राश्ट्रीय फलक पर देखी जा सकती है। भारत में इस महामारी के बीच जनवरी से मध्य फरवरी 2021 के बीच 229 लाख कोरोना वायरस के टीक उपलब्ध कराये। दुनिया के देषों को भारत द्वारा अनुदान सहायता और वाणिज्यिक आपूर्ति के तहत टीका उपलब्ध कराने के अभियान को टीका मैत्री का नाम  दिया गया जिसे टीका कूटनीति भी कहना तार्किक होगा। इसमें 64 लाख खुराक अनुदान सहायता से तो बचा हुआ बहुत बड़ा हिस्सा वाणिज्यिक आपूर्ति के तहत भेजी गयी। इतना ही नहीं अफ्रीकी देषों, लैटिन अमेरिका और प्रषान्त द्वीपीय देषों को भी भारत टीका उपलब्ध कराने का इरादा रखता है। देखा जाय तो भारत सद्भावना और सकारात्मकता को हर परिस्थिति में बनाये रखना अपनी जिम्मेदारी समझता है और इसी का नतीजा है कि भेंट के तौर पर टीके की 64 लाख खुराक पड़ोसी देषों को उपलब्ध करायी जिसमें बंग्लादेष को 20 लाख, म्यांमार को 17 लाख और नेपाल को 10 लाख समेत, भूटान, मालदीव, माॅरीषस, श्रीलंका, बहरीन, अफगानिस्तान, ओमान आदि अन्य देष षामिल हैं। इतना ही नहीं वाणिज्यिक आधार पर टीके को ब्राजील, मोरक्को, मिस्र, अल्जीरिया, दक्षिण अफ्रीका और कुवैत समेत अनेक देषों को खुराक की आपूर्ति की है। किसान आंदोलन को लेकर कनाडाई प्रधानमंत्री ट्रूडो के बयान से भारत और कनाडा के रिष्ते में थोड़ी खटास आयी थी हालांकि इसको दरकिनार रखते हुए भारत कनाडा को भी टीका दे रहा है। इस हेतु ट्रूडो ने मोदी से बात की थी। 

दो टूक यह है कि अन्तर्राश्ट्रीय फलक पर भारतीय वैक्सीन ने दमदारी के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है और दुनिया के देषों का वैक्सीन ने भरोसा भी जीता है। हालांकि वैक्सीन तो चीन ने भी बनाया मगर भरोसे में वह खोखला सिद्ध हुआ और भारत की वैक्सीन की तुलना में वह बेहतरीन सुरक्षा कवच भी नहीं है। कई अन्य देषों ने भी इस दिषा में बड़ी कोषिषें की और सुरक्षा की दृश्टि से कमोबेष उनका भी यह अभियान जारी है मगर जिस तरह भारत दुनिया में अपनी उपस्थिति वैक्सीन के माध्यम से दर्ज करायी है वह काबिल-ए-तारीफ है। इससे न केवल द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सम्बंधों को ऊंचाई मिल रही है बल्कि टीका कूटनीति के चलते चीन और पाकिस्तान जैसे देष दबाव भी महसूस कर रहे हैं। फिलहाल कोरोना के भंवर जाल में फंसे एक साल का लम्बा वक्त बीत गया और अब बाहर निकलने के लिए टीकाकरण जारी है। भारत स्वयं के साथ दुनिया को भी इस मुसीबत से बाहर निकालने का जो काम किया है उससे वैष्विक फलक पर भारत की चमक बढ़ना लाज़मी है।

डाॅ0 सुशील कुमार सिंह

निदेशक

वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन ऑफ़  पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 

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